किस्सा प्रभुदत्त खेड़ा का : पढ़ा लिखा आदमी
(१)
उन दिनों हिंदुस्तान बहुत बड़ा था, पूरब से पच्छिम तक खूब फैला हुआ था. हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दू थे और मुसलमान और पठान भी, सिख थे और ईसाई भी लेकिन सब हिंदुस्तानी थे. इन सबका रहन-सहन, खान-पान अलहदा था, वेशभूषा और बोली अलग-अलग थी लेकिन सबका दिल एक-दूसरे के लिये एक जैसा धड़कता था. इसी हिन्दुस्तान में एक शहर था लाहौर, वही लाहौर जो अपने सीने हिंदुस्तानियत का ज़ज्बा समेटे रहता था और दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसा हसीन शहर माना जाता था. इसी लाहौर में सन १९२८ की गर्मियों में सोमदत्त खेड़ा के घर में पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया, प्रभु दत्त.
सोमदत्त कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट थे, उनकी दिली ख्वाहिश थी कि प्रभुदत्त भी खूब पढ़े लेकिन उनके साथ समय ने कुछ ऐसा खेल किया कि उन्हें लाहौर छोड़ कर लुधियाना के पास झंग नामक गाँव में जाकर बसना पड़ा. झंग छोटी बस्ती थी, एक स्कूल था जिसमें प्राथमिक शाला लगती थी. एक हेड मास्टर था जो मास्टर भी था और पोस्टमास्टर भी. अकेला मास्टर पहली से लेकर चौथी कक्षा तक सबको पढ़ाता था. एक बड़ा कमरा जिस पर टिन की चादर लगी थी, उसी की छाँव में थोड़ी-थोड़ी दूर पर जूट से बनी पांत पर बैठकर बच्चे उर्दू भाषा में पढ़ते थे.
मास्टर जी का रुतबा गज़ब का होता था. ऊंचे-पूरे पंजाबी मर्द वाला कद्दावर शरीर, बदन पर आधे बांह की लम्बी कमीज़, सलवारनुमा पैजामा, सिर पर सफ़ेद पगड़ी, पगड़ी के ऊपर तना हुआ कलफदार तुरला और ऊपर से कड़क आवाज़- 'ओये खोते...'
मास्टर जी एक क्लास को पढ़ाते फिर उन्हें कुछ पढने या रटने का काम देकर दूसरी क्लास को पढ़ाते और इसी तरह तीसरी और चौथी क्लास को. किसी की क्या मजाल कि कोई विद्यार्थी दाएं-बाएँ झाँक ले क्योंकि उनकी नज़र हर समय हर पर रहती थी. उनके हाथ में तैनात 'रूल' और आँखों में सतर्कता का भय पूरे कमरे में व्याप्त रहता था. वे सुनिश्चित करते थे कि सब बच्चों को एक से लेकर बीस तक का पहाड़ा और पउआ, अद्धा, पौना रटा हुआ होना चाहिए.
विद्यार्थियों के पास लिखने के लिये लकड़ी की पटिया होती थी जिसे तख्ती कहते थे. उस पर सफ़ेद गेरू की मिट्टी, जिसे गाचनी कहते थे, का लेप लगाया जाता था और बेत से बनी कलम को काली स्याही में डुबा कर बच्चे उस पर खुशखती लिखा करते थे. रोज के रोज घर से लिखकर लाने के लिए पाठ दिया जाता था जिसे लिखकर बच्चे इस 'खुशखत' को मास्टर जी को दिखाया करते थे.
चूँकि स्कूल की छत टिन की थी इसलिए गर्मी के दिनों में बहुत तपती थी. पंजाब की भीषण गर्मी में पसीना बहता रहता लेकिन पढ़ाई चलती रहती. वहां बारिश कम होती थी लेकिन जब होती तो टिन की चादर पर पानी की बूँदें इतना शोर करती कि मास्टर जी की आवाज़ बच्चों को सुनाई नहीं पड़ती थी लेकिन किसी में हिम्मत नहीं थी कि कोई कह दे- 'मास्टर जी, सुनाई नहीं पड़ रहा है.'
यदि कोई लड़का किसी दिन स्कूल नहीं आता तो चार लड़कों को उसके घर भेजा जाता ताकि वे उसको पकड़कर या सशरीर उठाकर स्कूल लाएं.
ठण्ड के दिनों में स्कूल के मैदान में बरगद के पेड़ के पास खुली धूप में पढ़ाई होती. गाँव के लोग, जिनमें बच्चों के अभिभावक भी होते थे, वे भी वहां बिछी हुई खाट पर बैठे-बैठे बच्चों को पढ़ते हुए चुपचाप देखते रहते और अपने भाग्य पर अफ़सोस करते कि उनके ज़माने में स्कूल नहीं थे, वे पढ़ न सके.
बच्चों की ग़लती होने पर उनके सामने बच्चों की ठोकाई होती थी, बेंत से सोंटाई होती थी या 'रूल' से गदेलियाँ लाल होती थी लेकिन कोई भी मना नहीं करता था. वे सोचते कि मास्टर को मारने का अधिकार है, वे मारेंगे नहीं तो बच्चे पढ़ेंगे कैसे?
उस समय केवल बड़ी जगहों में पोस्ट आफिस हुआ करते थे. स्कूल के मास्टर पोस्ट मास्टर थे और पोस्टमेन भी. गाँवों की डाक मोटे झोले में लेकर हरकारे पोस्ट आफिस से पैदल निकलते थे और मीलों दूर पगडंडियों के सहारे गाँव-गाँव डाक बाँटते निकल जाते और लिखी हुई चिट्ठियाँ लेकर वापस पोस्ट आफिस आते. इन हरकारों के पास एक भाला होता था जिसके सिरे में घंटी लगी रहती थी. जब वे चलते तो घंटियाँ बजती रहती थी. घंटियों की आवाज़ सुनकर जंगली जानवर समझ जाते थे कि कोई आदमी रास्ते से गुजर रहा है परन्तु उस पर हमला नहीं करना है. घंटी की धुन पर हरकारा पंजाबी लोकगीत गाता हुआ अपना सफ़र तय कर लेता और इस तरह सुख-दुख के समाचार घर-घर पहुँच जाते.
मास्टर जी स्कूल की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद चिट्ठियों की छंटाई करते थे और शाम के समय चिट्ठियां पहुंचा देते. अधिकतर लोग पढ़ना नहीं जानते थे इसलिए मास्टर जी से ही पढ़वा लेते. ख़ुशी की खबर होती तो मास्टर जी को गुड़ खिलाते, मीठी लस्सी पिलाकर विदा करते.
मास्टर जी ने किसी घर के बाहर आवाज़ लगाईं- 'तार आया है.' तो तार का नाम सुनते ही बिना पढ़े घर में रोना शुरू हो जाता क्योंकि टेलीग्राम आम तौर पर शोक सन्देश लेकर आते थे. इसलिए मास्टर जी अक्सर तार को विद्यार्थियों के माध्यम से भिजवा देते क्योंकि दुःख का सन्देश उन्हें भी दुखी कर देता था.
(२)
पंजाब में पंजाबियत कुछ खास रंग लिये हुई थी. पंजाबी हर मामले में मज़बूत था, मेहनत हो या खाना-पीना, लड़ना-भिड़ना हो या भाईचारा. आम तौर पर कृषि पर आधारित जीवन था इसलिए समृद्धि नहीं थी लेकिन जीवन मज़े में चलता था. प्रभुदत्त के घर में सामान्य आर्थिक परिस्थिति थी. उसके पिता चाहते थे कि परभू पढ़-लिख ले क्योंकि अब सब तरफ पढ़ाई का हल्ला है, पढ़ाई करने से अकल बढ़ेगी और कोई सरकारी नौकरी लग गयी तो लड़के की ज़िन्दगी बदल जायेगी. मास्टर जी बता रहे थे- 'तुम्हारा लड़का पढ़ने में तेज है. याददाश्त भी अच्छी है, तरक्की करेगा' तो सुनकर अच्छा लगा और उम्मीद भी बनी.
प्रभुदत्त चुप्पा लड़का था. खेल-कूद में उसका दिल नहीं लगता था, अधिकतर घर में ही रहता और मां के काम में हाथ बंटाता. उसकी अहमद से पटती थी, दोनों खेत की मेढ़ पर बैठे-बैठे आपस में बात करते रहते थे, आज क्या-क्या खाया, स्कूल में क्यों मार पड़ी, बाऊ जी क्यों गुस्सा हो रहे थे, मां क्यों रोई आदि अनेक ज्वलंत प्रश्न थे जिस पर वे अपनी कहानियाँ सुनाते और सोचते कि कब बड़े हों और कब इन यातनाओं से मुक्ति मिले! एक दिन की चर्चा में प्रभुदत्त ने अहमद से पूछा- 'तू मांस क्यों खाता है?'
'क्या पता? मैं तो बचपन से खा रहा हूँ.'
'मांस के लिये जानवर की हत्या करनी पड़ती है न?'
'हाँ, ये तो है.'
'फिर?'
'फिर क्या, तुम मेरे घर में पैदा हुए होते तो तुम भी खाते.'
'हूँ. हम लोग नहीं खाते इसलिए यह सवाल मेरे दिमाग में आता है और तुम्हारे दिमाग में नहीं आता.'
'तू भी खाया कर, बहुत अच्छा लगता है.'
'नहीं, मुझे मत बोल. अरे सुन न, तेरी अम्मी सेवई की खीर बहुत अच्छी बनाती है लेकिन एक ही बार खिलाती है, ईद में. क्या बीच में नहीं बना सकती?'
'मैं अम्मी से पूछ कर बताऊंगा, तेरे को खाना है क्या?'
'हाँ यार, बहुत याद आती है.'
'कल बताता हूँ.' अहमद ने कहा.
अगली सुबह दोनों दोस्त अपने-अपने घर से स्कूल जाने के लिये निकले, एक तिगड्डे पर मिले. मिलते ही प्रभु ने पूछा- 'क्या हुआ?'
''क्या?'
'अम्मी से पूछा सेवई की खीर के लिये?'
'पूछा.'
'कब आऊं तेरे घर?'
'कभी भी आ जा लेकिन अभी घर में सेवई ख़त्म हो गई है. दूध की कोई कमी नहीं इसलिए सेवई के बदले चांवल की खीर बनेगी लेकिन एक शर्त है.'
'क्या?'
'अम्मी कह रही थी कि तुझे अकेली खीर नहीं मिलने वाली, साथ में रोटी तरकारी खानी पड़ेगी.'
'मंज़ूर है, कब आना है?'
'बताऊंगा, अम्मी से पूछ कर बताऊंगा.'
'ठीक है.'
'अच्छा ये बता कि तू घर में भी पढ़ता है क्या?'
'हाँ, रोज पढ़ता हूँ. सोने के पहले एक घंटा रोज.'
'यार मेरा दिल पढ़ने में नहीं लगता. न स्कूल में, न घर में.'
'क्यों?'
'क्या पता? मुझे तो पढ़ाई बेकार लगती है. चौथी जमात तक पढूंगा किसी प्रकार फिर छोड़ दूंगा, घर का काम करूंगा.'
'तेरी मरज़ी लेकिन मैं तो पढूंगा.'
'पढ़कर क्या करेगा?'
'मैं? मैं पढ़कर मास्टर जी बनूँगा.'
'मास्टर जी? तेरे बाऊ जी तो किसी से कह रहे थे कि तुझे पटवारी बनवाएंगे. फिर तू मास्टर जी क्यों बनना चाहता है?'
'इसलिए कि मैं जानना चाहता हूँ कि बिना मारे-पीटे भी विद्यार्थियों को पढाया जा सकता है क्या?'
'तेरे मन में ये बात क्यों आई?'
'तू जानता है कि गांव के कितने बच्चे मार की डर से स्कूल नहीं जाते?'
'हाँ, ये बात तो है.'
'वे सब अनपढ़ रह जाएंगे न?'
'हाँ.'
'अँगरेज़ सरकार हमें पढ़ाना चाहती है ताकि हम दुनिया को जान सकें.'
'पढ़ने से दुनिया मालूम होती है क्या?'
'और क्या?' प्रभुदत्त ने कहा. इतने में स्कूल आ गया. दोनों अपनी कक्षा में बैठ गए.
अहमद मन ही मन सोच रहा था कि उसका पढ़ने में दिल नहीं लगता तो वह दुनिया कैसे जानेगा? क्या दुनिया को जानना ज़रूरी है?
प्रश्न यह है कि शिक्षा के माध्यम से क्या हम दुनिया को जान सकते हैं? शिक्षा विविध भाषाओं से हमारी जान-पहचान कराती है, जानकारियों का पुलिंदा हमारे सामने पेश करती है, हमें जोड़-घटाना, गुणा-भाग करना सिखाती है, ज्ञान-विज्ञान से जोड़ती है. समझदारी विकसित करती है और आपसी प्रतिस्पर्धा का भाव रोपती है. सफल होने पर खुश होना सिखाती है और असफल होने पर पुनः प्रयास करने की उत्तेजना पैदा करती है.
चूँकि आदि काल से वर्तमान तक पढ़ाई सामूहिक क्रिया रही है इसलिए यह हमें समाज के विभिन्न समूहों से जोड़ती है और दूसरों के साथ ताल-मेल करके जीना सिखाती है. दुनिया के साथ चलना और सहयोग करना और विपरीत विचारों का सम्मान करना सिखाती है.
तो क्या दुनिया को अनुभव से जाना जा सकता है? अनुभव हमारे जीवन में हुई घटनाओं की स्मृतियाँ हैं. किसी एक क्रिया की प्रतिक्रिया अनेक ढंग से हो सकती है. हम किसी को देखकर मुस्कुराएं तो उत्तर में मुस्कराहट वापस आ सकती है, 'कोई जवाब नहीं' वापस आ सकता है, उपेक्षा वापस आ सकती है या नाराजगी भी. इस स्थिति में मुस्कुराने की प्रतिक्रिया में भी भ्रम की स्थिति है इसलिए मुस्कराहट का उपयोग सोच-समझ कर किया जाता है. जब मुस्कराहट जैसा मधुर व्यवहार अलग-अलग ढंग परिणाम देता है तो दुनिया को कैसे जाना जाए?
यह समस्या केवल अहमद जैसे विद्यार्थी की ही नहीं है, प्रत्येक जिज्ञासु की है जो शिक्षा से जुड़कर दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा है. तो क्या शिक्षा हमें दुनियादारी नहीं सिखाती?
सिखाती है, दुनियादारी सिखाती है लेकिन दुनिया के रहस्य नहीं बताती बल्कि उन रहस्यों को जानने की राह बताती है लेकिन रास्ता इतना लम्बा है कि मंजिल नज़र ही नहीं आती.
बस, चलते रहो, चलते रहो.
अहमद ने तय किया कि वह भी पढ़ाई में मन लगाएगा. प्रभुदत्त और अहमद मिल-जुल कर बातें करते और पढ़ते भी. समय बीतता गया और वे दोनों चौथी कक्षा पास हो गए. आगे की पढ़ाई झंग में संभव नहीं थी इसलिए प्रभुदत्त का झंग से पांच मील दूर मिघियाना के स्कूल में दाखिला करवा दिया गया लेकिन अहमद झंग में ही रह गया क्योंकि उसके अब्बा उसे झंग से बाहर जाकर पढ़ने के खिलाफ़ थे. अहमद ने अपनी तरफ से बहुत कोशिश की, अम्मी से कहलवाया लेकिन बात नहीं बनी और उसकी पढ़ाई झंग के स्कूल की चारदीवारी में कैद होकर रह गई. जिस दिन प्रभु झंग से जा रहा था, वह दिन दोनों दोस्तों के लिये बहुत भारी पड़ा. अहमद रो रहा था कि वह झंग से निकल नहीं पाया और प्रभु रो रहा था कि वह झंग से निकल कर अपने जिगरी दोस्त से बहुत दूर जा रहा था. क्या पता फिर मुलाकात हो, न हो!
(३)
प्रभुदत्त के पिता चाहते थे कि वह मेट्रिक पास कर ले और उसके बाद कोई सरकारी नौकरी कर ले लेकिन प्रभु को आगे पढने की ललक थी इसलिए उसने मेट्रिक पास होने के बाद जिद करके लाहौर के कालेज में बी.ए. की पढ़ाई शुरू कर दी. सन १९४७ में देश को आज़ादी मिलने वाली थी, उसी समय विभाजन की गाज गिरी और प्रभुदत्त का हिन्दुस्तान अचानक पाकिस्तान बन गया. उसके बाद पूरे पंजाब में गुंडागर्दी का नंगा आतंक फ़ैल गया और दोनों देशों की आबादी अपनी जान बचाने की फ़िक्र में इधर से उधर होने लगी. बहुत कम समय में हिन्दुस्तानी लोग हिन्दू और मुसलमान बन गये और अपनी मिट्टी छोड़कर अन्जानी मिट्टी में आशियाना खोजने लगे. प्रभुदत्त का परिवार लाहौर से भागकर दिल्ली आ पहुंचा और शरणार्थियों के केम्प में रहने लगा.
शरणार्थी शिविर में भीड़ बढ़ती जा रहे थी. रोज जत्थे के जत्थे पहुँच रहे थे. जगह कम पड़ रही थी. इंतजाम था लेकिन नाकाफ़ी साबित हो रहा था. सब तरफ बदहवासी पसरी हुई थी. किसी को आसरा चाहिए तो किसी को खाना. कोई अपना सामन सहेज रहा है तो कोई रिश्ते. कोई अपने किसी परिवारजन को खोज रहा है तो कोई खुद को.
प्रभुदत्त के परिवार को एक तम्बू में जगह मिल गयी. और भी बहुत से परिवार साथ में थे. सब एक-दूसरे को अपने दुखड़े सुना रहे थे. कुछ छाती पीट कर रो रहे थे, कुछ सुबक रहे थे, कुछ के आंसू पूरी तरह सूख चुके थे. वहां पर कुछ लोग अपने गुमे हुए परिजनों को खोज रहे थे. एक पंजाबी औरत अपने जवान बेटे को खोज रही थी- 'सतपाल....मेरा सतपाल.' अचानक प्रभुदत्त को देखकर वह दौड़ती आयी और उससे लिपट गयी- 'सतपाल, तू कहाँ गुम गया था रे? मैं कितने दिन से तुझे ढूंढ रही थी, मेरा प्यारा बेटा.'
प्रभुदत्त को कुछ समझ में न आया. ये औरत कौन है जो मुझे अपना बेटा सतपाल समझ रही है? प्रभुदत्त ने कहा- 'मैं सतपाल नहीं हूँ, प्रभु हूँ.'
'अरे, तूने अपना नाम भी बदल लिया मुन्डा?'
'आपको धोखा हो रहा है बी जी, मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ.'
'चल, मुझे अन्धी समझ रहा है? तेरी भी आँखें नहीं हैं क्या? हाय रब्बा, तू अपनी मां को नहीं पहचानता?'
'चल, मैं तुझे अपनी मां से मिलवाता हूँ.' प्रभुदत्त बोला और उस औरत को अपनी मां के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया.
'ये है मेरी माँ.' वह बोला.
'ये कैसे होगी तेरी मां? तू मेरा पुत्तर है सतपाल. मां की आँख धोखा नहीं खाती.' वह रोते-कलपते बोली.
प्रभुदत्त की मां को सारा माज़रा समझ में आ गया. उसने सतपाल की मां को अपने पास बैठाया, उसकी करुण गाथा सुनी. वह अकेली थी, भटक रही थी. सहारा ज़रूरी था. प्रभुदत्त की मां ने उससे कहा- 'तुम घबराओ नहीं. हमारे साथ रहो. जब तक सतपाल नहीं मिलता, प्रभु को अपना बेटा सतपाल समझो.'
दोनों की मां एक-दूसरे के गले से लिपट कर रो रही थी जैसे दो गुमी हुई सगी बहनें अरसे बाद अचानक मिली हों.
(४)
बी.ए. की पढ़ाई लाहौर में अधूरी छूट गयी थी उसे दिल्ली में पूरा करके प्रभुदत्त ने मनोविज्ञान में एम.ए. किया, फिर मास्टर ऑफ़ लिटरेचर किया. प्रभुदत्त विवाह योग्य हो गये इसलिए जब माता-पिता ने विवाह की बात की तो प्रभुदत्त ने पी.एच.डी.वाला अड़ंगा लगा दिया. 'मलेर कोटला (लुधियाना-पाकिस्तान) के मुस्लिम बच्चों की परवरिश' विषय पर सन १९७१ में शोध पूरा हो पाया और प्रभुदत्त के उम्र हो गयी, ४१ वर्ष.
अपनी बहू की शक्ल देखने की ख्वाहिश अपने सीने में समेटे हुए माता-पिता इस संसार से मुक्त हो गये. प्रभुदत्त अकेले रह गये और अकेले रहना सीख गये. प्रभुदत्त को यू.जी.सी. की पोस्ट डाक्टरल फेलोशिप मिल गयी. उसे पूरा करने के बाद भारत सरकार के शिक्षा विभाग और एन.सी.आर.टी. में दस वर्षों तक नौकरी की. पी.एच.डी. के बाद प्रभुदत्त दिल्ली विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान का अध्यापन करने लगे और १९९३ में सेवानिवृत्त हो गए.
विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान प्रभुदत्त अपने छात्रों को भारत के उन सुदूर गांवों में अध्ययन के लिये ले जाते थे जहाँ सामाजिक परिस्थितियों का व्यवहारिक अध्ययन किया जा सके. उसी सिलसिले में एक दिन वे ट्रेन से बिलासपुर स्टेशन में उतरे और बिलासपुर से लगे अचानकमार के जंगल में जीवनयापन कर रहे आदिवासियों के रहन-सहन को बहुत नज़दीक से देखने का उन्हें मौक़ा मिला. अचानकमार का जंगल उन्हें भा गया और वहां के आदिवासियों का भोलापन भी. विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होने के बाद एक झोला में अपने कपड़े रखकर लमनी नामक गाँव में पहुँच गए और आदिवासियों के उत्थान के लिये अपना जीवन अर्पित कर दिया.
अचानकमार के जंगल प्रकृति की अनोखी देन हैं जहाँ पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, नदी-नाले और मनुष्य एक-दूसरे से मिल-जुल कर रहते हैं. अचानकमार का जंगल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मध्यप्रदेश के अनुपपुर के बीच फैला हुआ है जिसका भौगोलिक क्षेत्र ५५१.१५ वर्ग किलोमीटर है. यह मैकाल पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत विंध्याचल और सतपुड़ा पहाड़ों को अपने सीने में समेटे हुए है. अचानकमार भारत के सबसे बड़े वर्षा-वनों में से एक है जिसमें जून से सितम्बर माह तक दक्षिण-पूर्वी मानसून के कारण भरपूर बारिश होती है. तीन बड़ी नदियाँ, नर्मदा, जोहिला और सोन इस पहाड़ी क्षेत्र से बहती हुई दो विपरीत दिशाओं में विभाजित होकर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती हैं.
अचानकमार में १५१ परिवारों की १५०० प्रजातियों के पौधे पाये जाते हैं. यहाँ १०५ औषधीय गुण वाले पौधे हैं जिनमें से २५ पौधे दुर्लभ प्रजाति के हैं. ऊंचे और सीधे खड़े साल. साजा, बीजा और बांस के वृक्षों की उपस्थिति में सम्पूर्ण वन गमकता-महकता है. पक्षियों की चहचाहट के साथ-साथ जंगली पशुओं की भी शरणस्थली है अचानकमार जहाँ २००४ की गणना के अनुसार २६ शेर, ४६ तेंदुवा, २८ भालू, १९३६ चीतल, १३६९ साम्भर ३७६ हिरन और असंख्य बन्दर हैं. इनके अतिरिक्त काला हिरण, लोमड़ी, जंगली भालू, सियार, भेड़िया, उड़ती गिलहरी, सांप, मेंढक और असंख्य बायसन की बहुतायत है. अचानकमार में इन जीवों के साथ मनुष्यों की भी आबादी रहती है जो आदिवासी कहलाते हैं. इन आदिवासियों ने वृक्षों और पक्षियों को सहेज कर रखा था.
आदिवासी दो शब्दों से मिलकर बना है, आदि और वासी, जिसका अर्थ है मूल निवासी. भारत की जनसँख्या का 8.6% (लगभग 10 करोड़) जितना बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है. आदिवासियों की जीवनशैली पर विश्व के समाजशास्त्रियों ने गहराई में जाकर अनेक अध्ययन किये है. स्टीफन कोरी के अनुसार- 'आदिवासियों ने अपनी जीवनशैली को पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं की सीमा में बाँध रखा है, वे आत्मनिर्भर है और आधुनिक समाज की मुख्यधारा से सर्वथा अलग हैं.' इस बात पर व्यापक मतभेद है कि उन्हें आदिवासी ही रहने दिया जाये या आधुनिक जगत की वैज्ञानिक प्रगति से जोड़ा जाए. आधुनिक विश्व उन्हें अपने साथ सम्मिलित करना चाहता है लेकिन अनेक विद्वान उनकी सहज जीवनशैली पर गैरज़रूरी अतिक्रमण और दखल मानते हैं क्योंकि उनकी आवश्यकताएं सीमित हैं, वे प्रकृति के सहयोग से अपना जीवनयापन करते हैं, मस्त हैं जबकि आधुनिक दुनिया जीवन की विभिन्न समस्याओं से घिरी हुई है, त्रस्त है.
प्रभुदत्त खेड़ा ने अध्यापन के दौरान आदिवासियों के जीवन का न केवल अध्ययन किया बल्कि वे देश के सभी आदिवासी क्षेत्रों में अपने छात्रों के साथ जाकर उन्हें आमने-सामने समझने की कोशिश की. उन्होंने देखा कि आदिवासी अपने में खुश हैं लेकिन पेट की भूख और अज्ञानता से जूझ रहे हैं. सूर्य और चन्द्रमा की किरणों से उनका दिन और रात का वास्ता है लेकिन आधुनिकता की कोई किरण उनके जीवन में नहीं पहुंची है. आधुनिक समाज से जोड़ने के लिए उनमें शिक्षा का प्रसार ज़रूरी समझ में आया इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापकी से निवृत्त होने के बाद प्रभुदत्त बिलासपुर के समीप अचानकमार के जंगल में आ बसे, छोटे से गाँव लमनी में.
(५)
लमनी में मुश्किल से बीस परिवार थे, उनकी छोटी-छोटी झोपड़ियां बांस और पत्तियों की बुनावट से बनी हुई थी. परिवार के पुरुष सदस्य रोज सुबह भाला या तीर-कमान लेकर शिकार के लिए निकलते, जो मिल जाता उसे घर में लाकर लकड़ी की आंच में भून कर खा लेते. औरतें लकड़ी और पत्ता बीनने निकलती, लौटकर भोजन पकाती. शाम को सबका मिलना-जुलना होता, गीत-संगीत होता और नृत्य. सात बजते-बजते सब अपनी झोपड़ियों में लौट जाते, सो जाते क्योंकि उनका दैनिक जीवन पौ फटने के पहले ही शुरू हो जाता था.
गहरे रंग के लोगों के बीच एक गौरवर्णी जब घने जंगल से घिरे लमनी गाँव में उतरा तो लोग समझे कि कोई घूमने-फिरने वाला आदमी आया है लेकिन जब वह वहां रुक गया और वहीँ रहने लगा तब वे उसे रोज दूर से देखते, घूर कर देखते लेकिन चुप रहते. दोनों एक दूसरे की भाषा से अनभिज्ञ थे लेकिन प्रभुदत्त की आत्मीय मुस्कान ने उनके बीच बातचीत की खिड़कियाँ खोल दी. आँखों-आँखों में बातें होने लगी, वे एक-दूसरे को समझने की कोशिश करने लगे. कुछ दिनों बाद वहां के आदिवासियों को यह समझ में आ गया कि गोरे रंग का यह ठिगना सा व्यक्ति उनसे प्यार करता है, उनका हितवा है और उनके लिये कुछ करने आया है. प्रभुदत्त को देखते ही बच्चे 'दिल्ली-साब' चिल्लाते हुए पास आ जाते क्योंकि प्रभुदत्त के कंधे में लटकते झोले में उनके लिये कुछ-न-कुछ अवश्य रहता था, भुना हुआ चना या मुर्रा या बताशा या मीठी गोलियां.
विकसित विश्व की सुविधाओं से बहुत दूर थे अचानकमार जंगल के निवासी, फिर भी उन्हें प्रकृति से जो मिलता था, उससे उनका काम चल जाता था. ज़रूरतें उनकी सीमित थी लेकिन उनका जीवन अभावग्रस्त था. बूढ़े लोग हड्डी के ढांचे थे, बच्चे कुपोषित थे. युवा मज़बूत थे लेकिन उनका यौवन ज़ल्दी मुरझा जाता था. किसी बीमारी ने यदि आक्रमण किया तो बैगा की झाड़-फूंक असर कर गयी तो कर गयी अन्यथा घर का एक सदस्य गिनती में अचानक कम हो जाता. वनवासियों का बिना किसी सहारे उनका जीवन शुरू होता और जीवन समाप्त होने तक उन्हें किसी भी सहारे का सहारा न मिलता.
दोनों ने मौन भाषा से मुखर भाषा तक आहिस्ता-आहिस्ता यात्रा की और कामचलाऊ हिंदी में आपस में बोलने-समझने लगे. सर्वाधिक महत्वपूर्ण था, उनके लिये पौष्टिक आहार की व्यवस्था, फिर स्वास्थ्य की जागरूकता और उसके बाद उन्हें आधुनिक शिक्षा के संसार से जोड़ना. सामान्यतया सभी मांसाहारी थे. जंगल से शिकार में जो मिलता उसे आग पर भून कर खा लेते थे. बारिश के दिनों में जंगल में घुसना मुश्किल हो जाता था इसलिए उनकी झोपड़ियों के आस-पास जो मिल जाता, वही उनका आहार बन जाता जैसे मेंढक, चूहा, सांप या कुत्ता. महुए की शराब का साथ तब भी था, आज भी है.
प्रभुदत्त ने उन्हें किसानी से जोड़ा और चावल तथा सब्जी उगाने और उसे उनके भोजन से जोड़ा. रोजगार मुहैया करने के लिए उन्हें बीड़ी-पत्ता तोड़ने के लिये और बांस की टुकनी और पंखा बनने के लिए प्रेरित किया. अपने घर में बच्चों को बुलाकर अक्षरज्ञान देंना आरम्भ किया. समय बीतता गया, वनवासियों में जागरूकता आने लगी. वे बिलासपुर आने-जाने लगे, सोच-विचार बदलने लगा. पहले बात करते समय भाग जाने वाले लोग अब बहस करने लगे. बच्चों ने पेंटिंग करना सीख लिया और बिलासपुर शहर में चित्र-वीथिका लगाकर अपनी कला का प्रदर्शन किया.
वनवासियों की आदतों में परिवर्तन आ रहा है. शिक्षा की ओर उनका रुझान बढ़ रहा है और आधुनिक युग की सोच और वेशभूषा का असर उन पर होता दिख रहा है. खेती की उपज बढ़ने से वे पौष्टिक आहार ले रहे हैं. चावल का 'पेज', भात-सब्जी और मांस का तालमेल उनके शारीरिक सौष्ठव में परिवर्तन ला रहा है.
प्रभुदत्त ने भी गाँव में एक झोपड़ी बना ली है. खुद अपना भोजन बनाते हैं, रात के समय, सब्जी और रोटी. एक पाव लौकी की सब्जी दो दिन चल जाती है. दिन में सत्तू खाते हैं या मौसमी फल जो वहां के जंगल में फलते हैं जैसे अमरुद, जामुन. आम, सीताफल, तेंदू, चार आदि. कभी-कभार मिल गई तो ब्रेड और बिना दूध की लाल चाय, पत्ती कम, वह भी दिन में एक बार.
रोज सुबह पक्षियों को दाना खिलाते हैं. जंगल की चिड़िया, मैना और मिट्ठू से उनकी पक्की दोस्ती हो गयी है. वे पक्षियों की भाषा समझने लग गए हैं, उनकी नाराज़गी हो या ख़ुशी, वे जान जाते हैं. कभी-कभार इन पक्षियों के बीच कोई कौवा घुस जाता है तो पक्षी शोर मचाकर प्रभुदत्त को आवाज़ देकर बुलाते हैं. जब प्रभुदत्त कौवा को भगा देते हैं तो वे पक्षी खुश होकर नाचने लगते हैं और दाना चुगने के बाद हर्षित होकर धन्यवाद देते हुए प्रभुदत्त से अपनी भाषा में आवाज़ देकर कहते हैं- 'मज़ा आ गया. अब जा रहे हैं.'
प्रभुदत्त खेड़ा की समाजसेवा को मान देते हुए छत्तीसगढ़ शासन ने उन्हें राज्योत्सव में राजकीय सम्मान और एक लाख रुपये की अनुग्रह राशि घोषित की. जब प्रभुदत्त को इस घोषणा की जानकारी मिली तो उन्होंने एक सहज मुस्कान बिखेरी और बिना किसी प्रतिक्रिया के अपने काम से लगे रहे. इस लेखक ने उन्हें बधाई दी तो वे बोले- 'किस बात की बधाई?'
'आपको मिले राज्य-सम्मान की बधाई.' मैंने कहा.
'मैं सम्मान लेने नहीं राजधानी गया ही नहीं. मैं किसी सम्मान या पुरस्कार के लिये काम नहीं करता.'
'सम्मान लेने नहीं गये, कोई बात नहीं. एक लाख रुपये तो ले लेना था, वनवासियों के काम आता.'
'वहां पैसे की ज़रुरत नहीं है, उन्हें हमारा साथ चाहिए, सरोकार चाहिए.' प्रभुदत्त ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
* * * * *
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
bahut hi shandar ktha h agrawal ji
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