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किस्सा चमनलाल चड्ढा का : पाकिस्तान से आया हिन्दुस्तानी

किस्सा चमनलाल चड्ढा का : पाकिस्तान से आया हिन्दुस्तानी 

(१)

          नदियों के किनारे बस्तियाँ बसती हैं, बस्तियों में लोग बसते हैं और लोगों में मनुष्यता बसती है। नदी का जल हमें जीवन देता है और निरंतर प्रवाहवान बने रहने का सबक भी। बिलासपुर के बीच में बहती अरपा नदी के कुछ इस पार लोग बसे, कुछ उस पार। जीवनदायिनी है अरपा। बिलासपुर में अधिकतर लोग आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसे, कुछ दूरदराज़ से आए। गाँवों में जो जमीन से जुड़े थे वे जमीन से ही जुड़े रह गए लेकिन जो धनपति बन गए वे बिलासपुर आकर बस गए क्योंकि यहाँ व्यापार था, स्कूल-कालेज थे, सिनेमा घर थे, अस्पताल थे और ऐश्वर्य भी। गाँव का मजदूर गाँव में और गाँव का गौंटिया शहर में।
          उन दिनों साल में एक फसल हुआ करती थी, धान की। चार महीने का काम था और आठ महीने का लंबा विश्राम। बड़े-बूढ़े तो आपस में बतियाकर समय काट लेते थे, युवकों के पास कोई काम न था। महिलाएं रसोई में भात-साग पका रही थी और लड़कियां अपने-आप पक रही थी, तेरह-चौदह की हुई, उनका ब्याह किया, वे भी किसी और की रसोई में खाना पकाने लगती। युवकों के पास कोई उत्पादक काम न था लेकिन चढ़ती जवानी के अपने काम होते हैं, चहलकदमी होती है, दिल लगता है तो कभी टूट भी जाता है। वैसे, दिल का लगना और टूटना शहरों की समस्या है, गांवों की नहीं क्योंकि ग्रामीण परिवेश में प्यार-मोहब्बत को लेकर शहरों के मुक़ाबले अधिक खुलापन होता है।
          परिवार से जुड़े रहने के कई फायदे हैं, कोई कमा रहा है, कोई खाना पका रहा है, कोई खिला रहा है। थोड़ी-बहुत डांट पड़ती है तो उसको सुन लेने में क्या हर्ज़ है ? गाँव की लड़कियां घर का काम सीखकर अपनी जीवन-यात्रा नियोजित कर लेती हैं लेकिन लड़कों के सामने 'कमाऊ पूत' बनने की बड़ी चुनौती होती है। उनकी सबसे बड़ी समस्या है, पढ़ना। रोजगार के अच्छे अवसर शिक्षा से जुड़े हुए हैं लेकिन सबका दिल तो पढ़ाई में लगता नहीं। स्कूल में या तो शैतानी सूझती है या नींद आती है। घर का काम, स्कूल का काम और अपना काम- इस तीनों में अपना काम ही मुश्किल से हो पाता है, घर और स्कूल का काम कब करें ? अपना काम यानी गाँव में घूमना-फिरना, गप्प-सड़ाका करना, हंसी-ठट्ठा करना, ताश खेलना, बीड़ी का सुट्टा लगाना आदि।
          खेतिहरों और व्यापारियों के परिवारों में परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। व्यापारी का बच्चा बचपन से ही व्यापार से जुड़ जाता है। जब शिशु रहता है तब से वह अपनी अबोध दृष्टि से लेनदेन देखता है, सिक्के से खेलता है या नोट को हाथ में लेकर उसे मोड़ने-तोड़ने-मसलने की कोशिश करता है। थोड़ा और बड़ा होता है तो 'कैश बॉक्स' को ललचाई दृष्टि से देखता है। किशोरावस्था उसका प्रशिक्षण काल होता है। युवक होते ही वह दायित्व संभाल लेता है और अपनी प्रतिभा से पारिवारिक व्यापार को अपने ढंग से बढ़ाने के प्रयत्न करता है। इस स्थिति में दो पीढ़ियों की कार्यशैली का अंतर उपस्थित होता है। आम तौर पर पुराने सदस्य नवागंतुकों के लिए रास्ता छोड़ देते हैं और अपनी सक्रियता को खाता-बही, लिखा-पढ़ी, बैंक, कोर्ट-कचहरी और 'टेक्सेशन' आदि की दिशा में मोड़ देते हैं। इस प्रकार दोनों पीढ़ियाँ मिलजुल कर व्यापार को विकसित करते हैं।
          बिलासपुर आप्रवासियों का शहर है। हर कोई कहीं-न-कहीं से आकर यहाँ बसा है। कुछ व्यापार करने आए तो कुछ नौकरी करने। नौकरी करने के लिए सर्वाधिक लोग रेल्वे में आए, ज़्यादातर बंगाल, ओडिशा, बिहार, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु से। अन्य नौकरियों में अन्य प्रदेशों के भी लोग आए। इन नौकरीपेशा लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए व्यापार फले-फूले। छोटा सा कस्बा धीरे-धीरे शहर का आकार लेने लगा। आज़ादी के पहले आसपास के कस्बों और गावों के लोग यहाँ आए, कुछ मारवाड़-राजस्थान से भी आए। देश की आज़ादी के दौरान पाकिस्तान के पंजाब और सिंध के प्रवासियों ने इस शहर के दरवाजे में दस्तक दी। अपना घर-द्वार और संपत्ति छोड़ कर आए इन मुसीबतज़दा परिवारों ने बामुश्किल अपने अस्तित्व को बचाने और नया संसार रचने की कोशिश की।
          बिलासपुर में उन दिनों बहुत से परिवार आए। चूंकि वे भारत के उत्तरी भाग से आए थे, वे सब गोरे-चिट्टे थे। सिंधियों के आवास के लिए 'केंप' जैसी व्यवस्था मोहल्ला जरहाभाटा में बनाई गई थी, जिसे सिंधी कालोनी कहा जाता था, अनेक परिवार वहां एक साथ बसे। कुछ परिवार अपनी दूकानों के पीछे रिहाइश बनाकर अन्य मोहल्लों में बस गए। लेकिन पंजाब से आए परिवारों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, उन्हें जहां किराए पर घर मिले, वे वहाँ टिक गए। पंजाबियों के परिवारों में कुछ सिख थे, लेकिन अधिकतर मोना पंजाबी। मोना पंजाबी का अर्थ है, पंजाब के वे रहवासी जिन्होंने सिख पंथ नहीं अपनाया।
          यह कहानी एक ऐसे मोना पंजाबी की है जिसका रंग सांवला था लेकिन खोपड़ी गजब की थी। अविभाजित पंजाब के डिस्ट्रिक्ट जेलम के गाँव टालियावालां के चमनलाल चड्डा हिन्दुस्तानी फौज में इलेक्ट्रीशियन थे। अफसर की मातहती से आहत होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। उन्हीं दिनों देश के विभाजन का कहर सामने आ गया। अपनी नव-विवाहिता कुलवंती को लेकर वे जम्मू पहुँच गए। किसी के साथ साझेदारी में बिजली के सामान बेचने की दूकान खोली, घाटा होने के बाद साझेदार को वहीं छोड़ा और बिलासपुर आ पहुंचे। कुलवंती गर्भवती थी, शहर नया था, फटेहाली थी। मोहल्ला गोंडपारा के राजाराम मंदिर के बाड़े में एक छोटा सा घर किराया पर लेकर रहने लगे। आर्थिक तंगी के बीच बिलासपुर के दीक्षित अस्पताल में कुलवंती ने 6 जनवरी 1948 को एक शिशु को जन्म दिया, नाम रखा गया, प्राण।
          कुलवंती की देखरेख और उसका इंतज़ाम चमनलाल को करना था। प्रसूता को पिलाने के लिए मसाले वाला पानी उबालना,  दोनों समय का खाना बनाना और दौड़-भाग में बीस दिन बीत गए। एक दिन कुलवंती ने चमनलाल से कहा- 'सुनो जी, अब मैं ठीक हो गई हूँ, घर का चूल्हा-चौका सम्हाल लूँगी। तुम अब अपना काम देखो। घर में राशन भी खत्म होने वाला है, बाहर निकलोगे तब तो काम बनेगा।'
'हो जाएगा, सब हो जाएगा। अभी तुम बहुत कमज़ोर हो, कुछ दिन और आराम कर लो।'
'हो गया मेरा आराम। तुमको चूल्हे का धुआं सहते हुए खाना बनाते देखती हूँ तो मुझे रोना आता है।'
'तुमको नहीं लगता क्या ?'
'लगता क्यों नहीं लेकिन हमारी आदत हो गई है। तुमको तो चूल्हे में ठीक से लकड़ी लगाना नहीं आता इसीलिए धुआं ज्यादा होता है।'
'अरे वाह, क्या मैं चूल्हा जलाना नहीं जानता ? ऐसा कौन सा काम है जो मैं नहीं जानता ? असल में लकड़ी गीली है, इसलिए धुआं होता है ।'
'अच्छा, तो तुम सब काम जानते हो ?'
'हूँ।'
'बच्चे को नौ महीने गर्भ में पाल सकते हो क्या ?'
'हा हा हा, इसके अलावा सब कर सकता हूँ।'
'शादी होकर दूसरे के घर जाकर रह सकते हो ?'
'नहीं, ये भी नहीं कर सकता।'
'तो फिर काहे का घमंड ? ऐसा कौन सा काम है जो मैं नहीं जानता.....' कुलवंती ने हँसते हुए ताना मारा- 'जिसकी बंदरिया, उसी से नाचती है। तुम जाओ, कल से अपना बैपार देखो।'

(२)

          बिलासपुर के मोहल्ला सरकंडा में एक सेठ रहते थे, बनवारीलाल अग्रवाल जिन्हें अंग्रेज़ सरकार ने 'राय साहब' का तमगा दिया था इसलिए उनका प्रचलित नाम था 'रायसाहब बनवारीलाल।' उनके पास राइस मिल थी, कार थी, कई ट्रक थे। चमनलाल की उनसे गहरी दोस्ती हो गई।
          अंग्रेज भारत छोड़कर वापस जा रहे थे, इसलिए उनके द्वारा बिलासपुर के आसपास स्थापित सैनिक अड्डों का बेशुमार असवाब वे कबाड़ के रूप बेचना चाहते थे जिसे रायसाहब बनवारीलाल और रामप्रसाद जैसे व्यापारियों ने औने-पौने दाम में खरीदा और उसे बिलासपुर से बाहर बेच कर बहुत लाभ कमाया। चमनलाल ने भी इसी धंधे को पकड़ा और अपनी कमाई लेकर कलकत्ता गए और बिलासपुर में एक नए व्यापार की शुरुआत की।
          कलकत्ता से उन्होंने 'ग्रामोफोन' लाकर बिलासपुर को 'लाउड स्पीकर' से परिचित कराया। पुराने जमाने का रेकार्ड प्लेयर जिस पर तवा चढ़ाकर, चाबी भर कर, सुई को धीरे से रख दिया जाता और पोंगे से जब ज़ोहरा बाई अंबालावाली, उमादेवी, पंकज मालिक और के.एल.सहगल के गानों की सुरीली आवाज़ फैलती तो सड़क पर सुनने वालों का मजमा लग जाता। आसपास के राजा-महाराजा, गौटिया, मालगुजार और सेठ अपने यहाँ शादी-ब्याह के कार्यक्रम में ग्रामोफोन बजवाते थे क्योंकि चमनलाल ने उस अनुसंधान को बिलासपुर में लाकर 'फर्स्ट प्रमोटर' होने का फायदा उठाया और उसका मनमाना किराया वसूल किया, इतना अधिक किराया कि आप-हम कल्पना नहीं कर सकते।   
          उन्हीं दिनों बिलासपुर के 55 मील दूर स्थित गाँव कवर्धा में एक यज्ञ का आयोजन हुआ। उस समय के हिसाब से वह विशाल कार्यक्रम था, जहाँ अंधकार को चकाचौंध में बदलने का ठेका चमनलाल को मिला। चमनलाल कलकत्ता गए, वहाँ से बड़े-बड़े जनरेटर और असंख्य बल्व तथा वायर ट्रक में लदवाकर कवर्धा ले आए और यज्ञस्थल को जगमगा दिया। आप कल्पना कीजिए, उस समय यदि कोई व्यक्ति टार्च की रोशनी देख लेता था तो उसे देखकर भूत-प्रेत होने का भय लगता था। मिट्टीतेल से जलने वाली कंडील से आगे की बात वे सोच भी नहीं सकते थे। बिजली के बल्व वहाँ के रहवासियों के लिए चमत्कार था। सब तरफ हल्ला हो गया और आसपास की आबादी यज्ञ देखने उमड़ पड़ी। चमनलाल का चमन आबाद हो गया।
          चमनलाल ने मोहल्ला कुड़ुदंड में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीदा, अपना घर बनवाया और उसमें अपनी दो लड़कियों और पाँच लड़कों के साथ सपरिवार रहने लगे। गोलबाजार में दो दूकानें और गोदाम किराए पर लिए जहां वे लाउडस्पीकर और बेट्री का व्यापार करते थे। पाँच छः साल के बाद दूकानों को बंद कर दिया और 'ट्रक ट्रांसपोर्टिंग' का काम शुरू किया। उनकी आठ ट्रकें चलने लगी जो दिन-रात अनाज और बीड़ीपत्ता की ढुलाई करती थी।

(३)

          सन 1962 की उस सुबह बिलासपुर में बहुत गहमा-गहमी थी, भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आने वाले थे। दोपहर बारह बजे उनका भाषण रघुराजसिंह स्टेडियम मे होना था। बिलासपुर में नेहरु जी पहली बार आ रहे थे। पूरा शहर उन्हें सुनने उमड़ पड़ा और आसपास के ग्रामीण अपनी बैलगाड़ियों में लद कर उन्हें देखने पहुँच गए। पूरे शहर की सड़कें भीड़ से भरपूर थी, बैलगाड़ियाँ सड़क के किनारे खड़ी थी और हर व्यक्ति के कदम स्टेडियम की ओर बढ़ रहे थे। स्टेडियम छोटा पड़ गया, लोग स्टेडियम से लगे खेतों पर जमकर बैठ गए। ऐसा जन सैलाब बिलासपुर की धरती ने फिर कभी नहीं देखा।
          उसी दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने चमनलाल को अंदर तक हिला दिया। सायकल के पीछे बैठा युवक उनकी एक ट्रक के नीचे आ गया और उसकी दुर्घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। घटना कचहरी के चढ़ाव पर हुई जहां बिछी हुई मुरम पर साइकलचालक का संतुलन बिगड़ गया और वे दोनों सड़क पर गिर गए, उनमें से एक युवक ट्रक के पिछले चक्के के नीचे आ गया। मृत युवक बिलासपुर के एक सरकारी अधिकारी का था, अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र। ट्रक का ड्राइवर गाड़ी लेकर घर पहुंचा और चमनलाल को घटना की जानकारी दी। चमनलाल चिंतित हो गए। वे ड्राइवर के साथ ट्रक में बैठकर कोतवाली गए, पुलिस को घटना के बारे में बताया जबकि उस समय तक पुलिस को दुर्घटना की कोई खबर नहीं थी। पुलिस ने ड्राइवर को थाने में रोक लिया और ट्रक जब्त कर ली।
          शाम को मृतक के बारे में चमनलाल को मालूम पड़ा। मृतक के पिता बिलासपुर जिलाधीश कार्यालय में भू-अधीक्षक थे. चमनलाल की उस परिवार का सामना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्हें हिम्मत जुटाने में डेढ़ दिन लग गए। शाम के समय मृतक का घर खोजते उसके परिवार से मिलने गए। पूरा परिवार बिलख रहा था, लेकिन जो होना था वह हो चुका था। आधे घंटे तक चमनलाल उन सब की बात सुनते रहे फिर बोले- 'जितना आपका दुख है, उतना मेरा दुख है।'
'आप हमारे दुख को क्या समझेंगे ? जिसका बेटा जाता है, दुख वही जानता है।' मृतक युवक के पिता ने कहा।
'आप ठीक हो, जी। जान-बूझ कर तो हुआ नहीं, अनहोनी थी, हो गई।'
'आपकी ट्रक का ड्राइवर उसको बचा सकता था।'
'ड्राइवर को तो दिखाई नहीं पड़ा, बच्चा पिछले चक्के के नीचे आ गया।'
'हम सब उसके सहारे थे, वह तो हमें छोड़कर चला गया।'
'मैं आप लोगों की मदद करना चाहता हूँ, कोई व्यापार लगवा सकता हूँ।'
'हमने कभी व्यापार किया नहीं, हम नहीं कर पाएंगे।'
'तो आप जो भी कहें, मैं आपको दे सकता हूँ।'
'पैसे का क्या करेंगे , आप हमारा बेटा वापस कर दो ?'
'आपका बेटा मैं कहाँ से वापस लाऊं ? एक काम कीजिए, मेरा बेटा ले लीजिए।'
'आपका बेटा ?'
'हाँ, पाँच हैं, एक बेटा आपकी सेवा करेगा।' चमनलाल ने कहा और रोने लगे। घर के अंदर से एक महिला का सिसकता स्वर बाहर घिसट कर आया- 'एक माँ तो दुखी है, क्या दूसरी माँ को भी दुखी करना है ?'
          मनुष्य के जीवन में कल क्या होने वाला है कोई नहीं जानता। जैसा होना होता है, वैसे हालात बन जाते हैं। सड़क दुर्घटना ने चमनलाल को इस कदर आहत कर दिया कि उन्होंने ट्रांसपोर्ट का व्यापार बंद करने का फैसला ले लिया और उसे समेटना शुरू कर दिया। एक-एक करके सारे ट्रक बेच दिए और मुर्गीपालन करने लगे। पंद्रह साल के अंतराल में चमनलाल ने कितने सारे काम किए, सेना में नौकरी, कबाड़ का व्यापार, बिजली का सामान, लाउड स्पीकर, बेट्री की दूकान, ट्रांसपोर्टिंग और अब मुर्गी-पालन !
          एक बात ज़रूर रही कि बिलासपुर में आकर चमनलाल ने जिस काम में हाथ डाला, भरपूर कमाई की। उनमें ग्राहकों की जरूरत को समझने का अद्भुत कौशल था। ग्राहक को आज क्या चाहिए ? कल किस वस्तु की मांग आने वाली है ?  नई वस्तु को ग्राहक की मांग कैसे बनाया जाए ? इन बातों को वे सफ़ल व्यापारी की तरह समय से पूर्व ताड़ कर उस पर काम करना शुरू कर देते थे। वे कुछ नया करने के फ़िराक में रहते थे। वे जिस काम को हाथ लगाते, चल पड़ता। उनके खून में व्यापार के अतिसक्रिय कीटाणु थे। उनकी सफलता का सूत्र था, दूरदृष्टि, उत्कट लगन और भरपूर परिश्रम।  
          वैसे भी देखने में यह आया है कि जो व्यक्ति विस्थापित होकर किसी नए शहर में अपने पैर जमाने की कोशिश करता है, वह अपनी सफलता के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाता है। उसका दिमाग और शरीर अपने लक्ष्य को हासिल करने के पुरजोर कोशिश करता है। चमनलाल पाकिस्तान से भारत आए, बिना किसी संदर्भ और जान-पहचान के बिलासपुर में टिक गए। परिवार मज़े से चलने लगा। बच्चे बढ़ रहे थे, पढ़ रहे थे। चमनलाल के सिर के बाल पकने लगे, शरीर फैलने लगा, उन्हें शहर के लोग 'चड्डा जी' कहते थे। मुर्गीपालन के व्यापार में आशातीत सफलता हासिल करने के बाद भी चमनलाल की मुर्गियों से दोस्ती अधिक दिन नहीं चली। उसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि वे शहर के लिए एक उदाहरण बन गए।

(४)

          चमनलाल जिंदगी भर जुनूनी इन्सान रहे, जिस काम के पीछे लग गए, लग गए। उनकी मुर्गियों ने इतने अधिक अंडे दिए कि उनकी खपत के लिए कि उन अंडों को लेकर बिलासपुर से बाहर बेचने के लिए निकलना पड़ा। आसपास सौ-दो सौ किलोमीटर तक 'चड्डा पोल्ट्री फार्म' की सील लगे अंडे ग्राहकों की पहली पसंद बन गए। वे अपनी मुर्गियों को अपने खेत में उगाई हुई ताज़ी सब्जियाँ खिलाते थे इसलिए उनके अंडे अधिक स्वादिष्ट होते थे। कुछ ही समय में अंडों का उत्पादन इतना अधिक होने लगा कि उसे बाजार में भेजना और खपाना बहुत बड़ी समस्या बन गई क्योंकि अंडा खाने का रिवाज मुसलमानों, ईसाइयों, पंजाबियों और सिंधियों में ही था, हिन्दू परिवार अंडे से परहेज करते थे इसलिए पूर्ति और मांग में नकारात्मक अंतर आ गया। धीरे-धीरे उन्होंने उस उद्योग को समेट लिया और कृषि की ओर मुड़ गए। घर से जुड़ा हुआ पाँच एकड़ का एक भूखंड ले लिया और उसमें फल, सब्जी और अनाज उगाने लगे।
          चमनलाल के पास भी हमारे आपके जैसी एक बुद्धि थी लेकिन उनकी अक्ल चौतरफा घूमती थी। वे फोटोग्राफी के शौकीन थे। शिकार के शौकीन थे। बिलासपुर के समीप स्थित अचानकमार के जंगल में उन्होंने दो शेर निपटाए थे। बिलासपुर शहर की पहली 'राजदूत' मोटरसाइकल वे रायपुर से खरीदकर लाए थे। पंजाब से जितने लोग बिलासपुर आए वे यहाँ आकर छत्तीसगढ़िया हो गए, पंजाबियत खो बैठे लेकिन चमनलाल आजीवन पंजाबी बने रहे। रहनसहन और वेषभूषा सदा पंजाबियों जैसी रही। ढीला-ढाला बड़े घेर वाला पैजामा और आधे बांह की कमीज उनकी स्थायी वेषभूषा थी जिसे कुलवंती घर में ही सिलती थी।
          सन 1964 में देश अकाल की चपेट में आ गया, अन्न का उत्पादन कम हो गया और आबादी बढ़ गई। भारत सरकार के सामने दुर्भिक्ष एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या के रूप में आ खड़ा हुआ। उससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय हरित क्रान्ति आन्दोलन' की शुरुआत की जिसमें एम.एस.स्वामीनाथन के मार्गदर्शन में अनेक योजनाओं को शुरू किया गया। प्रमुखतः वितरण व्यवस्था को नियोजित करने के लिए ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली' का क्रियान्वयन, कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए ‘नेशनल बेंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट' (नाबार्ड) तथा अनाज के भंडारण के लिए ‘भारतीय खाद्य निगम' का गठन किया गया। 
तात्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सोमवार के दिन एक समय का उपवास रखने की अपील की जिसे चमनलाल ने अपने घर में अपनाया लेकिन वे सोचा करते थे कि 'एक समय न खाने' से क्या देश की खाद्य समस्या का समाधान हो जाएगा ? चमनलाल का दिमाग अब अन्न-उत्पादन की ओर चल पड़ा। उन्होंने बिलासपुर शहर से पाँच किलोमीटर की अलग-अलग दूरी पर स्थित सकरी और मंगला गांव में 65 एकड़ कृषि योग्य जमीन खरीदी और दो सौ मजदूरों के सहयोग से खेती करने लगे और अपने स्तर पर अन्न की समस्या के समाधान में भिड़ गए। 
          मंगला की जमीन अनुपजाऊ थी, पड़ती जमीन, जिसे चमनलाल ने सस्ते भाव में खरीद लिया। जमीन में रेत की मात्रा अधिक थी इसलिए उपजाऊ बनाने के लिए आर्गेनिक और गोबर खाद मिलाकर तैयार करके उसमें केला, पपीता और गन्ना के पौधे रोपे गए। इन सभी की भरपूर पैदावार हुई। केले का पूरा उत्पादन बिलासपुर में ही खप जाता था। पपीता यहाँ की जरूरत से बहुत अधिक होता था इसलिए उसे बड़े-बड़े टोकरों में पैक करके ट्रेन के जरिए कलकत्ता भेजा जाता, लगभग दो क्विंटल प्रतिदिन। गन्ना की मांग बिलासपुर में केवल दीवाली के ग्यारह दिन बाद होने वाले एकादशी के त्यौहार में होती थी, इसलिए नियमित मांग व्यवस्थित करने के लिए उन्होंने शहर के तीन व्यक्तियों को गन्ने का रस बेचने की दूकान शुरू करने के लिए प्रेरित किया और मनोहर टाकीज़ के सामने, तारबाहर चौक और बुधवारी बाजार में यह नया व्यापार शुरू हो गया। इस प्रकार 'चड्डा फार्म' का गन्ना स्वादिष्ट और सस्ते पेय के रूप में नगरवासियों को उपलब्ध हो गया।

(५)

          एक दिन रायसाहब बनवारीलाल और उनके मित्र सेठ रामप्रसाद अग्रवाल आपसी चर्चा में व्यस्त थे। जिस दिन दोनों की बैठक जमती, उस दिन पूरा दिन बीत जाता और शाम हो जाती लेकिन बातचीत का सिलसिला न थमता। वे लोग व्यापार की, समाज की, परिवार की और राजनीति की बातें करते और अपने विचारों से एक-दूसरे को सहयोग दिया करते थे।
          रायसाहब की गद्दी में आज राजनीति पर चर्चा चल रही है। 'रायसाहब, आपको राजनीति में उतरना चाहिए।' सेठ रामप्रसाद बोले।
'इरादा तो बन रहा है, विधानसभा की टिकट के लिए मुख्यमंत्री श्यामाचरण से मेरी बात हुई थी।' रायसाहब बनवारीलाल ने बताया।
'क्या बोले वो ?'
'हंस रहे थे।'
'क्यों ?'
'क्या पता ?'
'इतनी सी बात नहीं समझे रायसाहब !'
'क्या ?'
'उनकी मुस्कान का मतलब रहा होगा कि टिकट 'फोकट' में थोड़े मिलेगी।'
'तो कैसे मिलेगी ?'
'जैसे आप अपना व्यापार चलाते हो, राजनीति उनका व्यापार है, बाल-बच्चे हैं।'
'कैसा किया जाए ?'
'चतरू डाक्टर उनके साढ़ू हैं वो आपके लिए कह दें तो आपका काम बन सकता है लेकिन चतरू बाबू आपका राजनीति में आगे बढ़ना पसंद नहीं करेंगे, उनका स्वभाव किसी को आगे बढ़ाने का नहीं है।'
'यह तो मैं भी जानता हूँ। फिर, कैसा किया जाए ?'
'पहले रायपुर जाओ, पद्मिनी भाभी को खुश करो और भोपाल पहुँच जाओ, काम बन जाएगा।'  सेठ रामप्रसाद ने सलाह दी। इतने में चमनलाल चड्डा भी आ पहुंचे।
'आओ, चमनलाल।' रायसाहब बोले।
'क्या चर्चा चल रही है, आप लोगों की ?' चमनलाल ने पूछा।
'रायसाहब को एम.एल.ए. की टिकट चाहिए, चुनाव लड़ने का मन है।' बीच में सेठ रामप्रसाद बोल पड़े। 
'व्यापार छोडकर राजनीति में जाओगे क्या, रायसाहब ?'
'क्यों नहीं ? जब तुम व्यापार छोड़कर खेती कर सकते हो तो क्या हम राजनीति नहीं कर सकते ?' रायसाहब ने पूछा। 
'कर सकते हो लेकिन जनता में पकड़ होनी चाहिए तब तो वोट मिलेगा।'
'मुझे बिलासपुर के आसपास किसी भी विधानसभा क्षेत्र की टिकट दिलवा दो, मैं जीत कर बताऊंगा।'
'कैसे जीत जाओगे ?'
'चुनाव 'पैसा' जीतता है, 'केन्डीडेट' नहीं।'
'क्या पैसे में इतनी ताकत है ?'
'देखना, यही पैसा टिकट दिलवाएगा, वोट दिलवाएगा और मुझे एम.एल.ए. बनवाएगा, चमनलाल।'
'इसीलिए आप लोग 'सेठ जी' कहलाते हैं क्योंकि आप पैसे की ताकत पहचानते हैं और पैसे को काम से लगाते हैं।'
'पैसा तो तुम्हारे पास भी बहुत है ?'
'है लेकिन मेरा मजदूर जैसा स्वभाव है। मैं मजदूरी में अपनी अक्ल लगाता हूँ, पैसे में नहीं। इसीलिए आप दोनों सेठ हो और मैं हूँ 'किसान' चमनलाल।'
          चमनलाल की पढ़ाई लाहौर में हुई थी, एफ॰ए॰ पास थे। एफ॰ए॰ अर्थात 'एंट्रेन्स' के समकक्ष। पाकिस्तान से भागे तो पढ़ाई-लिखाई छूट गई लेकिन पुस्तकें पढ़ने का शौक उनके पीछे लग गया। उनको हिन्दी भाषा पढ़नी-लिखनी नहीं आती थी लेकिन अंग्रेजी, उर्दू, फारसी के अच्छे जानकार थे। घर में समृद्ध लाइब्रेरी थी जिसमें कृषि और बागवानी से संबन्धित पुस्तकों का खासा संग्रह था। वे उपज बढ़ाने के लिए उपयोगी अधिकाधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश करते, देश भर में आयोजित प्रदर्शनियों और सेमिनारों में भाग लेते, कृषि वैज्ञानिकों और कृषकों से चर्चा करते और उसे अपने खेतों में ले आते। अन्न, फल और सब्जी के उत्पादन में मिली सफलता ने आसपास के कृषकों को आकर्षित किया और बिलासपुर के आसपास के गाँव की ज़मीनें चार महीने की फसल के बदले बारह महीने की फसल उगलने वाली बन गई।
            15 दिसंबर 1981 को पेट में हुई तकलीफ के कारण 62 वर्ष की उम्र में बिलासपुर का आधुनिक अन्नदूत इस चमन को हरा-भरा छोड़ कर असमय चला गया।

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 याद किया दिल ने  ============= दिल की बात  किशोरावस्था में हम  'धर्मयुग' पढ़ते थे. सबसे पहले आबिद सुरती का कार्टून कोना 'ढब्बू जी', उसके बाद पूरा 'धर्मयुग'. उसी धर्मयुग में मैंने कभी कवियित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से चोरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उ...

दिल की बात

दिल की बात  किशोरावस्था में हम  'धर्मयुग' पढ़ते थे. सबसे पहले आबिद सुरती का कार्टून कोना 'ढब्बू जी', उसके बाद पूरा 'धर्मयुग'. उसी धर्मयुग में मैंने कभी कवियित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से चोरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उनसे कोई डर नहीं है लेकिन जो अ...