याद किया दिल ने
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दिल की बात
किशोरावस्था में हम 'धर्मयुग' पढ़ते थे. सबसे पहले आबिद सुरती का कार्टून कोना 'ढब्बू जी', उसके बाद पूरा 'धर्मयुग'. उसी धर्मयुग में मैंने कभी कवियित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से चोरित है.
सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उनसे कोई डर नहीं है लेकिन जो अभी हैं, उनसे डर लग रहा है. डर इसलिए कि उनकी कुछ व्यक्तिगत बातें लिखे बिना ये शब्दचित्र ठीक से नहीं बन पा रहे थे. हो सकता है कि वे मुझसे नाराज हो जाएं लेकिन यदि वे मेरी इस बात पर गौर करें तो शायद उनकी नाराजगी कम हो जाए कि इस कहानी के माध्यम से वे दुनिया भर में प्रख्यात होने वाले हैं.
'ब्लॉग' और 'फेसबुक' में ये कहानियाँ पाठकों ने चाव से पढ़ी हैं, अब यह पुस्तक के रूप में आपके हाथों में है. जयपुर के बोधि प्रकाशन के मालिक और कवि श्री माया मृग ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने का दुस्साहस किया है, मैं उनके साहस को प्रणाम करता हूँ.
आज हमारे पुत्र कुंतल (स्वामी ऋजुदा) के जन्मदिवस की सैतीसवीं वर्षगांठ के सुअवसर पर 'याद किया दिल ने' आपको दिल से समर्पित है.
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
१८ जनवरी २०१८.
सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उनसे कोई डर नहीं है लेकिन जो अभी हैं, उनसे डर लग रहा है. डर इसलिए कि उनकी कुछ व्यक्तिगत बातें लिखे बिना ये शब्दचित्र ठीक से नहीं बन पा रहे थे. हो सकता है कि वे मुझसे नाराज हो जाएं लेकिन यदि वे मेरी इस बात पर गौर करें तो शायद उनकी नाराजगी कम हो जाए कि इस कहानी के माध्यम से वे दुनिया भर में प्रख्यात होने वाले हैं.
'ब्लॉग' और 'फेसबुक' में ये कहानियाँ पाठकों ने चाव से पढ़ी हैं, अब यह पुस्तक के रूप में आपके हाथों में है. जयपुर के बोधि प्रकाशन के मालिक और कवि श्री माया मृग ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने का दुस्साहस किया है, मैं उनके साहस को प्रणाम करता हूँ.
आज हमारे पुत्र कुंतल (स्वामी ऋजुदा) के जन्मदिवस की सैतीसवीं वर्षगांठ के सुअवसर पर 'याद किया दिल ने' आपको दिल से समर्पित है.
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
१८ जनवरी २०१८.
किस्सा रामप्रसाद अवस्थी का : पहलवानी दांव
(१)
बादलों का उमड़ना, घुमड़ना और बरसना वैसा ही है जैसा सब दूर होता है लेकिन बिलासपुर की बरसात में गर्माहट, ठंडक और नमी का मिश्रण कुछ खास है। शहर पूरा का पूरा कोलतार की सड़कों से पट गया है इसलिए गाँव की जमीन से उठती महक तो नहीं है परंतु बरसता पानी जब धूल को अपनी बाहों में समेटता है तो किसी जानी-पहचानी महक की हल्की सी याद ज़ेहन में बरबस आ जाती है। ऐसा लगता है कि यहाँ की धरती अतृप्त है लेकिन जो धरती काली सड़कों के नीचे दब गई हो उसकी प्यास को कैसे समझा जाए ? केवल धरती नहीं, यहाँ के रहने वाले लोग भी मुखौटों के पीछे छिपे हुए हैं, असली चेहरा दिखता नहीं। गाँव में भी इस तरह के लोग थे लेकिन वे जैसे थे, वैसे दिखते थे; यहाँ तो जो जैसा है वैसा नहीं, कुछ और-सा लगता है, जो दिखने में क्रूर है वह अंदर से नरम-दिल है और जो सज्जन दिख रहा है, वह दिल में कलुष छिपाए बैठा है। कुछ भी कहो, गाँव की बात ही कुछ और थी। वहाँ का खुलापन जब याद आता है तो यहाँ कसमसाहट महसूस होती है लेकिन हालात ऐसे बन गए कि अपना गाँव छोड़कर इस अनजाने शहर में आना पड़ा। उत्तरप्रदेश के जिला बांदा के एक छोटे से गाँव अर्जुनाह का कृषक-पुत्र रामप्रसाद अवस्थी घर से बेघर होकर एक ऐसी अंजान बस्ती में आ पहुंचा जहां उसका अपना कोई न था लेकिन बिलासपुर जैसी बस्ती में एक ठिकाना तो बन गया।
रामप्रसाद की गाँव में दस बीघा जमीन थी। गेहूं और चना की भरपूर पैदावार होती थी। घर लायक सब्जी भी हो जाती थी। बैल थे, एक गाय थी और रखवाली के लिए देसी कुत्ता भी था। घर में तेल पिलाई हुई लाठियाँ थी, बंदूक थी और एक तमंचा भी। ऐसा नहीं है कि केवल रामप्रसाद के घर में हथियार रहे हों, घर-घर में रहते हैं। अपना घर बचाना हो या जमीन, ताकत चाहिए, धमकी देने का माद्दा होना चाहिए और मौका पड़े तो शस्त्रों को काम पर भी लगाना चाहिए। लड़ने-भिड़ने के लिए तो बहाना चाहिए होता है, वहाँ तो जरा सी बात बिगड़ी कि बात बिगड़ जाती है। यहाँ तक कि शादी-ब्याह भी लड़ते-भिड़ते हुए निपटते हैं। एक बार की बात है, बड़ी बहन का विवाह था। बाइस कोस दूर से बारात आई थी, डेढ़ सौ लोग थे बारात में। लड़के वाले बात-बात में नखरा बता रहे थे। रामप्रसाद के दद्दा बहुत सहते रहे, कारण, बिटिया के ब्याह में कोई अनिष्ट न हो लेकिन लड़के के बाप का मुंह फैलता गया। दद्दा ने अपनी छः फुटी लाठी हवा में लहराई और चीखे- 'अब चुप्पे-चाप निकल लो, नहीं तो खोपड़िया खोल देंगे। पांव पूजा है, मूड़ नहीं।' उनका रौद्र रूप देखकर पूरी बारात सन्नाटे में आ गई और फिर विदाई तक सब एकदम चुप रहे।
अर्जुनाह में एक प्राथमिक शाला थी। गाँव के कुछ बच्चे वहाँ पढ़ने जाते थे। दद्दा कहते थे- 'रामपरसाद, इस्कूल में तुम्हारा नाम लिखवाया है, जाते क्यों नहीं ?' रामप्रसाद चुप, क्या जवाब दे ? स्कूल जाना मतलब दुनिया का सबसे बेकार काम। गुरुजी पढ़ाते हैं लेकिन कुछ समझ में नहीं आता, रटने को कहते हैं पर याद नहीं होता। रोज के रोज छड़ी से पिटाई होती है, सब लड़कों के सामने इज्ज़त खराब होती है। दद्दा को क्या बताएं ? दद्दा बड़बड़ाते- 'हम तो पढ़ नहीं पाए, गाँव में इस्कूल होता तो हम ज़रूर पढ़ते। तुमको भेज रहे हैं तो तुम्हारा रंग-ढंग समझ में नहीं आता। अरे, पढ़-लिख लो, आदमी बन जाओगे, बचुवा।' दद्दा समझाते और चिल्लाते भी लेकिन बचुवा के पल्ले यह नहीं पड़ता कि भला पढ़ने-लिखने से कोई आदमी कैसे बन जाता होगा ? अभी हम लड़के हैं, हैं कि नहीं ? जब बड़े होंगे, छाती चौड़ी हो जाएगी, दाढ़ी-मूंछ उग आएगी तो खुद ही आदमी बन जाएंगे, बिन-फोकट स्कूल भेजने के लिए पीछे लगे रहते हैं।
दिन भर गाँव में इधर से उधर भटकना, तालाब के तीर बैठकर ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंक कर गोल-गोल लहरों को निहारना, साथी इकट्ठा हुए तो 'चल कबड्डी आर-पार, मेरा मूंछा लाल-लाल' का घंटों दौर चलता, लुकाछिपी और रामरस खेलते। सारदा पहलवान कहते- 'रामपरसाद, मर्द की पहचान उसके गठीले बदन से होती है। रोज कसरत करो, दंड-बैठक करो और ब्रह्मचर्य साधो।'
'ये ब्रह्मचर्य क्या होता है गुरु ?' रामप्रसाद ने पूछा।
'तुम नहीं नहीं समझोगे, बच्चे हो। बड़े हो जाओगे तो सब समझाएँगे।'
'आपने कहा कि ब्रह्मचर्य साधो लेकिन उसको कैसे साधें, जब समझेंगे तब तो साधेंगे ?'
'कहा न, बाद में बताएँगे, अभी एक काम करो, अपनी चड्डी के अंदर लंगोट बांधा करो, समझे ?'
रामप्रसाद के दद्दा बहुत चिंतित थे. देश आज़ाद हुए दस साल बीत गए, गाँव की दशा में कोई बदलाव नहीं आया। फसल का कोई ठिकाना न था, अक्सर बरसात रूठ जाती तो फसल प्यासी सूख जाती या कभी बेमौसम बारिश खड़ी फसल को बर्बाद कर देती। जमीन तो केवल जोतने, बीज बोने और देखरेख करने की हो गई है, मनुष्य के जीवन की तरह, परिणाम सदैव अनिश्चित। खेती न हुई, जुआ हो गया जिसमें दांव अक्सर उलटा पड़ जाता है. किसान की ज़िन्दगी में सुख कहाँ ? अजीब बात है, दूसरों का पेट भरने वाला किसान खुद भूखा सोता है ! जवाहरलाल कहते हैं कि खेतों के लिए सिंचाई के साधन बनाएंगे, खेती की नई तकनीक लाएंगे, देश की तरक्की होगी, कोई भी भूखे पेट नहीं सोएगा। न जाने, कब वो दिन आएंगे ?
गाँव के छोकरे बिगड़ रहे हैं. स्कूल जाने के नाम से थर-थर कांपते हैं. मास्टर भी दुष्ट हैं, लड़कों को पढ़ाते कम हैं, मारते अधिक हैं। छोटे बच्चे हैं, गाँव के हैं, अनपढ़ माँ-बाप की संतान हैं, पैदा होते ही विद्वान तो हो नहीं जाएंगे पर इस बात को न मास्टर समझते और न लड़के। लड़के घर से निकलते हैं स्कूल जाने के लिए, रास्ते में अटक जाते हैं. न जाने कहाँ भटकते हैं। लफंगई करते हैं, पहलवानी कर रहे हैं, कमाई-धमाई की तरफ कोई ध्यान नहीं है। घर का काम बताओ तो उनको नानी याद आती है. ससुरे, न घर के न घाट के। घर में खाने वाले बढ़ते जा रहे हैं, कैसे बसर होगा ? सुना है, भिलाई में लोहा कारखाना बन रहा है, लड़का वहां काम पा जाता तो उसका भविष्य बन जाता लेकिन बहुत दूर है छत्तीसगढ़। वहां तो आदिवासी रहते हैं, जादू-टोना होता है, कोई वहां मरने जाएगा क्या ? ये नेहरू जी को क्या सूझा, जो उधर बनवाया, इधर अपने यूपी में बनवाते तो हम लोगों को नज़दीक पड़ता।
अम्मा को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था. घर की झाड़ू-बुहारी, कपड़े धोने और चौका-बासन में दिन कब बीत जाता, उसे मालूम न पड़ता। कभी फुर्सत पाती तो रामप्रसाद को समझाती- 'बचुवा, ब्राह्मणों के कुल में तुम्हारा जनम हुआ है, पढ़ो, पढ़ने से बुद्धि आती है, पढ़ोगे तब तो कुछ बनोगे।'
'अम्मा, कुछ भी बोलो, पढ़ने भर को न बोलो, हमसे न होगा. स्कूल जाओ तो मास्टर पीटता है। हम तो पहलवान बनेंगे। जरा ताकत आ जाने दो फिर बताएंगे उस मास्टरवा को.' रामप्रसाद ने निर्णय सुनाया।
'गुरूजी को भला ऐसा कहते हैं ? वो तुम्हारे अच्छे के लिए तुमको मारते हैं।'
'रहने दो, हमें अच्छा नहीं बनना, हम ऐसे ही ठीक हैं' रामप्रसाद ने वहां से भागते हुए कहा। अम्मा ने भगवान राम को हाथ जोड़कर याद किया और मन ही मन प्रार्थना की- 'भगवान, हमारे बचुवा को तनिक बुद्धि दो।'
रामप्रसाद पंद्रह साल का हो गया, सारदा गुरु की संगत में बदन हृष्ट-पुष्ट हो गया, चेहरा दमकने लगा, इस सबका एक और असर हुआ कि उसका दिमाग चढ़ने लगा। जब देखो तब किसी को भी ललकारने की घटना सुनाई पड़ने लगी। धन, पद, यश और बल के साथ यही बहुत बड़ी मुसीबत है कि ये सीमाबद्ध नहीं रहते।
इधर रामप्रसाद की उम्र बढ़ रही थी, उधर भाई-बहनों की संख्या बढ़ गई। रामप्रसाद की छोटी बहन चौदह साल की हो गई थी, घर का काम करती, सिलाई-कढ़ाई करती। लड़कियों की पढ़ाई का तो रिवाज ही न था। दो छोटे भाई भी थे, वे भी रामप्रसाद की तरह आगे बढ़ रहे थे। रामप्रसाद अपने दद्दा के साथ खेत जाता, उनके काम में हाथ बँटाता लेकिन कुश्ती लड़ना उसकी प्राथमिकता थी। रोज अखाड़े जाना, कुश्ती के दांव-पेंच सीखना, दंड-बैठक करना उसकी दैनंदिनी का अनिवार्य अंग था। साल में एक बार नागपंचमी के अवसर पर कुश्ती प्रतियोगिता होती तो वह दम-खम से भाग लेता और मुक़ाबला जीतने की कोशिश करता। गाँव की सड़क पर जब वह ज़रा लहरा कर, सीना तान कर चलता तो देखने वालों की नज़र उस पर टिक जाती। लड़कियां भी दरवाजे की आड़ से उसे देखकर मोहित होती, रास्ता चलते हौले से मुस्कुराती लेकिन वह सारदा गुरु की शिक्षा को ध्यान रखते हुए इन सब चक्करों से दूर रहता। एक दिन सारदा गुरु ने उससे पूछा- 'रामपरसाद, क्या सोचा है ?'
'किस बारे में गुरु ?'
'शादी-ब्याह के बारे में।'
'दद्दा तो पीछे पड़े हैं लेकिन हमने मना कर दिया।'
'क्यों, क्यों मना किया ?'
'ब्याह कर लेंगे तो ब्रह्मचर्य का क्या होगा ?'
'तो क्या आजीवन ब्रह्मचारी रहोगे ?'
'क्या पता लेकिन आप तो जानते हैं कि हमारा ब्याह हो चुका है।'
'ब्याह हो चुका है ? कब, किससे ?'
'अखाड़े की मिट्टी से।' रामप्रसाद ने हँसते हुए कहा। सारदा गुरु ने उसकी पीठ पर ज़ोर की धौल जमाई और कहा- 'पगलौट कहीं का।'
सारदा गुरु नामी पहलवान थे, स्वयं भी गृहस्थ थे, गृहस्थाश्रम के महत्व को समझते थे इसलिए उनको लगा कि उनका चेला भी अपनी गृहस्थी बसाए। लंगोट बांधने की सलाह उन्होंने ही दी थी इसलिए खुलवाने का दायित्व भी उन पर था। रामप्रसाद सोलह साल का हो गया था, शादी लायक उमर हो चुकी थी। गाँव में उसकी उमर के दूसरे लड़के कब के ब्याहे जा चुके थे, कुछ तो बाल-बच्चे वाले हो गए थे लेकिन उनका चेला अभी ब्रह्मचर्य का झूला झूल रहा था। शरीर बनाना, कुश्ती लड़ना तो शौक है लेकिन गृहस्थी बसाना भी ज़रूरी है उसे समझना चाहिए। रामप्रसाद ने पहलवानी में अच्छा शरीर बनाया किन्तु यदि अर्जित शक्ति विसर्जित न हुई तो या तो मनुष्य साधु बनेगा या उत्पाती। साधु बनने के कोई लक्षण तो हैं नहीं, यह लड़का आगे चलकर गाँव के लिए कहीं कोई समस्या न बन जाए ! सारदा गुरु ने मन ही मन निर्णय लिया कि वे रामप्रसाद को ब्याह करने के लिए समझाएँगे, उसके बाद उसके दद्दा से बात करेंगे क्योंकि उनकी नज़र में रामप्रसाद के लायक एक अच्छी लड़की उनकी रिश्तेदारी में थी।
इसके बाद रामप्रसाद की ज़िंदगी में एक जबर्दस्त मोड़ आया। आप बखूबी अनुमान लगा सकते हैं कि कौन सा मोड़ आया होगा, हो सकता है कि रामप्रसाद को किसी लड़की से प्यार हो गया हो। जहां तक प्यार करने का सवाल है, उस जमाने में दोतरफा प्रेम असंभव था, आम तौर पर एकतरफा होता था। दोतरफा प्रेम बहुत 'रिस्की' था। एक तो होता नहीं था, अगर हो जाए तो एकांत की समस्या रहती थी, यदि एकांत मिल जाए तो नज़दीकी नहीं बनती थी क्योंकि सात फेरे पूरे किए बिना लड़की अपना बदन छूने की अनुमति नहीं देती थी; यदि नज़दीकी बन जाए तो अंतरंगता नहीं हो पाती थी क्योंकि गर्भाधान का खतरा मंडराता था, यदि कदाचित अंतरंगता बन जाए और संयोगवश गर्भाधान हो जाए तो गर्भपात का कोई उपाय न था, बदनामी का डर अलग। वैसे भी, उस युग में 'प्रेम' को विवाह में परिवर्तित करना असंभव था क्योंकि दोनों के बाप सूचना प्राप्त होते ही एक दूसरे के शत्रु हो जाते थे, उनके बीच लट्ठ चल जाते थे, खून की नदियां बह जाती थी। इसी कारण वैसी परिस्थिति उत्पन्न ही न हो, उसी में सबकी भलाई थी इसलिए तात्कालीन युवा बेचारे बहुत लालायित होने के बावजूद मन मसोस कर रह जाते थे। फिर भी, मान लो, दोनों संयम न रख पाए और लड़की गर्भवती हो गई तो वह किसी कुएं में कूदकर अपने प्राण दे देती, उसके उपरांत कथानक से लड़की विलुप्त हो जाती और लड़के के शुभ-विवाह का मार्ग प्रशस्त हो जाता।
आप एक अन्य अनुमान भी लगा सकते हैं कि रामप्रसाद ने अपने गुरु की बात मान ली होगी, धूमधाम से उसका विवाह हो गया होगा और रामप्रसाद ने अपनी नव-विवाहिता पत्नी को किसी अन्य कमरे में जाकर सोने का आदेश सुना दिया होगा ताकि उसका ब्रह्मचर्य अक्षुण्ण बना रहे ! पाठक अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन ये जो ज़िंदगी है न, यह पूर्वानुमानों पर नहीं चलती, विचित्र मोड़ लेने की आदी है। रामप्रसाद की जिंदगी ने कैसा मोड़ लिया, यह मैं आपको बाद में बताऊंगा, अभी आपको मैं अपने छत्तीसगढ़ में स्थित शहर बिलासपुर के बारे में कुछ बताऊंगा।
(२)
ऐसा सुना है कि घिर्रऊ और बरउआ बिलासपुर के वे पुराने लोग हैं जिन्होंने बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में हलवाई की दूकान खोली थी। उन दिनों वहाँ दूध, मलाई, जलेबी, लड्डू, बालूशाही, मैसूर पाक, सूजी का हलवा, पेठा; नमकीन सलोनी, सेव आदि बनते-बिकते थे। चाय-काफी, समोसा, आलूबड़ा, भजिया का चलन बहुत बाद में शुरू हुआ, संभवतः सन 1930 के बाद। बिलासपुर के शहर बनने की शुरुआत गोलबाजार के निर्माण से हुई जिसे सन 1936 से 1938 के मध्य गोलाकार शैली में बनवाया गया। झोपड़ी छाप हलवाई की दूकानें खत्म हो गई और गोलबाजार में बड़े आकार की दूकानें खुली। सबसे पहले आए, बिरजी हलवाई, कल्लामल बृजलाल। इस दूकान ने धूम मचा दी। दूकान इस कदर चलती थी कि एक किवदंती प्रचलित हो गई- 'बिरजी सेठ के यहाँ रात को तांगे में बैठकर मिठाई खरीदने के लिए एक जिन्न आता है और ढेर सारे रुपए दे जाता है।' हो सकता है कि जिन्न आता रहा हो लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उसके पास हलवाई को देने के लिए जार्ज पंचम के चांदी से निर्मित सिक्के कैसे आते रहे होंगे ?
उसके बाद उत्तरप्रदेश के दो परिवार बिलासपुर आए, रघुनंदनप्रसाद पांडे और गयाप्रसाद पांडे, फिर मनेन्द्रगढ़ से जगदीशनारायण अग्रवाल आए, मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आए. स्थानीय शिवप्रसाद केशरवानी, श्यामलाल अग्रवाल, रणछोड़भाई मेहता ने भी दूकानें खोली। गोलबाजार एक अघोषित 'मिठाई लाइन' बन गई जो पूरे बस्ती के आगमन और आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गया। घरों में नाश्ता बनाने का रिवाज़ नहीं था इसलिए पुरुष सुबह होते ही घर से बाहर निकलते और इन हलवाइयों की दूकानों में घुस जाते और अपना मनपसन्द नास्ता करते। औरतों का घर से बाहर निकलने का रिवाज़ नहीं था इसलिए न तो उन्हें नास्ता नसीब होता और न ही उन्हें पुरुषों की इस चोट्टाई की खबर होती।
(३)
आपको रामप्रसाद की ज़िंदगी में आए 'टर्निंग-पाइंट' के बारे में बताना है इसलिए अब हम पुनः यूपी के जिला बांदा के ग्राम अर्जुनाह की सीमा में प्रवेश करते हैं। रामप्रसाद अपने काम से काम रखता था, प्रतिदिन व्यायाम करता, खेत में दद्दा की मदद करता। एक दिन वह अपने घर भोजन के लिए आया तो उसकी छोटी बहन रो रही थी।उसने पूछा- ‘क्या हुआ, क्यों रो रही है ?’
‘भैया, मुझे बिसेसर बहुत परेशान करता है.’ बहन ने बताया।
‘कौन ? बिसेसर ठाकुर ?’
‘हां, आज तालाब नहाने गई थी तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।’
‘उसकी ये हिम्मत ?’
‘मैं उसको बोली, भैया को बताऊंगी तेरी ये हरकत।’
‘तो ?’
‘बोला- ‘तेरा भाई मेरा क्या बिगाड़ लेगा।’
‘ऐसा बोला ?’
‘हां लेकिन तुम उससे मत उलझना भैया, उनका पूरा परिवार लड़ाकू है, सब के सब गुन्डे हैं।’
‘ठीक है, उसको मैं देख लूंगा, अब से तुम उधर मत जाना।’ रामप्रसाद ने उसे शांत स्वर में समझाया लेकिन अंदर ही अंदर वह गुस्से से उबल रहा था. इस बीच उसकी बहन घर के अन्दर किसी काम से गई, रामप्रसाद ने लाठी निकाली और सीधे सारदा गुरु के घर पहुंचा. गुरु ने पूरी बात सुनी और बोले- ‘चल, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ.’ दोनों बिसेसर के घर पहुंचे और उसे ललकारा. बिसेसर ने उन दोनों को खिड़की से झांककर देखा और कुछ देर बाद अपने भाइयों के साथ लाठियों से लैस बाहर निकला और एक दूसरे पर लट्ठ चल पड़े. लाठियां चलाने में सब सिद्धहस्त थे. वार होते रहे, बचाव भी हुए, तब ही एक घातक वार सारदा गुरु के सिर पर पड़ा, उसका सिर फ़ट गया और वह जमीन पर चिल्लाते हुए लोटने लगा. रामप्रसाद अकेला पड़ गया, उसे समझ में आ गया कि अब उसका बचना मुश्किल है. उसके सामने करो या मारो की स्थिति आ गई. उसने झपट्टा मारकर बिसेसर की गर्दन दबोच ली और जब तक उसके भाई देख पाते तब तक बिसेसर टें बोल गया. बिसेसर के भाइयों का ध्यान जमीन पर पड़े निष्प्राण बिसेसर पर गया और रामप्रसाद मौका ताड़कर वहां से सरपट भागा. बस अड्डे पर खड़ी एक बस में बैठ गया, बस चल पड़ी. उसकी सांस बहुत तेज चल रही थी लेकिन बस धीमी चल रही थी. कन्डक्टर ने उससे पूछा- ‘कहां जाना है ?’
‘ये बस कहां जा रही है ? उसने पूछा.
‘बांदा.’
‘वहीं जाना है.’ रामप्रसाद ने अपनी सांस को संयत करते हुए कहा.
बांदा के बस अड्डे के पास ही रेलवे स्टेशन था। रामप्रसाद तेज कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ा, सामने एक ट्रेन थी, मानिकपुर जा रही थी, टिकट लेकर बैठ गया। पैसेंजर थी, हर स्टेशन पर रुकती और रामप्रसाद की धड़कन बढ़ जाती। वह सतर्क निगाह से सब ओर देख रहा था कि कहीं पकड़ा न जाए। राम-राम करते मानिकपुर आया। वहाँ उसे कटनी की ओर जानेवाली गाड़ी दिखी, टिकट खरीदी और उसमें बैठ गया। उसने सुना था कटनी के आगे जबलपुर है, बड़ा शहर है, वहाँ पहुँच जाऊंगा तो वहाँ कौन खोज पाएगा। ले-दे कर कटनी आया। पूछ-ताछ करने पर मालूम पड़ा कि जबलपुर की गाड़ी सात घंटे बाद है, उतनी देर तक कटनी स्टेशन में रुके रहने से पकड़े जाने का खतरा था। सामने वाले प्लेटफार्म पर एक गाड़ी का इंजिन सीटी बजाकर जाने की सूचना दे रहा था। रामप्रसाद दौड़कर उसमें चढ़ गया, टिकट लेने का समय न था।
थर्ड क्लास के डिब्बे में उसने बैठने की जगह बनाई, यात्रियों से पूछने पर मालूम पड़ा, ट्रेन बिलासपुर जा रही है। बिलासपुर का उसने नाम बहुत सुना था लेकिन उसे इस तरह भगोड़ा बनकर जाना पड़ेगा, ऐसा उसने सपने में भी नहीं सोचा था। धीरे-धीरे रात घिरने लगी, डिब्बे में धीमी रोशनी थी, वह सहज भाव से बैठा रहा लेकिन नज़र उसकी अब पीछा करने वालों पर कम, टिकट-चेकर पर अधिक थी। शहडोल स्टेशन से ट्रेन छूटने के बाद मुसीबत काला कोट पहने चढ़ गई, रामप्रसाद ने जैसे ही उसे देखा, उसके दिल की धड़कन बढ़ गई। वह उठा और टीसी की विपरीत दिशा वाले संडास में घुस गया और चुपचाप उस बदबू में घंटे भर बैठा रहा। बाहर निकलकर उसने नज़र घुमाई, आफत जा चुकी थी लेकिन उसकी सीट पर कोई और बैठ गया था। उसे गुस्सा बहुत आया, उसका गाँव होता तो उठाकर बाहर फेंक देता लेकिन इस परिस्थिति में चुप रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न था, समझा-बुझा कर उसने थोड़ी जगह बनाई और बैठे-बैठे सो गया।
सुबह एक झटके से उसकी नींद खुली, सब लोग डिब्बे से उतर रहे थे, बिलासपुर आ गया था। बाहर पानी बरस रहा था, हवा तेज चल रही थी, बौछार से उसके कपड़े भीग गए। भागकर वह शेड के नीचे पहुंचा और बारिश रुकने का इंतज़ार करते बहुत देर तक भाप छोडते इंजिन को देखता रहा जो रात भर की यात्रा के बाद सुस्ताता खड़ा था और गहरी सांस ले रहा था।
(४)
बैठे-बैठे एक घंटा बीत गया लेकिन बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह सोच रहा था- 'बरसात की ऐसी झड़ी तो हमारी तरफ नहीं होती। पानी आता है तो थोड़ी देर बरस कर निकल जाता है। हमारे यहाँ गेहूं और चना की खेती में पानी कम लगता है, सुना है, चांवल की फसल को बहुत पानी लगता है। मुझसे तो चावल खाया नहीं जाता, खा लो तो पेट में दर्द उठने लगता है। अपने यहाँ की रोटी और सब्जी का स्वाद अलग है। अम्मा जब हाथ से थाप कर गरम-गरम रोटी सेंक कर देती है तो उसकी मिठास का क्या कहना?'
अम्मा की रोटी की याद आते ही उसे भूख ने आ घेरा। उसने कल सुबह से कुछ खाया नहीं था। कुर्ते की जेब में पैसे खोजे, डेढ़ रुपए निकले। दो आलूबड़ा लिया और एक कप चाय, पेट में अन्न गया तो दिमाग आगे बढ़ा। उसके दिमाग में सवाल उठा- 'अब क्या ?'
नई जगह, न जान न पहचान, एक घबराहट से पिंड छूटा तो दूसरी शुरू हो गई। कुछ देर बाद बारिश रुकी, रामप्रसाद स्टेशन के बाहर निकला। बाहर तांगे की लाइन लगी थी, उनके घोड़े बीच-बीच में हिनहिना रहे थे और तांगेवाले आवाज लगा रहे थे- 'बस्ती चलो बस्ती, आठ आने...' रामप्रसाद एक तांगे के पास पहुंचा और उससे पूछा- 'बस्ती जाने का आठ आना? कितनी दूर है जो आठ आने बोल रहे हो?'
'पाँच मील है यहाँ से गोलबाजार।'
'फिर भी जादा है, चार आने में ले चलो।'
'चलो, छै आने देना, बैठो बोहनी का टाइम है।'
'ये बोहनी क्या होती है ?'
'सुबह-सुबह के पहले ग्राहक से जो पैसा मिलता है उसे बोहनी कहते हैं।'
'तो मैं पहला ग्राहक हूँ।'
'हौ, बैठो, जल्दी बैठो तब तक मैं और सवारी लेकर आता हूँ।' तांगे वाले ने कहा।
तांगे वाले का घोडा दुबला-पतला था, मुंह में फंसे लोहे को चबा रहा था और बार-बार अपना सिर ऊपर-नीचे कर रहा था। बीच-बीच में बदन पर बैठी मक्खी को अपनी पूंछ से उड़ा रहा था लेकिन जिद्दी मक्खी उड़ती और फिर आकर बैठ जाती। घोडा बेचैन था लेकिन पूंछ हिलाने के अलावा कोई दूसरा उपाय उसके पास न था।
दस मिनट के अंदर पाँच सवारियां और आ गई, 'खसक के बैठो भैया, थोड़ा आगे-पीछे हो जाओ मालिक, चल, आगे बढ़, बढ़ मेरे राजा...' कहते हुए तांगेवाले ने घोड़े के पुट्ठे में चाबुक चलाया, घोडा हिनहिनाते हुए आगे बढ़ा और सरपट दौड़ने लगा। तांगेवाला अपनी चाबुक की छड़ी को तांगे के चक्कों में अड़ाता और खड़-खड़-खड़ की आवाज़ निकालकर आधुनिक 'हार्न' जैसा अपने वाहन के आगमन का संकेत दे रहा था।
ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होता हुआ तांगा पौन घंटे में एक जगह आकर रुक गया। सवारियां उतरने लगी। रामप्रसाद ने तांगेवाले की ओर देखा, तांगेवाले ने कहा- 'अब उतरो भैया, गोलबाजार आ गया, निकालो छै आना।' घोड़े के ऊपर बैठी मक्खी भी उड़ते-बैठते गोलबाजार आ गई। घोड़े ने उससे कुछ नहीं मांगा, मक्खी ने भी कुछ नहीं दिया और इतना लंबा सफर संपन्न हो गया। पशु और जीव-जन्तु के मध्य कोई व्यापार नहीं होता, यह इंसान ही ऐसा है जो बिना पैसा लिए कुछ नहीं करता !
कुछ दूर पैदल चलने के बाद हलवाई की एक दूकान पर रामप्रसाद का ध्यान गया। गद्दी पर धोती-कुर्ता-टोपी धारण किए हुए एक बुजुर्ग बैठे थे जिन्हे देखकर उसे अपनापन जैसा लगा। वे गयाप्रसाद पाण्डेय थे। उसने उनको हाथ जोड़े और पूछा- 'आपके यहाँ कुछ काम मिलेगा ?'
'क्या काम जानते हो ?' दूकान मालिक ने पूछा।
'जीवन में पहली बार काम मांग रहा हूँ, घर में खेती है।'
'कौन जात हो ?'
'ब्राह्मण, अवस्थी।'
'यहाँ तो जूठा उठाने का काम है, ब्राह्मण से जूठा कैसे उठवाएंगे ?'
'सही बात है लेकिन सब समय एक जैसा कहाँ होता है ! आप जो कहेंगे, करूंगा, सब करूंगा।'
'घर कहाँ है ?'
'यूपी, जिला बांदा।'
'कौन गाँव ?'
'अर्जुनाह।'
'अरे, हम भी वहीं के हैं, बवेरु के।'
'हाँ !'
'हाँ, यहाँ कैसे आ गए ?'
'आपको क्या बताएं, हमारा दिमाग बिगड़ गया, बाप से लड़कर चले आए।'
'ठीक है, देस से आए हो तो फिर रहो लेकिन किसी से न कहना कि ब्राह्मण हो, अपना नाम भर बताना, समझे। कोई जान जाएगा तो हमें दोष देगा कि ब्राह्मण से जूठा उठवा रहे हो। तीस रुपिया महीना मिलेगा, यहीं खाना खा लेना और रात को चबूतरे पर सो जाना।' गयाप्रसाद बोले।
'जी, बहुत कृपा आपकी।'
'सामान कहाँ है तुम्हारा ?'
'जो पहना हूँ, वही सामान है।' रामप्रसाद ने बताया।
इस प्रकार रामप्रसाद को बिलासपुर में एक ठिकाना मिल गया।
गयाप्रसाद पान्डे महराज की होटल में सुबह छः बजे से रात दस बजे तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। अल-सुबह जलेबी की तई भट्ठी पर चढ़ती तो रात तक अनवरत जलेबी बनती रहती जिसे खाने के लिए पूरे होटल में पसरी गंदगी और बदबू को दुर्लक्ष्य कर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती। उनके पास एक जलेबी बनाने वाला एक कारीगर था जिसे पहलवान उस्ताद कहते थे और वह मोहल्ला चांटीडीह में रहता था। तेज आंच वाली भट्ठी में बैठकर सुबह से लेकर रात तक जलेबी बनाना बेहद कठिन काम होता है लेकिन वह निर्विकार भाव से बदन के पसीने को गमछे से पोछता हुआ अपने काम को इतनी लगन से करता जैसे कोई भक्त मंदिर में कीर्तन करता है।
जलेबी के साथ स्वादवृद्धि के लिए दो नमकीन भी थे। एक- आलू और प्याज को भूंज कर बनाए गए मसाले के ऊपर बेसन लपेट कर तला गया ‘आलूबड़ा' और दूसरा- पिछली रात बच गए नमकीन को मसल कर, उसमें बेसन और मिर्च मसाला मिला कर तेज लहसुन की छौंक से तैयार किया गया 'प्याज बड़ा'। जलेबी के साथ इन दोनों का 'काम्बिनेशन' इस कदर जायकेदार होता था कि मजा आ जाता। नाश्ते की ये तीनों वस्तुएं जब तैयार होती तो इनकी खुशबू इतनी फैलती कि सड़क चलता इन्सान सम्मोहित सा होटल में खिंचा चला आता। एक बड़ी केतली भर कर चाय बनती जिसे चालू चाय कहा जाता था क्योंकि उसमें पानी की मात्रा अधिक होती थी और बाजार में प्रचलित कीमत से सस्ती थी, परंतु उसका स्वाद लाजवाब था। आसपास के मोहल्ले का आदमी यदि पान्डे महराज की होटल में किसी वजह से किसी दिन न जाए पाए तो उसे रात में बुरे-बुरे सपने दिखाई देते थे।
काम लग जाने से रामप्रसाद को तनिक धीरज बंध गया लेकिन वह जिस माहौल से आया था वह काम करने नहीं, काम लेने वाला था। घर का ऐश-आराम, गाँव में मान-सम्मान, दोस्ती-यारी, घूमना-फिरना, खाना-पीना और रुआब, सब कुछ सहसा हाथ से फिसल गया। सीना तान कर चलने वाला रामप्रसाद आँखें छुपा कर जीने के लिए मजबूर हो गया। पहचान छुपाने के लिए उसने अपना सिर घुटा लिया, मुछमुंडा हो गया और अपना लिबास भी बदल लिया। गाँव में उसका पहरावा धोती-कुर्ता था, यहाँ उसने हाफ़पेंट और कमीज सिलवाई, लंबी कमीज, जिसके अंदर अक्सर उसका हाफ़पेंट छुप जाता था और ऐसा लगता था जैसे वह केवल कमीज पहने हुए है। रोटी-सब्जी खाने वाला मनुष्य अरुचिकर चावल का भात और चटनी खाने लगा। ज़िंदगी ने ऐसी पलटी मारी कि उसके नाम से अवस्थी हट गया, केवल रामप्रसाद रह गया।
उस समय नास्ते की दूकानों में ग्राहक अंदर लगी बेन्च में बैठते, हाथ में दोना पकड़कर खाते और वहीं जमीन पर दोना फेंककर हाथ से टेड़ कर पानी निकालने वाले नल के पास जाते, अपना हाथ धोते, गद्दी पर विराजमान मालिक को बताते कि 'उसने क्या-क्या खाया।' दूकानदार मनगणित से पैसा जोड़ते और भुगतान ले लेते। इस तरीके से परस्पर विश्वास के आधार पर ग्राहक और दूकानदार के मध्य लेनदेन चलता था लेकिन कुछ चतुर-सुजान ग्राहक भी होते हैं जो भरोसे की दीवार में छेद करते हैं। ऐसे लोग कम सामान बताकर घपला करते, पैसे देते समय गंभीर चेहरा बनाते और दूकान से बाहर निकलकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते। रामप्रसाद ने कुछ ग्राहकों की इस चालाकी को ताड़ लिया और पांडे महाराज को शिकायत पेश की। रास्ता यह निकला कि ग्राहक जितना सामान लेंगे, उसका हिसाब जोड़कर रामप्रसाद आवाज लगाकर पैसे बताएगा। इस प्रकार एक नया चलन शुरू हुआ, रामप्रसाद काम करते जाता और जैसे ही ग्राहक मुंह पोछते हुए गद्दी के पास पहुंचता, वह ज़ोर से आवाज लगाता- 'लेना पैसे लेना, आठ आना।' या, इसी तरह जितना भी भुगतान ग्राहक का देय होता। यह आवाज सड़क तक जाती और सड़क पर आने-जाने वाले लोग इस आवाज को सुनकर ठिठक जाते, उन्हें नास्ता करने का बरबस स्मरण हो आता और इस प्रकार पांडे महाराज की दूकान में भीड़ और अधिक बढ़ने लगी।
पुरानी कहावत है- 'रांड रंडापा काट ले, रंडुवे काटन दें' अर्थात विधवा अपना जीवन पवित्रता से व्यतीत कर सकती है लेकिन विधुर उसके पीछे पड़े रहते हैं। इस बीच चतुर-सुजान ग्राहकों ने भी अपना दिमाग लगाया और रामप्रसाद के कुरते की जेब में चवन्नी-अठन्नी टपकाने लगे, रामप्रसाद की जेब में पहले से ही चिल्हर रहती थी, जब और जुड़ने की आवाज़ उसके कानों में प्रविष्ट होती तो ग्राहक के 'बिल' में 'आटोमेटिक' कमी हो जाती। लोग अपने मित्र के साथ आते, पेट भर कर नास्ता-चाय लेते और रामप्रसाद आवाज़ लगाता- 'लेना पैसे लेना, चार आना।' कुछ समय तक ऐसा चला फिर भेद खुल गया, नौकरी चली गई। बगल की दूकान 'पेंड्रावाला' में काम मिल गया और वहां से आवाज़ उभरने लगी- 'लेना पैसे लेना, आठ आने लेना।' पेंड्रावाला को मालूम था कि रामप्रसाद को पड़ोसी ने काम से क्यों निकाला। ऐसे आदमी को काम पर रखना 'रिस्की' था लेकिन पेंड्रावाला और पांडे महाराज में बहुत फर्क था।
दोनों दूकानें अगल-बगल थी लेकिन दोनों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा न थी। दोनों के ग्राहक अलग-अलग थे। पेंड्रावाला में आनेवाले ग्राहक गंभीर किस्म के थे, लौंडे-चपाटी वहाँ घुसने की हिम्मत नहीं करते थे। रामप्रसाद की ऊपरी कमाई एकदम कम हो जाने की एक वजह और थी कि पेंड्रावाला के मालिक रूपनारायण अपने पड़ोसी पांडे महाराज की तरह गऊ स्वभाव के नहीं थे। वे चाक-चौबन्द-धाकड़ व्यापारी थे जिनके सामने अच्छे-अच्छे भयभीत मुद्रा में खड़े रहते थे क्योंकि वे स्वभाव से कड़क, अपशब्दों के प्रयोग में पारंगत और पकड़ कर ठुकाई करने के लिए प्रसिद्ध थे।
रामप्रसाद की तनख्वाह बढ़ती गई और धीरे-धीरे वह सौ रुपए मासिक का मुलाज़िम हो गया। महाकंजूस था वह, साल के साल बीत जाते, कुछ खर्च न करता और वह अपनी तनख्वाह मालिक के पास ही जमा रखता। उसे हर महीने एक शीशी 'शार्कोफेराल' नामक टानिक खरीदना होता था ताकि उसके शरीर में मज़बूती कायम रहे। उस दवा के लिए छः रुपए वह मालिक के छोटे भाई को बहला-फुसला कर ले लेता था और उसका 'डिपाजिट फिक्स' बना रहता।
अंत में आपको रामप्रसाद के बारे में कुछ और बता दूँ और उसे विदा करूँ। इस समय आपको लेखक पर गुस्सा आ रहा होगा कि कहानी को यहाँ तक लाए और रामप्रसाद को क्यों टपकाया जा रहा है? दरअसल लेखक को पात्र के बारे में जितना मालूम था, उतना सब बता दिया। वैसे भी, इस संसार में जो आया है वह एक पात्र है और उसके जीवन से मृत्यु तक का काल एक घटना ही तो है।
(५)
हर साल वर्षाऋतु में गोलबाजार की एक सह-सड़क पर रामलीला का आयोजन होता था। मंडली चित्रकूट से आती थी, रोज शाम को बाजपेयी गली में आठ बजे हारमोनियम और तबले की थाप गूंजने लगती। लोग अपने घरों से खाना निपटा कर जमीन पर बिछाने के लिए बोरियां लेकर पहुँच जाते, पालथी मारकर बैठते और सपरिवार रामकथा के साक्षात प्रदर्शन का आनंद और पुण्य अर्जित करते। सड़क खचाखच भर जाती। रामकथा वैसे ही रोचक है, रामलीला के कलाकार अपनी ओर से कुछ और जोड़कर उसे अधिक मनोरंजक बनाते। जोकरई होती थी, अट्टहास सुनाई पड़ता था, युद्ध-नृत्य का प्रदर्शन होता था और कहानी को ऐसी जगह ले जाकर अटकाते जहां सीता और राम को एक साथ मंच पर बैठाए जा सके। सिया-राम की जोड़ी के समक्ष दर्शक हाथ जोड़कर खड़े हो जाते, कुछ उन्हें पैसे चढ़ाते और कुछ समर्थ लोग पाँच रुपए, दस रुपए की घोषणा अपने नाम के साथ करवाते। इसके अलावा बहुत देर तक उस व्यक्ति की प्रतीक्षा की जाती जो सिया-राम की जोड़ी को अपने हाथों से फूलों की माला पहनाए। यह अधिकार केवल उस व्यक्ति को मिलता जो मंडली के समस्त सदस्यों को अगले दिन अपने घर में भोजन करवाए या भोजन में व्यय होने वाली राशि मंडली को नगद दे दे। ऐसे दानी व्यक्ति की प्रतीक्षा रात को बारह बजे तक चलती, कोई न कोई आ ही जाता और अगर कोई न आता तो उस रात की माला रामप्रसाद पहनाता। माला अर्पित करने का उसे अवसर अक्सर मिलता क्योंकि कई बार माला अर्पित करने कोई न आता। वह दिलदारी के साथ उस भोजन का खर्च अपने ऊपर ले लेता और केवल तब ही उसका 'फिक्स डिपाजिट' टूटता जबकि एक दिन का भोजन देने में उसकी एक माह की तनख्वाह खर्च हो जाती थी।
रामप्रसाद लगभग बारह साल तक बिलासपुर में रहा। उसके बाद उसे अपने गाँव की याद सताने लगी। इतनी लंबी फरारी बिताने के बाद वह अपने गाँव अर्जुनाह लौट गया, फिर कभी वापस नहीं आया। ऐसा सुनने में आया है कि बिसेसर के परिवार वालों को जब रामप्रसाद के गाँव वापस आने की सूचना मिली तो उन्होंने अपना बदला लेने के लिए उसकी हत्या कर दी।
बिलासपुर के गोलबाज़ार में आज भी रामप्रसाद की उस आवाज़ को लोग दिल से याद करते हैं, 'लेना पैसे लेना, आठ आने लेना।'
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बादलों का उमड़ना, घुमड़ना और बरसना वैसा ही है जैसा सब दूर होता है लेकिन बिलासपुर की बरसात में गर्माहट, ठंडक और नमी का मिश्रण कुछ खास है। शहर पूरा का पूरा कोलतार की सड़कों से पट गया है इसलिए गाँव की जमीन से उठती महक तो नहीं है परंतु बरसता पानी जब धूल को अपनी बाहों में समेटता है तो किसी जानी-पहचानी महक की हल्की सी याद ज़ेहन में बरबस आ जाती है। ऐसा लगता है कि यहाँ की धरती अतृप्त है लेकिन जो धरती काली सड़कों के नीचे दब गई हो उसकी प्यास को कैसे समझा जाए ? केवल धरती नहीं, यहाँ के रहने वाले लोग भी मुखौटों के पीछे छिपे हुए हैं, असली चेहरा दिखता नहीं। गाँव में भी इस तरह के लोग थे लेकिन वे जैसे थे, वैसे दिखते थे; यहाँ तो जो जैसा है वैसा नहीं, कुछ और-सा लगता है, जो दिखने में क्रूर है वह अंदर से नरम-दिल है और जो सज्जन दिख रहा है, वह दिल में कलुष छिपाए बैठा है। कुछ भी कहो, गाँव की बात ही कुछ और थी। वहाँ का खुलापन जब याद आता है तो यहाँ कसमसाहट महसूस होती है लेकिन हालात ऐसे बन गए कि अपना गाँव छोड़कर इस अनजाने शहर में आना पड़ा। उत्तरप्रदेश के जिला बांदा के एक छोटे से गाँव अर्जुनाह का कृषक-पुत्र रामप्रसाद अवस्थी घर से बेघर होकर एक ऐसी अंजान बस्ती में आ पहुंचा जहां उसका अपना कोई न था लेकिन बिलासपुर जैसी बस्ती में एक ठिकाना तो बन गया।
रामप्रसाद की गाँव में दस बीघा जमीन थी। गेहूं और चना की भरपूर पैदावार होती थी। घर लायक सब्जी भी हो जाती थी। बैल थे, एक गाय थी और रखवाली के लिए देसी कुत्ता भी था। घर में तेल पिलाई हुई लाठियाँ थी, बंदूक थी और एक तमंचा भी। ऐसा नहीं है कि केवल रामप्रसाद के घर में हथियार रहे हों, घर-घर में रहते हैं। अपना घर बचाना हो या जमीन, ताकत चाहिए, धमकी देने का माद्दा होना चाहिए और मौका पड़े तो शस्त्रों को काम पर भी लगाना चाहिए। लड़ने-भिड़ने के लिए तो बहाना चाहिए होता है, वहाँ तो जरा सी बात बिगड़ी कि बात बिगड़ जाती है। यहाँ तक कि शादी-ब्याह भी लड़ते-भिड़ते हुए निपटते हैं। एक बार की बात है, बड़ी बहन का विवाह था। बाइस कोस दूर से बारात आई थी, डेढ़ सौ लोग थे बारात में। लड़के वाले बात-बात में नखरा बता रहे थे। रामप्रसाद के दद्दा बहुत सहते रहे, कारण, बिटिया के ब्याह में कोई अनिष्ट न हो लेकिन लड़के के बाप का मुंह फैलता गया। दद्दा ने अपनी छः फुटी लाठी हवा में लहराई और चीखे- 'अब चुप्पे-चाप निकल लो, नहीं तो खोपड़िया खोल देंगे। पांव पूजा है, मूड़ नहीं।' उनका रौद्र रूप देखकर पूरी बारात सन्नाटे में आ गई और फिर विदाई तक सब एकदम चुप रहे।
अर्जुनाह में एक प्राथमिक शाला थी। गाँव के कुछ बच्चे वहाँ पढ़ने जाते थे। दद्दा कहते थे- 'रामपरसाद, इस्कूल में तुम्हारा नाम लिखवाया है, जाते क्यों नहीं ?' रामप्रसाद चुप, क्या जवाब दे ? स्कूल जाना मतलब दुनिया का सबसे बेकार काम। गुरुजी पढ़ाते हैं लेकिन कुछ समझ में नहीं आता, रटने को कहते हैं पर याद नहीं होता। रोज के रोज छड़ी से पिटाई होती है, सब लड़कों के सामने इज्ज़त खराब होती है। दद्दा को क्या बताएं ? दद्दा बड़बड़ाते- 'हम तो पढ़ नहीं पाए, गाँव में इस्कूल होता तो हम ज़रूर पढ़ते। तुमको भेज रहे हैं तो तुम्हारा रंग-ढंग समझ में नहीं आता। अरे, पढ़-लिख लो, आदमी बन जाओगे, बचुवा।' दद्दा समझाते और चिल्लाते भी लेकिन बचुवा के पल्ले यह नहीं पड़ता कि भला पढ़ने-लिखने से कोई आदमी कैसे बन जाता होगा ? अभी हम लड़के हैं, हैं कि नहीं ? जब बड़े होंगे, छाती चौड़ी हो जाएगी, दाढ़ी-मूंछ उग आएगी तो खुद ही आदमी बन जाएंगे, बिन-फोकट स्कूल भेजने के लिए पीछे लगे रहते हैं।
दिन भर गाँव में इधर से उधर भटकना, तालाब के तीर बैठकर ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंक कर गोल-गोल लहरों को निहारना, साथी इकट्ठा हुए तो 'चल कबड्डी आर-पार, मेरा मूंछा लाल-लाल' का घंटों दौर चलता, लुकाछिपी और रामरस खेलते। सारदा पहलवान कहते- 'रामपरसाद, मर्द की पहचान उसके गठीले बदन से होती है। रोज कसरत करो, दंड-बैठक करो और ब्रह्मचर्य साधो।'
'ये ब्रह्मचर्य क्या होता है गुरु ?' रामप्रसाद ने पूछा।
'तुम नहीं नहीं समझोगे, बच्चे हो। बड़े हो जाओगे तो सब समझाएँगे।'
'आपने कहा कि ब्रह्मचर्य साधो लेकिन उसको कैसे साधें, जब समझेंगे तब तो साधेंगे ?'
'कहा न, बाद में बताएँगे, अभी एक काम करो, अपनी चड्डी के अंदर लंगोट बांधा करो, समझे ?'
रामप्रसाद के दद्दा बहुत चिंतित थे. देश आज़ाद हुए दस साल बीत गए, गाँव की दशा में कोई बदलाव नहीं आया। फसल का कोई ठिकाना न था, अक्सर बरसात रूठ जाती तो फसल प्यासी सूख जाती या कभी बेमौसम बारिश खड़ी फसल को बर्बाद कर देती। जमीन तो केवल जोतने, बीज बोने और देखरेख करने की हो गई है, मनुष्य के जीवन की तरह, परिणाम सदैव अनिश्चित। खेती न हुई, जुआ हो गया जिसमें दांव अक्सर उलटा पड़ जाता है. किसान की ज़िन्दगी में सुख कहाँ ? अजीब बात है, दूसरों का पेट भरने वाला किसान खुद भूखा सोता है ! जवाहरलाल कहते हैं कि खेतों के लिए सिंचाई के साधन बनाएंगे, खेती की नई तकनीक लाएंगे, देश की तरक्की होगी, कोई भी भूखे पेट नहीं सोएगा। न जाने, कब वो दिन आएंगे ?
गाँव के छोकरे बिगड़ रहे हैं. स्कूल जाने के नाम से थर-थर कांपते हैं. मास्टर भी दुष्ट हैं, लड़कों को पढ़ाते कम हैं, मारते अधिक हैं। छोटे बच्चे हैं, गाँव के हैं, अनपढ़ माँ-बाप की संतान हैं, पैदा होते ही विद्वान तो हो नहीं जाएंगे पर इस बात को न मास्टर समझते और न लड़के। लड़के घर से निकलते हैं स्कूल जाने के लिए, रास्ते में अटक जाते हैं. न जाने कहाँ भटकते हैं। लफंगई करते हैं, पहलवानी कर रहे हैं, कमाई-धमाई की तरफ कोई ध्यान नहीं है। घर का काम बताओ तो उनको नानी याद आती है. ससुरे, न घर के न घाट के। घर में खाने वाले बढ़ते जा रहे हैं, कैसे बसर होगा ? सुना है, भिलाई में लोहा कारखाना बन रहा है, लड़का वहां काम पा जाता तो उसका भविष्य बन जाता लेकिन बहुत दूर है छत्तीसगढ़। वहां तो आदिवासी रहते हैं, जादू-टोना होता है, कोई वहां मरने जाएगा क्या ? ये नेहरू जी को क्या सूझा, जो उधर बनवाया, इधर अपने यूपी में बनवाते तो हम लोगों को नज़दीक पड़ता।
अम्मा को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था. घर की झाड़ू-बुहारी, कपड़े धोने और चौका-बासन में दिन कब बीत जाता, उसे मालूम न पड़ता। कभी फुर्सत पाती तो रामप्रसाद को समझाती- 'बचुवा, ब्राह्मणों के कुल में तुम्हारा जनम हुआ है, पढ़ो, पढ़ने से बुद्धि आती है, पढ़ोगे तब तो कुछ बनोगे।'
'अम्मा, कुछ भी बोलो, पढ़ने भर को न बोलो, हमसे न होगा. स्कूल जाओ तो मास्टर पीटता है। हम तो पहलवान बनेंगे। जरा ताकत आ जाने दो फिर बताएंगे उस मास्टरवा को.' रामप्रसाद ने निर्णय सुनाया।
'गुरूजी को भला ऐसा कहते हैं ? वो तुम्हारे अच्छे के लिए तुमको मारते हैं।'
'रहने दो, हमें अच्छा नहीं बनना, हम ऐसे ही ठीक हैं' रामप्रसाद ने वहां से भागते हुए कहा। अम्मा ने भगवान राम को हाथ जोड़कर याद किया और मन ही मन प्रार्थना की- 'भगवान, हमारे बचुवा को तनिक बुद्धि दो।'
रामप्रसाद पंद्रह साल का हो गया, सारदा गुरु की संगत में बदन हृष्ट-पुष्ट हो गया, चेहरा दमकने लगा, इस सबका एक और असर हुआ कि उसका दिमाग चढ़ने लगा। जब देखो तब किसी को भी ललकारने की घटना सुनाई पड़ने लगी। धन, पद, यश और बल के साथ यही बहुत बड़ी मुसीबत है कि ये सीमाबद्ध नहीं रहते।
इधर रामप्रसाद की उम्र बढ़ रही थी, उधर भाई-बहनों की संख्या बढ़ गई। रामप्रसाद की छोटी बहन चौदह साल की हो गई थी, घर का काम करती, सिलाई-कढ़ाई करती। लड़कियों की पढ़ाई का तो रिवाज ही न था। दो छोटे भाई भी थे, वे भी रामप्रसाद की तरह आगे बढ़ रहे थे। रामप्रसाद अपने दद्दा के साथ खेत जाता, उनके काम में हाथ बँटाता लेकिन कुश्ती लड़ना उसकी प्राथमिकता थी। रोज अखाड़े जाना, कुश्ती के दांव-पेंच सीखना, दंड-बैठक करना उसकी दैनंदिनी का अनिवार्य अंग था। साल में एक बार नागपंचमी के अवसर पर कुश्ती प्रतियोगिता होती तो वह दम-खम से भाग लेता और मुक़ाबला जीतने की कोशिश करता। गाँव की सड़क पर जब वह ज़रा लहरा कर, सीना तान कर चलता तो देखने वालों की नज़र उस पर टिक जाती। लड़कियां भी दरवाजे की आड़ से उसे देखकर मोहित होती, रास्ता चलते हौले से मुस्कुराती लेकिन वह सारदा गुरु की शिक्षा को ध्यान रखते हुए इन सब चक्करों से दूर रहता। एक दिन सारदा गुरु ने उससे पूछा- 'रामपरसाद, क्या सोचा है ?'
'किस बारे में गुरु ?'
'शादी-ब्याह के बारे में।'
'दद्दा तो पीछे पड़े हैं लेकिन हमने मना कर दिया।'
'क्यों, क्यों मना किया ?'
'ब्याह कर लेंगे तो ब्रह्मचर्य का क्या होगा ?'
'तो क्या आजीवन ब्रह्मचारी रहोगे ?'
'क्या पता लेकिन आप तो जानते हैं कि हमारा ब्याह हो चुका है।'
'ब्याह हो चुका है ? कब, किससे ?'
'अखाड़े की मिट्टी से।' रामप्रसाद ने हँसते हुए कहा। सारदा गुरु ने उसकी पीठ पर ज़ोर की धौल जमाई और कहा- 'पगलौट कहीं का।'
सारदा गुरु नामी पहलवान थे, स्वयं भी गृहस्थ थे, गृहस्थाश्रम के महत्व को समझते थे इसलिए उनको लगा कि उनका चेला भी अपनी गृहस्थी बसाए। लंगोट बांधने की सलाह उन्होंने ही दी थी इसलिए खुलवाने का दायित्व भी उन पर था। रामप्रसाद सोलह साल का हो गया था, शादी लायक उमर हो चुकी थी। गाँव में उसकी उमर के दूसरे लड़के कब के ब्याहे जा चुके थे, कुछ तो बाल-बच्चे वाले हो गए थे लेकिन उनका चेला अभी ब्रह्मचर्य का झूला झूल रहा था। शरीर बनाना, कुश्ती लड़ना तो शौक है लेकिन गृहस्थी बसाना भी ज़रूरी है उसे समझना चाहिए। रामप्रसाद ने पहलवानी में अच्छा शरीर बनाया किन्तु यदि अर्जित शक्ति विसर्जित न हुई तो या तो मनुष्य साधु बनेगा या उत्पाती। साधु बनने के कोई लक्षण तो हैं नहीं, यह लड़का आगे चलकर गाँव के लिए कहीं कोई समस्या न बन जाए ! सारदा गुरु ने मन ही मन निर्णय लिया कि वे रामप्रसाद को ब्याह करने के लिए समझाएँगे, उसके बाद उसके दद्दा से बात करेंगे क्योंकि उनकी नज़र में रामप्रसाद के लायक एक अच्छी लड़की उनकी रिश्तेदारी में थी।
इसके बाद रामप्रसाद की ज़िंदगी में एक जबर्दस्त मोड़ आया। आप बखूबी अनुमान लगा सकते हैं कि कौन सा मोड़ आया होगा, हो सकता है कि रामप्रसाद को किसी लड़की से प्यार हो गया हो। जहां तक प्यार करने का सवाल है, उस जमाने में दोतरफा प्रेम असंभव था, आम तौर पर एकतरफा होता था। दोतरफा प्रेम बहुत 'रिस्की' था। एक तो होता नहीं था, अगर हो जाए तो एकांत की समस्या रहती थी, यदि एकांत मिल जाए तो नज़दीकी नहीं बनती थी क्योंकि सात फेरे पूरे किए बिना लड़की अपना बदन छूने की अनुमति नहीं देती थी; यदि नज़दीकी बन जाए तो अंतरंगता नहीं हो पाती थी क्योंकि गर्भाधान का खतरा मंडराता था, यदि कदाचित अंतरंगता बन जाए और संयोगवश गर्भाधान हो जाए तो गर्भपात का कोई उपाय न था, बदनामी का डर अलग। वैसे भी, उस युग में 'प्रेम' को विवाह में परिवर्तित करना असंभव था क्योंकि दोनों के बाप सूचना प्राप्त होते ही एक दूसरे के शत्रु हो जाते थे, उनके बीच लट्ठ चल जाते थे, खून की नदियां बह जाती थी। इसी कारण वैसी परिस्थिति उत्पन्न ही न हो, उसी में सबकी भलाई थी इसलिए तात्कालीन युवा बेचारे बहुत लालायित होने के बावजूद मन मसोस कर रह जाते थे। फिर भी, मान लो, दोनों संयम न रख पाए और लड़की गर्भवती हो गई तो वह किसी कुएं में कूदकर अपने प्राण दे देती, उसके उपरांत कथानक से लड़की विलुप्त हो जाती और लड़के के शुभ-विवाह का मार्ग प्रशस्त हो जाता।
आप एक अन्य अनुमान भी लगा सकते हैं कि रामप्रसाद ने अपने गुरु की बात मान ली होगी, धूमधाम से उसका विवाह हो गया होगा और रामप्रसाद ने अपनी नव-विवाहिता पत्नी को किसी अन्य कमरे में जाकर सोने का आदेश सुना दिया होगा ताकि उसका ब्रह्मचर्य अक्षुण्ण बना रहे ! पाठक अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन ये जो ज़िंदगी है न, यह पूर्वानुमानों पर नहीं चलती, विचित्र मोड़ लेने की आदी है। रामप्रसाद की जिंदगी ने कैसा मोड़ लिया, यह मैं आपको बाद में बताऊंगा, अभी आपको मैं अपने छत्तीसगढ़ में स्थित शहर बिलासपुर के बारे में कुछ बताऊंगा।
(२)
ऐसा सुना है कि घिर्रऊ और बरउआ बिलासपुर के वे पुराने लोग हैं जिन्होंने बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में हलवाई की दूकान खोली थी। उन दिनों वहाँ दूध, मलाई, जलेबी, लड्डू, बालूशाही, मैसूर पाक, सूजी का हलवा, पेठा; नमकीन सलोनी, सेव आदि बनते-बिकते थे। चाय-काफी, समोसा, आलूबड़ा, भजिया का चलन बहुत बाद में शुरू हुआ, संभवतः सन 1930 के बाद। बिलासपुर के शहर बनने की शुरुआत गोलबाजार के निर्माण से हुई जिसे सन 1936 से 1938 के मध्य गोलाकार शैली में बनवाया गया। झोपड़ी छाप हलवाई की दूकानें खत्म हो गई और गोलबाजार में बड़े आकार की दूकानें खुली। सबसे पहले आए, बिरजी हलवाई, कल्लामल बृजलाल। इस दूकान ने धूम मचा दी। दूकान इस कदर चलती थी कि एक किवदंती प्रचलित हो गई- 'बिरजी सेठ के यहाँ रात को तांगे में बैठकर मिठाई खरीदने के लिए एक जिन्न आता है और ढेर सारे रुपए दे जाता है।' हो सकता है कि जिन्न आता रहा हो लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उसके पास हलवाई को देने के लिए जार्ज पंचम के चांदी से निर्मित सिक्के कैसे आते रहे होंगे ?
उसके बाद उत्तरप्रदेश के दो परिवार बिलासपुर आए, रघुनंदनप्रसाद पांडे और गयाप्रसाद पांडे, फिर मनेन्द्रगढ़ से जगदीशनारायण अग्रवाल आए, मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आए. स्थानीय शिवप्रसाद केशरवानी, श्यामलाल अग्रवाल, रणछोड़भाई मेहता ने भी दूकानें खोली। गोलबाजार एक अघोषित 'मिठाई लाइन' बन गई जो पूरे बस्ती के आगमन और आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गया। घरों में नाश्ता बनाने का रिवाज़ नहीं था इसलिए पुरुष सुबह होते ही घर से बाहर निकलते और इन हलवाइयों की दूकानों में घुस जाते और अपना मनपसन्द नास्ता करते। औरतों का घर से बाहर निकलने का रिवाज़ नहीं था इसलिए न तो उन्हें नास्ता नसीब होता और न ही उन्हें पुरुषों की इस चोट्टाई की खबर होती।
(३)
आपको रामप्रसाद की ज़िंदगी में आए 'टर्निंग-पाइंट' के बारे में बताना है इसलिए अब हम पुनः यूपी के जिला बांदा के ग्राम अर्जुनाह की सीमा में प्रवेश करते हैं। रामप्रसाद अपने काम से काम रखता था, प्रतिदिन व्यायाम करता, खेत में दद्दा की मदद करता। एक दिन वह अपने घर भोजन के लिए आया तो उसकी छोटी बहन रो रही थी।उसने पूछा- ‘क्या हुआ, क्यों रो रही है ?’
‘भैया, मुझे बिसेसर बहुत परेशान करता है.’ बहन ने बताया।
‘कौन ? बिसेसर ठाकुर ?’
‘हां, आज तालाब नहाने गई थी तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।’
‘उसकी ये हिम्मत ?’
‘मैं उसको बोली, भैया को बताऊंगी तेरी ये हरकत।’
‘तो ?’
‘बोला- ‘तेरा भाई मेरा क्या बिगाड़ लेगा।’
‘ऐसा बोला ?’
‘हां लेकिन तुम उससे मत उलझना भैया, उनका पूरा परिवार लड़ाकू है, सब के सब गुन्डे हैं।’
‘ठीक है, उसको मैं देख लूंगा, अब से तुम उधर मत जाना।’ रामप्रसाद ने उसे शांत स्वर में समझाया लेकिन अंदर ही अंदर वह गुस्से से उबल रहा था. इस बीच उसकी बहन घर के अन्दर किसी काम से गई, रामप्रसाद ने लाठी निकाली और सीधे सारदा गुरु के घर पहुंचा. गुरु ने पूरी बात सुनी और बोले- ‘चल, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ.’ दोनों बिसेसर के घर पहुंचे और उसे ललकारा. बिसेसर ने उन दोनों को खिड़की से झांककर देखा और कुछ देर बाद अपने भाइयों के साथ लाठियों से लैस बाहर निकला और एक दूसरे पर लट्ठ चल पड़े. लाठियां चलाने में सब सिद्धहस्त थे. वार होते रहे, बचाव भी हुए, तब ही एक घातक वार सारदा गुरु के सिर पर पड़ा, उसका सिर फ़ट गया और वह जमीन पर चिल्लाते हुए लोटने लगा. रामप्रसाद अकेला पड़ गया, उसे समझ में आ गया कि अब उसका बचना मुश्किल है. उसके सामने करो या मारो की स्थिति आ गई. उसने झपट्टा मारकर बिसेसर की गर्दन दबोच ली और जब तक उसके भाई देख पाते तब तक बिसेसर टें बोल गया. बिसेसर के भाइयों का ध्यान जमीन पर पड़े निष्प्राण बिसेसर पर गया और रामप्रसाद मौका ताड़कर वहां से सरपट भागा. बस अड्डे पर खड़ी एक बस में बैठ गया, बस चल पड़ी. उसकी सांस बहुत तेज चल रही थी लेकिन बस धीमी चल रही थी. कन्डक्टर ने उससे पूछा- ‘कहां जाना है ?’
‘ये बस कहां जा रही है ? उसने पूछा.
‘बांदा.’
‘वहीं जाना है.’ रामप्रसाद ने अपनी सांस को संयत करते हुए कहा.
बांदा के बस अड्डे के पास ही रेलवे स्टेशन था। रामप्रसाद तेज कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ा, सामने एक ट्रेन थी, मानिकपुर जा रही थी, टिकट लेकर बैठ गया। पैसेंजर थी, हर स्टेशन पर रुकती और रामप्रसाद की धड़कन बढ़ जाती। वह सतर्क निगाह से सब ओर देख रहा था कि कहीं पकड़ा न जाए। राम-राम करते मानिकपुर आया। वहाँ उसे कटनी की ओर जानेवाली गाड़ी दिखी, टिकट खरीदी और उसमें बैठ गया। उसने सुना था कटनी के आगे जबलपुर है, बड़ा शहर है, वहाँ पहुँच जाऊंगा तो वहाँ कौन खोज पाएगा। ले-दे कर कटनी आया। पूछ-ताछ करने पर मालूम पड़ा कि जबलपुर की गाड़ी सात घंटे बाद है, उतनी देर तक कटनी स्टेशन में रुके रहने से पकड़े जाने का खतरा था। सामने वाले प्लेटफार्म पर एक गाड़ी का इंजिन सीटी बजाकर जाने की सूचना दे रहा था। रामप्रसाद दौड़कर उसमें चढ़ गया, टिकट लेने का समय न था।
थर्ड क्लास के डिब्बे में उसने बैठने की जगह बनाई, यात्रियों से पूछने पर मालूम पड़ा, ट्रेन बिलासपुर जा रही है। बिलासपुर का उसने नाम बहुत सुना था लेकिन उसे इस तरह भगोड़ा बनकर जाना पड़ेगा, ऐसा उसने सपने में भी नहीं सोचा था। धीरे-धीरे रात घिरने लगी, डिब्बे में धीमी रोशनी थी, वह सहज भाव से बैठा रहा लेकिन नज़र उसकी अब पीछा करने वालों पर कम, टिकट-चेकर पर अधिक थी। शहडोल स्टेशन से ट्रेन छूटने के बाद मुसीबत काला कोट पहने चढ़ गई, रामप्रसाद ने जैसे ही उसे देखा, उसके दिल की धड़कन बढ़ गई। वह उठा और टीसी की विपरीत दिशा वाले संडास में घुस गया और चुपचाप उस बदबू में घंटे भर बैठा रहा। बाहर निकलकर उसने नज़र घुमाई, आफत जा चुकी थी लेकिन उसकी सीट पर कोई और बैठ गया था। उसे गुस्सा बहुत आया, उसका गाँव होता तो उठाकर बाहर फेंक देता लेकिन इस परिस्थिति में चुप रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न था, समझा-बुझा कर उसने थोड़ी जगह बनाई और बैठे-बैठे सो गया।
सुबह एक झटके से उसकी नींद खुली, सब लोग डिब्बे से उतर रहे थे, बिलासपुर आ गया था। बाहर पानी बरस रहा था, हवा तेज चल रही थी, बौछार से उसके कपड़े भीग गए। भागकर वह शेड के नीचे पहुंचा और बारिश रुकने का इंतज़ार करते बहुत देर तक भाप छोडते इंजिन को देखता रहा जो रात भर की यात्रा के बाद सुस्ताता खड़ा था और गहरी सांस ले रहा था।
(४)
बैठे-बैठे एक घंटा बीत गया लेकिन बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह सोच रहा था- 'बरसात की ऐसी झड़ी तो हमारी तरफ नहीं होती। पानी आता है तो थोड़ी देर बरस कर निकल जाता है। हमारे यहाँ गेहूं और चना की खेती में पानी कम लगता है, सुना है, चांवल की फसल को बहुत पानी लगता है। मुझसे तो चावल खाया नहीं जाता, खा लो तो पेट में दर्द उठने लगता है। अपने यहाँ की रोटी और सब्जी का स्वाद अलग है। अम्मा जब हाथ से थाप कर गरम-गरम रोटी सेंक कर देती है तो उसकी मिठास का क्या कहना?'
अम्मा की रोटी की याद आते ही उसे भूख ने आ घेरा। उसने कल सुबह से कुछ खाया नहीं था। कुर्ते की जेब में पैसे खोजे, डेढ़ रुपए निकले। दो आलूबड़ा लिया और एक कप चाय, पेट में अन्न गया तो दिमाग आगे बढ़ा। उसके दिमाग में सवाल उठा- 'अब क्या ?'
नई जगह, न जान न पहचान, एक घबराहट से पिंड छूटा तो दूसरी शुरू हो गई। कुछ देर बाद बारिश रुकी, रामप्रसाद स्टेशन के बाहर निकला। बाहर तांगे की लाइन लगी थी, उनके घोड़े बीच-बीच में हिनहिना रहे थे और तांगेवाले आवाज लगा रहे थे- 'बस्ती चलो बस्ती, आठ आने...' रामप्रसाद एक तांगे के पास पहुंचा और उससे पूछा- 'बस्ती जाने का आठ आना? कितनी दूर है जो आठ आने बोल रहे हो?'
'पाँच मील है यहाँ से गोलबाजार।'
'फिर भी जादा है, चार आने में ले चलो।'
'चलो, छै आने देना, बैठो बोहनी का टाइम है।'
'ये बोहनी क्या होती है ?'
'सुबह-सुबह के पहले ग्राहक से जो पैसा मिलता है उसे बोहनी कहते हैं।'
'तो मैं पहला ग्राहक हूँ।'
'हौ, बैठो, जल्दी बैठो तब तक मैं और सवारी लेकर आता हूँ।' तांगे वाले ने कहा।
तांगे वाले का घोडा दुबला-पतला था, मुंह में फंसे लोहे को चबा रहा था और बार-बार अपना सिर ऊपर-नीचे कर रहा था। बीच-बीच में बदन पर बैठी मक्खी को अपनी पूंछ से उड़ा रहा था लेकिन जिद्दी मक्खी उड़ती और फिर आकर बैठ जाती। घोडा बेचैन था लेकिन पूंछ हिलाने के अलावा कोई दूसरा उपाय उसके पास न था।
दस मिनट के अंदर पाँच सवारियां और आ गई, 'खसक के बैठो भैया, थोड़ा आगे-पीछे हो जाओ मालिक, चल, आगे बढ़, बढ़ मेरे राजा...' कहते हुए तांगेवाले ने घोड़े के पुट्ठे में चाबुक चलाया, घोडा हिनहिनाते हुए आगे बढ़ा और सरपट दौड़ने लगा। तांगेवाला अपनी चाबुक की छड़ी को तांगे के चक्कों में अड़ाता और खड़-खड़-खड़ की आवाज़ निकालकर आधुनिक 'हार्न' जैसा अपने वाहन के आगमन का संकेत दे रहा था।
ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होता हुआ तांगा पौन घंटे में एक जगह आकर रुक गया। सवारियां उतरने लगी। रामप्रसाद ने तांगेवाले की ओर देखा, तांगेवाले ने कहा- 'अब उतरो भैया, गोलबाजार आ गया, निकालो छै आना।' घोड़े के ऊपर बैठी मक्खी भी उड़ते-बैठते गोलबाजार आ गई। घोड़े ने उससे कुछ नहीं मांगा, मक्खी ने भी कुछ नहीं दिया और इतना लंबा सफर संपन्न हो गया। पशु और जीव-जन्तु के मध्य कोई व्यापार नहीं होता, यह इंसान ही ऐसा है जो बिना पैसा लिए कुछ नहीं करता !
कुछ दूर पैदल चलने के बाद हलवाई की एक दूकान पर रामप्रसाद का ध्यान गया। गद्दी पर धोती-कुर्ता-टोपी धारण किए हुए एक बुजुर्ग बैठे थे जिन्हे देखकर उसे अपनापन जैसा लगा। वे गयाप्रसाद पाण्डेय थे। उसने उनको हाथ जोड़े और पूछा- 'आपके यहाँ कुछ काम मिलेगा ?'
'क्या काम जानते हो ?' दूकान मालिक ने पूछा।
'जीवन में पहली बार काम मांग रहा हूँ, घर में खेती है।'
'कौन जात हो ?'
'ब्राह्मण, अवस्थी।'
'यहाँ तो जूठा उठाने का काम है, ब्राह्मण से जूठा कैसे उठवाएंगे ?'
'सही बात है लेकिन सब समय एक जैसा कहाँ होता है ! आप जो कहेंगे, करूंगा, सब करूंगा।'
'घर कहाँ है ?'
'यूपी, जिला बांदा।'
'कौन गाँव ?'
'अर्जुनाह।'
'अरे, हम भी वहीं के हैं, बवेरु के।'
'हाँ !'
'हाँ, यहाँ कैसे आ गए ?'
'आपको क्या बताएं, हमारा दिमाग बिगड़ गया, बाप से लड़कर चले आए।'
'ठीक है, देस से आए हो तो फिर रहो लेकिन किसी से न कहना कि ब्राह्मण हो, अपना नाम भर बताना, समझे। कोई जान जाएगा तो हमें दोष देगा कि ब्राह्मण से जूठा उठवा रहे हो। तीस रुपिया महीना मिलेगा, यहीं खाना खा लेना और रात को चबूतरे पर सो जाना।' गयाप्रसाद बोले।
'जी, बहुत कृपा आपकी।'
'सामान कहाँ है तुम्हारा ?'
'जो पहना हूँ, वही सामान है।' रामप्रसाद ने बताया।
इस प्रकार रामप्रसाद को बिलासपुर में एक ठिकाना मिल गया।
गयाप्रसाद पान्डे महराज की होटल में सुबह छः बजे से रात दस बजे तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। अल-सुबह जलेबी की तई भट्ठी पर चढ़ती तो रात तक अनवरत जलेबी बनती रहती जिसे खाने के लिए पूरे होटल में पसरी गंदगी और बदबू को दुर्लक्ष्य कर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती। उनके पास एक जलेबी बनाने वाला एक कारीगर था जिसे पहलवान उस्ताद कहते थे और वह मोहल्ला चांटीडीह में रहता था। तेज आंच वाली भट्ठी में बैठकर सुबह से लेकर रात तक जलेबी बनाना बेहद कठिन काम होता है लेकिन वह निर्विकार भाव से बदन के पसीने को गमछे से पोछता हुआ अपने काम को इतनी लगन से करता जैसे कोई भक्त मंदिर में कीर्तन करता है।
जलेबी के साथ स्वादवृद्धि के लिए दो नमकीन भी थे। एक- आलू और प्याज को भूंज कर बनाए गए मसाले के ऊपर बेसन लपेट कर तला गया ‘आलूबड़ा' और दूसरा- पिछली रात बच गए नमकीन को मसल कर, उसमें बेसन और मिर्च मसाला मिला कर तेज लहसुन की छौंक से तैयार किया गया 'प्याज बड़ा'। जलेबी के साथ इन दोनों का 'काम्बिनेशन' इस कदर जायकेदार होता था कि मजा आ जाता। नाश्ते की ये तीनों वस्तुएं जब तैयार होती तो इनकी खुशबू इतनी फैलती कि सड़क चलता इन्सान सम्मोहित सा होटल में खिंचा चला आता। एक बड़ी केतली भर कर चाय बनती जिसे चालू चाय कहा जाता था क्योंकि उसमें पानी की मात्रा अधिक होती थी और बाजार में प्रचलित कीमत से सस्ती थी, परंतु उसका स्वाद लाजवाब था। आसपास के मोहल्ले का आदमी यदि पान्डे महराज की होटल में किसी वजह से किसी दिन न जाए पाए तो उसे रात में बुरे-बुरे सपने दिखाई देते थे।
काम लग जाने से रामप्रसाद को तनिक धीरज बंध गया लेकिन वह जिस माहौल से आया था वह काम करने नहीं, काम लेने वाला था। घर का ऐश-आराम, गाँव में मान-सम्मान, दोस्ती-यारी, घूमना-फिरना, खाना-पीना और रुआब, सब कुछ सहसा हाथ से फिसल गया। सीना तान कर चलने वाला रामप्रसाद आँखें छुपा कर जीने के लिए मजबूर हो गया। पहचान छुपाने के लिए उसने अपना सिर घुटा लिया, मुछमुंडा हो गया और अपना लिबास भी बदल लिया। गाँव में उसका पहरावा धोती-कुर्ता था, यहाँ उसने हाफ़पेंट और कमीज सिलवाई, लंबी कमीज, जिसके अंदर अक्सर उसका हाफ़पेंट छुप जाता था और ऐसा लगता था जैसे वह केवल कमीज पहने हुए है। रोटी-सब्जी खाने वाला मनुष्य अरुचिकर चावल का भात और चटनी खाने लगा। ज़िंदगी ने ऐसी पलटी मारी कि उसके नाम से अवस्थी हट गया, केवल रामप्रसाद रह गया।
उस समय नास्ते की दूकानों में ग्राहक अंदर लगी बेन्च में बैठते, हाथ में दोना पकड़कर खाते और वहीं जमीन पर दोना फेंककर हाथ से टेड़ कर पानी निकालने वाले नल के पास जाते, अपना हाथ धोते, गद्दी पर विराजमान मालिक को बताते कि 'उसने क्या-क्या खाया।' दूकानदार मनगणित से पैसा जोड़ते और भुगतान ले लेते। इस तरीके से परस्पर विश्वास के आधार पर ग्राहक और दूकानदार के मध्य लेनदेन चलता था लेकिन कुछ चतुर-सुजान ग्राहक भी होते हैं जो भरोसे की दीवार में छेद करते हैं। ऐसे लोग कम सामान बताकर घपला करते, पैसे देते समय गंभीर चेहरा बनाते और दूकान से बाहर निकलकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते। रामप्रसाद ने कुछ ग्राहकों की इस चालाकी को ताड़ लिया और पांडे महाराज को शिकायत पेश की। रास्ता यह निकला कि ग्राहक जितना सामान लेंगे, उसका हिसाब जोड़कर रामप्रसाद आवाज लगाकर पैसे बताएगा। इस प्रकार एक नया चलन शुरू हुआ, रामप्रसाद काम करते जाता और जैसे ही ग्राहक मुंह पोछते हुए गद्दी के पास पहुंचता, वह ज़ोर से आवाज लगाता- 'लेना पैसे लेना, आठ आना।' या, इसी तरह जितना भी भुगतान ग्राहक का देय होता। यह आवाज सड़क तक जाती और सड़क पर आने-जाने वाले लोग इस आवाज को सुनकर ठिठक जाते, उन्हें नास्ता करने का बरबस स्मरण हो आता और इस प्रकार पांडे महाराज की दूकान में भीड़ और अधिक बढ़ने लगी।
पुरानी कहावत है- 'रांड रंडापा काट ले, रंडुवे काटन दें' अर्थात विधवा अपना जीवन पवित्रता से व्यतीत कर सकती है लेकिन विधुर उसके पीछे पड़े रहते हैं। इस बीच चतुर-सुजान ग्राहकों ने भी अपना दिमाग लगाया और रामप्रसाद के कुरते की जेब में चवन्नी-अठन्नी टपकाने लगे, रामप्रसाद की जेब में पहले से ही चिल्हर रहती थी, जब और जुड़ने की आवाज़ उसके कानों में प्रविष्ट होती तो ग्राहक के 'बिल' में 'आटोमेटिक' कमी हो जाती। लोग अपने मित्र के साथ आते, पेट भर कर नास्ता-चाय लेते और रामप्रसाद आवाज़ लगाता- 'लेना पैसे लेना, चार आना।' कुछ समय तक ऐसा चला फिर भेद खुल गया, नौकरी चली गई। बगल की दूकान 'पेंड्रावाला' में काम मिल गया और वहां से आवाज़ उभरने लगी- 'लेना पैसे लेना, आठ आने लेना।' पेंड्रावाला को मालूम था कि रामप्रसाद को पड़ोसी ने काम से क्यों निकाला। ऐसे आदमी को काम पर रखना 'रिस्की' था लेकिन पेंड्रावाला और पांडे महाराज में बहुत फर्क था।
दोनों दूकानें अगल-बगल थी लेकिन दोनों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा न थी। दोनों के ग्राहक अलग-अलग थे। पेंड्रावाला में आनेवाले ग्राहक गंभीर किस्म के थे, लौंडे-चपाटी वहाँ घुसने की हिम्मत नहीं करते थे। रामप्रसाद की ऊपरी कमाई एकदम कम हो जाने की एक वजह और थी कि पेंड्रावाला के मालिक रूपनारायण अपने पड़ोसी पांडे महाराज की तरह गऊ स्वभाव के नहीं थे। वे चाक-चौबन्द-धाकड़ व्यापारी थे जिनके सामने अच्छे-अच्छे भयभीत मुद्रा में खड़े रहते थे क्योंकि वे स्वभाव से कड़क, अपशब्दों के प्रयोग में पारंगत और पकड़ कर ठुकाई करने के लिए प्रसिद्ध थे।
रामप्रसाद की तनख्वाह बढ़ती गई और धीरे-धीरे वह सौ रुपए मासिक का मुलाज़िम हो गया। महाकंजूस था वह, साल के साल बीत जाते, कुछ खर्च न करता और वह अपनी तनख्वाह मालिक के पास ही जमा रखता। उसे हर महीने एक शीशी 'शार्कोफेराल' नामक टानिक खरीदना होता था ताकि उसके शरीर में मज़बूती कायम रहे। उस दवा के लिए छः रुपए वह मालिक के छोटे भाई को बहला-फुसला कर ले लेता था और उसका 'डिपाजिट फिक्स' बना रहता।
अंत में आपको रामप्रसाद के बारे में कुछ और बता दूँ और उसे विदा करूँ। इस समय आपको लेखक पर गुस्सा आ रहा होगा कि कहानी को यहाँ तक लाए और रामप्रसाद को क्यों टपकाया जा रहा है? दरअसल लेखक को पात्र के बारे में जितना मालूम था, उतना सब बता दिया। वैसे भी, इस संसार में जो आया है वह एक पात्र है और उसके जीवन से मृत्यु तक का काल एक घटना ही तो है।
(५)
हर साल वर्षाऋतु में गोलबाजार की एक सह-सड़क पर रामलीला का आयोजन होता था। मंडली चित्रकूट से आती थी, रोज शाम को बाजपेयी गली में आठ बजे हारमोनियम और तबले की थाप गूंजने लगती। लोग अपने घरों से खाना निपटा कर जमीन पर बिछाने के लिए बोरियां लेकर पहुँच जाते, पालथी मारकर बैठते और सपरिवार रामकथा के साक्षात प्रदर्शन का आनंद और पुण्य अर्जित करते। सड़क खचाखच भर जाती। रामकथा वैसे ही रोचक है, रामलीला के कलाकार अपनी ओर से कुछ और जोड़कर उसे अधिक मनोरंजक बनाते। जोकरई होती थी, अट्टहास सुनाई पड़ता था, युद्ध-नृत्य का प्रदर्शन होता था और कहानी को ऐसी जगह ले जाकर अटकाते जहां सीता और राम को एक साथ मंच पर बैठाए जा सके। सिया-राम की जोड़ी के समक्ष दर्शक हाथ जोड़कर खड़े हो जाते, कुछ उन्हें पैसे चढ़ाते और कुछ समर्थ लोग पाँच रुपए, दस रुपए की घोषणा अपने नाम के साथ करवाते। इसके अलावा बहुत देर तक उस व्यक्ति की प्रतीक्षा की जाती जो सिया-राम की जोड़ी को अपने हाथों से फूलों की माला पहनाए। यह अधिकार केवल उस व्यक्ति को मिलता जो मंडली के समस्त सदस्यों को अगले दिन अपने घर में भोजन करवाए या भोजन में व्यय होने वाली राशि मंडली को नगद दे दे। ऐसे दानी व्यक्ति की प्रतीक्षा रात को बारह बजे तक चलती, कोई न कोई आ ही जाता और अगर कोई न आता तो उस रात की माला रामप्रसाद पहनाता। माला अर्पित करने का उसे अवसर अक्सर मिलता क्योंकि कई बार माला अर्पित करने कोई न आता। वह दिलदारी के साथ उस भोजन का खर्च अपने ऊपर ले लेता और केवल तब ही उसका 'फिक्स डिपाजिट' टूटता जबकि एक दिन का भोजन देने में उसकी एक माह की तनख्वाह खर्च हो जाती थी।
रामप्रसाद लगभग बारह साल तक बिलासपुर में रहा। उसके बाद उसे अपने गाँव की याद सताने लगी। इतनी लंबी फरारी बिताने के बाद वह अपने गाँव अर्जुनाह लौट गया, फिर कभी वापस नहीं आया। ऐसा सुनने में आया है कि बिसेसर के परिवार वालों को जब रामप्रसाद के गाँव वापस आने की सूचना मिली तो उन्होंने अपना बदला लेने के लिए उसकी हत्या कर दी।
बिलासपुर के गोलबाज़ार में आज भी रामप्रसाद की उस आवाज़ को लोग दिल से याद करते हैं, 'लेना पैसे लेना, आठ आने लेना।'
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किस्सा कन्हैया का : कन्हैया की राधा
(१)
बिलासपुर का तेलीपारा, रेलवे स्टेशन और बस्ती को जोड़ने वाली सड़क के दोनों ओर बसा हुआ मोहल्ला जिसमें सब्जियों के लहलहाते खेत हैं। वर्षा ऋतु में धान के पौधे भी लगाए जाते हैं। किसी जमाने में तेली जाति की आबादी रही होगी, अब काछियों का वर्चस्व है। उनके खेत साल भर फसल देते हैं, सांस लेने की फुर्सत नहीं। भूमिस्वामी बीज, गोबर खाद और मजदूरों की व्यवस्था करते हैं, फसल अपने-आप हो जाती है। जगह-जगह कुएं खुदे हुए हैं, चाहे जितना पानी ले लो। चार हाथ खोदो तो बिलासपुर की मिट्टी से पानी का स्रोत दिखने लगता है। बारिश भी भरपूर होती है।
केजूराम यादव इन्हीं काछी बाड़ियों में मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। पाँच बच्चे थे, कन्हैया सबसे बड़ा, ग्यारहवें में लग गया था। चौथी पास करने के बाद उसके पिता ने उसको म्युनिसिपल स्कूल में भर्ती करवा दिया ताकि वह पढ़-लिख ले लेकिन नियति को कुछ और सूझा, खेत में काम करते समय केजूराम को जहरीले साँप ने काट दिया। बैगा की झाड-फूँक के बावजूद जहर न उतरा और केजूराम अपनी घरवाली और छोटे-छोटे बच्चों को रोता-बिलखता छोड़ कर चला गया। कन्हैया को मिडिल स्कूल जाते तीन माह हुए थे, पढ़ाई छूट गई। 'रोज कमाना-रोज खाना' वाले परिवार में चटनी-भात के लाले पड़ने लगे। कन्हैया बच्चा था, खेतों में काम करने लायक न था इसलिए उसकी माँ ने आसपास के दो घरों में बर्तन माँजने का काम पकड़ लिया लेकिन मेहनताना इतना कम मिलता था कि घर में एक समय ही चूल्हा जलता और रात के समय बच्चे भूख से रोते-कलपते सो जाते।
कन्हैया काम खोज रहा था, उसका कद कम था इसलिए वह और भी छोटा लगता था इसलिए जहां काम मांगने जाता उसे एक ही जवाब मिलता- 'अभी बच्चा है, तू क्या काम करेगा ?' यह सवाल उसकी परेशानी और भूख दोनों बढ़ा देते।
एक दिन की बात है, कन्हैया ने देखा, उसकी झोपड़ी के बाहर एक साँप लहराते हुए तेजी से चला जा रहा था। वह बिजली की तेजी से साँप की ओर लपका और उसे दबोच लिया। कन्हैया गुस्से में था, उसे साँपों से नफ़रत हो गई थी। 'ज़रूर इसी ने बाबू को डसा होगा, इसको नहीं छोड़ूंगा।'
साँप काफी मोटा था लेकिन छोटा था। कन्हैया की मुट्ठी में फँसकर साँप फड़फड़ा रहा था, पूंछ से वार कर रहा था लेकिन पकड़ मजबूत थी, साँप का बच निकलना मुश्किल था। कन्हैया के दिल में कुछ आया। उसने साँप के फन को अपने चेहरे के सामने लाकर उससे पूछा- 'तुमने मेरे बाबू को क्यों डसा ?'
'मैंने ? मैंने तुम्हारे बाबू को कब डसा ?' साँप ने कन्हैया की आँखों में आंखे डालकर पूछा।
'महीना भर हो गया।'
'पर मैं तो इस तरफ पहली बार आया।'
'तो तुम्हारा कोई भाई-बंधु आया होगा।'
'हो सकता है, पर वह मैं नहीं हूँ।'
'पर हो तो साँप न, किसी न किसी को काटोगे ?'
'किसने कह दिया कि हम काटते हैं ?'
'सब जानते हैं, तुम्हारा स्वभाव है।'
'गलत, सब गलत। जब तक हमारी जान को खतरा न हो, हम लोग हमला नहीं करते, भाग जाते हैं। हम तो किसी हल्की सी आवाज या कंपन से जान जाते हैं कि कोई आ रहा है और सर्र से छुप जाते हैं। हमें मालूम है कि मनुष्य दुष्ट होते हैं, हमें देखते ही मारेंगे। हमको भी तो अपनी जान बचानी है।'
'फिर उसने मेरे बाबू को क्यों काटा ?'
'हो सकता है कि तुम्हारे बाबू ने उस पर हमला किया हो !'
'ये तो मुझे नहीं मालूम लेकिन तुमको पता है कि मेरे बाबू मर गए, हम अनाथ और बेसहारे हो गए, मैं तुमको नहीं छोड़ूंगा।'
'उस दिन क्या हुआ, कौन जाने ! पर तुमको पता है कि खेतों में रहने वाले सभी साँप विषैले नहीं होते।'
'साँप तो सब जहरीले होते हैं, मैं जानता हूँ।'
'तुम्हारी जानकारी गलत है।'
'फिर मेरा बाबू क्यों मरा ?'
'डर से मर गया होगा।'
'डर से ?'
'हाँ, अधिकतर लोग हमारे दाँत गड़ाते ही सदमे में मर जाते हैं।'
'तुम मुझे मत बहकाओ, मैं तुम्हें छोडने वाला नहीं।'
'अब जब मेरी गलती नहीं है तो तुम मुझे क्यों मार रहे हो ?'
'मुझे सारे साँपों से चिढ़ हो गई है, मैं सबसे बदला लूँगा।'
'तुम इन्सानों में यह बहुत बड़ा दोष है कि गलती किसी और की होती है और सज़ा किसी और को देते हो।' सांप ने कन्हैया को डांटते हुए कहा।
'चलो होगा, पर एक बात बताओ, तुम बोल कैसे रहे हो, वह भी हमारी भाषा में ?' कन्हैया ने विस्मित होते हुए पूछा।
'हम सब समझते हैं, तुम्हारा दुख भी मुझे समझ में आ रहा है।' सांप ने बताया।
'मेरा दुख, तुम्हें समझ में आ रहा है? मैं नहीं मानता।'
'मत मानो लेकिन मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्कूल छूट गया, घर में खाने-पीने की तंगी है।'
'अरे वाह, तुम तो सब जानते हो। अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ ?'
'पढ़ाई बन्द मत करो, पढ़ो, तब तो सभ्य बनोगे।'
'अरे, वाह !'
'हाँ, हमारी कोई स्कूल नहीं, कभी कुछ सीखने का मन होता है तो चुपचाप किसी स्कूल में घुस जाता हूँ और सब सुनते रहता हूँ।'
'अब तक क्या सीखे ?'
'यही कि सदा सच बोलना चाहिए, बड़ों का आदर करना चाहिए, सब प्राणियों से प्रेम करना चाहिए।'
'कुछ समझ में आया ?'
'आया लेकिन ये सब हमारे काम का नहीं है, सभ्य होना तुम मनुष्यों की समस्या है। हम असभ्य ही ठीक हैं।'
'कुछ सीख लो, क्या नुकसान है !'
'मैंने कहा न, हमारी दुनिया अलग है। अब तुम मुझे छोड़ दो।' साँप ने विनयपूर्वक कहा।
कन्हैया साँप से नाराज था लेकिन उसकी बातों ने उसका गुस्सा ठंडा कर दिया। उसने अपनी मुट्ठी खोली लेकिन वह खुल नहीं रही थी, जैसे उसकी उंगलियाँ जकड़ गई हों।
अचानक कन्हैया की आँखें खुली, उसने अपनी खाट की लकड़ी को मजबूती से जकड़ा हुआ था। उठकर उसने अपनी मुट्ठी खोली और बहुत देर तक अपनी गदेलियों को घूरकर देखता रहा।
कन्हैया की माँ मेहनती थी लेकिन काम पर जाने में बच्चों को घर में छोड़ कर जाने की समस्या थी। कन्हैया सबको सम्हालता और माँ के घर आ जाने के बाद काम की तलाश में निकल जाता। एक दिन, रास्ते में उसे पिता के पुराने दोस्त मिल गए, सुकालू काका, जो मिट्टी के बर्तन बनाते थे। कन्हैया ने उनसे अपनी परेशानी बताई तो वे उसको अपने साथ अपने घर ले गए। कन्हैया उनकी चाक घुमाता और सुकालू अपनी दक्ष उंगलियों से बर्तन गढ़ता। सीखने की गरज़ से कन्हैया ने भी हाथ आज़माए लेकिन बात नहीं बनी। मिट्टी के बर्तन गढ़ना हो या कोई भी दूसरा काम, सीखते-सीखते हाथ जमता है। सुकालू उसका हौसला बढ़ाता, शाम को घर वापस जाते समय उसे चार आने भी देता।
तेलीपारा से लगा हुआ था कुम्हारपारा, जहां कुम्हारों की बस्ती थी। खुली जमीन में छोटे-छोटे कच्चे बने हुए दो या तीन कमरे वाले घर, जिनमें उनका रहना था और भंडार भी। मिट्टी के बर्तन बनाने का काम बाज़ार की मांग का अनुमान लगाकर बहुत पहले से शुरू करना पड़ता है। गर्मी के मौसम के लिए मटका और सुराही, पोला के त्यौहार के लिए बच्चों के खिलौने, दिवाली के लिए दिए और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ आदि बनाने का काम तीन-चार महीने पहले शुरू करना पड़ता है। हलवाई दूकानों में खपने वाले दही जमाने वाला कुंडा, रसगुल्ला 'पेक' करने के लिए छोटी मटकियाँ और छोटे सकोरे खाली समय में बनाकर रख लिए जाते हैं जो धीरे-धीरे साल भर बिकते रहते हैं। इन्हें तैयार करने में परिश्रम, कलाकारी और धैर्य की ज़रूरत होती है। यह बेहद थकाऊ और मगज़मारी वाला काम है। चिकनी मिट्टी को खोजना, फिर उसे खोदना, छानना, भिगाना, सानना, उसके बाद उसे मनचाहा रूप देना, सुखाना, आग में पकाना, भंडार में सुरक्षित रखना और टूट-फूट से बचाना- ये सब मेहनत ग्राहक को नहीं दिखती। बेचने जाओ तो मिट्टी का सामान औने-पौने दाम में बिकता है। ग्राहक इतना मोलभाव करते हैं कि दिमाग खराब हो जाता है। मुश्किल यह है कि बाप-दादों से यही काम सीखा है, कुछ और जानते नहीं, क्या करें?
(२)
बिलासपुर की गर्मी को गर्मी कहना उचित नहीं, प्रचंड गर्मी कहना चाहिए। यहाँ वर्ष भर में केवल दो मौसम होते हैं, एक गर्मी और दूसरा बहुत गर्मी। ऐसे ही 'बहुत गर्मी' वाली धूप में काम करते समय कन्हैया बेहोश होकर जमीन में पसर गया। सुकालू घबरा गया। उसने फटाफट मिट्टी से सना अपना हाथ धोया, कन्हैया को गोद में उठाकर घर के अंदर ले गया और उसके चेहरे और सिर पर एक लोटा पानी डाल दिया। सुकालू की घरवाली ने कच्चा आम पीसा और कन्हैया के तलवे में लेप लगा दिया। थोड़ी देर बाद कन्हैया होश में आ गया, उसे पानी पिलाया और पास में बैठकर पंखा झलने लगे। सुकालू को समझ में आ गया कि इतनी कम उम्र में इतनी अधिक मेहनत का काम कन्हैया के लिए ठीक नहीं, इसलिए उससे कहा- 'तू इस काम को नहीं कर पाएगा। किसी हलवाई की दूकान में काम खोज ले, वहाँ ठीक रहेगा।'
'मैं कई जगह गया था, मुझे किसी ने काम पर नहीं लगाया।' कन्हैया ने कहा।
'मेरा काम बहुत मेहनत वाला है, तेरे से नहीं बनेगा।'
'फिर मैं क्या करूं ?'
'कल सुबह मेरे पास आना, मैं तुझे एक हलवाई के यहाँ ले चलूँगा. वहाँ सकोरा देने जाना है मुझे. मेरी जान-पहचान है, मैं तेरे लिए बात करूंगा. सुकालू ने समझाया।
कन्हैया अगली सुबह सुकालू काका के साथ गोलबाज़ार की ओर चल पड़ा।
बाँस से बने विशालकाय टोकरे को सुकालू ने एक हलवाई की दूकान के सामने अपने सिर से उतारा जिसमें वह मिट्टी के सकोरे भर कर लाया था। गमछे से अपना चेहरे का पसीना पोछा और गद्दी पर बैठे बुजुर्ग से कहा- 'सेठ जी, सकोरे ले आया। तीन सौ दस हैं।'
'तीन सौ दस ? दस ज़्यादा क्यों ?' दूकान मालिक ने पूछा।
'टूट-फूट वाली चीज है, रखते-उतारते टूट जाए तो मेरी गिनती गलत नहीं निकलनी चाहिए, आप गिनवा लो।'
'गिनने की ज़रूरत नहीं है, जाओ, अंदर धीरे से जमाकर रख दो।'
सकोरा रखने के बाद सुकालू बोला- 'दो, सेठ जी, छह रुपिया।'
'अरे, भाव बढ़ा दिया क्या ? पिछले बार एक रूपिया बारह आने सैकड़ा दिया था ?'
'क्या करें सेठ जी, चाउर (चावल) मंहगा हो गया। कोयला मंहगा हो गया। मंहगाई इतनी बढ़ रही है कि पेट भरना मुश्किल हो गया।'
'चाँवल क्या भाव मिल रहा है ? तुम लोग तो मोटा चाँवल खाते हो, वह तो सस्ता होगा ?'
'काहे का सस्ता ? एक रुपए का डेढ़ सेर मिल रहा है।'
'अरे, बहुत भाव बढ़ गया है। चलो ठीक है, पूरा छः रूपिया ले लो लेकिन अब भाव मत बढ़ाना सुकालू राम।'
'जी, सेठ जी।'
'ये साथ में तुम्हारा लड़का है क्या ? बड़ा सुंदर है।'
'नहीं, मेरे साथी का बड़ा लड़का है, इसका बाप मर गया, चार छोटे भाई-बहन भी हैं।'
'कैसे मर गया ?'
'नाग देवता ने काट दिया।'
'ये तो बहुत बुरा हुआ, राम-राम।'
'सेठ जी, इसे अपने यहाँ काम में रख लेते तो बड़ी कृपा होती।'
'ये बहुत छोटा है, हमारे यहाँ क्या काम कर पाएगा ?'
'ग्राहक को सामान लगा देगा, जूठा उठा देगा।'
'ठीक है, रखे लेते हैं, आठ आना रोज देंगे, बन जाएगा ?'
'बहुत अच्छा हो जाएगा मालिक।' सुकालू ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।
'तो, कल सुबह सात बजे भेज देना।' बुजुर्ग जगदीश नारायण ने कहा और एक दोना भरकर जलेबी कन्हैया को दी और कहा- 'घर ले जाओ, सब कोई खाना।' कन्हैया रोने लगा।
घर पहुँच कर कन्हैया अपनी माँ से लिपट गया और नौकरी मिल जाने की खबर दी। भूखे बच्चे जलेबी पर टूट पड़े, दो मिनट में खत्म हो गई। जलेबी से पेट कहाँ भरता है, मुंह मीठा हो जाता है, तनिक तसल्ली हो जाती है। पेट भरने के लिए हाड़-तोड़ परिश्रम करना पड़ता है लेकिन पेट तो तब भी नहीं भरता। कन्हैया के घर में कमाने वाले एक से दो हो गए, अब शायद दोनों समय रसोई का चूल्हा जले।
अगली सुबह कन्हैया दूकान पहुंच गया, वह चौंक गया क्योंकि गद्दी पर उसका एक सहपाठी विराजमान था। वह घबराया क्योंकि हलवाई की दूकान में नौकरी की खबर इस सहपाठी के जरिए स्कूल तक पहुँच जाएगी। भले ही उसने स्कूल जाना छोड़ दिया है पर जब दूसरे लड़कों को मालूम पड़ेगा तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। 'बताओ, जूठा उठाने की नौकरी करता है, कोई दूसरा काम नहीं मिला क्या?'
थोड़ी शर्म भी आ रही थी। जिसके साथ बैठकर क्लास में पढ़ता था, उसका नौकर बन गया। पहले बराबरी का दर्जा था लेकिन अब मालिक-नौकर का हो गया। कन्हैया के दिल में आया कि उल्टे पैर घर लौट जाए लेकिन भूख ने कुछ समझाया और वह अपनी आँखें झुकाए काम से लग गया। उसने पूरी दूकान में झाड़ू लगाई और गीले कपड़े से 'बेन्च' पोछकर साफ की। इतनी देर में बड़े मालिक आ गए जो उसके सहपाठी के दादाजी थे। उनके आते ही सहपाठी गद्दी से नीचे उतर गया और उसमें बड़े मालिक बैठ गए।
देशी घी की गरम जलेबी और समोसा तैयार होकर परात में आ गए, इधर ग्राहकों की भीड़ भी आ गई। सहपाठी तराजू से तौल कर जलेबी दोने में रखता, दूसरे दोने में समोसा रखता और कन्हैया दौड़कर अंदर ग्राहक को देता जाता। ग्राहक अंदर बेन्च पर बैठकर नास्ते करते और गद्दी में पैसे चुकाकर चले जाते। कन्हैया को काम आसान लगा और खुशी-खुशी करता रहा लेकिन उसकी नाक में घुस रही जलेबी और समोसा की प्यारी खुशबू उसे परेशान भी कर रही थी। जब अधिक बेचैनी होती तो वह थोड़ा पानी पी लेता तो उस खुशबू से उसका ध्यान हट जाता। कन्हैया ने देखा कि उसका सहपाठी भी बीच-बीच में ग्राहकों को समान ले जाकर दे आता और जूठे दोने उठाता तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। मालिक के घर का लड़का भी यह सब काम कर रहा है !
नौ बजे के बाद ग्राहकों की भीड़ कम होने लगी, उसने गौर किया कि बड़े मालिक कुछ गुनगुना रहे हैं और अपनी एक मुट्ठी बंद करके दूसरी हाथ की उँगलियों से थाप दे रहे हैं। चुपके से उनके पीछे खड़ा होकर उसने सुना कि वे एक गाना गा रहे थे- 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।'
सहपाठी ने जलेबी और समोसा एक दोने में निकाला, अंदर जाकर कन्हैया को इशारा करके बुलाया, उसे दे दिया और कहा- 'ले, नास्ता कर ले। मैं अब घर जा रहा हूँ।'
खाते-खाते कन्हैया सोच रहा था- 'किस स्वादिष्ट दुनिया में आ गया मैं !'
(३)
कन्हैया नौकरी कर सकता या पढ़ाई। नौकरी के कारण वह पाँचवी कक्षा तक ही पढ़ पाया और ललचाई आँखों से सड़क पर बस्ता टाँगे स्कूल जाते बच्चों को देखता रह जाता। दिन बीतते रहे, दिन महीनों में, महीने सालों में। एक दिन कन्हैया की माँ ने उससे कहा- 'अक्ती के दिन तेरा ब्याह है कन्हैया।'
'मेरा ब्याह? कन्हैया ने पूछा।
'हाँ, तेरा ब्याह। मालिक से छुट्टी ले लेना।'
'ठीक है, कब है अक्ती?'
'दो दिन बाद।'
'ब्याह में क्या होता है?'
'दुल्हा और दुल्हन की शादी।'
'मैं दुल्हा बनूँगा?'
'हाँ।'
'और दुल्हन?'
'आएगी तब देख लेना।'
'जब आएगी तो यहीं अपने घर में रहेगी?'
'नहीं, अभी ब्याह के बाद अपने घर वापस चली जाएगी।'
'फिर?'
'दो साल बाद आएगी।'
'क्यों?'
'तू अभी छोटा है, चौदह साल का तो है।'
'उसको रोक लेना, मैं उसके साथ खेलूँगा।'
'नहीं, अभी नहीं खेल सकता। जब दो साल बाद में यहाँ रहने आएगी तब खेलना उसके साथ।' कन्हैया की माँ ने उसे डांटते हुए कहा, माँ के चेहरे पर थोड़ी मुस्कुराहट आई और उसके बाद अपने दिवंगत पति की याद आई और सहसा उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
गरीब के घर की शादी गरीबी से होती है। जान-पहचान में अच्छी लड़की दिखी तो कन्हैया का सादगी से ब्याह हो गया। जिस दिन बहू घर आई, कन्हैया ने उसे देखने की बहुत कोशिश की लेकिन ठीक से देख नहीं पाया क्योंकि उसने अपना घूँघट नहीं हटाया। वह गुस्साया हुआ अपनी माँ के पास गया और बोला- 'ब्याह मोर होए है कि तोर।' (ब्याह मेरा हुआ या तेरा?)
'तोर होए हे, काबर?'(तेरा हुआ है, क्यों?)
'घरवाली मोर हवै अऊ मैं ओला देखे नई पायों।' (मेरी घरवाली है और मैं उसको नहीं देख पा रहा हूँ।) कन्हैया भन्ना कर बोला। माँ ने हँसते हुए बहू को अपने पास बुलाया और उससे बोली- 'जा, अपन दुल्हा लंग थोड़कुन गोठिया ले ओ, नई तो वो हर रिसा जाही।' (जा, अपने पति से बात कर ले अन्यथा वह नाराज हो जाएगा।) दुल्हन सकुचाते हुए कन्हैया के पास गई और बगल में बैठ गई। माँ झाड़ू लेकर सफाई के बहाने झोपड़ी के बाहर चली गई। कन्हैया ने उसके घूँघट को झटके से उठाया और उससे पूछा- 'तेरा नाम राधा है न? मेरा कन्हैया है।'
'मालूम है।' उसने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया।
'पढ़ने जाती है?'
'नहीं।'
'क्यों नहीं जाती?'
'बाबू नहीं जाने देता।'
'बाबू से बोलना कि तुझे स्कूल में भरती कराएगा। पढ़-लिख ले, यहाँ आएगी तो चूल्हे-चक्की से लग जाएगी।'
'हौ।'
'क्या हौ?'
'बोलूँगी और स्कूल जाकर पढ़ूँगी।'
'तू बहुत सुंदर है रे राधा।' कन्हैया उसके गाल छूकर मुसकुराते हुए बोला। वह सकुचाते हुए थोड़ी दूर हट गई। कन्हैया उसके पास खिसका तो वह और हट गई। कन्हैया और पास खिसका लेकिन राधा के हटने की जगह बची नहीं थी इसलिए वह पलंग से उठी और दौड़ते हुए झोपड़ी के बाहर निकल गई।
सूरज डूबते समय बहू विदा हो गई, राधा चली गई लेकिन उसके पैरों की पायल के घुंघरुओं ने जो मीठी आवाज बिखेरी वह कन्हैया के कानों में रच-बस गई और उस रात उसे नींद नहीं आई। केवल उस रात क्यों, हर रात को वही मीठी आवाज उसके कानों में गुनगुन-गुनगुन करती रही और उसकी याद दिलाती रही।
कन्हैया की राधा अपने मायके वापस चली गई और कन्हैया का दिल भी ले गई। कितनी अनोखी है यह दुनिया जिसमें एक छोटी सी मुलाक़ात एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ देती है! जुड़ना बहुआयामी होता है। बच्चे के जन्म देते ही माँ उससे जुड़ जाती है। कुछ देर बाद शिशु भी अपनी माँ से जुड़ जाता है क्योंकि उसकी पहली खुशनुमा मुलाक़ात माँ से होती है, उसके सामीप्य और उष्ण दुग्ध-धार से होती है। धीरे-धीरे अन्य मुलाकातें बढ़ती जाती हैं और नए रिश्ते पनपते जाते हैं। शुरुआती संबंध मानवीय आधार पर बनते और बढ़ते हैं लेकिन बचपन बीत जाने के बाद ये संबंध आपसी रुचियों और व्यवहार की जमीन पर विकसित होते हैं। किशोरावस्था में सम्बन्ध की नई इबारतें संवेदनाओं की कलम से लिखी जाती है, उन दिनों हमउम्र दोस्त बनते हैं, समलिंगी और विपरीतलिंगी धागे बुने जाते हैं। कमजोर धागे रास्ते में टूटते जाते है, वहीं पर कुछ अपनी मजबूती बनाए रखते हैं और इस तरह धागे-धागे एक दूसरे से गुंथकर मजबूत किसी रिश्ते का नाम दे देते हैं। सबसे अधिक मिठास वाला रिश्ता होता है, किसी वयस्क स्त्री और पुरुष का मानसिक और शारीरिक रूप से जुड़ना। शारीरिक जुड़ाव भले ही टिकाऊ न हो लेकिन सम्बन्धों को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है, वहीं पर मानसिक जुड़ाव ताउम्र बना रहता है। मानसिक जुड़ाव एक-दूसरे की समान रुचियों, संतुलित वार्तालाप और दुख-सुख में साथ देने के ज़रिए धीरे-धीरे बढ़ता है, रिश्ते का नाम चाहे जो हो। इन रिश्तों में सबसे शीर्ष पर है पति-पत्नी का रिश्ता जो खटमिट्ठा तो होता है लेकिन बिना 'प्रिजर्वेटिव' के सालों-साल चलता है।
नेपोलियन हिल लिखते हैं -'लंबे समय तक साथ रहने के बाद पति और पत्नी के चेहरे एक जैसे हो जाते हैं। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति भीड़ में अलग-अलग खड़े होने पर भी उन्हें उनके चेहरे की साम्यता के आधार पर खोज सकता है।'
चेहरे की यह साम्यता दोनों के शारीरिक संपर्क से नहीं, उनकी मानसिक अंतःक्रिया से बनती है।
(४)
मेरे साथ यही गड़बड़ी है कि जैसे ही मौका मिला, मैं अपना ज्ञान बघारने लगता हूँ और मूल कहानी भटक जाती है। कन्हैया का किस्सा अटक गया जबकि मुझे यह बताना था कि राधा के मायके जाने के बाद कन्हैया का मन भी भटक गया। वह दूकान में काम करता तो उसे हर समय राधा की याद आती, उसके बदन की मोहक खुशबू जैसे हर समय उसके आसपास मौजूद रहती। हँसता-मुस्कुराता कन्हैया गंभीर हो गया, मुस्कुराहट राधा की याद में खो गई। मेरे लिए यह बताना मुश्किल है कि वह शारीरिक आकर्षण था या मानसिक लेकिन कोई अज़ब मनस्थिति थी जिसको शब्दों में कैसे बताया जा सकता है ?
शादी हो जाने के बाद जब कन्हैया 'ड्यूटी' पर आया तो उसके सहपाठी ने पूछा- 'हो गया तेरा ब्याह?'
'हो गया।' कन्हैया ने शर्माते हुए बताया।
'शर्मा क्यों रहा है?'
'हें हें हें...'
'कैसी है भाभी?'
'सुंदर है।'
'बात किया उससे?'
'ऐसे ही, थोड़ा सा।'
'अच्छा। ये बता, आज सुबह तू नहाया नहीं क्या?
'कैसे मालूम पड़ा?'
'तेरे मुंह और हाथ पैर में हल्दी का रंग चढ़ा हुआ है। अरे, तूने पैर की उँगलियों में महावर भी लगवाया था?'
'मैं बहुत मना किया था लेकिन नाउन मानी नहीं, जबरन लगा दिया उसने।'
'उसको डांटना था।'
'जब ब्याह होता है तो दूल्हे की नहीं चलती। जो औरतों के मन आता है, वो कर लेती हैं।'
'चल कोई बात नहीं, पर मुझको मिठाई नहीं खिलाया।'
'तुम्हारी मिठाई की दूकान है, जितना चाहो खा लो।'
'ठीक है लेकिन तेरे ब्याह की मिठाई का स्वाद अलग होगा।'
'गरीबों के यहाँ मिठाई नहीं बनती, बताशे से काम चलाना पड़ता है। बताशे का क्या स्वाद? बस, मीठा-मीठा लगता है।'
'ससुराल में भी मिठाई नहीं मिली?'
'वो लोग भी गरीब हैं।'
'अरे!'
'हाँ।'
'तो तू खुश है न?'
'कल तक खुश था, आज नहीं।'
'क्यों?'
'राधा कल अपने मायके वापस चली गई। अम्मा बोल रही थी कि दो साल बाद वापस आएगी।' कन्हैया का गला भर आया।
'फिर कैसा करेगा? तेरा उससे मिलने का मन नहीं हो रहा है?'
'जिस दिन मन होगा, चला जाऊंगा। अरपा नदी के उस पार चिंगराजपारा में उसका घर है, किसी दिन ज़रूर जाऊंगा।'
'तेरी अम्मा गुस्सा नहीं करेगी क्या?'
'उसको कैसे मालूम पड़ेगा?'
'ससुराल वालों ने बता दिया तो?'
'वो मैं बना लूँगा।' उसके चेहरे पर किसी भावी योजना का आत्मविश्वास झलक रहा था।
ब्याह के चौथे दिन कन्हैया अरपा नदी पार करके अचानक अपनी ससुराल जा पहुंचा। राधा घर के बाहर झाड़ू लगा रही थी। झाड़ू करते-करते उसे लगा, जैसे कोई खड़ा है। सिर उठाकर उसने देखा तो सामने कन्हैया खड़ा था, कृष्ण-कन्हैया की मुद्रा में। राधा का जी धक से हो गया, दिल की धड़कन रुक सी गई और फिर धक-धक चलने लगी। झाड़ू को एक किनारे फेंक कर दौड़ती हुई वह कन्हैया के पास आई, उसका हाथ पकड़ा और घर के अंदर ले गई। बोरा बिछाकर उस पर कन्हैया को बैठाया और पूछा- 'तुम कैसे हो?'
'ठीक हूँ।' कन्हैया की आवाज़ में धीमापन था।
'आज काम पर नहीं गए?'
'गया था, अभी छुट्टी लेकर तुमसे मिलने आया?'
'मुझे भी तुम्हारी याद आ रही थी।'
'सच में।'
'हूँ। मैं सोच रही थी कि न जाने तुम कब मिलोगे। अच्छा हुआ, आ गए।'
'दाई (माँ) कहाँ है?'
'वह काम करने गई है।'
'और बाबू (पिता)?'
'वह गाय चराने गया है।'
'ठीक है, अब मैं जाता हूँ, मुझे देर हो रही है।'
'थोड़ी देर और बैठो, पानी पी लो। बासी (भात) खाओगे क्या?'
'खा लूँगा।' कन्हैया बोला। राधा चूल्हे के पास गई, मिट्टी के बर्तन में बासी भात और नमक ले कर आई और बोली- 'ले खा ले।'
कन्हैया भात खा रहा था और खाते-खाते राधा को लगातार देखते जा रहा था। राधा ने जब उसे घूरते देखा तो पूछी- 'ऐसा क्यों देख रहे हो?'
'तुमको देखना अच्छा लगता है।'
'हट।'
'सच।'
'तू कितना अच्छा है।'
'तू भी।' कन्हैया ने कहा। इतनी देर में बासी खत्म हो गया। वह उठ खड़ा हुआ और बोला- 'अब मैं चलता हूँ, फिर आऊँगा।'
'ठीक है, आना पर अब खाली हाथ नहीं आना।' राधा बोली।
'क्या लाना है?'
'मेरे लिए हरे और लाल रंग की चूड़ियाँ लाना, मुझे बहुत अच्छी लगती है।'
'ज़रूर लाऊँगा लेकिन मुझे तुम्हारी कलाई का नाप नहीं मालूम!' कन्हैया ने सवाल किया तो राधा ने अपनी कलाई आगे बढ़ाई और कहा- 'लो, नाप लो।'
कन्हैया ने उसे अपने अंगूठे और उँगलियों से नापा, एक- दूसरे के स्पर्श से दोनों कंपकपा गए।
दोनों का मिलना-जुलना चुपके-चुपके चलता रहा। कन्हैया और राधा बड़े होते रहे लेकिन ब्याह का वह मतलब नहीं जानते थे जिसे वयस्क जान जाते हैं। कन्हैया दूकान के काम में बहकने लगा। बताए गये काम को भूलने लगा और कभी-कभी काम करते-करते खो सा जाता था। एक दिन उसके सहपाठी ने उससे पूछा- 'भौजाई कैसी है? मिला था क्या उससे?'
'हाँ, मिलते रहता हूँ।' कन्हैया ने उत्तर दिया।
'जब मिलता है तो क्या करता है?'
'खूब बातें करता हूँ। तुमको क्या बताऊँ, वह बहुत मीठा बोलती है, गुड़ जैसी मिठास है उसकी बोली में।'
'तेरी माँ को मालूम है, तू उससे मिलता है?'
'अभी तक किसी को मालूम नहीं है, न मेरे घर में, न उसके घर में।'
'किसी दिन पकड़ा गया तो?'
'तो क्या होगा? वह मेरी ब्याहता है।'
'पर तुझे दो साल तक मिलना-जुलना मना है न?'
'क्यों मना है? तुमको कुछ मालूम है क्या?'
'मुझे क्या मालूम?'
'फिर?'
'लेकिन कोई तो बात है। मेरे बड़े भाई का ब्याह हुआ है, भाभी हमारे घर में रहती है। उनको कोई मनाही नहीं है।'
'सच में?'
'हाँ।'
'तो मुझे क्यों नहीं मिलने देते?'
'तू अभी बच्चा है, शायद इसलिए।'
'मैं बड़ा कब होऊंगा?'
'जिस दिन भौजाई तेरे घर में आ जाएगी, समझ लेना कि तू बड़ा हो गया है।'
'फिर बहुत मज़ा आएगा।'
'अच्छा ये बता कि तेरे घर में तेरे लिए कोई अलग से कमरा है?'
'झोपड़ी में कमरा होता है क्या? एक तरफ चूल्हा है जिसमें माँ खाना बनाती है और उसके बगल में सामान रखती है। रात को जमीन पर चादर बिछा कर हम सो जाते हैं।'
'अरे, फिर कैसा होगा?'
'कैसा होगा?'
'मेरे बड़े भैया अलग कमरे में भाभी के साथ सोते हैं।'
'अलग कमरे में क्यों सोते हैं?'
'मुझे क्या पता? पर कोई बात ज़रूर है।' सहपाठी ने कहा। कन्हैया भी सोच में पड़ गया। उसे याद आया कि जब भी वह राधा को छूता है तो उसे सिहरन सी होती है, इस बात का कोई न कोई संबंध अलग कमरे से जरूर है।
किशोरावस्था जिज्ञासु वय है। वह भावी जीवन के प्रत्येक व्यावहारिक पहलू को समझना चाहता है। कुछ समझ में आता है तो कुछ समझ में नहीं आता और कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जिन्हें समझने के लिए उसे उचित समय की प्रतीक्षा करनी होती है। विपरीतलिंगी संबंध मनुष्य के जन्म से बनने शुरू हो जाते हैं जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ विभिन्न रिश्तों में विकसित होते हैं, जैसे माँ-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी। लंबे समय तक साथ रहने और चलने वाले रिश्तों को सावधानी से चलने वाले लोग जीवन भर निभा ले जाते हैं। मनुष्य जीवन का एक आश्चर्य यह भी है कि जीवन भर साथ निभाने वाले भी एक-दूसरे को ठीक से समझ नहीं पाते, बहुत कुछ अबूझा रह जाता है, खास तौर से पति-पत्नी का रिश्ता। यह रिश्ता शरीर से होते हुए मन और मन से होते हुए आत्मा से जुड़ता है। इस जुड़ाव के लिए दोनों का शरीर किसी पुल की तरह काम करता है जो दो छोरों को मिलाता है और मन से आत्मा तक की यात्रा सम्पन्न करवाता है।
हाँ, तो मैं आपको कन्हैया और राधा के विरह की बातें बता रहा था। हुआ यह कि एक दिन कन्हैया सपड़ा गया। उसकी सास अचानक आ पहुंची। कन्हैया को देखकर वह नाराज़ नहीं हुई बल्कि खुशी से उसको अपने गले से लगा लिया। बोली- 'कब आए?'
'थोड़ी देर हुई।' कन्हैया सहमते हुए बोला।
'तुम्हारी माँ कैसी है?'
'अच्छी है।'
'और भाई-बहन?'
'ठीक हैं लेकिन छोटे भाई का हाल बुरा है।'
'क्या हुआ?'
'ठीक से स्कूल नहीं जाता। बाहर दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा खेलते रहता है। दाई उसको कुछ नहीं बोलती लेकिन मैं उसको समझता हूँ कि 'पढ़-लिख ले रे, नहीं तो मेरे जैसा जूठा उठाने का काम करेगा' पर वह मानता नहीं है।'
'किस क्लास में पढ़ता है?'
'तीसरी कक्षा में।'
'अभी बच्चा है, बड़ा होगा तो समझ जाएगा लेकिन पढ़ेगा तो कमाएगा कब?'
'जब उसकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तब बढ़िया नौकरी करेगा, कहीं सरकारी विभाग में चपरासी बन जाएगा।'
'घर का खर्चा कैसे चलेगा, तू तो अकेला है कमाने वाला।'
'माँ भी तो कमाती है।'
'पर जब राधा तेरे घर जाएगी तो कैसा करोगे?'
'राधा कब घर जाएगी?'
'अभी देर है।'
'उसको जल्दी भेजो, मुझे उसके साथ खेलना है।' कन्हैया ने कहा। उसकी सास को हंसी आ गई और बोली- 'ठीक है मैं तेरी माँ से बात करती हूँ।'
कन्हैया को उम्मीद थी कि राधा की माँ उसकी माँ से बात करेगी लेकिन कई माह बीत गए, गाड़ी आगे न बढ़ी. उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी लेकिन किसी से कहने की हिम्मत न हो. एक दिन वह नहा-धोकर काम पर जाने के लिए घर से निकल रहा था कि माँ ने उसे आवाज़ दी- 'सुन कन्हैया.'
'क्या है?'
'मैं अकेले इतने बच्चों की देखरेख नहीं कर पाती, मजदूरी के लिए भी घर छोड़कर जाना पड़ता है. सोचती हूँ कि राधा को ले आऊँ तो मदद हो जाएगी.'
'अभी तो एक साल की देरी है न?' कन्हैया ने नखरा बताया.
'है तो लेकिन आज मैं राधा के घर जाकर बात करूंगी और वे लोग राजी हो गए तो विदा करवा कर ले आउंगी.'
'वो लोग राजी हैं.'
'तुझको कैसे मालूम?'
'राधा की माँ से मेरी बात हुई थी.'
'तू वहां गया था?'
'हाँ, गया था.'
'मुझसे बिना पूछे, बिना बताये?'
'तो क्या हुआ?' कन्हैया ने तैश में कहा. कन्हैया की माँ गुस्से में कन्हैया की ओर बढ़ी और उसके गाल में एक तमाचा जड़ा. कन्हैया सकपका गया. असावधानीवश उसके मुंह से वह निकल गया जो उसे छुपा कर रखना था. वह सर झुका कर खड़ा रह गया. माँ ने पूछा- 'कब गया था?' कन्हैया चुप. इसके बाद माँ ने ताबड़तोड़ कई सवाल पूछे लेकिन कन्हैया ने एकदम चुप्पी साध ली और चुपचाप घर से बाहर हो गया और काम के लिए दूकान की ओर निकल पड़ा. रास्ते भर उसे अपनी गलती पर अफ़सोस होता रहा और उसे समझ आ गया कि राधा का घर आना अब मुश्किल है.
पूरा दिन वह उदास रहा, किसी प्रकार दिन कटा, रात आई. छुट्टी मिलने पर वह डरते हुए घर में घुसा तो उसने देखा कि माँ और राधा चूल्हे के पास बैठी हुई खाना पका रही है. माँ मुस्कुरा रही है और राधा भाप उगलते भात को पसा रही है.
(५)
कन्हैया अब सत्तर वर्ष का हो गया है. बाल-बच्चेदार हो गया है. नाना-दादा भी बन गया है लेकिन उसकी मेहनत और मुस्कराहट अब भी कायम है. यदि आप कन्हैया से मिलना चाहें तो वह आपको बिलासपुर की भारत माता स्कूल के सामने मिल जाएगा, वह वहां स्कूली बच्चों के लिए 'खाई-खजाना' बेचता हुआ मिल जाएगा.
एक निवेदन है आपसे कि इस कहानी के बारे में कन्हैया को मत बताइएगा अन्यथा वह मुझ पर नाराज़ हो जाएगा और मुझे उलाहना देगा कि उसकी 'प्राइवेट' बातें मैंने क्यों 'पब्लिक' कर दी.
अब तो आप समझ गये होंगे कि उसका सहपाठी मैं ही हूँ....
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बिलासपुर का तेलीपारा, रेलवे स्टेशन और बस्ती को जोड़ने वाली सड़क के दोनों ओर बसा हुआ मोहल्ला जिसमें सब्जियों के लहलहाते खेत हैं। वर्षा ऋतु में धान के पौधे भी लगाए जाते हैं। किसी जमाने में तेली जाति की आबादी रही होगी, अब काछियों का वर्चस्व है। उनके खेत साल भर फसल देते हैं, सांस लेने की फुर्सत नहीं। भूमिस्वामी बीज, गोबर खाद और मजदूरों की व्यवस्था करते हैं, फसल अपने-आप हो जाती है। जगह-जगह कुएं खुदे हुए हैं, चाहे जितना पानी ले लो। चार हाथ खोदो तो बिलासपुर की मिट्टी से पानी का स्रोत दिखने लगता है। बारिश भी भरपूर होती है।
केजूराम यादव इन्हीं काछी बाड़ियों में मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। पाँच बच्चे थे, कन्हैया सबसे बड़ा, ग्यारहवें में लग गया था। चौथी पास करने के बाद उसके पिता ने उसको म्युनिसिपल स्कूल में भर्ती करवा दिया ताकि वह पढ़-लिख ले लेकिन नियति को कुछ और सूझा, खेत में काम करते समय केजूराम को जहरीले साँप ने काट दिया। बैगा की झाड-फूँक के बावजूद जहर न उतरा और केजूराम अपनी घरवाली और छोटे-छोटे बच्चों को रोता-बिलखता छोड़ कर चला गया। कन्हैया को मिडिल स्कूल जाते तीन माह हुए थे, पढ़ाई छूट गई। 'रोज कमाना-रोज खाना' वाले परिवार में चटनी-भात के लाले पड़ने लगे। कन्हैया बच्चा था, खेतों में काम करने लायक न था इसलिए उसकी माँ ने आसपास के दो घरों में बर्तन माँजने का काम पकड़ लिया लेकिन मेहनताना इतना कम मिलता था कि घर में एक समय ही चूल्हा जलता और रात के समय बच्चे भूख से रोते-कलपते सो जाते।
कन्हैया काम खोज रहा था, उसका कद कम था इसलिए वह और भी छोटा लगता था इसलिए जहां काम मांगने जाता उसे एक ही जवाब मिलता- 'अभी बच्चा है, तू क्या काम करेगा ?' यह सवाल उसकी परेशानी और भूख दोनों बढ़ा देते।
एक दिन की बात है, कन्हैया ने देखा, उसकी झोपड़ी के बाहर एक साँप लहराते हुए तेजी से चला जा रहा था। वह बिजली की तेजी से साँप की ओर लपका और उसे दबोच लिया। कन्हैया गुस्से में था, उसे साँपों से नफ़रत हो गई थी। 'ज़रूर इसी ने बाबू को डसा होगा, इसको नहीं छोड़ूंगा।'
साँप काफी मोटा था लेकिन छोटा था। कन्हैया की मुट्ठी में फँसकर साँप फड़फड़ा रहा था, पूंछ से वार कर रहा था लेकिन पकड़ मजबूत थी, साँप का बच निकलना मुश्किल था। कन्हैया के दिल में कुछ आया। उसने साँप के फन को अपने चेहरे के सामने लाकर उससे पूछा- 'तुमने मेरे बाबू को क्यों डसा ?'
'मैंने ? मैंने तुम्हारे बाबू को कब डसा ?' साँप ने कन्हैया की आँखों में आंखे डालकर पूछा।
'महीना भर हो गया।'
'पर मैं तो इस तरफ पहली बार आया।'
'तो तुम्हारा कोई भाई-बंधु आया होगा।'
'हो सकता है, पर वह मैं नहीं हूँ।'
'पर हो तो साँप न, किसी न किसी को काटोगे ?'
'किसने कह दिया कि हम काटते हैं ?'
'सब जानते हैं, तुम्हारा स्वभाव है।'
'गलत, सब गलत। जब तक हमारी जान को खतरा न हो, हम लोग हमला नहीं करते, भाग जाते हैं। हम तो किसी हल्की सी आवाज या कंपन से जान जाते हैं कि कोई आ रहा है और सर्र से छुप जाते हैं। हमें मालूम है कि मनुष्य दुष्ट होते हैं, हमें देखते ही मारेंगे। हमको भी तो अपनी जान बचानी है।'
'फिर उसने मेरे बाबू को क्यों काटा ?'
'हो सकता है कि तुम्हारे बाबू ने उस पर हमला किया हो !'
'ये तो मुझे नहीं मालूम लेकिन तुमको पता है कि मेरे बाबू मर गए, हम अनाथ और बेसहारे हो गए, मैं तुमको नहीं छोड़ूंगा।'
'उस दिन क्या हुआ, कौन जाने ! पर तुमको पता है कि खेतों में रहने वाले सभी साँप विषैले नहीं होते।'
'साँप तो सब जहरीले होते हैं, मैं जानता हूँ।'
'तुम्हारी जानकारी गलत है।'
'फिर मेरा बाबू क्यों मरा ?'
'डर से मर गया होगा।'
'डर से ?'
'हाँ, अधिकतर लोग हमारे दाँत गड़ाते ही सदमे में मर जाते हैं।'
'तुम मुझे मत बहकाओ, मैं तुम्हें छोडने वाला नहीं।'
'अब जब मेरी गलती नहीं है तो तुम मुझे क्यों मार रहे हो ?'
'मुझे सारे साँपों से चिढ़ हो गई है, मैं सबसे बदला लूँगा।'
'तुम इन्सानों में यह बहुत बड़ा दोष है कि गलती किसी और की होती है और सज़ा किसी और को देते हो।' सांप ने कन्हैया को डांटते हुए कहा।
'चलो होगा, पर एक बात बताओ, तुम बोल कैसे रहे हो, वह भी हमारी भाषा में ?' कन्हैया ने विस्मित होते हुए पूछा।
'हम सब समझते हैं, तुम्हारा दुख भी मुझे समझ में आ रहा है।' सांप ने बताया।
'मेरा दुख, तुम्हें समझ में आ रहा है? मैं नहीं मानता।'
'मत मानो लेकिन मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्कूल छूट गया, घर में खाने-पीने की तंगी है।'
'अरे वाह, तुम तो सब जानते हो। अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ ?'
'पढ़ाई बन्द मत करो, पढ़ो, तब तो सभ्य बनोगे।'
'अरे, वाह !'
'हाँ, हमारी कोई स्कूल नहीं, कभी कुछ सीखने का मन होता है तो चुपचाप किसी स्कूल में घुस जाता हूँ और सब सुनते रहता हूँ।'
'अब तक क्या सीखे ?'
'यही कि सदा सच बोलना चाहिए, बड़ों का आदर करना चाहिए, सब प्राणियों से प्रेम करना चाहिए।'
'कुछ समझ में आया ?'
'आया लेकिन ये सब हमारे काम का नहीं है, सभ्य होना तुम मनुष्यों की समस्या है। हम असभ्य ही ठीक हैं।'
'कुछ सीख लो, क्या नुकसान है !'
'मैंने कहा न, हमारी दुनिया अलग है। अब तुम मुझे छोड़ दो।' साँप ने विनयपूर्वक कहा।
कन्हैया साँप से नाराज था लेकिन उसकी बातों ने उसका गुस्सा ठंडा कर दिया। उसने अपनी मुट्ठी खोली लेकिन वह खुल नहीं रही थी, जैसे उसकी उंगलियाँ जकड़ गई हों।
अचानक कन्हैया की आँखें खुली, उसने अपनी खाट की लकड़ी को मजबूती से जकड़ा हुआ था। उठकर उसने अपनी मुट्ठी खोली और बहुत देर तक अपनी गदेलियों को घूरकर देखता रहा।
कन्हैया की माँ मेहनती थी लेकिन काम पर जाने में बच्चों को घर में छोड़ कर जाने की समस्या थी। कन्हैया सबको सम्हालता और माँ के घर आ जाने के बाद काम की तलाश में निकल जाता। एक दिन, रास्ते में उसे पिता के पुराने दोस्त मिल गए, सुकालू काका, जो मिट्टी के बर्तन बनाते थे। कन्हैया ने उनसे अपनी परेशानी बताई तो वे उसको अपने साथ अपने घर ले गए। कन्हैया उनकी चाक घुमाता और सुकालू अपनी दक्ष उंगलियों से बर्तन गढ़ता। सीखने की गरज़ से कन्हैया ने भी हाथ आज़माए लेकिन बात नहीं बनी। मिट्टी के बर्तन गढ़ना हो या कोई भी दूसरा काम, सीखते-सीखते हाथ जमता है। सुकालू उसका हौसला बढ़ाता, शाम को घर वापस जाते समय उसे चार आने भी देता।
तेलीपारा से लगा हुआ था कुम्हारपारा, जहां कुम्हारों की बस्ती थी। खुली जमीन में छोटे-छोटे कच्चे बने हुए दो या तीन कमरे वाले घर, जिनमें उनका रहना था और भंडार भी। मिट्टी के बर्तन बनाने का काम बाज़ार की मांग का अनुमान लगाकर बहुत पहले से शुरू करना पड़ता है। गर्मी के मौसम के लिए मटका और सुराही, पोला के त्यौहार के लिए बच्चों के खिलौने, दिवाली के लिए दिए और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ आदि बनाने का काम तीन-चार महीने पहले शुरू करना पड़ता है। हलवाई दूकानों में खपने वाले दही जमाने वाला कुंडा, रसगुल्ला 'पेक' करने के लिए छोटी मटकियाँ और छोटे सकोरे खाली समय में बनाकर रख लिए जाते हैं जो धीरे-धीरे साल भर बिकते रहते हैं। इन्हें तैयार करने में परिश्रम, कलाकारी और धैर्य की ज़रूरत होती है। यह बेहद थकाऊ और मगज़मारी वाला काम है। चिकनी मिट्टी को खोजना, फिर उसे खोदना, छानना, भिगाना, सानना, उसके बाद उसे मनचाहा रूप देना, सुखाना, आग में पकाना, भंडार में सुरक्षित रखना और टूट-फूट से बचाना- ये सब मेहनत ग्राहक को नहीं दिखती। बेचने जाओ तो मिट्टी का सामान औने-पौने दाम में बिकता है। ग्राहक इतना मोलभाव करते हैं कि दिमाग खराब हो जाता है। मुश्किल यह है कि बाप-दादों से यही काम सीखा है, कुछ और जानते नहीं, क्या करें?
(२)
बिलासपुर की गर्मी को गर्मी कहना उचित नहीं, प्रचंड गर्मी कहना चाहिए। यहाँ वर्ष भर में केवल दो मौसम होते हैं, एक गर्मी और दूसरा बहुत गर्मी। ऐसे ही 'बहुत गर्मी' वाली धूप में काम करते समय कन्हैया बेहोश होकर जमीन में पसर गया। सुकालू घबरा गया। उसने फटाफट मिट्टी से सना अपना हाथ धोया, कन्हैया को गोद में उठाकर घर के अंदर ले गया और उसके चेहरे और सिर पर एक लोटा पानी डाल दिया। सुकालू की घरवाली ने कच्चा आम पीसा और कन्हैया के तलवे में लेप लगा दिया। थोड़ी देर बाद कन्हैया होश में आ गया, उसे पानी पिलाया और पास में बैठकर पंखा झलने लगे। सुकालू को समझ में आ गया कि इतनी कम उम्र में इतनी अधिक मेहनत का काम कन्हैया के लिए ठीक नहीं, इसलिए उससे कहा- 'तू इस काम को नहीं कर पाएगा। किसी हलवाई की दूकान में काम खोज ले, वहाँ ठीक रहेगा।'
'मैं कई जगह गया था, मुझे किसी ने काम पर नहीं लगाया।' कन्हैया ने कहा।
'मेरा काम बहुत मेहनत वाला है, तेरे से नहीं बनेगा।'
'फिर मैं क्या करूं ?'
'कल सुबह मेरे पास आना, मैं तुझे एक हलवाई के यहाँ ले चलूँगा. वहाँ सकोरा देने जाना है मुझे. मेरी जान-पहचान है, मैं तेरे लिए बात करूंगा. सुकालू ने समझाया।
कन्हैया अगली सुबह सुकालू काका के साथ गोलबाज़ार की ओर चल पड़ा।
बाँस से बने विशालकाय टोकरे को सुकालू ने एक हलवाई की दूकान के सामने अपने सिर से उतारा जिसमें वह मिट्टी के सकोरे भर कर लाया था। गमछे से अपना चेहरे का पसीना पोछा और गद्दी पर बैठे बुजुर्ग से कहा- 'सेठ जी, सकोरे ले आया। तीन सौ दस हैं।'
'तीन सौ दस ? दस ज़्यादा क्यों ?' दूकान मालिक ने पूछा।
'टूट-फूट वाली चीज है, रखते-उतारते टूट जाए तो मेरी गिनती गलत नहीं निकलनी चाहिए, आप गिनवा लो।'
'गिनने की ज़रूरत नहीं है, जाओ, अंदर धीरे से जमाकर रख दो।'
सकोरा रखने के बाद सुकालू बोला- 'दो, सेठ जी, छह रुपिया।'
'अरे, भाव बढ़ा दिया क्या ? पिछले बार एक रूपिया बारह आने सैकड़ा दिया था ?'
'क्या करें सेठ जी, चाउर (चावल) मंहगा हो गया। कोयला मंहगा हो गया। मंहगाई इतनी बढ़ रही है कि पेट भरना मुश्किल हो गया।'
'चाँवल क्या भाव मिल रहा है ? तुम लोग तो मोटा चाँवल खाते हो, वह तो सस्ता होगा ?'
'काहे का सस्ता ? एक रुपए का डेढ़ सेर मिल रहा है।'
'अरे, बहुत भाव बढ़ गया है। चलो ठीक है, पूरा छः रूपिया ले लो लेकिन अब भाव मत बढ़ाना सुकालू राम।'
'जी, सेठ जी।'
'ये साथ में तुम्हारा लड़का है क्या ? बड़ा सुंदर है।'
'नहीं, मेरे साथी का बड़ा लड़का है, इसका बाप मर गया, चार छोटे भाई-बहन भी हैं।'
'कैसे मर गया ?'
'नाग देवता ने काट दिया।'
'ये तो बहुत बुरा हुआ, राम-राम।'
'सेठ जी, इसे अपने यहाँ काम में रख लेते तो बड़ी कृपा होती।'
'ये बहुत छोटा है, हमारे यहाँ क्या काम कर पाएगा ?'
'ग्राहक को सामान लगा देगा, जूठा उठा देगा।'
'ठीक है, रखे लेते हैं, आठ आना रोज देंगे, बन जाएगा ?'
'बहुत अच्छा हो जाएगा मालिक।' सुकालू ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।
'तो, कल सुबह सात बजे भेज देना।' बुजुर्ग जगदीश नारायण ने कहा और एक दोना भरकर जलेबी कन्हैया को दी और कहा- 'घर ले जाओ, सब कोई खाना।' कन्हैया रोने लगा।
घर पहुँच कर कन्हैया अपनी माँ से लिपट गया और नौकरी मिल जाने की खबर दी। भूखे बच्चे जलेबी पर टूट पड़े, दो मिनट में खत्म हो गई। जलेबी से पेट कहाँ भरता है, मुंह मीठा हो जाता है, तनिक तसल्ली हो जाती है। पेट भरने के लिए हाड़-तोड़ परिश्रम करना पड़ता है लेकिन पेट तो तब भी नहीं भरता। कन्हैया के घर में कमाने वाले एक से दो हो गए, अब शायद दोनों समय रसोई का चूल्हा जले।
अगली सुबह कन्हैया दूकान पहुंच गया, वह चौंक गया क्योंकि गद्दी पर उसका एक सहपाठी विराजमान था। वह घबराया क्योंकि हलवाई की दूकान में नौकरी की खबर इस सहपाठी के जरिए स्कूल तक पहुँच जाएगी। भले ही उसने स्कूल जाना छोड़ दिया है पर जब दूसरे लड़कों को मालूम पड़ेगा तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। 'बताओ, जूठा उठाने की नौकरी करता है, कोई दूसरा काम नहीं मिला क्या?'
थोड़ी शर्म भी आ रही थी। जिसके साथ बैठकर क्लास में पढ़ता था, उसका नौकर बन गया। पहले बराबरी का दर्जा था लेकिन अब मालिक-नौकर का हो गया। कन्हैया के दिल में आया कि उल्टे पैर घर लौट जाए लेकिन भूख ने कुछ समझाया और वह अपनी आँखें झुकाए काम से लग गया। उसने पूरी दूकान में झाड़ू लगाई और गीले कपड़े से 'बेन्च' पोछकर साफ की। इतनी देर में बड़े मालिक आ गए जो उसके सहपाठी के दादाजी थे। उनके आते ही सहपाठी गद्दी से नीचे उतर गया और उसमें बड़े मालिक बैठ गए।
देशी घी की गरम जलेबी और समोसा तैयार होकर परात में आ गए, इधर ग्राहकों की भीड़ भी आ गई। सहपाठी तराजू से तौल कर जलेबी दोने में रखता, दूसरे दोने में समोसा रखता और कन्हैया दौड़कर अंदर ग्राहक को देता जाता। ग्राहक अंदर बेन्च पर बैठकर नास्ते करते और गद्दी में पैसे चुकाकर चले जाते। कन्हैया को काम आसान लगा और खुशी-खुशी करता रहा लेकिन उसकी नाक में घुस रही जलेबी और समोसा की प्यारी खुशबू उसे परेशान भी कर रही थी। जब अधिक बेचैनी होती तो वह थोड़ा पानी पी लेता तो उस खुशबू से उसका ध्यान हट जाता। कन्हैया ने देखा कि उसका सहपाठी भी बीच-बीच में ग्राहकों को समान ले जाकर दे आता और जूठे दोने उठाता तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। मालिक के घर का लड़का भी यह सब काम कर रहा है !
नौ बजे के बाद ग्राहकों की भीड़ कम होने लगी, उसने गौर किया कि बड़े मालिक कुछ गुनगुना रहे हैं और अपनी एक मुट्ठी बंद करके दूसरी हाथ की उँगलियों से थाप दे रहे हैं। चुपके से उनके पीछे खड़ा होकर उसने सुना कि वे एक गाना गा रहे थे- 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।'
सहपाठी ने जलेबी और समोसा एक दोने में निकाला, अंदर जाकर कन्हैया को इशारा करके बुलाया, उसे दे दिया और कहा- 'ले, नास्ता कर ले। मैं अब घर जा रहा हूँ।'
खाते-खाते कन्हैया सोच रहा था- 'किस स्वादिष्ट दुनिया में आ गया मैं !'
(३)
कन्हैया नौकरी कर सकता या पढ़ाई। नौकरी के कारण वह पाँचवी कक्षा तक ही पढ़ पाया और ललचाई आँखों से सड़क पर बस्ता टाँगे स्कूल जाते बच्चों को देखता रह जाता। दिन बीतते रहे, दिन महीनों में, महीने सालों में। एक दिन कन्हैया की माँ ने उससे कहा- 'अक्ती के दिन तेरा ब्याह है कन्हैया।'
'मेरा ब्याह? कन्हैया ने पूछा।
'हाँ, तेरा ब्याह। मालिक से छुट्टी ले लेना।'
'ठीक है, कब है अक्ती?'
'दो दिन बाद।'
'ब्याह में क्या होता है?'
'दुल्हा और दुल्हन की शादी।'
'मैं दुल्हा बनूँगा?'
'हाँ।'
'और दुल्हन?'
'आएगी तब देख लेना।'
'जब आएगी तो यहीं अपने घर में रहेगी?'
'नहीं, अभी ब्याह के बाद अपने घर वापस चली जाएगी।'
'फिर?'
'दो साल बाद आएगी।'
'क्यों?'
'तू अभी छोटा है, चौदह साल का तो है।'
'उसको रोक लेना, मैं उसके साथ खेलूँगा।'
'नहीं, अभी नहीं खेल सकता। जब दो साल बाद में यहाँ रहने आएगी तब खेलना उसके साथ।' कन्हैया की माँ ने उसे डांटते हुए कहा, माँ के चेहरे पर थोड़ी मुस्कुराहट आई और उसके बाद अपने दिवंगत पति की याद आई और सहसा उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
गरीब के घर की शादी गरीबी से होती है। जान-पहचान में अच्छी लड़की दिखी तो कन्हैया का सादगी से ब्याह हो गया। जिस दिन बहू घर आई, कन्हैया ने उसे देखने की बहुत कोशिश की लेकिन ठीक से देख नहीं पाया क्योंकि उसने अपना घूँघट नहीं हटाया। वह गुस्साया हुआ अपनी माँ के पास गया और बोला- 'ब्याह मोर होए है कि तोर।' (ब्याह मेरा हुआ या तेरा?)
'तोर होए हे, काबर?'(तेरा हुआ है, क्यों?)
'घरवाली मोर हवै अऊ मैं ओला देखे नई पायों।' (मेरी घरवाली है और मैं उसको नहीं देख पा रहा हूँ।) कन्हैया भन्ना कर बोला। माँ ने हँसते हुए बहू को अपने पास बुलाया और उससे बोली- 'जा, अपन दुल्हा लंग थोड़कुन गोठिया ले ओ, नई तो वो हर रिसा जाही।' (जा, अपने पति से बात कर ले अन्यथा वह नाराज हो जाएगा।) दुल्हन सकुचाते हुए कन्हैया के पास गई और बगल में बैठ गई। माँ झाड़ू लेकर सफाई के बहाने झोपड़ी के बाहर चली गई। कन्हैया ने उसके घूँघट को झटके से उठाया और उससे पूछा- 'तेरा नाम राधा है न? मेरा कन्हैया है।'
'मालूम है।' उसने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया।
'पढ़ने जाती है?'
'नहीं।'
'क्यों नहीं जाती?'
'बाबू नहीं जाने देता।'
'बाबू से बोलना कि तुझे स्कूल में भरती कराएगा। पढ़-लिख ले, यहाँ आएगी तो चूल्हे-चक्की से लग जाएगी।'
'हौ।'
'क्या हौ?'
'बोलूँगी और स्कूल जाकर पढ़ूँगी।'
'तू बहुत सुंदर है रे राधा।' कन्हैया उसके गाल छूकर मुसकुराते हुए बोला। वह सकुचाते हुए थोड़ी दूर हट गई। कन्हैया उसके पास खिसका तो वह और हट गई। कन्हैया और पास खिसका लेकिन राधा के हटने की जगह बची नहीं थी इसलिए वह पलंग से उठी और दौड़ते हुए झोपड़ी के बाहर निकल गई।
सूरज डूबते समय बहू विदा हो गई, राधा चली गई लेकिन उसके पैरों की पायल के घुंघरुओं ने जो मीठी आवाज बिखेरी वह कन्हैया के कानों में रच-बस गई और उस रात उसे नींद नहीं आई। केवल उस रात क्यों, हर रात को वही मीठी आवाज उसके कानों में गुनगुन-गुनगुन करती रही और उसकी याद दिलाती रही।
कन्हैया की राधा अपने मायके वापस चली गई और कन्हैया का दिल भी ले गई। कितनी अनोखी है यह दुनिया जिसमें एक छोटी सी मुलाक़ात एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ देती है! जुड़ना बहुआयामी होता है। बच्चे के जन्म देते ही माँ उससे जुड़ जाती है। कुछ देर बाद शिशु भी अपनी माँ से जुड़ जाता है क्योंकि उसकी पहली खुशनुमा मुलाक़ात माँ से होती है, उसके सामीप्य और उष्ण दुग्ध-धार से होती है। धीरे-धीरे अन्य मुलाकातें बढ़ती जाती हैं और नए रिश्ते पनपते जाते हैं। शुरुआती संबंध मानवीय आधार पर बनते और बढ़ते हैं लेकिन बचपन बीत जाने के बाद ये संबंध आपसी रुचियों और व्यवहार की जमीन पर विकसित होते हैं। किशोरावस्था में सम्बन्ध की नई इबारतें संवेदनाओं की कलम से लिखी जाती है, उन दिनों हमउम्र दोस्त बनते हैं, समलिंगी और विपरीतलिंगी धागे बुने जाते हैं। कमजोर धागे रास्ते में टूटते जाते है, वहीं पर कुछ अपनी मजबूती बनाए रखते हैं और इस तरह धागे-धागे एक दूसरे से गुंथकर मजबूत किसी रिश्ते का नाम दे देते हैं। सबसे अधिक मिठास वाला रिश्ता होता है, किसी वयस्क स्त्री और पुरुष का मानसिक और शारीरिक रूप से जुड़ना। शारीरिक जुड़ाव भले ही टिकाऊ न हो लेकिन सम्बन्धों को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है, वहीं पर मानसिक जुड़ाव ताउम्र बना रहता है। मानसिक जुड़ाव एक-दूसरे की समान रुचियों, संतुलित वार्तालाप और दुख-सुख में साथ देने के ज़रिए धीरे-धीरे बढ़ता है, रिश्ते का नाम चाहे जो हो। इन रिश्तों में सबसे शीर्ष पर है पति-पत्नी का रिश्ता जो खटमिट्ठा तो होता है लेकिन बिना 'प्रिजर्वेटिव' के सालों-साल चलता है।
नेपोलियन हिल लिखते हैं -'लंबे समय तक साथ रहने के बाद पति और पत्नी के चेहरे एक जैसे हो जाते हैं। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति भीड़ में अलग-अलग खड़े होने पर भी उन्हें उनके चेहरे की साम्यता के आधार पर खोज सकता है।'
चेहरे की यह साम्यता दोनों के शारीरिक संपर्क से नहीं, उनकी मानसिक अंतःक्रिया से बनती है।
(४)
मेरे साथ यही गड़बड़ी है कि जैसे ही मौका मिला, मैं अपना ज्ञान बघारने लगता हूँ और मूल कहानी भटक जाती है। कन्हैया का किस्सा अटक गया जबकि मुझे यह बताना था कि राधा के मायके जाने के बाद कन्हैया का मन भी भटक गया। वह दूकान में काम करता तो उसे हर समय राधा की याद आती, उसके बदन की मोहक खुशबू जैसे हर समय उसके आसपास मौजूद रहती। हँसता-मुस्कुराता कन्हैया गंभीर हो गया, मुस्कुराहट राधा की याद में खो गई। मेरे लिए यह बताना मुश्किल है कि वह शारीरिक आकर्षण था या मानसिक लेकिन कोई अज़ब मनस्थिति थी जिसको शब्दों में कैसे बताया जा सकता है ?
शादी हो जाने के बाद जब कन्हैया 'ड्यूटी' पर आया तो उसके सहपाठी ने पूछा- 'हो गया तेरा ब्याह?'
'हो गया।' कन्हैया ने शर्माते हुए बताया।
'शर्मा क्यों रहा है?'
'हें हें हें...'
'कैसी है भाभी?'
'सुंदर है।'
'बात किया उससे?'
'ऐसे ही, थोड़ा सा।'
'अच्छा। ये बता, आज सुबह तू नहाया नहीं क्या?
'कैसे मालूम पड़ा?'
'तेरे मुंह और हाथ पैर में हल्दी का रंग चढ़ा हुआ है। अरे, तूने पैर की उँगलियों में महावर भी लगवाया था?'
'मैं बहुत मना किया था लेकिन नाउन मानी नहीं, जबरन लगा दिया उसने।'
'उसको डांटना था।'
'जब ब्याह होता है तो दूल्हे की नहीं चलती। जो औरतों के मन आता है, वो कर लेती हैं।'
'चल कोई बात नहीं, पर मुझको मिठाई नहीं खिलाया।'
'तुम्हारी मिठाई की दूकान है, जितना चाहो खा लो।'
'ठीक है लेकिन तेरे ब्याह की मिठाई का स्वाद अलग होगा।'
'गरीबों के यहाँ मिठाई नहीं बनती, बताशे से काम चलाना पड़ता है। बताशे का क्या स्वाद? बस, मीठा-मीठा लगता है।'
'ससुराल में भी मिठाई नहीं मिली?'
'वो लोग भी गरीब हैं।'
'अरे!'
'हाँ।'
'तो तू खुश है न?'
'कल तक खुश था, आज नहीं।'
'क्यों?'
'राधा कल अपने मायके वापस चली गई। अम्मा बोल रही थी कि दो साल बाद वापस आएगी।' कन्हैया का गला भर आया।
'फिर कैसा करेगा? तेरा उससे मिलने का मन नहीं हो रहा है?'
'जिस दिन मन होगा, चला जाऊंगा। अरपा नदी के उस पार चिंगराजपारा में उसका घर है, किसी दिन ज़रूर जाऊंगा।'
'तेरी अम्मा गुस्सा नहीं करेगी क्या?'
'उसको कैसे मालूम पड़ेगा?'
'ससुराल वालों ने बता दिया तो?'
'वो मैं बना लूँगा।' उसके चेहरे पर किसी भावी योजना का आत्मविश्वास झलक रहा था।
ब्याह के चौथे दिन कन्हैया अरपा नदी पार करके अचानक अपनी ससुराल जा पहुंचा। राधा घर के बाहर झाड़ू लगा रही थी। झाड़ू करते-करते उसे लगा, जैसे कोई खड़ा है। सिर उठाकर उसने देखा तो सामने कन्हैया खड़ा था, कृष्ण-कन्हैया की मुद्रा में। राधा का जी धक से हो गया, दिल की धड़कन रुक सी गई और फिर धक-धक चलने लगी। झाड़ू को एक किनारे फेंक कर दौड़ती हुई वह कन्हैया के पास आई, उसका हाथ पकड़ा और घर के अंदर ले गई। बोरा बिछाकर उस पर कन्हैया को बैठाया और पूछा- 'तुम कैसे हो?'
'ठीक हूँ।' कन्हैया की आवाज़ में धीमापन था।
'आज काम पर नहीं गए?'
'गया था, अभी छुट्टी लेकर तुमसे मिलने आया?'
'मुझे भी तुम्हारी याद आ रही थी।'
'सच में।'
'हूँ। मैं सोच रही थी कि न जाने तुम कब मिलोगे। अच्छा हुआ, आ गए।'
'दाई (माँ) कहाँ है?'
'वह काम करने गई है।'
'और बाबू (पिता)?'
'वह गाय चराने गया है।'
'ठीक है, अब मैं जाता हूँ, मुझे देर हो रही है।'
'थोड़ी देर और बैठो, पानी पी लो। बासी (भात) खाओगे क्या?'
'खा लूँगा।' कन्हैया बोला। राधा चूल्हे के पास गई, मिट्टी के बर्तन में बासी भात और नमक ले कर आई और बोली- 'ले खा ले।'
कन्हैया भात खा रहा था और खाते-खाते राधा को लगातार देखते जा रहा था। राधा ने जब उसे घूरते देखा तो पूछी- 'ऐसा क्यों देख रहे हो?'
'तुमको देखना अच्छा लगता है।'
'हट।'
'सच।'
'तू कितना अच्छा है।'
'तू भी।' कन्हैया ने कहा। इतनी देर में बासी खत्म हो गया। वह उठ खड़ा हुआ और बोला- 'अब मैं चलता हूँ, फिर आऊँगा।'
'ठीक है, आना पर अब खाली हाथ नहीं आना।' राधा बोली।
'क्या लाना है?'
'मेरे लिए हरे और लाल रंग की चूड़ियाँ लाना, मुझे बहुत अच्छी लगती है।'
'ज़रूर लाऊँगा लेकिन मुझे तुम्हारी कलाई का नाप नहीं मालूम!' कन्हैया ने सवाल किया तो राधा ने अपनी कलाई आगे बढ़ाई और कहा- 'लो, नाप लो।'
कन्हैया ने उसे अपने अंगूठे और उँगलियों से नापा, एक- दूसरे के स्पर्श से दोनों कंपकपा गए।
दोनों का मिलना-जुलना चुपके-चुपके चलता रहा। कन्हैया और राधा बड़े होते रहे लेकिन ब्याह का वह मतलब नहीं जानते थे जिसे वयस्क जान जाते हैं। कन्हैया दूकान के काम में बहकने लगा। बताए गये काम को भूलने लगा और कभी-कभी काम करते-करते खो सा जाता था। एक दिन उसके सहपाठी ने उससे पूछा- 'भौजाई कैसी है? मिला था क्या उससे?'
'हाँ, मिलते रहता हूँ।' कन्हैया ने उत्तर दिया।
'जब मिलता है तो क्या करता है?'
'खूब बातें करता हूँ। तुमको क्या बताऊँ, वह बहुत मीठा बोलती है, गुड़ जैसी मिठास है उसकी बोली में।'
'तेरी माँ को मालूम है, तू उससे मिलता है?'
'अभी तक किसी को मालूम नहीं है, न मेरे घर में, न उसके घर में।'
'किसी दिन पकड़ा गया तो?'
'तो क्या होगा? वह मेरी ब्याहता है।'
'पर तुझे दो साल तक मिलना-जुलना मना है न?'
'क्यों मना है? तुमको कुछ मालूम है क्या?'
'मुझे क्या मालूम?'
'फिर?'
'लेकिन कोई तो बात है। मेरे बड़े भाई का ब्याह हुआ है, भाभी हमारे घर में रहती है। उनको कोई मनाही नहीं है।'
'सच में?'
'हाँ।'
'तो मुझे क्यों नहीं मिलने देते?'
'तू अभी बच्चा है, शायद इसलिए।'
'मैं बड़ा कब होऊंगा?'
'जिस दिन भौजाई तेरे घर में आ जाएगी, समझ लेना कि तू बड़ा हो गया है।'
'फिर बहुत मज़ा आएगा।'
'अच्छा ये बता कि तेरे घर में तेरे लिए कोई अलग से कमरा है?'
'झोपड़ी में कमरा होता है क्या? एक तरफ चूल्हा है जिसमें माँ खाना बनाती है और उसके बगल में सामान रखती है। रात को जमीन पर चादर बिछा कर हम सो जाते हैं।'
'अरे, फिर कैसा होगा?'
'कैसा होगा?'
'मेरे बड़े भैया अलग कमरे में भाभी के साथ सोते हैं।'
'अलग कमरे में क्यों सोते हैं?'
'मुझे क्या पता? पर कोई बात ज़रूर है।' सहपाठी ने कहा। कन्हैया भी सोच में पड़ गया। उसे याद आया कि जब भी वह राधा को छूता है तो उसे सिहरन सी होती है, इस बात का कोई न कोई संबंध अलग कमरे से जरूर है।
किशोरावस्था जिज्ञासु वय है। वह भावी जीवन के प्रत्येक व्यावहारिक पहलू को समझना चाहता है। कुछ समझ में आता है तो कुछ समझ में नहीं आता और कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जिन्हें समझने के लिए उसे उचित समय की प्रतीक्षा करनी होती है। विपरीतलिंगी संबंध मनुष्य के जन्म से बनने शुरू हो जाते हैं जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ विभिन्न रिश्तों में विकसित होते हैं, जैसे माँ-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी। लंबे समय तक साथ रहने और चलने वाले रिश्तों को सावधानी से चलने वाले लोग जीवन भर निभा ले जाते हैं। मनुष्य जीवन का एक आश्चर्य यह भी है कि जीवन भर साथ निभाने वाले भी एक-दूसरे को ठीक से समझ नहीं पाते, बहुत कुछ अबूझा रह जाता है, खास तौर से पति-पत्नी का रिश्ता। यह रिश्ता शरीर से होते हुए मन और मन से होते हुए आत्मा से जुड़ता है। इस जुड़ाव के लिए दोनों का शरीर किसी पुल की तरह काम करता है जो दो छोरों को मिलाता है और मन से आत्मा तक की यात्रा सम्पन्न करवाता है।
हाँ, तो मैं आपको कन्हैया और राधा के विरह की बातें बता रहा था। हुआ यह कि एक दिन कन्हैया सपड़ा गया। उसकी सास अचानक आ पहुंची। कन्हैया को देखकर वह नाराज़ नहीं हुई बल्कि खुशी से उसको अपने गले से लगा लिया। बोली- 'कब आए?'
'थोड़ी देर हुई।' कन्हैया सहमते हुए बोला।
'तुम्हारी माँ कैसी है?'
'अच्छी है।'
'और भाई-बहन?'
'ठीक हैं लेकिन छोटे भाई का हाल बुरा है।'
'क्या हुआ?'
'ठीक से स्कूल नहीं जाता। बाहर दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा खेलते रहता है। दाई उसको कुछ नहीं बोलती लेकिन मैं उसको समझता हूँ कि 'पढ़-लिख ले रे, नहीं तो मेरे जैसा जूठा उठाने का काम करेगा' पर वह मानता नहीं है।'
'किस क्लास में पढ़ता है?'
'तीसरी कक्षा में।'
'अभी बच्चा है, बड़ा होगा तो समझ जाएगा लेकिन पढ़ेगा तो कमाएगा कब?'
'जब उसकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तब बढ़िया नौकरी करेगा, कहीं सरकारी विभाग में चपरासी बन जाएगा।'
'घर का खर्चा कैसे चलेगा, तू तो अकेला है कमाने वाला।'
'माँ भी तो कमाती है।'
'पर जब राधा तेरे घर जाएगी तो कैसा करोगे?'
'राधा कब घर जाएगी?'
'अभी देर है।'
'उसको जल्दी भेजो, मुझे उसके साथ खेलना है।' कन्हैया ने कहा। उसकी सास को हंसी आ गई और बोली- 'ठीक है मैं तेरी माँ से बात करती हूँ।'
कन्हैया को उम्मीद थी कि राधा की माँ उसकी माँ से बात करेगी लेकिन कई माह बीत गए, गाड़ी आगे न बढ़ी. उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी लेकिन किसी से कहने की हिम्मत न हो. एक दिन वह नहा-धोकर काम पर जाने के लिए घर से निकल रहा था कि माँ ने उसे आवाज़ दी- 'सुन कन्हैया.'
'क्या है?'
'मैं अकेले इतने बच्चों की देखरेख नहीं कर पाती, मजदूरी के लिए भी घर छोड़कर जाना पड़ता है. सोचती हूँ कि राधा को ले आऊँ तो मदद हो जाएगी.'
'अभी तो एक साल की देरी है न?' कन्हैया ने नखरा बताया.
'है तो लेकिन आज मैं राधा के घर जाकर बात करूंगी और वे लोग राजी हो गए तो विदा करवा कर ले आउंगी.'
'वो लोग राजी हैं.'
'तुझको कैसे मालूम?'
'राधा की माँ से मेरी बात हुई थी.'
'तू वहां गया था?'
'हाँ, गया था.'
'मुझसे बिना पूछे, बिना बताये?'
'तो क्या हुआ?' कन्हैया ने तैश में कहा. कन्हैया की माँ गुस्से में कन्हैया की ओर बढ़ी और उसके गाल में एक तमाचा जड़ा. कन्हैया सकपका गया. असावधानीवश उसके मुंह से वह निकल गया जो उसे छुपा कर रखना था. वह सर झुका कर खड़ा रह गया. माँ ने पूछा- 'कब गया था?' कन्हैया चुप. इसके बाद माँ ने ताबड़तोड़ कई सवाल पूछे लेकिन कन्हैया ने एकदम चुप्पी साध ली और चुपचाप घर से बाहर हो गया और काम के लिए दूकान की ओर निकल पड़ा. रास्ते भर उसे अपनी गलती पर अफ़सोस होता रहा और उसे समझ आ गया कि राधा का घर आना अब मुश्किल है.
पूरा दिन वह उदास रहा, किसी प्रकार दिन कटा, रात आई. छुट्टी मिलने पर वह डरते हुए घर में घुसा तो उसने देखा कि माँ और राधा चूल्हे के पास बैठी हुई खाना पका रही है. माँ मुस्कुरा रही है और राधा भाप उगलते भात को पसा रही है.
(५)
कन्हैया अब सत्तर वर्ष का हो गया है. बाल-बच्चेदार हो गया है. नाना-दादा भी बन गया है लेकिन उसकी मेहनत और मुस्कराहट अब भी कायम है. यदि आप कन्हैया से मिलना चाहें तो वह आपको बिलासपुर की भारत माता स्कूल के सामने मिल जाएगा, वह वहां स्कूली बच्चों के लिए 'खाई-खजाना' बेचता हुआ मिल जाएगा.
एक निवेदन है आपसे कि इस कहानी के बारे में कन्हैया को मत बताइएगा अन्यथा वह मुझ पर नाराज़ हो जाएगा और मुझे उलाहना देगा कि उसकी 'प्राइवेट' बातें मैंने क्यों 'पब्लिक' कर दी.
अब तो आप समझ गये होंगे कि उसका सहपाठी मैं ही हूँ....
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किस्सा मोहल्ला गोंडपारा का
(१)
बिलासपुर का गोंडपारा किसी ज़माने में गोंड लोगों की बस्ती रहा होगा, अब गोंड प्रजाति का यहाँ कोई नहीं रहता बल्कि जो लोग रहते हैं, वे सब किसी न किसी कोण से विलक्षण हैं। जो इस मोहल्ले मे पैदा हुए, वे इस भूमि में जन्म लेने मात्र से अज़ब-अनोखे बन जाते हैं। यदि किसी का जन्म यहाँ न हो पाया हो लेकिन वह कहीं से आकर गोंडपारा में बस गया हो तो भी उस भूमि के प्रभाव से परमज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसी मोहल्ले में लल्लू काका रहते हैं जो गालियों के चलते-फिरते शब्दकोश हैं और साँप पकड़ने के विशेषज्ञ भी। शहर का नामी जेबकतरा और आतंक के पर्याय तीन 'दादा' इसी क्षेत्र की पैदाइश हैं। इस मोहल्ले के पुरुष सींकिया होते हुए भी सीना तान कर चलने की आदी हैं क्योंकि ताकत बदन में हो न हो, गुस्सा दिमाग पर हर समय हावी रहता है। कौन कब क्या कर जाए, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कहते हैं कि पानी का असर है।
सन 1960 के आसपास के काल में मोहल्ला गोंडपारा में दो भाई थे, गुलब्बा और मंगल, दोनों का पहलवानी शरीर था और दोनों दिमाग से पैदल। कब किसी को थुर दें, कब किसको संसार के पार भेज दें, ये सब उनके लिए मामूली काम था। पूरा शहर उनसे काँपता था, उनको अपनी ओर आता देख लोग इधर-उधर हो जाते थे। लोगों को पुलिस से उतना डर न था जितना इन बाहुबलियों से था। उन्हीं दिनों सिटी कोतवाली में एक नया दरोगा आया, वाखड़े। जब कोई नया दारोगा आता है तो वह 'एरिया' के गुंडे-उचक्कों की पता-साजी करता है, नशा करने व बेचने वालों का सर्वेक्षण करता है, जुए के फड़ को चिन्हांकित करता है, सत्तासीन दल के नेताओं का पता लगाता है, उसके बाद अपनी मजबूती और ज़रूरत से उनका गुणा-भाग करके थाने की कुर्सी में बैठता है। यहाँ जिस दरोगा का ज़िक्र हो रहा है, वह बड़ी-बड़ी मूछों वाला, देखने में दुबला-पतला लेकिन मजबूत कलेजे वाला पुलिस अफसर था। ये तो जगजाहिर है कि अपराधियों और पुलिसबल की संख्या में घनघोर अंतर रहता है। शहर के सीधे-सादे लोग तो पुलिस की वर्दी देखकर ही भय खाते हैं लेकिन बदमाश तो पुलिस से अधिक बदमाश होते हैं इसलिए उनको साधने के लिए दरोगा को अपना रौद्र रूप दिखाना पड़ता है, उसी तरह, जिस तरह फिल्म 'जंजीर' में नायक अमिताभ बच्चन ने खलनायक प्राण को दिखाया था। याद है आपको यह डायलाग ? 'जब तक बैठने को न कहा जाये शराफत से खड़े रहो ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं।"
बिलासपुर के गोलबाजार और सदरबाजार के बीच में एक सड़क दो दिशाओं में मुड़ती है, एक गोंडपारा जिसे राघवेंद्रनगर और दूसरी मारवाड़ी लाइन खपरगंज जिसे लाजपतरायनगर नाम दिया गया। मोहल्ला मारवाड़ी लाइन खपरगंज में खपरैल से आच्छादित एक स्कूल था, प्राथमिक शाला जिसमें हिन्दी और उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती थी। नज़दीक में देवकीनन्दन पुत्री शाला थी। इन स्कूलों के पास बस्ती के दो सर्वाधिक प्रतिष्ठित परिवार रहते थे, एक- गुरुमुखराय बख्शीराम जाजोदिया और दूसरी तरफ- बच्छराज अमोलकचंद बजाज। इनकी हवेलियाँ और उनमें रहने वाले लोग बिलासपुर की शान थे। इन दो परिवारों की बसाहट के कारण मुसलमानों की बहुतायत वाला मोहल्ला खपरगंज, मारवाड़ी लाइन कहा जाने लग गया।
मारवाड़ी लाइन में घुसने के पहले कोने में एक छोटी सी दूकान थी, जहां बिकने के लिए कुछ नहीं दिखता था लेकिन एक विचित्र बुद्धिशाली व्यक्ति अपनी अक्ल बेचता था, नाम था बिसेसरलाल शर्मा। सुर्ख श्याम रंग वाले इस प्रौढ़ व्यक्ति के पास गज़ब की जुगाड़ू बुद्धि थी। झक्क सफ़ेद चुन्नट वाला कुर्ता और धोती धारण करने वाले इस इंसान के चक्कर में जो फंस गया, समझ लीजिए, वह निपट गया। इस वाक्पटु चतुर इंसान ने अपनी प्रतिभा को यदि सही दिशा दी होती तो वे किसी ऐसे मक़ाम पर होते जिनकी बातें बताने में लेखक को संकोच न होता।
ऐसी ही एक विलक्षण प्रतिभा गोलबाजार के पीछे हरदेवलाल मंदिर के पास विराजित हुआ करती थी कोटेश्वरप्रसाद दुबे, जिन्हें लोग राजाबाबू वकील के नाम से जानते थे। उनका हिन्दी और अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार था। वाणी ओजपूर्ण, जबर्दस्त याददास्त, कानून और रामचरित मानस के मर्मज्ञ राजाबाबू 'स्पाइल्ड जीनियस' थे। वे हिन्दी के स्वनामधन्य कवि भवानी प्रसाद मिश्र के दामाद और प्रसिद्ध नाट्यकर्मी सत्यदेव दुबे के बड़े भाई थे। अभिमानी स्वभाव और व्यसनों के प्रभाव से एक अद्भुत प्रतिभा बिलासपुर की स्मृतियों में निरर्थक विलीन हो गई। उनके छोटे भाई सत्यदेव दुबे प्रतिभा में उनसे आगे थे, कुछ समय तक बिलासपुर के एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने के पश्चात वे बंबई चले गए जहां उन्होंने भारतवर्ष की नाटक संस्कृति को समृद्ध किया और स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया, फिल्में बनाई, फिल्मों में अभिनय किया, संवाद लिखे और अनेक नामी कलाकारों को अभिनय का प्रशिक्षण भी दिया।
(२)
बिलासपुर में सन 1936 में जन्मे छोटी कद-काठी के घुँघराले बालों वाले सत्यदेव दुबे को गोंडपारा से गोलबाजार की सड़कों पर खाकी हाफ़पेंट में खुसी हुई सफ़ेद कमीज पहने पैदल घूमते देखकर कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता था कि इस इंसान की खोपड़ी में क्या भरा हुआ है ! इतनी बड़ी बस्ती में केवल दो लोग उनसे बात करते थे, पालेश्वर शर्मा और अशोक राव, शेष लोग न उनसे बात कर पाते, न वे किसी से बात करते। सत्यदेव दुबे अद्भुत पढ़ाका थे, वे पुस्तकों के शब्दों के पीछे की भाषा समझने वाले अपूर्व पाठक थे।
बिलासपुर की गलियों में घूमते-फिरते वे बंबई चले गए, बस्ती के लोगों ने समझा- 'एक्टर बनने गया है।' सत्यदेव दुबे ने बंबई में न केवल स्वयं को स्थापित किया वरन बिलासपुर का नाम भी फिल्म और नाटक की दुनिया में प्रकाशित कर दिया।
प्रसिद्ध अभिनेता (स्व॰) अमरीशपुरी अपनी आत्मकथा 'जीवन का रंगमंच' में सत्यदेव दुबे को इस तरह याद करते हैं : '(सत्यदेव) दुबे साहब ने मुझे शिल्प सिखाया। वे अद्भुत शिल्पी हैं। रंगमंच पर उनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नवीनता एवं गहराई इतनी विविधता लिए हुए होती है कि मैं शब्दों में इसे व्यक्त नहीं कर सकता। समय बीतने के साथ-साथ उनका विकास होता रहा, किसी भी बिन्दु पर ह्रास की स्थिति नहीं आई। वे अभी भी नाटक लिख रहे हैं जो मेरे मतानुसार श्रेष्ठ नाटकों में से है और जब रंगमंच पर अभिनय की बात आती है तो जिस प्रकार की रचना और पुनर्रचना वे करते हैं और जिस प्रकार के अर्थ वे नाटकों को प्रदान करते हैं, वह उल्लेखनीय है और मैं अपने कलाकार होने का समस्त श्रेय भी उन्हीं को देता हूँ। केवल वही मुझसे मंच पर उत्तम कार्य करवा पाए।'
अमरीशपुरी ने लिखा है- 'दुबे साहब की आश्चर्यजनक प्रतिभा ही केवल उनकी सर्वोत्तम विशेषता नहीं है अपितु उनमें दूसरों में भी इस प्रतिभा का संचार कर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त करने की अनुपम योग्यता भी है। वे चिंगारी को सुलगाना जानते हैं और उन्होंने अपने विचारों से अनेक लेखकों को बेहतर लेखक, निर्देशकों को बेहतर निर्देशक और अनेक कलाकारों को बेहतर कलाकार बनाया है। उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि दूसरे की ग्रहण प्रतिभा कितनी है। मुझे लगता है कि यदि दुबे साहब ने मुझे न देखा और न धमकाया होता तो मैं अपनी उत्तम प्रस्तुतियाँ दिए बिना ही जीवन व्यतीत कर इस संसार से चला गया होता। अप्रशिक्षित प्रतिभा जंगल के उन सुंदर और शानदार फूलों के समान होती है जो किसी के द्वारा बिना देखे, सूंघे और प्रशंसा के सूख जाते हैं। हमारे चारों ओर कितनी प्रतिभा बिखरी हुई है और हम उसके अस्तित्व को जानते तक नहीं। दुबे साहब शायद एकमात्र ऐसे अध्यापक हैं जिन्होंने सर्वाधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया है। पूरी तरह से अनगढ़, नई प्रतिभाओं को लिया एवं थियेटर गतिविधियों पर अनगिनत कक्षाओं, कार्यशालाओं, शिविरों और सम्मेलनों का आयोजन किया।'
पद्मविभूषण से सम्मानित सत्यदेव दुबे ने धर्मवीर भारती के नाटक 'अंधा युग', गिरीश कर्नाड के नाटक 'ययाति' और 'हयवदन', बादल सरकार के 'एवं इंद्रजीत' और 'पगला घोड़ा', मोहन राकेश के 'आधे अधूरे' एवं विजय तेंदुलकर के 'खामोश अदालत जारी है' और 'सखाराम बाइंडर' जैसे नाटकों ने सत्यदेव दुबे को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने हिन्दी और मराठी में एक फिल्म- 'शांतता कोर्ट चालू आहे' और एक लघु फिल्म बनाई- 'अपरिचय का विंध्याचल'। सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की टीवी सीरियल 'भारत एक खोज' में चाणक्य और फिल्म 'निशांत' में पुजारी की भूमिका निभाई। उनका निधन 25 दिसम्बर 2011 को मुंबई में हुआ। वे बिलासपुर के भाल पर चन्दन का टीका थे।
(३)
इसी मोहल्ले से सटा हुआ है गोलबाजार। ऐसा माना जा सकता है कि गोलबाजार, गोंडपारा वालों का 'माल' है। पूरे दिन आना-जाना अनवरत चलते रहता है जैसे एक दूसरे के बिना जीना संभव न हो। आम आदमी को दिन भर में कई बार गोलबाजार आना पड़ता है जैसे, सुबह पांडे महाराज के यहाँ नास्ता करने, दिन में 'पेंड्रावाला' की पूड़ी-सब्जी खाने, शाम होने के पहले 'मौसा जी' का समोसा खाने, शाम के कुछ बाद होरीलाल की चाट खाने आदि। यह जानना बेहद मुश्किल है कि वे लोग घर में क्या और कब खाते होंगे !
सन 1935 के आसपास की बात है, उत्तरप्रदेश के मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आजीविका की तलाश में बिलासपुर आ गए। गोलबाजार में 'कल्लामल बृजलाल' के बृजलाल उनके साढ़ू थे जिनका मिठाई बेचने का व्यापार था। बृजलाल के पुत्र चिरौंजीलाल को मौसाजी कहते थे इसलिए चिरौंजीलाल 'मौसाजी' के नाम से पुकारे जाने लगे। वे चाट बनाने के विशेषज्ञ थे। शाम के वक्त सड़क के एक किनारे में अपना खोमचा जमाते थे और रात को नौ बजे तक अपना माल बेचकर गोंडपारा में स्थित दर्जी मंदिर के बगल वाले अपने घर चले जाते।
चिरौंजीलाल के चार लड़के थे, छेदीलाल, दशरथलाल, मूलचंद और लक्ष्मीप्रसाद। छेदीलाल जब बड़े हुए तो उन्होंने 'इंद्रपुरी' और दशरथलाल ने गोलबाजार के अंदर 'मौसा जी मथुरा वाले' नामक हलवाई की दूकानें शुरू की। इन दूकानों के खुलने के बाद चिरौंजीलाल ने चाट की दूकान लगाना बंद कर दिया और 'रिटायरमेंट' ले लिया। शहर में 'इंद्रपुरी' की लस्सी और 'मौसा जी मथुरा वाले' का दही-खटाई वाला समोसा बेहद लोकप्रिय था। 'मौसा जी मथुरा वाले' में मूलचंद अपने बड़े भाई के साथ दूकान में बैठते थे और कारखाने मे मिठाई-नमकीन बनाने का काम सीखते थे। मूलचंद ने म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ाई भी की थी लेकिन आठवीं कक्षा में उनके मास्टर ने उनकी ऐसी पिटाई की कि उनका स्कूल जाने से जी उचट गया और वे अपनी दूकान में ही व्यस्त हो गए। इस बीच गोलबाजार की एक दूकान श्यामलाल ने बेची जिसे मूलचंद के लिए खरीद लिया गया और वहाँ 'नीलकमल' नामक आधुनिक शैली की हलवाई-दूकान खुली।
मूलचंद खंडेलवाल साहसी और दूरदर्शी युवक थे। उन पर हर समय कुछ नया करने का जुनून हावी रहता था। उनकी बातचीत के लहज़े में बनारस का असर था, कहने का मतलब यह है कि उनका कोई भी वाक्य अपशब्दों के बिना पूरा नहीं होता था। माँ-बहन वाली गाली का उच्चारण वे शास्त्रीय संगीत की शैली में करते थे, अर्थात आरंभ के तीन शब्द 'द्रुत' में और शेष दो शब्द 'विलंबित' में।
मूलचंद का झुकाव भारतीय जनसंघ की ओर था। एक बार वे बाज़ार वार्ड से जनसंघ की टिकट पर चुनाव लड़े और अपने पड़ोसी हलवाई 'कोहिनूर' वाले नत्थूलाल केशरवानी को परास्त करके नगरपालिका के सदस्य बने। यहीं से उन्हें राजनीति का चस्का लग गया और वे 'नीलकमल' को कम और राजनीति को अधिक समय देने लगे। नीलकमल राजनीतिक चर्चा का अड्डा बन गया और जनसंघ के बड़े नेताओं से उनकी जान-पहचान विकसित होती गई। अटलबिहारी बाजपेयी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे राष्ट्रीय और राज्य स्तर की हस्तियाँ मूलचंद के आदर्श कालोनी स्थित घर में मेहमान हुआ करते थे। मूलचंद और उनकी पत्नी देवकी उन सबका स्वागत-सत्कार अत्यंत आत्मीयता से करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनता पार्टी के पदाधिकारियों को नीलकमल में रसमलाई, दही-खटाई वाली आलू भजिया और चाय निःशुल्क उपलब्ध थी।
मूलचंद अत्यंत सावधानी से अपने 'होने' को स्थापित कर रहे थे, परिणामस्वरूप उन्हें सन 1985 के मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए बिलासपुर शहर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी बनने का अवसर मिल गया। मूलचंद चुनाव हार गए लेकिन इसी पराजय से उनकी विजय पताका को हवा मिलने लगी।
यद्यपि मूलचंद एक बड़ी राजनीतिक गफलत कर चुके थे, आपातकाल के दौरान जब मूलचंद को मालूम हुआ कि जेलयात्रा का उनका भी मुहूर्त निकल चुका है तो वे सफ़ेद टोपी पहनकर गाजे-बाजे के साथ कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। यह समझना बेहद कठिन है कि वह कौन सा चमत्कार रहा होगा कि उस भयंकर भूल के बावजूद उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया। यह सच है कि जेल की सजा भुगत कर आए अन्य नेता उनसे बहुत खखुवाए हुए थे। मूलचंद चुनाव हार गए तो भन्नाए हुए 'मीसाबंदी' मूलचंद के चयन पर उंगली उठाने लगे और मूलचंद अपने बचाव की कोई नई तरकीब खोजने में लग गए।
आम तौर पर चुनाव जीतने के बाद नेतागण अपने चुनाव क्षेत्र को भूल जाते हैं। केवल चुनाव लड़ने के समय 'डोर-टू-डोर' जाते है और जीतने या हारने के बाद उन्हें मतदाता के घर की 'लोकेशन' अगले चुनाव तक के लिए याद रखने की जरूरत नहीं रहती।
मूलचंद ने हारने के बाद मतदाताओं के घर जाने का निर्णय लिया और घर-घर जाकर धन्यवाद दिया। यह बात सबको प्रभावित कर गई और जिसने उन्हें वोट नहीं दिया था, उसे भी मूलचंद का हारना अखर गया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि वे शहर के लिए अवतार जैसे हो गए और गली-गली में उनके नाम का डंका बजने लगा। उनके आलोचकों की घिग्घी बंध गई। पाँच साल बीत गए, सन 1990 में पुनः विधानसभा चुनाव घोषित हुए और मूलचंद को फिर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया गया।
इस बार बिलासपुर का मतदाता मूलचंद को जिताने के लिए उतारू था और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर किला फतह किया। संयोग से उस चुनाव के पश्चात प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और मूलचंद को पहली बार विधायक बनने के बावजूद बी॰आर॰यादव जैसे दिग्गज को हराने के पुरस्कार स्वरूप मंत्रिमंडल में जगह मिली, वह भी मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य का नागरिक आपूर्ति मंत्री !
क्या कोई कल्पना कर सकता था कि एक अल्पशिक्षित हलवाई अपने दृढ़संकल्प और दूरदृष्टि से ऐसी ऊंचाई तक पहुँचेगा ? मूलचंद खंडेलवाल बिलासपुर शहर की वह हस्ती बने जिसने यह साबित किया कि उसका 'बेकग्राउंड' कुछ भी हो, यदि मनुष्य में लगन हो और वह सही दिशा में प्रयत्न करे तो सब संभव है।
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बिलासपुर का गोंडपारा किसी ज़माने में गोंड लोगों की बस्ती रहा होगा, अब गोंड प्रजाति का यहाँ कोई नहीं रहता बल्कि जो लोग रहते हैं, वे सब किसी न किसी कोण से विलक्षण हैं। जो इस मोहल्ले मे पैदा हुए, वे इस भूमि में जन्म लेने मात्र से अज़ब-अनोखे बन जाते हैं। यदि किसी का जन्म यहाँ न हो पाया हो लेकिन वह कहीं से आकर गोंडपारा में बस गया हो तो भी उस भूमि के प्रभाव से परमज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसी मोहल्ले में लल्लू काका रहते हैं जो गालियों के चलते-फिरते शब्दकोश हैं और साँप पकड़ने के विशेषज्ञ भी। शहर का नामी जेबकतरा और आतंक के पर्याय तीन 'दादा' इसी क्षेत्र की पैदाइश हैं। इस मोहल्ले के पुरुष सींकिया होते हुए भी सीना तान कर चलने की आदी हैं क्योंकि ताकत बदन में हो न हो, गुस्सा दिमाग पर हर समय हावी रहता है। कौन कब क्या कर जाए, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कहते हैं कि पानी का असर है।
सन 1960 के आसपास के काल में मोहल्ला गोंडपारा में दो भाई थे, गुलब्बा और मंगल, दोनों का पहलवानी शरीर था और दोनों दिमाग से पैदल। कब किसी को थुर दें, कब किसको संसार के पार भेज दें, ये सब उनके लिए मामूली काम था। पूरा शहर उनसे काँपता था, उनको अपनी ओर आता देख लोग इधर-उधर हो जाते थे। लोगों को पुलिस से उतना डर न था जितना इन बाहुबलियों से था। उन्हीं दिनों सिटी कोतवाली में एक नया दरोगा आया, वाखड़े। जब कोई नया दारोगा आता है तो वह 'एरिया' के गुंडे-उचक्कों की पता-साजी करता है, नशा करने व बेचने वालों का सर्वेक्षण करता है, जुए के फड़ को चिन्हांकित करता है, सत्तासीन दल के नेताओं का पता लगाता है, उसके बाद अपनी मजबूती और ज़रूरत से उनका गुणा-भाग करके थाने की कुर्सी में बैठता है। यहाँ जिस दरोगा का ज़िक्र हो रहा है, वह बड़ी-बड़ी मूछों वाला, देखने में दुबला-पतला लेकिन मजबूत कलेजे वाला पुलिस अफसर था। ये तो जगजाहिर है कि अपराधियों और पुलिसबल की संख्या में घनघोर अंतर रहता है। शहर के सीधे-सादे लोग तो पुलिस की वर्दी देखकर ही भय खाते हैं लेकिन बदमाश तो पुलिस से अधिक बदमाश होते हैं इसलिए उनको साधने के लिए दरोगा को अपना रौद्र रूप दिखाना पड़ता है, उसी तरह, जिस तरह फिल्म 'जंजीर' में नायक अमिताभ बच्चन ने खलनायक प्राण को दिखाया था। याद है आपको यह डायलाग ? 'जब तक बैठने को न कहा जाये शराफत से खड़े रहो ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं।"
तो हुआ ये, कि वाखड़े दरोगा ने एक दिन गस्त के दौरान अरपा नदी के पुल के ऊपर बनी मुंडेर पर दो लोगों को जुआ खेलते देखा। चांदनी रात थी, दरोगा ने करीब पहुँचने पर देखा कि मंगल एक अन्य आदमी के साथ ताश-पत्ती खेल रहा था, चिल्हर पैसा दांव में लगा हुआ था। वाखड़े बहुत दिनों से मंगल को धरने की तलाश में थे।उन्हें अपना वर्चस्व स्थापित करने का सुअवसर मिल गया। दरोगा ने पुलिस-भाषा में दोनों को ललकारा, दोनों मुंडेरी से नीचे कूदे, दोनों ने मिलकर दरोगा साहब को अपने हाथों से उठाया और सूखी नदी में फेंक दिया। वाखड़े दरोगा तीस-पैंतीस फुट नीचे गिरे, 'मल्टीपल फ्रेक्चर' हो गया।
बिलासपुर जैसी छोटी बस्ती में उनका इलाज नहीं हो सकता था क्योंकि उन दिनों हमारे यहाँ एक जिला अस्पताल था और दूसरा मिशन अस्पताल था। अस्पताल के डाक्टर कंपाउंडर जैसे थे और कंपाउंडर डाक्टर माने जाते थे। अस्पतालों में 'स्पेशलिस्ट' नामक व्यक्ति के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था, उनके अवतरित होने में देर थी इसलिए इलाज़ के लिए दरोगाजी नागपुर भेजे गए। वहाँ छः महीने तक अस्पताल में बिस्तर पर पड़े अपनी हड्डियाँ जुड़वाते रहे और मन ही मन मंगल के परिवारजनों को अपने ढंग से याद करते रहे।
ऐसा न समझें कि सब गुंडे-मवाली हैं। देश भर में अपनी आभा बिखेरने वाले ई॰ राघवेंद्र राव, जो ब्रिटिश काल में मध्यप्रांत के गवर्नर थे, इसी मोहल्ले में रहते थे। देश-विदेश में प्रख्यात नाट्यकर्मी सत्यदेव दुबे इसी भूमि की देन हैं। इसी मोहल्ले के डा॰ श्रीधर मिश्र, अशोक राव और मूलचंद खंडेलवाल अविभाजित मध्यप्रदेश के मंत्री पद पर आसीन रहे हैं।बिलासपुर के गोलबाजार और सदरबाजार के बीच में एक सड़क दो दिशाओं में मुड़ती है, एक गोंडपारा जिसे राघवेंद्रनगर और दूसरी मारवाड़ी लाइन खपरगंज जिसे लाजपतरायनगर नाम दिया गया। मोहल्ला मारवाड़ी लाइन खपरगंज में खपरैल से आच्छादित एक स्कूल था, प्राथमिक शाला जिसमें हिन्दी और उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती थी। नज़दीक में देवकीनन्दन पुत्री शाला थी। इन स्कूलों के पास बस्ती के दो सर्वाधिक प्रतिष्ठित परिवार रहते थे, एक- गुरुमुखराय बख्शीराम जाजोदिया और दूसरी तरफ- बच्छराज अमोलकचंद बजाज। इनकी हवेलियाँ और उनमें रहने वाले लोग बिलासपुर की शान थे। इन दो परिवारों की बसाहट के कारण मुसलमानों की बहुतायत वाला मोहल्ला खपरगंज, मारवाड़ी लाइन कहा जाने लग गया।
मारवाड़ी लाइन में घुसने के पहले कोने में एक छोटी सी दूकान थी, जहां बिकने के लिए कुछ नहीं दिखता था लेकिन एक विचित्र बुद्धिशाली व्यक्ति अपनी अक्ल बेचता था, नाम था बिसेसरलाल शर्मा। सुर्ख श्याम रंग वाले इस प्रौढ़ व्यक्ति के पास गज़ब की जुगाड़ू बुद्धि थी। झक्क सफ़ेद चुन्नट वाला कुर्ता और धोती धारण करने वाले इस इंसान के चक्कर में जो फंस गया, समझ लीजिए, वह निपट गया। इस वाक्पटु चतुर इंसान ने अपनी प्रतिभा को यदि सही दिशा दी होती तो वे किसी ऐसे मक़ाम पर होते जिनकी बातें बताने में लेखक को संकोच न होता।
ऐसी ही एक विलक्षण प्रतिभा गोलबाजार के पीछे हरदेवलाल मंदिर के पास विराजित हुआ करती थी कोटेश्वरप्रसाद दुबे, जिन्हें लोग राजाबाबू वकील के नाम से जानते थे। उनका हिन्दी और अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार था। वाणी ओजपूर्ण, जबर्दस्त याददास्त, कानून और रामचरित मानस के मर्मज्ञ राजाबाबू 'स्पाइल्ड जीनियस' थे। वे हिन्दी के स्वनामधन्य कवि भवानी प्रसाद मिश्र के दामाद और प्रसिद्ध नाट्यकर्मी सत्यदेव दुबे के बड़े भाई थे। अभिमानी स्वभाव और व्यसनों के प्रभाव से एक अद्भुत प्रतिभा बिलासपुर की स्मृतियों में निरर्थक विलीन हो गई। उनके छोटे भाई सत्यदेव दुबे प्रतिभा में उनसे आगे थे, कुछ समय तक बिलासपुर के एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने के पश्चात वे बंबई चले गए जहां उन्होंने भारतवर्ष की नाटक संस्कृति को समृद्ध किया और स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया, फिल्में बनाई, फिल्मों में अभिनय किया, संवाद लिखे और अनेक नामी कलाकारों को अभिनय का प्रशिक्षण भी दिया।
(२)
बिलासपुर में सन 1936 में जन्मे छोटी कद-काठी के घुँघराले बालों वाले सत्यदेव दुबे को गोंडपारा से गोलबाजार की सड़कों पर खाकी हाफ़पेंट में खुसी हुई सफ़ेद कमीज पहने पैदल घूमते देखकर कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता था कि इस इंसान की खोपड़ी में क्या भरा हुआ है ! इतनी बड़ी बस्ती में केवल दो लोग उनसे बात करते थे, पालेश्वर शर्मा और अशोक राव, शेष लोग न उनसे बात कर पाते, न वे किसी से बात करते। सत्यदेव दुबे अद्भुत पढ़ाका थे, वे पुस्तकों के शब्दों के पीछे की भाषा समझने वाले अपूर्व पाठक थे।
बिलासपुर की गलियों में घूमते-फिरते वे बंबई चले गए, बस्ती के लोगों ने समझा- 'एक्टर बनने गया है।' सत्यदेव दुबे ने बंबई में न केवल स्वयं को स्थापित किया वरन बिलासपुर का नाम भी फिल्म और नाटक की दुनिया में प्रकाशित कर दिया।
प्रसिद्ध अभिनेता (स्व॰) अमरीशपुरी अपनी आत्मकथा 'जीवन का रंगमंच' में सत्यदेव दुबे को इस तरह याद करते हैं : '(सत्यदेव) दुबे साहब ने मुझे शिल्प सिखाया। वे अद्भुत शिल्पी हैं। रंगमंच पर उनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नवीनता एवं गहराई इतनी विविधता लिए हुए होती है कि मैं शब्दों में इसे व्यक्त नहीं कर सकता। समय बीतने के साथ-साथ उनका विकास होता रहा, किसी भी बिन्दु पर ह्रास की स्थिति नहीं आई। वे अभी भी नाटक लिख रहे हैं जो मेरे मतानुसार श्रेष्ठ नाटकों में से है और जब रंगमंच पर अभिनय की बात आती है तो जिस प्रकार की रचना और पुनर्रचना वे करते हैं और जिस प्रकार के अर्थ वे नाटकों को प्रदान करते हैं, वह उल्लेखनीय है और मैं अपने कलाकार होने का समस्त श्रेय भी उन्हीं को देता हूँ। केवल वही मुझसे मंच पर उत्तम कार्य करवा पाए।'
अमरीशपुरी ने लिखा है- 'दुबे साहब की आश्चर्यजनक प्रतिभा ही केवल उनकी सर्वोत्तम विशेषता नहीं है अपितु उनमें दूसरों में भी इस प्रतिभा का संचार कर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त करने की अनुपम योग्यता भी है। वे चिंगारी को सुलगाना जानते हैं और उन्होंने अपने विचारों से अनेक लेखकों को बेहतर लेखक, निर्देशकों को बेहतर निर्देशक और अनेक कलाकारों को बेहतर कलाकार बनाया है। उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि दूसरे की ग्रहण प्रतिभा कितनी है। मुझे लगता है कि यदि दुबे साहब ने मुझे न देखा और न धमकाया होता तो मैं अपनी उत्तम प्रस्तुतियाँ दिए बिना ही जीवन व्यतीत कर इस संसार से चला गया होता। अप्रशिक्षित प्रतिभा जंगल के उन सुंदर और शानदार फूलों के समान होती है जो किसी के द्वारा बिना देखे, सूंघे और प्रशंसा के सूख जाते हैं। हमारे चारों ओर कितनी प्रतिभा बिखरी हुई है और हम उसके अस्तित्व को जानते तक नहीं। दुबे साहब शायद एकमात्र ऐसे अध्यापक हैं जिन्होंने सर्वाधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया है। पूरी तरह से अनगढ़, नई प्रतिभाओं को लिया एवं थियेटर गतिविधियों पर अनगिनत कक्षाओं, कार्यशालाओं, शिविरों और सम्मेलनों का आयोजन किया।'
पद्मविभूषण से सम्मानित सत्यदेव दुबे ने धर्मवीर भारती के नाटक 'अंधा युग', गिरीश कर्नाड के नाटक 'ययाति' और 'हयवदन', बादल सरकार के 'एवं इंद्रजीत' और 'पगला घोड़ा', मोहन राकेश के 'आधे अधूरे' एवं विजय तेंदुलकर के 'खामोश अदालत जारी है' और 'सखाराम बाइंडर' जैसे नाटकों ने सत्यदेव दुबे को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने हिन्दी और मराठी में एक फिल्म- 'शांतता कोर्ट चालू आहे' और एक लघु फिल्म बनाई- 'अपरिचय का विंध्याचल'। सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की टीवी सीरियल 'भारत एक खोज' में चाणक्य और फिल्म 'निशांत' में पुजारी की भूमिका निभाई। उनका निधन 25 दिसम्बर 2011 को मुंबई में हुआ। वे बिलासपुर के भाल पर चन्दन का टीका थे।
(३)
सन 1935 के आसपास की बात है, उत्तरप्रदेश के मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आजीविका की तलाश में बिलासपुर आ गए। गोलबाजार में 'कल्लामल बृजलाल' के बृजलाल उनके साढ़ू थे जिनका मिठाई बेचने का व्यापार था। बृजलाल के पुत्र चिरौंजीलाल को मौसाजी कहते थे इसलिए चिरौंजीलाल 'मौसाजी' के नाम से पुकारे जाने लगे। वे चाट बनाने के विशेषज्ञ थे। शाम के वक्त सड़क के एक किनारे में अपना खोमचा जमाते थे और रात को नौ बजे तक अपना माल बेचकर गोंडपारा में स्थित दर्जी मंदिर के बगल वाले अपने घर चले जाते।
चिरौंजीलाल के चार लड़के थे, छेदीलाल, दशरथलाल, मूलचंद और लक्ष्मीप्रसाद। छेदीलाल जब बड़े हुए तो उन्होंने 'इंद्रपुरी' और दशरथलाल ने गोलबाजार के अंदर 'मौसा जी मथुरा वाले' नामक हलवाई की दूकानें शुरू की। इन दूकानों के खुलने के बाद चिरौंजीलाल ने चाट की दूकान लगाना बंद कर दिया और 'रिटायरमेंट' ले लिया। शहर में 'इंद्रपुरी' की लस्सी और 'मौसा जी मथुरा वाले' का दही-खटाई वाला समोसा बेहद लोकप्रिय था। 'मौसा जी मथुरा वाले' में मूलचंद अपने बड़े भाई के साथ दूकान में बैठते थे और कारखाने मे मिठाई-नमकीन बनाने का काम सीखते थे। मूलचंद ने म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ाई भी की थी लेकिन आठवीं कक्षा में उनके मास्टर ने उनकी ऐसी पिटाई की कि उनका स्कूल जाने से जी उचट गया और वे अपनी दूकान में ही व्यस्त हो गए। इस बीच गोलबाजार की एक दूकान श्यामलाल ने बेची जिसे मूलचंद के लिए खरीद लिया गया और वहाँ 'नीलकमल' नामक आधुनिक शैली की हलवाई-दूकान खुली।
मूलचंद खंडेलवाल साहसी और दूरदर्शी युवक थे। उन पर हर समय कुछ नया करने का जुनून हावी रहता था। उनकी बातचीत के लहज़े में बनारस का असर था, कहने का मतलब यह है कि उनका कोई भी वाक्य अपशब्दों के बिना पूरा नहीं होता था। माँ-बहन वाली गाली का उच्चारण वे शास्त्रीय संगीत की शैली में करते थे, अर्थात आरंभ के तीन शब्द 'द्रुत' में और शेष दो शब्द 'विलंबित' में।
मूलचंद का झुकाव भारतीय जनसंघ की ओर था। एक बार वे बाज़ार वार्ड से जनसंघ की टिकट पर चुनाव लड़े और अपने पड़ोसी हलवाई 'कोहिनूर' वाले नत्थूलाल केशरवानी को परास्त करके नगरपालिका के सदस्य बने। यहीं से उन्हें राजनीति का चस्का लग गया और वे 'नीलकमल' को कम और राजनीति को अधिक समय देने लगे। नीलकमल राजनीतिक चर्चा का अड्डा बन गया और जनसंघ के बड़े नेताओं से उनकी जान-पहचान विकसित होती गई। अटलबिहारी बाजपेयी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे राष्ट्रीय और राज्य स्तर की हस्तियाँ मूलचंद के आदर्श कालोनी स्थित घर में मेहमान हुआ करते थे। मूलचंद और उनकी पत्नी देवकी उन सबका स्वागत-सत्कार अत्यंत आत्मीयता से करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनता पार्टी के पदाधिकारियों को नीलकमल में रसमलाई, दही-खटाई वाली आलू भजिया और चाय निःशुल्क उपलब्ध थी।
मूलचंद अत्यंत सावधानी से अपने 'होने' को स्थापित कर रहे थे, परिणामस्वरूप उन्हें सन 1985 के मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए बिलासपुर शहर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी बनने का अवसर मिल गया। मूलचंद चुनाव हार गए लेकिन इसी पराजय से उनकी विजय पताका को हवा मिलने लगी।
यद्यपि मूलचंद एक बड़ी राजनीतिक गफलत कर चुके थे, आपातकाल के दौरान जब मूलचंद को मालूम हुआ कि जेलयात्रा का उनका भी मुहूर्त निकल चुका है तो वे सफ़ेद टोपी पहनकर गाजे-बाजे के साथ कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। यह समझना बेहद कठिन है कि वह कौन सा चमत्कार रहा होगा कि उस भयंकर भूल के बावजूद उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया। यह सच है कि जेल की सजा भुगत कर आए अन्य नेता उनसे बहुत खखुवाए हुए थे। मूलचंद चुनाव हार गए तो भन्नाए हुए 'मीसाबंदी' मूलचंद के चयन पर उंगली उठाने लगे और मूलचंद अपने बचाव की कोई नई तरकीब खोजने में लग गए।
आम तौर पर चुनाव जीतने के बाद नेतागण अपने चुनाव क्षेत्र को भूल जाते हैं। केवल चुनाव लड़ने के समय 'डोर-टू-डोर' जाते है और जीतने या हारने के बाद उन्हें मतदाता के घर की 'लोकेशन' अगले चुनाव तक के लिए याद रखने की जरूरत नहीं रहती।
मूलचंद ने हारने के बाद मतदाताओं के घर जाने का निर्णय लिया और घर-घर जाकर धन्यवाद दिया। यह बात सबको प्रभावित कर गई और जिसने उन्हें वोट नहीं दिया था, उसे भी मूलचंद का हारना अखर गया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि वे शहर के लिए अवतार जैसे हो गए और गली-गली में उनके नाम का डंका बजने लगा। उनके आलोचकों की घिग्घी बंध गई। पाँच साल बीत गए, सन 1990 में पुनः विधानसभा चुनाव घोषित हुए और मूलचंद को फिर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया गया।
इस बार बिलासपुर का मतदाता मूलचंद को जिताने के लिए उतारू था और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर किला फतह किया। संयोग से उस चुनाव के पश्चात प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और मूलचंद को पहली बार विधायक बनने के बावजूद बी॰आर॰यादव जैसे दिग्गज को हराने के पुरस्कार स्वरूप मंत्रिमंडल में जगह मिली, वह भी मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य का नागरिक आपूर्ति मंत्री !
क्या कोई कल्पना कर सकता था कि एक अल्पशिक्षित हलवाई अपने दृढ़संकल्प और दूरदृष्टि से ऐसी ऊंचाई तक पहुँचेगा ? मूलचंद खंडेलवाल बिलासपुर शहर की वह हस्ती बने जिसने यह साबित किया कि उसका 'बेकग्राउंड' कुछ भी हो, यदि मनुष्य में लगन हो और वह सही दिशा में प्रयत्न करे तो सब संभव है।
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किस्सा टेटकूदास का : बिच्छू का दंश
(१)
बिलासपुर से दस कोस दूर एक गाँव है, जरौंधा। कम आबादी वाले इस गांव में गुजरबसर के लिए खेती-किसानी, बैलगाड़ी के चक्के बनाने वाले दो बढ़ई, एक लोहार, एक वैद्य, एक पंडित, एक नाई, चार चरवाहे, एक किरानी और इक्कीस परिवार थे। अधिकतर ग्रामवासी छत्तीसगढ़ी मूल के थे, कुछ-एक बाहरी भी, सभी जातियों के मिश्रण से बना यह गाँव आपसी प्रेमभाव की मिसाल था। हर घर एक-दूसरे का मददगार था। किसी ने किसी के लिए कुछ किया तो पैसे का लेन-देन नहीं होता था, अनाज का लेन-देन होता था।
इसी गाँव में मटकूदास रहता था, तालाब के किनारे उसने एक झोपड़ी बनाई थी, एक कमरे का घर जिसमें उसकी घरवाली और तीन बच्चे रहते थे। मटकूदास खेतों में मजदूरी करता था, उसकी घरवाली घर का काम करती, बड़ा लड़का टेटकू दास आवारागर्दी करता था और छोटी दोनों लड़कियां दिन भर रोने का काम करती थी। छत्तीसगढ़ में साल में एक फ़सल होती है, धान की, जिसमें मुश्किल से तीस दिन काम मिलता था। तीस दिन की मज़दूरी में पाँच आदमी का पेट भरना संभव न था इसलिए दिवाली के बाद मटकूदास पैसा कमाने कलकत्ता चला जाता। उसकी घरवाली रुक्मनी अपने पति की अनुपस्थिति का छः-सात महीने घरवास भुगतती और अपने बेटे टेटकूदास को डांट-डपट कर घर से भगाती और कुछ कमाकर लाने के लिए कहती। टेटकू गलत संगत में पड़ गया था। पीपल के पेड़ के नीचे अपने जुआरी दोस्तों के साथ बीड़ी पीते बैठा रहता और यदि दो-चार आना जीत जाता तो माँ के हाथ में रखकर बोलता- 'ले रख, कमा कर लाया हूँ।' कभी हार जाता तो दोस्तों का खेल बिगाड़कर हल्ला मचाता- 'तुम लोग बेईमान हो, मैं नहीं खेलता' और भाग खड़ा होता। उसकी बदमाशी की खबर मटकूदास को थी, वह टेटकू को लेकर बहुत फिक्रमंद था लेकिन करता क्या ? गाँव में कोई रोजगार भी न था।
एक दिन की बात है, बच्चे घर के बाहर थे, मटकूदास ने रुक्मनी से कहा- 'आठ दिन बाद कलकत्ता जाना है, कपड़ा-लत्ता की गठरी बना देना।'
'मत जाओ कलकत्ता, पास में बिलासपुर है, वहाँ जाकर कोई काम खोजो, मिल जाएगा। कलकता जाते हो तो वहीं के बन कर रह जाते हो।' रुक्मनी ने कहा।
'कलकत्ता में मज़दूरी ज्यादा मिलती है, बिलासपुर में उतना पैसा कौन देगा ?'
'कम देगा और क्या ? लेकिन तुम बीच में घर आ जाया करोगे तो अच्छा लगेगा।'
'मैं यहाँ नहीं रहता तो क्या तुमको अच्छा नहीं लगता ?'
'क्यों तुमको वहाँ मेरे बिना वहाँ अच्छा लगता है ?'
'नहीं लगता लेकिन क्या करूँ, टेटकू कहीं काम करता तो दो झन कमाने वाले हो जाते लेकिन तुम्हारा लड़का तो एक नंबर का बदमाश है।'
'मेरा लड़का ? मैं क्या किसी और से ब्याहकर टेटकू को पैदा की थी ?'
'अरे नहीं रुक्मनी, वैसा मत बोल। तेरे लाड़-प्यार ने उसको बिगाड़ा है।'
'उसको क्यों दोष देते हो ? तुम भी तो बिगड़े हुए हो।'
'मैं, मैं बिगड़ा हुआ हूँ ?'
'बहुत बिगड़े हुए हो।'
'ऐसा ?' मटकूदास ने प्यार से रुक्मनी को देखा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया। रुक्मनी कद में ठिगनी थी, नीचे झुककर बुचक गई और मटकूदास से अलग होकर बोली- 'मैं कह रही थी न, तुम बहुत बिगड़े हुए हो।'
रात को टेटकू घर आया। माँ ने उसे भात और रमकेरिया की साग परोसी। दो-चार कौर खाने के बाद टेटकू ने माँ से पूछा- 'बाबू कलकत्ता जाने वाला था, कब जाएगा ?'
'आठ दिन बाद, बुधवार को।' माँ बोली।
'मैं भी जाऊँ क्या, बाबू के साथ ?'
'पूछ ले।'
'मैंने पूछा था, मना कर दिया।'
'क्यों?'
'वहाँ बहुत तकलीफ है, न रहने का ठिकाना, न खाने का ठिकाना।'
'फिर ?'
'बोल रहा था, बिलासपुर पास में है।'
'तो, चले जा।'
'चले जाता माँ लेकिन मुझे ब्याह करना है।'
'ब्याह करना है ? कमाई न धमाई और ब्याह करना है। कौन पालेगा तेरी घरवाली को ?'
'ब्याह कर दे माँ, मैं बिलासपुर जाऊंगा, कमाने।'
'किससे ब्याह करेगा ?'
'सुरसती से, वो राजी है।'
'सुरसती, दयाल की लड़की ? पर वो लोग तो सतनामी है, हम पनिका हैं, कैसे ब्याह होगा ?'
'तुम बाबू को मना लो, सब हो जाएगा।'
'बाबू नहीं मानेगा।'
'बात तो कर माँ।'
'पहले बोलता है, कलकत्ता जाऊंगा, फिर बोलता है ब्याह करूंगा, उसके बाद बोलता है बिलासपुर जाऊंगा, मेरे को तेरी बात समझ में नहीं आती। जब तेरे को कमाने के लिए बाहर जाना है तो ब्याह क्यों कर रहा है, उसको कहाँ रखेगा ?'
'अपने साथ बिलासपुर ले जाऊंगा।'
'अभी नौकरी नहीं लगी, बिलासपुर ले जाएगा ?'
'मैं क्या करूँ ? ब्याह करना जरूरी है।'
'क्यों, क्या हो गया ?'
'सुरसती हमल से है।' टेटकू बोला। रुक्मणी सन्नाटे में आ गई। बात रुक गई। चुप्पी छा गई। टेटकू खाता रहा, रुक्मणी उसे घूरती रही। एक बार और भात परोसा, साग दिया और धीरे से पूछा- 'कितने दिन का है ?'
'तीन माह का।'
'आने दे तेरे बाबू को, बात करती हूँ। बहुत गुस्साएगा, मैं जानती हूँ।'
'मना लेना माँ, मेरा उससे ब्याह करा दे, मैं बदल जाऊंगा माँ। मैं भी कमाऊँगा और घर चलाऊँगा।' टेटकू माँ से गिड़गिड़ाया।
खाना खाकर टेटकू रफूचक्कर हो गया क्योंकि उसके बाबू के घर पहुँचने का समय हो गया था। वह जानता था कि माँ ने यदि उसके सामने बात की तो बाबू तगड़ी पिटाई करेगा। खाना खाने के बाद मार खाना अच्छी बात नहीं होती। टेटकू को यह अंदाज़ नहीं था कि बात इतनी बढ़ जाएगी लेकिन अब बढ़ चुकी थी। थोड़ी देर के मज़े की सज़ा भारी पड़ रही थी, गलती हो तो गई लेकिन अब कैसा करे ?
मटकूदास घर आया, हाथ-पैर धोकर भोजन करने बैठा। रुक्मनी ने उसकी थाली लगाई, भोजन परोसा और भयभीत होकर उसे ताकती रही। मटकूदास घर की खबर से बेखबर भात खा रहा था। खाते-खाते बोला- 'आठ दिन और खा लेता हूँ तेरे हाथ का बना खाना फिर कलकत्ते में बिना स्वाद वाला खाना निगलना पड़ेगा।'
'वहाँ तो मछली-भात मिलता है न ?' रुक्मनी ने पूछा।
'मिलता तो है लेकिन सरसों तेल की गंध से मुझे मितलाई आती है।'
'फिर कैसा करते हो ?'
'क्या करते हैं, दस-पंद्रह दिन में आदत पड़ जाती है।'
'मेरे बिना तुमको वहाँ कैसा लगता है ?'
'अच्छा लगता है।'
'एँ, अच्छा लगता है ?'
'हाँ, वहाँ आज़ादी रहती है, जब मर्ज़ी आओ-जाओ, कोई टोकने वाला नहीं रहता।'
'मैं टोकती हूँ क्या ? तुम तो अपनी मर्ज़ी से चलने वाले हो, दूसरे का कहा मानते हो कभी ?'
'तेरा कहा तो मानता हूँ।'
'मेरा कहा मानते हो ? मानोगे मेरा कहा ?
'बोल के देख, बस, कलकत्ता जाने को मना मत करना।'
'ठीक है, कलकत्ता जाने को मना नहीं करूंगी।'
'बोल।'
'टेटकू का ब्याह कर दो, दयाल की लड़की सुरसती से।' रुक्मनी ने कहा। मटकूदास का कौर मुंह में रह गया, उसने घूर कर रुक्मनी को देखा। उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गई। भात निगलकर बोला- 'क्या कह रही हो ?'
'हाँ, कलकत्ता जाने के पहले उन दोनों का ब्याह कर दो।'
'ब्याह कर दो, तुम्हारे सड़कछाप लड़के का ब्याह कर दो। लोफ़रई करता है, एक पैसा कमाता नहीं है, एक को और घर में लाकर मेरे सिर पर बैठा दे तू।'
'बोल रहा है कि ब्याह करने के बाद कमाने जाएगा बिलासपुर, कोई नौकरी खोजेगा।'
'पर सतनामी के घर की लड़की कैसे लाएँगे ?'
'अब लाना पड़ेगा।'
'क्यों, ऐसी क्या बात है ?'
'लड़की हमल से है, तीसरा महीना चल रहा है।' रुक्मनी ने धीरे से कहा। मटकूदास माथा पकड़कर बैठ गया। रुक्मनी ने और भात परोसने का प्रयास किया, मटकूदास ने लेने से मना कर दिया और हाथ धोने के लिए उठ खड़ा हुआ। वह चिंतित होकर बिस्तर पर लेट गया और टेटकू के घर आने का इंतज़ार करने लगा।
टेटकू घबराया हुआ था। जवानी के जोश में होश खो बैठा, अब मुसीबत सामने खड़ी थी। वह सुरसती को दिल से प्यार करता था, गाँव छोड़ कर भाग सकता था लेकिन सुरसती के साथ धोखा हो जाता। सुरसती उस बात को कितने दिन छिपा पाती ? सवाल यह था कि बाबू राजी होगा या नहीं, सुरसती का बाप मानेगा या नहीं ?
पूरा गाँव सो गया। पगडंडी सो गई। गाँव की झोपड़ियाँ सो गई। पीपल का पेड़ सो गया। सुरसती सो गई होगी। दाई सो गई होगी। बाबू सो गया होगा। दबे पाँव वह अपनी झोपड़ी के पास पहुंचा। दरवाजे को धक्का दिया, खुल गया। दाई ने सांकल खुली छोड़ दी थी ताकि वह चुपचाप आकर सो सके। बिना किसी आहट के वह चादर ओढ़कर सो गया।
उस रात टेटकू ने सपना देखा। उसका बाप उसे डंडे से पीट रहा है। वह बाप से पूछता है- 'क्यों मार रहे हो ?'
'तूने खाना क्यों नहीं खाया।' बाप ने पूछा।
'खाया तो।'
'कब खाया ?'
'तीन महीने पहले खाया।'
'सच बोलना।'
'बाबू, मैं सच बोल रहा हूँ।'
'कैसे मानूँ तेरी बात, तूने मुझे बताया ?'
'दाई को बताया था।'
'मुझे क्यों नहीं बताया ?'
'तुमसे ड़र लगता है।'
'मुझसे क्यों डरता है ?'
'क्योंकि तुम डरावने हो।'
'मैंने तुझे कब मारा ?'
'कभी नहीं मारा।'
'तो फिर ?'
'आज मारोगे।'
'अरे नहीं, मैं क्यों मारूँगा ?'
'सच बाबू ?'
'सच।' टेटकू आपने बाबू से लिपट गया। अचानक उसे लगा, जैसे उसका बाप बरगद का बूढ़ा पेड़ बन गया है। उस पेड़ की जटाओं ने टेटकू को सब तरफ से लपेट लिया है। जकड़न बढ़ती जा रही है। सांस डूबती जा रही है। दूर से सुरसती रोती हुई टेटकू को बुला रही है। टेटकू उसके पास जाना चाहता है लेकिन जटाएँ और कसते जा रही हैं। अचानक सुरसती चुप हो गई। वह न जाने कहाँ गुम हो गई। वह सुरसती को पुकार रहा है- 'सुरसती...मेरी सुरसती।'
टेटकू की माँ ने उसे झिंझोड़ कर जगाया- 'क्या हुआ ? क्यों बड़बड़ा रहा है ?'
'दाई, सुरसती को बचा ले दाई।' टेटकू रो रहा था।
'सो जा, अभी सो जा। सुबह सब ठीक हो जाएगा।' रुक्मणी बोली। रात और गहरी हो गई। रात बेहोश हो चुकी थी।
मटकूदास बड़ी सुबह नहा-धोकर घर से निकल गया और सीधे सुरसती के पिता दयाल के घर पहुँच गया। दयाल उसे देखकर चौंक गया, उसे बिठाया और पूछा- 'कैसे आए मटकू भैया ?'
'तुम्हारी सुरसती को अपने घर की बहू बनाने के लिए।'
'क्या बोल रहे हो ? सुरसती, तुम्हारी बहू ?'
'हाँ, मेरा लड़का टेटकू उससे ब्याह करना चाहता है।'
'तुम तो बहुत अच्छी खबर लेकर आए लेकिन यह संबंध नहीं हो सकता।'
'क्यों ? टेटकू में कोई खराबी है क्या ?'
'नहीं, वह बात नहीं। तुम ऊंची जात के हो, हम लोग अछूत हैं, कैसे बनेगा ?'
'जब मुझे जम रहा है तो तुमको क्या परेशानी है ?'
'फिर ठीक है, मुझे मंजूर है।'
'ब्याह एक-दो दिन में करना है। मुझे मजदूरी के लिए बुधवार को कलकत्ता के लिए निकलना है।' मटकूदास ने कहा। दयाल मान गया। तीसरे दिन ब्याह हो गया। गाँव के लोग दस किस्म की चर्चा करते रहे लेकिन किसी को असल बात की भनक नहीं लगी। सुरसती टेटकू के घर आ गई। अगले दिन मटकूदास रुक्मणी और बच्चों के साथ सिनेमा देखने बिलासपुर चला गया। रात को बिलासपुर की एक धर्मशाला में ठहर गया। मटकूदास के वापस आते तक वह झोपड़ी टेटकू और सुरसती के संग धड़कती रही, नृत्यमग्न रही।
(२)
मटकूदास कलकता गया, चार महीने वहाँ रहा। सुबह की मेल से बिलासपुर उतरा और दोपहर के समय घर पहुँच गया। उस दिन रुक्मनी बेहद खुश थी। भरी ठंड में पति से दूर रहने का दुख विरहिणी ही जानती है लेकिन गरीबी जो न करवा ले, वह कम है। मटकूदास कलकत्ते से सबके लिए कपड़े लेकर आया, अपनी बहू सुरसती के लिए भी। रुक्मनी को पति के आने का मालूम ही न था, वह अचानक आ गया। उसके आने के पहले ही सब खा चुके थे और चौका साफ हो चुका था।
जब तक मटकूदास नहाकर आया तब तक रुक्मनी ने उसके लिए खाना बनाया और उसे परोस दिया। आज उसकी पसंद का साग बना था, आलू-भाटा-पताल का खूब तीखा साग और साथ में गरम-गरम भात। भोजन के बाद मटकूदास ने पूछा- 'टेटकू नहीं दिख रहा है, कहाँ गया ?'
'घरवाली को लेकर अपनी ससुराल गया है, रात को आएगा।' रुक्मनी ने बताया। मटकूदास मन ही मन खुश हुआ, बहुत खुश हुआ।
रात को जब टेटकू घर वापस आया तो मटकूदास ने उससे पूछा- 'गया था बिलासपुर, काम मिला ?'
'नहीं जा पाया।' टेटकू ने जवाब दिया।
'नहीं जा पाया...क्यों नहीं जा पाया ?'
'घर में तुम नहीं थे तो दाई को कौन देखता ?'
'दाई का नाम बीच में क्यों ला रहा है ? साफ-साफ बोल न कि घर में पड़ा रहा।'
'सुरसती की देखरेख भी करनी थी।'
'अब सुरसती को बीच में ले आया ?' मटकूदास भड़का। टेटकू चुप रह गया।
'तूने कहा दाई को था कि ब्याह करवा दो तो नौकरी करने जाऊंगा, यह बात सच है या नहीं ?' मटकूदास ने पूछा।
'सच है।'
'फिर क्यों नहीं गया ?'
'नहीं गया।'
'वही पूछ रहा हूँ, क्यों नहीं गया ?'
'सोचा कि तुम आ जाओगे तब जाऊंगा।' टेटकू ने सफाई दी। मटकूदास गुस्से से भभक गया- 'मैं परदेस गया, मेहनत-मजदूरी करने, अपना पसीना बहाया। एक टाइम खाना खाकर जिंदा रहा, पैसा बचाकर लाया और तू घर में गुलछर्रे उड़ा रहा था ?' वह झटके से उठा और उसने टेटकू को पीटना शुरू किया। रुक्मनी ने बीच-बचाव किया लेकिन जब तक मटकूदास का मन नहीं भरा, उसने तब तक पीटा। सुरसती रोती हुई एक कोने में दुबकी खड़ी रही।
उस रात घर में खाना नहीं बना, सब भूखे रहे। किसी ने किसी कोई बात नहीं की। सब सो रहे थे, टेटकू जग रहा था, उठा और चुपचाप घर से निकल गया और रात के सन्नाटे में पैदल चल पड़ा। रास्ते के पेड़ टेटकू से पूछ रहे थे- 'कहाँ जा रहा है ?'
(३)
रात भर पैदल चलते-चलते न जाने कितना रास्ता कट गया। एक चबूतरा दिखा, उस पर सो गया। सुबह नींद खुली, कोई गाँव था। शाम को ससुराल से लौटते समय सास ने उसके हाथ में दो रुपये का लाल रंग का नोट रखा था, वही जेब में था। एक बस आती दिखी, वह मुंगेली से लौट रही थी और बिलासपुर जा रही थी, उसमें बैठ गया। छः आने की टिकट लगी। डेढ़ घंटे में बिलासपुर का बसस्टेंड आ गया। उसने चारों ओर नज़र घुमाई, बहुत सी बसें खड़ी थी। कुछ में कम्बाइन्ड ट्रांसपोर्ट लिखा था तो कुछ में सुदर्शन ट्रांसपोर्ट। कंडक्टर सवारी को बुलाने के लिए हल्ला मचा रहे थे। वह बसस्टेंड से बायीं सड़क पर चल पड़ा, पाँच मिनट में एक गोल आकार का बाज़ार आ गया। यह वही बेरोजगार मजबूरों को रोजगार देने वाला बाज़ार था, गोलबाजार।
दिन का दस बज चुका था, चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। गोलबाजार में सब कुछ बिक रहा था। एक तरफ बहुत सी सायकल बेचने की दूकानें थी तो दूसरी तरफ हलवाइयों की कतार। गोलबाज़ार के अंदर सब्जियों की दूकान जिसमें हरी-ताज़ी सब्ज़ियों के भरे टोकरे आ रहे थे। दो-तीन मनिहारी की दूकानें थी और एक हलवाई की भी। टेटकू सकुचाते हुए उस दूकान में घुस गया और गद्दी पर बैठे मालिक से पूछा- 'कुछ काम मिलेगा क्या ?'
टेटकू को काम मिल गया, भट्ठीघर में बर्तनों की साफ सफाई और मुख्य कारीगर के द्वारा बताए काम को करना। तनख्वाह तीस रुपए प्रति माह, खाना-पीना मुफ्त। ड्यूटी सुबह 6 से रात 11 बजे तक। ज़िंदगी भर आराम फरमाने वाले टेटकू को यह काम बहुत भारी पड़ा। सत्रह घंटे की ड्यूटी, वह भी भट्ठीघर में ? घर से भागकर न आया होता तो घर वापस चला जाता। रात को दूकान के बाहर बने चबूतरे में सोना पड़ता था। शक्कर के दो खाली बोरे मिले थे, एक को बिछा लो और दूसरे को ओढ़ लो। सोते साथ मच्छरों की फ़ौज का हमला होता, काटते या कान के पास भन्न-भन्न करते। वे भी दुखी हो जाते रहे होंगे क्योंकि इतनी लंबी ड्यूटी देने वाले इंसान की थकावट उनके प्रयासों पर पानी फेर दे देती। ड्यूटी के बीच में एक घंटे की छुट्टी मिलती। एक मील दूर पर अरपा नदी की रेत पर बैठकर 'दिशा-मैदान' करता, नदी में धोता, मुखारी करता, नहाता और वापस दूकान आ जाता। आठ-दस दिन बहुत बुरे बीते, फिर आदत पड़ गई। टेटकू को समझ में आने लग गया कि कलकत्ते से वापस आने पर उसके बाबू ने उसे क्यों पीटा था !
टेटकू को भट्ठी में उठती लपट से बहुत परेशानी थी। लपट में उसे सुरसती का सुंदर मुखड़ा नज़र आता था। सुरसती को ऐसी अवस्था में छोड़ कर बिना बताए भाग आना उसे बहुत अखर रहा था लेकिन उस रात जिस तरह बाबू ने सुरसती के सामने पिटाई की, वह अपमान सहन नहीं हुआ। बाबू को मारना था तो बाहर ले जाकर मारना था, अगले दिन मार लेता लेकिन बाप है, बाप को सब माफ है, कुछ कह नहीं सकते। पैदा किया है, बड़ा किया है, भात खिलाता है तो बिना कारण मार भी सकता है। खैर, इस बार तो उसने मारा, ठीक मारा, मेरी गलती थी लेकिन क्या करे सुरसती से एक पल दूर होने का मन ही न करे। मुझे लगता था, उसके सामने बैठा रहूँ, उसे देखता रहूँ, बालों से खेलता रहूँ और उसकी धड़कन सुनता रहूँ। बाबू ने ऐसी धुनाई की कि सब गुड़-गोबर हो गया और अब यहाँ भट्ठी की आंच के सामने बैठा सुरसती को याद करता हूँ, अपना खून और जी जला रहा हूँ।
एक दिन की बात है, नदी से लौटते समय रास्ते में किसी ने उसे आवाज़ दी- 'टेटकू, ओ टेटकू।' वह चौंका कि बिलासपुर में उसे किसने पुकारा ? रामबिलास उसकी ओर दौड़ते चला आ रहा था। वह उसका बचपन का साथी था। दोनों एक दूसरे के गले लग गए।
'कहाँ है रे तू ?' राम बिलास ने पूछा।
'मैं यहीं हूँ, बिलासपुर में।' टेटकू ने बताया।
'किसी को तेरा कुछ पता नहीं, तू बिना बताए घर से चला गया। सब परेशान हैं।'
'तो क्या सबको जता-बता कर आता ? यहाँ काम खोजने आया था, मिल गया।'
'गाँव में तो कुछ और हल्ला है।'
'क्या है ?'
'तेरे बाप ने मारा इसलिए तू हर छोड़कर भाग गया।'
'दोनों बात ठीक है लेकिन घर से भागा नहीं, नौकरी करने यहाँ आया।'
'क्या काम करता है ?'
'बहुत बड़ी होटल में काम करता हूँ।'
'अरे वाह, क्या करता है वहाँ ?'
'बढ़िया ठाठ है, थोड़ा-बहुत काम करना पड़ता है और खाने-पीने का बहुत आराम है।'
'मुझे भी लगवा दे न ?'
'ठीक है, मालिक से बात कर लेता हूँ फिर बताऊंगा। नौकरी बड़ी मुश्किल से मिलती है यहाँ। अच्छा, मेरे घर की तरफ गया था क्या ?'
'हाँ, गया था। तीन दिन पहले तेरा लड़का हुआ है।'
'सच में ?'
'हाँ, सच में।'
'चल तेरे को चाय पिलाता हूँ।'
'बस, चाय !'
'मेरे पास ज्यादा पैसा नहीं है, आठ आना जेब में है। तनख्वाह नहीं मिली है।'
'क्यों नहीं लिया ?'
'जब घर जाऊंगा, तब लूँगा।'
'घर कब जाएगा ?'
'अब जाऊंगा, लड़के की छठी में।' टेटकू खुश होकर बोला- 'लेकिन मेरे बारे में घर में मत बताना, तुझको मेरी कसम।'
'क्यों ?'
'अब कमाई करके जब घर जाऊंगा तब सबको मेरे बारे में मालूम पड़ना चाहिए।'
'ठीक है, नहीं बताऊंगा लेकिन मेरा काम मत भूलना।' रामबिलास ने चाय पीते-पीते बोला।
'किसी दिन मालिक खुश दिखेगा, उस दिन बात करूंगा।' टेटकू ने कहा, फिर से दोनों गले लगे और अपने-अपने रास्ते चल पड़े। खुशी के मारे टेटकू लहरा रहा था, उसे घर याद आ रहा था, सुरसती की याद आ रही थी और किसी बच्चे का अंजाना चेहरा हँसता हुआ दिखाई पड़ रहा था।
टेटकू 'सुसमय' ताड़कर मालिक के सामने अपना सिर खुजलाते खड़ा हो गया। मालिक ने पूछा- 'क्या बात है ?'
'घर जाऊंगा।' टेटकू ने बताया।
'तो जाओ।'
'तनख्वाह चाहिए।'
'कितने दिन का काम हो गया ?'
'ढाई महीना।'
'कितना पैसा चाहिए ?'
'जितना निकलता हो, दे दीजिए।'
'क्यों, काम नहीं करना है क्या ?'
'छठी के बाद लौट आऊँगा।'
'किसकी छठी है ?'
'मेरे लड़के की, चार दिन पहले हुआ है।'
'ऐसा क्या ? पर अभी तो तू खुद लड़का है।'
'गाँव तरफ जल्दी ब्याह हो जाता है मालिक, बच्चा भी जल्दी हो जाता है।'
'कब है छठी ?'
'परसों।'
'ठीक है, ये दो महीने की तनख्वाह साठ रुपए रख ले, बाकी हिसाब लौट कर होगा।'
'हौ।'
'पैसा सम्हाल कर रखना और ये पाँच रुपए और ले, मेरी तरफ से तेरे लड़के के लिए कपड़ा खरीद लेना।' मालिक ने कहा। टेटकू ने मालिक के पैर छुए, बाजार से लड़के के लिए कपड़ा खरीदा और अपने गाँव के लिए निकल पड़ा। बस में बैठ गया। आधा घंटा बीत गया, बस छूटने का नाम न ले, वह बार-बार ड्राइवर की सीट की ओर देखे, खाली सीट भरे तो बस आगे बढ़े। ड्राइवर न जाने कहाँ चला गया। उसने बाहर झांककर देखा लेकिन बेकार गया क्योंकि वह ड्राइवर को पहचानता ही नहीं था। कुछ देर बाद बस भर गई, कंडक्टर ने मुंह से सीटी बजाई और बस में चढ़ गया। अचानक ड्राइवर चढ़ गया, बस का इंजन चालू हो गया, हार्न बजा, बस हिली और धीरे-धीरे आगे सरकने लगी। टेटकू सोच रहा था कि उसको ड्राइवरी सीखनी चाहिए, ड्राइवर बन जाएगा तो बस को इस तरह बेमतलब लेट नहीं होने देगा और तेजी से भगाएगा लेकिन इस बस का ड्राइवर तो एकदम बेहूदा है, रास्ते में किसी ने भी हाथ दिखाया तो बस रोक देता है। पता नहीं, कैसा चलाता है ? अचानक बस रुकी, ड्राइवर ने कंडक्टर को कुछ कहा और नीचे उतर गया। कुछ यात्री भी उतरे। धीरे-धीरे सब उतर गए। बस का एक टायर-ट्यूब पंक्चर हो गया था और ड्राइवर कंडक्टर दोनों मिलकर चक्के को निकालने में भिड़े हुए थे।
किसी प्रकार चलते-घिसटते बस उस मुख्य सड़क तक पहुँच गई जहां से जरौंधा जाने का पैदल मार्ग शुरू होता था। टेटकू उसी राह से वापस अपने घर जा रहा था जहां से एक रात वह नाराज होकर निकला था। उस काली रात और इस सुहानी सुबह में ढाई माह की दूरी है, आलस्य और परिश्रम का अंतर है, कुछ न करने के बदले कुछ कर-गुजरने का साहस है। उस रात कदम थके हुए थे, आज तरोताज़ा हैं।
कितने दिन बीत गए थे दाई के हाथ का बना साग-भात खाए, आज खाऊँगा, जी भर कर खाऊँगा लेकिन खाने के पहले तालाब में नहाऊँगा। इस मौसम में तालाब के चारों तरफ कमल के फूल खिले होंगे, उनका गुच्छा बनाकर चुपके से सुरसती को दूँगा। सुरसती बिस्तर पर लेटी होगी या फिर अपनी गोद में बच्चे को सुला रही होगी लेकिन मैं तो जाते साथ बच्चे को जगा दूँगा, उसे गोद में ले लूँगा, उसको खूब सारा प्यार करूंगा। अरे, देखो, हड़बड़ी में सुरसती के लिए पायल खरीदना भूल गया। वह मुझसे बच्चे के बदले इनाम मांगेगी तो क्या दूँगा ? कोई न कोई बहाना सोचना पड़ेगा। सुरसती सीधी है, बहाने को सच ही मानेगी। हाँ, याद आया, बोल दूँगा- 'तुम्हारे नाप की पायल नहीं थी, सुनार को नाप दे आया हूँ, अगली बार ले आऊँगा।'
गाँव नज़दीक आने लगा, एक जानी-पहचानी सुगंध टेटकू के दिमाग में छाने लगी। यह वही सुगंध जिसे वह बिलासपुर में भूल चुका था। मिट्टी की सुगंध, हरियाली का रंग, सूर्य की चमक, धूल की धमक और अपनेपन का आभास सब उसे घेर कर चारों ओर नाचने लगे। लो, यह गाँव आ गया, वही गाँव, उसका अपना गाँव। गाँव का जो व्यक्ति टेटकू को देखता, देखता रह जाता। सब आश्चर्यचकित।
'टेटकू आ गया !'
'तुम तो बता रहे थे कि टेटकू ने आत्महत्या कर ली !'
'अरे नहीं, देखो, टेटकू ज़िन्दा है !'
'कहाँ गया था ?'
'क्या जाने कहाँ गया था ?'
'किससे पूछें ?'
'उसी से पूछेंगे।'
'कौन पूछेगा ?'
'सब पूछेंगे।'
'क्या पूछेंगे ?'
'यही, कि क्या तुम क्यों ज़िन्दा हो ?'
'और ?'
'इतने दिन कैसे ज़िन्दा रहे।'
'और ?'
'ज़िन्दा कैसे रहा जाता है ?'
'और ?'
'हाँ, यह भी पूछेंगे कि अकेले होकर जीने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है ?'
'अरे, अभी टेटकू को घर तो पहुँचने दो....' समवेत स्वर उठा।
(४)
घर पहुँचकर टेटकू ने आवाज़ लगाई- 'दाई ओ।'
'कौन ?' घर के अंदर से रुक्मनी का स्वर दौड़ते हुए बाहर आया।
'मैं, टेटकू।'
'मेरा टेटकू।' रुक्मनी रोने लगी। 'कहाँ गया था तू ? बिना बताए ?'
'मैं कमाने गया था दाई, बिलासपुर।'
'मेरा बेटा, आ जा, देख, तेरा लड़का हुआ है।' रुक्मनी उसका हाथ पकड़कर झोपड़ी के अंदर ले गई, खुशी-खुशी टेटकू अंदर गया, छोटा सा बच्चा टुकुर-टुकुर देख रहा था, सुरसती समझ गई कि कौन आया है। वह पीठ फेर कर लेट गई और सुबकने लगी। रुक्मनी बोली- 'तेरा बाबू खेत गया है, मैं उसे बताती हूँ और बुलाकर लाती हूँ।' वह दौड़ती हुई खेत की ओर चली गई। घर में ढाई लोग रह गए। टेटकू, सुरसती और बेटकू।
'सुरसती, नाराज है रे ?' टेटकू ने पूछा।
'बात मत करो।' सुरसती भड़की। उसकी मुद्रा यथावत रही।
'बात मत करो ? क्यों मत करो ?'
'मैंने कहा न, बात मत करो।'
'नाराज हो ?'
'नहीं, बहुत खुश हूँ।'
'मैं उस दिन बहुत गुस्से में था इसलिए तुझे बताए बिना चला गया। गलती हो गई, देख, मैं आ गया। कितना सुंदर बच्चा है ये !' टेटकू की बात सुनकर सुरसती ने करवट बदली और मुस्कुराते हुए बच्चे को देखने लगी। टेटकू समझ गया कि बात बन गई, उसने धीरे से सुरसती को सहारा देकर उठाया और गले लगा लिया। दोनों रो रहे थे, बेटकू अब भी टुकुर-टुकुर देख रहा था।
थोड़ी देर में रुक्मनी लौट आई, बोली- 'तेरा बाबू साँझ के समय खेत से लौटेगा।' टेटकू ने रुक्मनी के हाथ में तनख्वाह में मिले रुपए रख दिया और उसके पैर छूकर बोला- 'दाई, ये मेरी पहली कमाई है, तेरी है।' रुक्मनी के हाथ सुन्न पड़ गए, गला भर आया और आँखें विस्मय से खुली रह गई। उसने जीवन में किसी ने इतने रुपए नहीं दिए थे। उसने दस रुपए टेटकू को वापस किए और धीरे से कहा- 'सुरसती को दे देना।'
शाम को मटकूदास खेत से वापस लौटा तब टेटकू घर में नहीं था। रुक्मनी ने मटकूदास को बताया कि टेटकू को बिलासपुर में नौकरी मिल गई है और उसने दो महीने की पगार उसे लाकर दी है। मटकूदास ने पूरी बात चुपचाप सुनी और चुप रहा। सब सुनकर वह खुश भी था और दुखी भी। खुश इसलिए कि टेटकू किसी काम से लग गया, उसकी आवारागर्दी बंद हुई और दुखी इसलिए कि टेटकू को काम से लगाने के लिए उसे उस पर हाथ उठाना पड़ा। अगले दिन छठी होनी थी, दोनों ने उस पर चर्चा की और खाना खाने के बाद मटकूदास सो गया। टेटकू रात को देर से लौटा। उस रात पिता-पुत्र का वार्तालाप न हो सका। अगले दिन भी चुप्पी बनी रही, दोनों एक-दूसरे से बात करने से बचते रहे।
छठी के कार्यक्रम में सुरसती के मायके वाले आए और बिरादरी और पड़ोस के आठ-दस लोग भी बुलाए गए। किसी ने बच्चे को कपड़े दिए तो किसी ने पैसे। रुक्मनी ने मेहमानों को खिलाने के लिए भात-साग-चटनी बनाया और साथ में चाँवल-दूध की मीठी खीर भी। खुशी के दो कारण बन गए थे, घर में नया मेहमान आया और टेटकू की नौकरी लग गई। जब मेहमान चले गए, सब बैठे-बैठे सुस्ता रहे थे, मटकूदास ने बात शुरू की- 'कहाँ काम मिला ?'
'एक होटल है बाबू, बिलासपुर में, पेंड्रावाला। टेटकू धीरे से बोला।
'ये कैसा नाम है ?'
'वहाँ सब लोग ऐसा ही कुछ कहते हैं।'
'क्या काम करना पड़ता है ?'
'साफ-सफाई करता हूँ, बर्तन-कड़ाही माँजता हूँ।'
'तू कर लेता है ?'
'कुछ दिन तक हाथ-पैर में बहुत दर्द हुआ, अब आदत पड़ गई।'
'मैं भी कलकत्ता जाता हूँ तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है।'
'हाँ बाबू, मेहनत नहीं करेंगे तो इतना पैसा कौन देगा ?'
'ठीक बात है। तू छुट्टी लेकर आया है ?'
'हाँ, कल वापस जाऊंगा।' टेटकू बोला। सुरसती ने घूरकर टेटकू को देखा। टेटकू सिर ऊपर करके छप्पर की तरफ देखने लगा।
'एक-दो दिन और रुक जा, फिर चले जाना।'
'मेरी जगह कोई दूसरा आ गया तो नौकरी हाथ से निकल जाएगी।'
'निकल जाएगी तो दूसरी नौकरी खोज लेना। तू घबरा मत, कुछ नहीं होगा।'
'ठीक है बाबू।'
'टेटकू, मैंने तुझको बहुत मारा, तू नाराज़ है रे ?'
'नाराज था बाबू लेकिन अब नहीं हूँ। आपने ठीक किया, मैं कमाने लायक हो गया। जिस दिन मुझे पगार मिली उस दिन मुझे समझ आया कि मेहनत का इनाम कितनी खुशी देता है।'
'तो क्या सोचा ?'
'नौकरी पर जाऊंगा। काम सीख जाऊंगा तो तनख्वाह भी बढ़ जाएगी।'
'फिर अपना ध्यान रखना, वहाँ कोई गलत संगत मत बना लेना।'
'हौ।' टेटकू ने आपने पिता को आश्वस्त किया। उधर सुरसती के आंसू बह रहे थे।
जब बाबू सो गया तब टेटकू ने सुरसती को दस रुपए अपनी जेब से निकालकर दिया। सुरसती बोली- 'मुझे क्यों दे रहे हो ? मैं क्या करूंगी ?
'इसे रख लो, परसों सुबह मैं बिलासपुर जाऊंगा, दो-तीन माह बाद आऊँगा, शायद पैसे का कुछ काम पड़े।' टेटकू ने समझाया।'
'तुम फिर जा रहे हो ?'
'जाना पड़ेगा, बाबू भी तो जाता है कलकत्ता।'
'तुम यहीं कोई काम क्यों नहीं करते ?'
'यहाँ गाँव में खेती के अलावा और क्या काम है ? बोवाई के समय छुट्टी लेकर आ जाऊंगा तब एक महीना तुम्हारे पास रहूँगा।'
'सच बोल रहे हो, झूठ तो नहीं।'
'सच बोल रहा हूँ।'
'पर इतने सारे रुपए मत दो। एक काम करो, पाँच रुपए मुझे दे दो, बाकी पाँच तुम रखो। बिलासपुर जाने का बस-किराया लगेगा और वहाँ कुछ खाने का मन करेगा तो पैसा जेब में होना चाहिए।'
'मुझे खाने के लिए वहाँ मिलता है।'
'रख लो न, गोलगप्पे खा लेना, सनीमा देख लेना और कभी-कभी दूध पी लिया करो, ताकत बनी रहती है।'
'ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।' टेटकू ने हँसते हुए कहा।
चार दिन पलक झपकते बीत गए। सुबह-सुबह टेटकू भारत के असंख्य मजबूरों की तरह नौकरी पर फिर निकल गया। नौकरी, जो इस कदर निर्मम है कि इसे न तो परिवार का महत्व समझ आता है और न अकेले जीने का दर्द। बेहूदी नौकरी।
(५)
दूकान भी वही थी, मालिक वही था लेकिन इस बार की नौकरी में टेटकू पहले की तरह दुखी नहीं था क्योंकि वह भगोड़ा नहीं बल्कि जगजाहिर नौकरी पर था। पूरा गाँव जान गया था कि टेटकू मटरगश्ती करने वाला आवारा छोकरा नहीं है, बिलासपुर की होटल में काम करने वाला टेटकूदास मानिकपुरी है।
उस्तादी एक विशिष्टता है जिसका अर्थ है होशियारी। उस्ताद का मतलब है, जो अपने कार्य में निपुण हो। उस्ताद शब्द का प्रयोग अनेक क्षेत्रों में होता है, खास तौर से संगीत में, पहलवानी में, दादागिरी में। हलवाई की दूकान में जिस व्यक्ति को मीठा और नमकीन बनाने में महारत होती है, उसे भी उस्ताद कहते हैं। इसका काम होता है, होटल में बनने वाले सामान का तालमेल बैठाना, कच्चा माल खराब न हो इसका ध्यान रखना, भट्ठी की आंच पर नज़र रखना, समय पर माल तैयार होने के बाद उसे खूबसूरती से सजाकर काउंटर पर भेजना, ग्राहक की ज़रूरत और उसके स्वाद का आकलन करना, निर्माण के दौरान सामान की गुणवत्ता का ख्याल रखना, कारखाने में हो रहे नुकसान को कम करना, मातहतों से काम लेना और मालिक तथा अन्य कामगारों के मध्य पुल का काम करना।
होटल में उस्ताद का जलवा मालिक से अधिक होता है। इसके दो कारण होते हैं, पहला, सभी कामगार उसके 'डायरेक्ट कंट्रोल' में रहते हैं और दूसरा, होटल के चलने या न चलने का पूरा दारोमदार उस्ताद के हुनर पर रहता है। उस्ताद बढ़िया तो माल बढ़िया बनता है, माल अच्छा तो ग्राहक खुश रहते हैं, ग्राहक खुश तो दूकान चलती है, दूकान चलती है तो मालिक की तिजोरी भरती है, मालिक मालदार होता है तो उसकी बीवी गहनों से लदी रहती है, गहने पहन कर बीवी अपने पति से खुश रहती है, बीवी खुश रहती है तो मालिक के घर में शांति रहती है। समझने की बात यह है कि मालिक के घर में शांति का सूत्र इसी उस्ताद के हाथ में है।
टेटकू की नज़र इस बार अपने उस्ताद की उस्तादी पर थी। उसे समझ में आ गया था कि झाड़ू-बर्तन करता रह गया तो ज़िंदगी भर वही करता रहेगा और तनख्वाह कभी नहीं बढ़ेगी जबकि उस्ताद की तनख्वाह उससे सात गुनी अधिक थी। उसने निर्णय लिया कि वह उस्ताद को पटाएगा और उसकी शागिर्दी करेगा।
एक दिन की बात है कि उस्ताद रसगुल्ला की गोली करते समय गाना गुनगुना रहा था- 'सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, हमें डर है हम खो न जायें कहीं...।' टेटकू ने हिम्मत बटोरते हुए कहा- 'गुरु जी, बहुत बढ़िया गाते हो।'
'अच्छा लगा? 'मधुमती' पिक्चर का गाना है।'
'मुझे भी गाना सिखा दो गुरु जी।'
'का करेगा गाना सीख के, फिलिम में काम करेगा? सीखना है तो मिठाई बनाना सीख, नमकीन बनाना सीख तो जिंदगी भर काम आएगा।'
'मुझे कौन सिखायेगा गुरु जी?'
'सीखेगा? मैं सिखाऊँगा।' कल्लू उस्ताद ने पूछा। टेटकू बर्तन माँजना छोडकर अपने हाथ धोया, उचक कर खड़ा हुआ और झुककर उस्ताद के पाँव पकड़ लिये। टेटकू उसके पैर को पकड़ कर वहीं बैठ गया, छोड़े न। उस्ताद बोला- 'पैर तो छोड़।'
'नहीं छोडूंगा। पहले हाँ करो कि मेरे को कारीगरी सिखाओगे।'
'अच्छा चल, सिखाऊँगा लेकिन मेरी एक शर्त है, मानेगा?'
'कौन सी शर्त?'
'जो मैं कहूँगा, मानना पड़ेगा.'
'क्या कहोगे?'
'सवाल करता है। सीधे-सीधे हाँ बोल।'
'मानूँगा।' टेटकू डरते-डरते बोला।
'जा, मेरे लिए एक बंगला पान बनवा कर लाना, थोड़ी सी तम्बाखू अलग से लेकर आना।'
'जी, गुरु जी।' टेटकू ने उस्ताद के पैर छोड़े और पान लेने के लिए तेजी से निकल गया।
टेटकू को सफाई और बर्तन साफ करने के साथ-साथ अब उस्ताद के पास बैठकर काम करने के मौके मिलने लगे। शुरुआत तो हमेशा छोटी होती है लेकिन करते-करते मनुष्य काम सीख लेता है बशर्ते वह सीखना चाहे। टेटकू को शौक था इसलिए वह उस्ताद के पीछे लगा रहता और धीरे-धीरे काम की बारीकी समझने लगा।
पीतल के बड़े गंज में 15 सेर दूध उबलने के लिये चढ़ा हुआ था। एक तरफ उस्ताद और टेटकू समोसा भर रहे थे लेकिन उस्ताद की नज़र दूध पर थी ताकि दूध न उफने। जब दूध उबलने लगा तो उसने टेटकू से कहा- 'जल्दी कर, दूध उतार, संभाल कर।'
टेटकू उठा, दोनों हाथ में छोटे-छोटे कपड़े लेकर गंज को भट्ठी से उतारने लगा। अचानक संतुलन बिगड़ा और दूध का गंज हाथ से छूट गया। उबलता हुआ दूध टेटकू के पैरों से होता हुआ जमीन में फैल गया। टेटकू के मुंह से चीख निकली, उस्ताद उठकर टेटकू की ओर दौड़ा। चीख सुनकर मालिक कारखाने में आया, उसने देखा कि दूध छलकने से टेटकू के पैरों में जलन हो रही थी। जले हुए हिस्से में तुरंत 'बरनाल' का पीला लेप करवा दिया गया। मालिक ने उस्ताद को डांटा- 'नये लड़के को दूध उतारने के लिए किसने बोला, देखो बेचारा जल गया?'
'मैंने बोला।' उस्ताद ने कहा।
'क्यों?'
'चार महीना हो गया काम करते, अभी नया है क्या?'
'तो क्या पुराना हो गया?'
'गबरू जवान है, कब काम सीखेगा?'
'लेकिन यह ठीक हुआ क्या?'
'ठीक हुआ। भट्ठी के काम में जलेगा नहीं तो काम कैसे सीखेगा सेठ जी?'
'क्यों रे, भट्ठी में ऐसे काम करते हैं?' मालिक ने टेटकू से पूछा।
टेटकू चुप। 'सावधानी से काम किया करो।' मालिक ने डपटकर कहा और बड़बड़ाते हुए वापस चला गया।
टेटकू के पैर में जलन हो रही थी। उसने उस्ताद से कहा- 'बहुत जल रहा है।'
'बच गया रे टेटकू, तेरे पैर में दूध का झाग गिरा, दूध जमीन में गिरा। अगर पैर में दूध गिरता तो समझ में आता कि जलना क्या होता है?'
'बच गया मैं.'
'हूँ...क्यों रे, तेरा हाथ जला है क्या? चल समोसा भर।' उस्ताद ने उसे डांटते हुए कहा।
समोसा भरते हुए उस्ताद टेटकू को समझा रहा था- 'क्यों, सायकल चलाना सीखा था तो गिरा था या नहीं? गिरा होगा। जब गिरा होगा तब सायकल का बेलेन्स समझ में आया होगा, वैसे ही ये है। यहाँ तो रोज का काम है, उबलता हुआ दूध, खौलता हुआ शीरा, और गरम घी, ज़रा सा ध्यान बंटा, पकड़ कमजोर हुई तो वही होगा जो आज हुआ। आज जल गया, अच्छा हुआ, अब ज़िंदगी भर इसे याद रखेगा और भट्ठी में सावधानी से काम करेगा।जवान आदमी, पंद्रह सेर दूध नहीं उठा पाया, घंटा कारीगरी सीखेगा। मालिक से मुझे ज़बरन का डांट खिलवा दिया।'
'माफ़ करना गुरु जी।'
'दूध उतारते समय क्या घरवाली की याद आ रही थी?'
'नहीं गुरु जी, लेकिन अभी याद आ रही है।'
'घर जायेगा?'
'नहीं जाऊंगा। घर जाऊंगा तो मेरी इस हालत को देखकर मुझे यहाँ कोई नहीं आने देगा, मैं वहीं अटक जाऊंगा।'
'अब दुखी मत हो, आज रात को लक्ष्मी टाकीज़ में सेकेंड शो चलेंगे, मैं तुझे 'मधुमती' पिक्चर दिखाऊँगा। वैजयंती माला को देखेगा तो तबीयत मस्त हो जाएगी।'
'पर मेरे पास टिकट के पैसे नहीं है।'
'मैं टिकट कटाऊंगा न रे पगले।' उस्ताद बोला। इस प्रस्ताव को सुनकर टेटकू अपने पैर की जलन को भूल गया और सुरसती के बदले वैजयंती माला की यादों में खो गया। समोसा भरने की गति और तेज हो गयी।
सेकेण्ड शो रात को एक बजे छूटा। गुरु-चेला टाकीज़ से पैदल वापस लौट रहे थे। फिल्म की चर्चा चल रही थी।
'कैसी लगी पिक्चर?' उस्ताद ने पूछा।
'मज़ा आ गया।'
'क्या अच्छा लगा?'
'गाने एक से एक थे गुरु जी।'
'सबसे अच्छा कौन सा लगा?'
'दैया रे दैया, चढ़ गयो पापी बिछुआ।'
'कैसे? '
'हमारे गाँव में एक लड़का है, बहुत अच्छे छत्तीसगढ़ी गीत गाता है. वो एक गाना गाया करता था- 'चाबिस रे चाबिस, मोला बिछुआ ह चाबिस, दाई ओ।'
'क्या मतलब?'
'काट दिया रे काट दिया, मुझे बिच्छू ने काट दिया, ओ मां।'
'तेरे को कभी बिच्छू ने काटा?'
'वैजयंतीमाला वाले बिच्छू ने काटा था।'
'कब रे?'
'गुरु जी, मैं आपको आज बता रहा हूँ, मैं अपने ब्याह के पहले ही बाप बन गया था।'
'आंय, ब्याह के पहले कोई कैसे बाप बनेगा?'
'जब मेरा ब्याह हुआ तब सुरसती के पेट में बेटकू आ चुका था।'
'कैसे?'
'वही, एक दिन सुरसती को देखकर बिच्छू चढ़ गया था।' टेटकू ने हंसते हुए बताया।
उस्ताद मोहल्ला तेलीपारा में एक कमरे की खोली लेकर रहता था। बात करते-करते उसका घर आ गया। उस्ताद ने दरवाजा खटखटाया, उसकी घरवाली ने खोला। साथ में एक अनजान को देखकर बोली- 'कौन है ये?'
'मेरा चेला है, साथ में काम करता है।'
'तो?'
'आज हम लोगों को कारखाने में काम निपटाते बहुत देर हो गई तो मैं इससे बोला, चल मेरे घर में सो जाना।'
'एक कमरे का घर है, ले आए एक और आदमी को यहाँ सुलाने के लिए, समझ नहीं आता तुम्हारी अकल को क्या हो गया है!'
'एक कोने में जमीन पर पड़ा रहेगा।'
'मैं नहीं मानती। उसको दरी और चादर दे दो, घर के बाहर सो जाएगा।' उस्ताद की घरवाली ने अंतिम फैसला सुनाया। टेटकू को दरी और चादर दे दिया गया। वह घर के बाहर चबूतरे पर सोने का प्रयास करता रहा। बहुत देर तक उसके दिमाग में वैजयंतीमाला की अदाएं तैरती रही फिर वैजयंतीमाला और सुरसती का चेहरा 'मिक्स' होकर गड्ड-मड्ड होने लगा और उसकी आँखें बोझिल हो गई। अचानक चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी और नींद ने आ घेरा। टेटकू को रात भर मच्छर काटते रहे और बिछुआ भी।
(६)
हलवाइयों के बीच यह धारणा है कि कसाई का कुत्ता और होटल का नौकर एक जगह नहीं टिकता (यह कहावत अब कार्पोरेट सेक्टर और पत्रकार जगत में भी चलने लगी है), वह दस जगह मुंह मारता है।
वे सभी कारोबार जो श्रमिकों पर निर्भर हैं, वे श्रमिकों के बल पर ही चलते हैं। कोई भी इकाई हो, यदि के उसके पास काम करने वाले या अच्छा काम करने वाले नहीं हैं तो व्यापार का भसकना तय है। मालिक-श्रमिक सम्बन्ध सदैव मधुर नहीं रहते क्योंकि काम लेने और काम करने की मात्रा में हमेशा अंतर रहता है लेकिन जब यह अंतर बढ़ जाता है तो खटास आने लगती है। उसके बाद दोनों अलग-अलग ढंग से एक-दूसरे से अलग होने के बहाने खोजने लगते हैं जो झटपट मिल जाते हैं और मिल कर काम करने वाले दो लोग अलग हो जाते हैं।
होटलों में यदाकदा ही कोई टिकता है, आयाराम-गयाराम होते रहता है। उस्ताद बदलते रहे लेकिन टेटकू टिका रहा। कुछ वर्षों की मेहनत के बाद वह स्वयं उस्ताद के 'लेवल' में पहुँच गया और उस्ताद बन गया। इस बीच उसने सुरसती को भी बिलासपुर बुलवा लिया, बेटकू की एक बहन भी आ गई लेकिन मां-बाप गाँव में ही थे। उसकी तनख्वाह बढ़ गई लेकिन वह नौकरी करते हुए अपनी ज़िन्दगी बसर नहीं करना चाहता था। वह इस तलाश में था कि छोटी-मोटी ही सही, एक दूकान खोल ली जाए।
गोलबाज़ार से लगा हुआ है शनीचरी पड़ाव, जहाँ ग्रामीणों की ज़रुरत के सामान की अनेक दूकानें हैं। जहां बहुत सी आरा मशीनें भी हैं, वहीँ पर बेजा कब्ज़ा पर बनी हुई एक झोपड़ीनुमा दूकान किराये पर मिल रही थी। दूकान मालिक से किराया तय हो गया लेकिन उसने एक विचित्र शर्त डाल दी, दूकान देने के लिये उसने ऐसे व्यक्ति की 'गेरेंटी' मांगी जिसे वह जानता हो। केवल एक व्यक्ति था जिसे 'वह' जानता था और टेटकू भी, वह था 'पेंड्रावाला' का मालिक। टेटकू को समझ में न आये कि वह यह बात मालिक से कैसे कहे? उसकी हिम्मत न हो और देर हो जाने पर दूकान हाथ से निकल जाने का डर अलग से था।
एक दिन उसने एक कप चाय बनाई और मालिक के सामने जा खड़ा हुआ। मालिक ने उसे देखा और पूछा- 'चाय लाया, लेकिन मैंने तो नहीं मंगाया।'
'स्पेशल चाय बनाया हूँ, आपके लिए।' टेटकू बोला.
'क्या बात है? कुछ चाहिए क्या? चाय पीते हुए मालिक ने पूछा।
'आपकी गेरेंटी चाहिए।'
'क्या ले रहे हो?'
'एक दूकान किराये पर ले रहा हूँ, छोटी सी चाय-भजिया की दूकान खोलूँगा। आप बोलोगे तब दूकान मिलेगी।'
'अरे वाह, धंधा शुरू कर रहा है। अच्छा सोचा है। जिसकी दूकान है उसे यहीं बुलवा ले, मैं बोल दूंगा। अब समझ में आया स्पेशल चाय का मतलब।' मालिक ने हंसते हुए कहा. टेटकू ने झुककर माली के पैर छुए।
टेटकू की दूकान खुल गई, साल भर में भरपूर चलने लगी। हर दिवाली के दूसरे दिन टेटकू अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपने पुराने मालिक के पैर छूने आता है, साथ में मिठाई लाता है। मालिक को मालूम है कि टेटकू ज़रूर आएगा इसलिए वह उसके बच्चों के नाप के कपड़े पहले से मंगवाकर रखता है।
टेटकू अब किसी मालिक का नौकर नहीं रहा, खुद मालिक बन गया है लेकिन वह अपने मालिक को आज भी मालिक ही मानता है।
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बिलासपुर से दस कोस दूर एक गाँव है, जरौंधा। कम आबादी वाले इस गांव में गुजरबसर के लिए खेती-किसानी, बैलगाड़ी के चक्के बनाने वाले दो बढ़ई, एक लोहार, एक वैद्य, एक पंडित, एक नाई, चार चरवाहे, एक किरानी और इक्कीस परिवार थे। अधिकतर ग्रामवासी छत्तीसगढ़ी मूल के थे, कुछ-एक बाहरी भी, सभी जातियों के मिश्रण से बना यह गाँव आपसी प्रेमभाव की मिसाल था। हर घर एक-दूसरे का मददगार था। किसी ने किसी के लिए कुछ किया तो पैसे का लेन-देन नहीं होता था, अनाज का लेन-देन होता था।
इसी गाँव में मटकूदास रहता था, तालाब के किनारे उसने एक झोपड़ी बनाई थी, एक कमरे का घर जिसमें उसकी घरवाली और तीन बच्चे रहते थे। मटकूदास खेतों में मजदूरी करता था, उसकी घरवाली घर का काम करती, बड़ा लड़का टेटकू दास आवारागर्दी करता था और छोटी दोनों लड़कियां दिन भर रोने का काम करती थी। छत्तीसगढ़ में साल में एक फ़सल होती है, धान की, जिसमें मुश्किल से तीस दिन काम मिलता था। तीस दिन की मज़दूरी में पाँच आदमी का पेट भरना संभव न था इसलिए दिवाली के बाद मटकूदास पैसा कमाने कलकत्ता चला जाता। उसकी घरवाली रुक्मनी अपने पति की अनुपस्थिति का छः-सात महीने घरवास भुगतती और अपने बेटे टेटकूदास को डांट-डपट कर घर से भगाती और कुछ कमाकर लाने के लिए कहती। टेटकू गलत संगत में पड़ गया था। पीपल के पेड़ के नीचे अपने जुआरी दोस्तों के साथ बीड़ी पीते बैठा रहता और यदि दो-चार आना जीत जाता तो माँ के हाथ में रखकर बोलता- 'ले रख, कमा कर लाया हूँ।' कभी हार जाता तो दोस्तों का खेल बिगाड़कर हल्ला मचाता- 'तुम लोग बेईमान हो, मैं नहीं खेलता' और भाग खड़ा होता। उसकी बदमाशी की खबर मटकूदास को थी, वह टेटकू को लेकर बहुत फिक्रमंद था लेकिन करता क्या ? गाँव में कोई रोजगार भी न था।
एक दिन की बात है, बच्चे घर के बाहर थे, मटकूदास ने रुक्मनी से कहा- 'आठ दिन बाद कलकत्ता जाना है, कपड़ा-लत्ता की गठरी बना देना।'
'मत जाओ कलकत्ता, पास में बिलासपुर है, वहाँ जाकर कोई काम खोजो, मिल जाएगा। कलकता जाते हो तो वहीं के बन कर रह जाते हो।' रुक्मनी ने कहा।
'कलकत्ता में मज़दूरी ज्यादा मिलती है, बिलासपुर में उतना पैसा कौन देगा ?'
'कम देगा और क्या ? लेकिन तुम बीच में घर आ जाया करोगे तो अच्छा लगेगा।'
'मैं यहाँ नहीं रहता तो क्या तुमको अच्छा नहीं लगता ?'
'क्यों तुमको वहाँ मेरे बिना वहाँ अच्छा लगता है ?'
'नहीं लगता लेकिन क्या करूँ, टेटकू कहीं काम करता तो दो झन कमाने वाले हो जाते लेकिन तुम्हारा लड़का तो एक नंबर का बदमाश है।'
'मेरा लड़का ? मैं क्या किसी और से ब्याहकर टेटकू को पैदा की थी ?'
'अरे नहीं रुक्मनी, वैसा मत बोल। तेरे लाड़-प्यार ने उसको बिगाड़ा है।'
'उसको क्यों दोष देते हो ? तुम भी तो बिगड़े हुए हो।'
'मैं, मैं बिगड़ा हुआ हूँ ?'
'बहुत बिगड़े हुए हो।'
'ऐसा ?' मटकूदास ने प्यार से रुक्मनी को देखा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया। रुक्मनी कद में ठिगनी थी, नीचे झुककर बुचक गई और मटकूदास से अलग होकर बोली- 'मैं कह रही थी न, तुम बहुत बिगड़े हुए हो।'
रात को टेटकू घर आया। माँ ने उसे भात और रमकेरिया की साग परोसी। दो-चार कौर खाने के बाद टेटकू ने माँ से पूछा- 'बाबू कलकत्ता जाने वाला था, कब जाएगा ?'
'आठ दिन बाद, बुधवार को।' माँ बोली।
'मैं भी जाऊँ क्या, बाबू के साथ ?'
'पूछ ले।'
'मैंने पूछा था, मना कर दिया।'
'क्यों?'
'वहाँ बहुत तकलीफ है, न रहने का ठिकाना, न खाने का ठिकाना।'
'फिर ?'
'बोल रहा था, बिलासपुर पास में है।'
'तो, चले जा।'
'चले जाता माँ लेकिन मुझे ब्याह करना है।'
'ब्याह करना है ? कमाई न धमाई और ब्याह करना है। कौन पालेगा तेरी घरवाली को ?'
'ब्याह कर दे माँ, मैं बिलासपुर जाऊंगा, कमाने।'
'किससे ब्याह करेगा ?'
'सुरसती से, वो राजी है।'
'सुरसती, दयाल की लड़की ? पर वो लोग तो सतनामी है, हम पनिका हैं, कैसे ब्याह होगा ?'
'तुम बाबू को मना लो, सब हो जाएगा।'
'बाबू नहीं मानेगा।'
'बात तो कर माँ।'
'पहले बोलता है, कलकत्ता जाऊंगा, फिर बोलता है ब्याह करूंगा, उसके बाद बोलता है बिलासपुर जाऊंगा, मेरे को तेरी बात समझ में नहीं आती। जब तेरे को कमाने के लिए बाहर जाना है तो ब्याह क्यों कर रहा है, उसको कहाँ रखेगा ?'
'अपने साथ बिलासपुर ले जाऊंगा।'
'अभी नौकरी नहीं लगी, बिलासपुर ले जाएगा ?'
'मैं क्या करूँ ? ब्याह करना जरूरी है।'
'क्यों, क्या हो गया ?'
'सुरसती हमल से है।' टेटकू बोला। रुक्मणी सन्नाटे में आ गई। बात रुक गई। चुप्पी छा गई। टेटकू खाता रहा, रुक्मणी उसे घूरती रही। एक बार और भात परोसा, साग दिया और धीरे से पूछा- 'कितने दिन का है ?'
'तीन माह का।'
'आने दे तेरे बाबू को, बात करती हूँ। बहुत गुस्साएगा, मैं जानती हूँ।'
'मना लेना माँ, मेरा उससे ब्याह करा दे, मैं बदल जाऊंगा माँ। मैं भी कमाऊँगा और घर चलाऊँगा।' टेटकू माँ से गिड़गिड़ाया।
खाना खाकर टेटकू रफूचक्कर हो गया क्योंकि उसके बाबू के घर पहुँचने का समय हो गया था। वह जानता था कि माँ ने यदि उसके सामने बात की तो बाबू तगड़ी पिटाई करेगा। खाना खाने के बाद मार खाना अच्छी बात नहीं होती। टेटकू को यह अंदाज़ नहीं था कि बात इतनी बढ़ जाएगी लेकिन अब बढ़ चुकी थी। थोड़ी देर के मज़े की सज़ा भारी पड़ रही थी, गलती हो तो गई लेकिन अब कैसा करे ?
मटकूदास घर आया, हाथ-पैर धोकर भोजन करने बैठा। रुक्मनी ने उसकी थाली लगाई, भोजन परोसा और भयभीत होकर उसे ताकती रही। मटकूदास घर की खबर से बेखबर भात खा रहा था। खाते-खाते बोला- 'आठ दिन और खा लेता हूँ तेरे हाथ का बना खाना फिर कलकत्ते में बिना स्वाद वाला खाना निगलना पड़ेगा।'
'वहाँ तो मछली-भात मिलता है न ?' रुक्मनी ने पूछा।
'मिलता तो है लेकिन सरसों तेल की गंध से मुझे मितलाई आती है।'
'फिर कैसा करते हो ?'
'क्या करते हैं, दस-पंद्रह दिन में आदत पड़ जाती है।'
'मेरे बिना तुमको वहाँ कैसा लगता है ?'
'अच्छा लगता है।'
'एँ, अच्छा लगता है ?'
'हाँ, वहाँ आज़ादी रहती है, जब मर्ज़ी आओ-जाओ, कोई टोकने वाला नहीं रहता।'
'मैं टोकती हूँ क्या ? तुम तो अपनी मर्ज़ी से चलने वाले हो, दूसरे का कहा मानते हो कभी ?'
'तेरा कहा तो मानता हूँ।'
'मेरा कहा मानते हो ? मानोगे मेरा कहा ?
'बोल के देख, बस, कलकत्ता जाने को मना मत करना।'
'ठीक है, कलकत्ता जाने को मना नहीं करूंगी।'
'बोल।'
'टेटकू का ब्याह कर दो, दयाल की लड़की सुरसती से।' रुक्मनी ने कहा। मटकूदास का कौर मुंह में रह गया, उसने घूर कर रुक्मनी को देखा। उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गई। भात निगलकर बोला- 'क्या कह रही हो ?'
'हाँ, कलकत्ता जाने के पहले उन दोनों का ब्याह कर दो।'
'ब्याह कर दो, तुम्हारे सड़कछाप लड़के का ब्याह कर दो। लोफ़रई करता है, एक पैसा कमाता नहीं है, एक को और घर में लाकर मेरे सिर पर बैठा दे तू।'
'बोल रहा है कि ब्याह करने के बाद कमाने जाएगा बिलासपुर, कोई नौकरी खोजेगा।'
'पर सतनामी के घर की लड़की कैसे लाएँगे ?'
'अब लाना पड़ेगा।'
'क्यों, ऐसी क्या बात है ?'
'लड़की हमल से है, तीसरा महीना चल रहा है।' रुक्मनी ने धीरे से कहा। मटकूदास माथा पकड़कर बैठ गया। रुक्मनी ने और भात परोसने का प्रयास किया, मटकूदास ने लेने से मना कर दिया और हाथ धोने के लिए उठ खड़ा हुआ। वह चिंतित होकर बिस्तर पर लेट गया और टेटकू के घर आने का इंतज़ार करने लगा।
टेटकू घबराया हुआ था। जवानी के जोश में होश खो बैठा, अब मुसीबत सामने खड़ी थी। वह सुरसती को दिल से प्यार करता था, गाँव छोड़ कर भाग सकता था लेकिन सुरसती के साथ धोखा हो जाता। सुरसती उस बात को कितने दिन छिपा पाती ? सवाल यह था कि बाबू राजी होगा या नहीं, सुरसती का बाप मानेगा या नहीं ?
पूरा गाँव सो गया। पगडंडी सो गई। गाँव की झोपड़ियाँ सो गई। पीपल का पेड़ सो गया। सुरसती सो गई होगी। दाई सो गई होगी। बाबू सो गया होगा। दबे पाँव वह अपनी झोपड़ी के पास पहुंचा। दरवाजे को धक्का दिया, खुल गया। दाई ने सांकल खुली छोड़ दी थी ताकि वह चुपचाप आकर सो सके। बिना किसी आहट के वह चादर ओढ़कर सो गया।
उस रात टेटकू ने सपना देखा। उसका बाप उसे डंडे से पीट रहा है। वह बाप से पूछता है- 'क्यों मार रहे हो ?'
'तूने खाना क्यों नहीं खाया।' बाप ने पूछा।
'खाया तो।'
'कब खाया ?'
'तीन महीने पहले खाया।'
'सच बोलना।'
'बाबू, मैं सच बोल रहा हूँ।'
'कैसे मानूँ तेरी बात, तूने मुझे बताया ?'
'दाई को बताया था।'
'मुझे क्यों नहीं बताया ?'
'तुमसे ड़र लगता है।'
'मुझसे क्यों डरता है ?'
'क्योंकि तुम डरावने हो।'
'मैंने तुझे कब मारा ?'
'कभी नहीं मारा।'
'तो फिर ?'
'आज मारोगे।'
'अरे नहीं, मैं क्यों मारूँगा ?'
'सच बाबू ?'
'सच।' टेटकू आपने बाबू से लिपट गया। अचानक उसे लगा, जैसे उसका बाप बरगद का बूढ़ा पेड़ बन गया है। उस पेड़ की जटाओं ने टेटकू को सब तरफ से लपेट लिया है। जकड़न बढ़ती जा रही है। सांस डूबती जा रही है। दूर से सुरसती रोती हुई टेटकू को बुला रही है। टेटकू उसके पास जाना चाहता है लेकिन जटाएँ और कसते जा रही हैं। अचानक सुरसती चुप हो गई। वह न जाने कहाँ गुम हो गई। वह सुरसती को पुकार रहा है- 'सुरसती...मेरी सुरसती।'
टेटकू की माँ ने उसे झिंझोड़ कर जगाया- 'क्या हुआ ? क्यों बड़बड़ा रहा है ?'
'दाई, सुरसती को बचा ले दाई।' टेटकू रो रहा था।
'सो जा, अभी सो जा। सुबह सब ठीक हो जाएगा।' रुक्मणी बोली। रात और गहरी हो गई। रात बेहोश हो चुकी थी।
मटकूदास बड़ी सुबह नहा-धोकर घर से निकल गया और सीधे सुरसती के पिता दयाल के घर पहुँच गया। दयाल उसे देखकर चौंक गया, उसे बिठाया और पूछा- 'कैसे आए मटकू भैया ?'
'तुम्हारी सुरसती को अपने घर की बहू बनाने के लिए।'
'क्या बोल रहे हो ? सुरसती, तुम्हारी बहू ?'
'हाँ, मेरा लड़का टेटकू उससे ब्याह करना चाहता है।'
'तुम तो बहुत अच्छी खबर लेकर आए लेकिन यह संबंध नहीं हो सकता।'
'क्यों ? टेटकू में कोई खराबी है क्या ?'
'नहीं, वह बात नहीं। तुम ऊंची जात के हो, हम लोग अछूत हैं, कैसे बनेगा ?'
'जब मुझे जम रहा है तो तुमको क्या परेशानी है ?'
'फिर ठीक है, मुझे मंजूर है।'
'ब्याह एक-दो दिन में करना है। मुझे मजदूरी के लिए बुधवार को कलकत्ता के लिए निकलना है।' मटकूदास ने कहा। दयाल मान गया। तीसरे दिन ब्याह हो गया। गाँव के लोग दस किस्म की चर्चा करते रहे लेकिन किसी को असल बात की भनक नहीं लगी। सुरसती टेटकू के घर आ गई। अगले दिन मटकूदास रुक्मणी और बच्चों के साथ सिनेमा देखने बिलासपुर चला गया। रात को बिलासपुर की एक धर्मशाला में ठहर गया। मटकूदास के वापस आते तक वह झोपड़ी टेटकू और सुरसती के संग धड़कती रही, नृत्यमग्न रही।
(२)
मटकूदास कलकता गया, चार महीने वहाँ रहा। सुबह की मेल से बिलासपुर उतरा और दोपहर के समय घर पहुँच गया। उस दिन रुक्मनी बेहद खुश थी। भरी ठंड में पति से दूर रहने का दुख विरहिणी ही जानती है लेकिन गरीबी जो न करवा ले, वह कम है। मटकूदास कलकत्ते से सबके लिए कपड़े लेकर आया, अपनी बहू सुरसती के लिए भी। रुक्मनी को पति के आने का मालूम ही न था, वह अचानक आ गया। उसके आने के पहले ही सब खा चुके थे और चौका साफ हो चुका था।
जब तक मटकूदास नहाकर आया तब तक रुक्मनी ने उसके लिए खाना बनाया और उसे परोस दिया। आज उसकी पसंद का साग बना था, आलू-भाटा-पताल का खूब तीखा साग और साथ में गरम-गरम भात। भोजन के बाद मटकूदास ने पूछा- 'टेटकू नहीं दिख रहा है, कहाँ गया ?'
'घरवाली को लेकर अपनी ससुराल गया है, रात को आएगा।' रुक्मनी ने बताया। मटकूदास मन ही मन खुश हुआ, बहुत खुश हुआ।
रात को जब टेटकू घर वापस आया तो मटकूदास ने उससे पूछा- 'गया था बिलासपुर, काम मिला ?'
'नहीं जा पाया।' टेटकू ने जवाब दिया।
'नहीं जा पाया...क्यों नहीं जा पाया ?'
'घर में तुम नहीं थे तो दाई को कौन देखता ?'
'दाई का नाम बीच में क्यों ला रहा है ? साफ-साफ बोल न कि घर में पड़ा रहा।'
'सुरसती की देखरेख भी करनी थी।'
'अब सुरसती को बीच में ले आया ?' मटकूदास भड़का। टेटकू चुप रह गया।
'तूने कहा दाई को था कि ब्याह करवा दो तो नौकरी करने जाऊंगा, यह बात सच है या नहीं ?' मटकूदास ने पूछा।
'सच है।'
'फिर क्यों नहीं गया ?'
'नहीं गया।'
'वही पूछ रहा हूँ, क्यों नहीं गया ?'
'सोचा कि तुम आ जाओगे तब जाऊंगा।' टेटकू ने सफाई दी। मटकूदास गुस्से से भभक गया- 'मैं परदेस गया, मेहनत-मजदूरी करने, अपना पसीना बहाया। एक टाइम खाना खाकर जिंदा रहा, पैसा बचाकर लाया और तू घर में गुलछर्रे उड़ा रहा था ?' वह झटके से उठा और उसने टेटकू को पीटना शुरू किया। रुक्मनी ने बीच-बचाव किया लेकिन जब तक मटकूदास का मन नहीं भरा, उसने तब तक पीटा। सुरसती रोती हुई एक कोने में दुबकी खड़ी रही।
उस रात घर में खाना नहीं बना, सब भूखे रहे। किसी ने किसी कोई बात नहीं की। सब सो रहे थे, टेटकू जग रहा था, उठा और चुपचाप घर से निकल गया और रात के सन्नाटे में पैदल चल पड़ा। रास्ते के पेड़ टेटकू से पूछ रहे थे- 'कहाँ जा रहा है ?'
(३)
रात भर पैदल चलते-चलते न जाने कितना रास्ता कट गया। एक चबूतरा दिखा, उस पर सो गया। सुबह नींद खुली, कोई गाँव था। शाम को ससुराल से लौटते समय सास ने उसके हाथ में दो रुपये का लाल रंग का नोट रखा था, वही जेब में था। एक बस आती दिखी, वह मुंगेली से लौट रही थी और बिलासपुर जा रही थी, उसमें बैठ गया। छः आने की टिकट लगी। डेढ़ घंटे में बिलासपुर का बसस्टेंड आ गया। उसने चारों ओर नज़र घुमाई, बहुत सी बसें खड़ी थी। कुछ में कम्बाइन्ड ट्रांसपोर्ट लिखा था तो कुछ में सुदर्शन ट्रांसपोर्ट। कंडक्टर सवारी को बुलाने के लिए हल्ला मचा रहे थे। वह बसस्टेंड से बायीं सड़क पर चल पड़ा, पाँच मिनट में एक गोल आकार का बाज़ार आ गया। यह वही बेरोजगार मजबूरों को रोजगार देने वाला बाज़ार था, गोलबाजार।
दिन का दस बज चुका था, चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। गोलबाजार में सब कुछ बिक रहा था। एक तरफ बहुत सी सायकल बेचने की दूकानें थी तो दूसरी तरफ हलवाइयों की कतार। गोलबाज़ार के अंदर सब्जियों की दूकान जिसमें हरी-ताज़ी सब्ज़ियों के भरे टोकरे आ रहे थे। दो-तीन मनिहारी की दूकानें थी और एक हलवाई की भी। टेटकू सकुचाते हुए उस दूकान में घुस गया और गद्दी पर बैठे मालिक से पूछा- 'कुछ काम मिलेगा क्या ?'
टेटकू को काम मिल गया, भट्ठीघर में बर्तनों की साफ सफाई और मुख्य कारीगर के द्वारा बताए काम को करना। तनख्वाह तीस रुपए प्रति माह, खाना-पीना मुफ्त। ड्यूटी सुबह 6 से रात 11 बजे तक। ज़िंदगी भर आराम फरमाने वाले टेटकू को यह काम बहुत भारी पड़ा। सत्रह घंटे की ड्यूटी, वह भी भट्ठीघर में ? घर से भागकर न आया होता तो घर वापस चला जाता। रात को दूकान के बाहर बने चबूतरे में सोना पड़ता था। शक्कर के दो खाली बोरे मिले थे, एक को बिछा लो और दूसरे को ओढ़ लो। सोते साथ मच्छरों की फ़ौज का हमला होता, काटते या कान के पास भन्न-भन्न करते। वे भी दुखी हो जाते रहे होंगे क्योंकि इतनी लंबी ड्यूटी देने वाले इंसान की थकावट उनके प्रयासों पर पानी फेर दे देती। ड्यूटी के बीच में एक घंटे की छुट्टी मिलती। एक मील दूर पर अरपा नदी की रेत पर बैठकर 'दिशा-मैदान' करता, नदी में धोता, मुखारी करता, नहाता और वापस दूकान आ जाता। आठ-दस दिन बहुत बुरे बीते, फिर आदत पड़ गई। टेटकू को समझ में आने लग गया कि कलकत्ते से वापस आने पर उसके बाबू ने उसे क्यों पीटा था !
टेटकू को भट्ठी में उठती लपट से बहुत परेशानी थी। लपट में उसे सुरसती का सुंदर मुखड़ा नज़र आता था। सुरसती को ऐसी अवस्था में छोड़ कर बिना बताए भाग आना उसे बहुत अखर रहा था लेकिन उस रात जिस तरह बाबू ने सुरसती के सामने पिटाई की, वह अपमान सहन नहीं हुआ। बाबू को मारना था तो बाहर ले जाकर मारना था, अगले दिन मार लेता लेकिन बाप है, बाप को सब माफ है, कुछ कह नहीं सकते। पैदा किया है, बड़ा किया है, भात खिलाता है तो बिना कारण मार भी सकता है। खैर, इस बार तो उसने मारा, ठीक मारा, मेरी गलती थी लेकिन क्या करे सुरसती से एक पल दूर होने का मन ही न करे। मुझे लगता था, उसके सामने बैठा रहूँ, उसे देखता रहूँ, बालों से खेलता रहूँ और उसकी धड़कन सुनता रहूँ। बाबू ने ऐसी धुनाई की कि सब गुड़-गोबर हो गया और अब यहाँ भट्ठी की आंच के सामने बैठा सुरसती को याद करता हूँ, अपना खून और जी जला रहा हूँ।
एक दिन की बात है, नदी से लौटते समय रास्ते में किसी ने उसे आवाज़ दी- 'टेटकू, ओ टेटकू।' वह चौंका कि बिलासपुर में उसे किसने पुकारा ? रामबिलास उसकी ओर दौड़ते चला आ रहा था। वह उसका बचपन का साथी था। दोनों एक दूसरे के गले लग गए।
'कहाँ है रे तू ?' राम बिलास ने पूछा।
'मैं यहीं हूँ, बिलासपुर में।' टेटकू ने बताया।
'किसी को तेरा कुछ पता नहीं, तू बिना बताए घर से चला गया। सब परेशान हैं।'
'तो क्या सबको जता-बता कर आता ? यहाँ काम खोजने आया था, मिल गया।'
'गाँव में तो कुछ और हल्ला है।'
'क्या है ?'
'तेरे बाप ने मारा इसलिए तू हर छोड़कर भाग गया।'
'दोनों बात ठीक है लेकिन घर से भागा नहीं, नौकरी करने यहाँ आया।'
'क्या काम करता है ?'
'बहुत बड़ी होटल में काम करता हूँ।'
'अरे वाह, क्या करता है वहाँ ?'
'बढ़िया ठाठ है, थोड़ा-बहुत काम करना पड़ता है और खाने-पीने का बहुत आराम है।'
'मुझे भी लगवा दे न ?'
'ठीक है, मालिक से बात कर लेता हूँ फिर बताऊंगा। नौकरी बड़ी मुश्किल से मिलती है यहाँ। अच्छा, मेरे घर की तरफ गया था क्या ?'
'हाँ, गया था। तीन दिन पहले तेरा लड़का हुआ है।'
'सच में ?'
'हाँ, सच में।'
'चल तेरे को चाय पिलाता हूँ।'
'बस, चाय !'
'मेरे पास ज्यादा पैसा नहीं है, आठ आना जेब में है। तनख्वाह नहीं मिली है।'
'क्यों नहीं लिया ?'
'जब घर जाऊंगा, तब लूँगा।'
'घर कब जाएगा ?'
'अब जाऊंगा, लड़के की छठी में।' टेटकू खुश होकर बोला- 'लेकिन मेरे बारे में घर में मत बताना, तुझको मेरी कसम।'
'क्यों ?'
'अब कमाई करके जब घर जाऊंगा तब सबको मेरे बारे में मालूम पड़ना चाहिए।'
'ठीक है, नहीं बताऊंगा लेकिन मेरा काम मत भूलना।' रामबिलास ने चाय पीते-पीते बोला।
'किसी दिन मालिक खुश दिखेगा, उस दिन बात करूंगा।' टेटकू ने कहा, फिर से दोनों गले लगे और अपने-अपने रास्ते चल पड़े। खुशी के मारे टेटकू लहरा रहा था, उसे घर याद आ रहा था, सुरसती की याद आ रही थी और किसी बच्चे का अंजाना चेहरा हँसता हुआ दिखाई पड़ रहा था।
टेटकू 'सुसमय' ताड़कर मालिक के सामने अपना सिर खुजलाते खड़ा हो गया। मालिक ने पूछा- 'क्या बात है ?'
'घर जाऊंगा।' टेटकू ने बताया।
'तो जाओ।'
'तनख्वाह चाहिए।'
'कितने दिन का काम हो गया ?'
'ढाई महीना।'
'कितना पैसा चाहिए ?'
'जितना निकलता हो, दे दीजिए।'
'क्यों, काम नहीं करना है क्या ?'
'छठी के बाद लौट आऊँगा।'
'किसकी छठी है ?'
'मेरे लड़के की, चार दिन पहले हुआ है।'
'ऐसा क्या ? पर अभी तो तू खुद लड़का है।'
'गाँव तरफ जल्दी ब्याह हो जाता है मालिक, बच्चा भी जल्दी हो जाता है।'
'कब है छठी ?'
'परसों।'
'ठीक है, ये दो महीने की तनख्वाह साठ रुपए रख ले, बाकी हिसाब लौट कर होगा।'
'हौ।'
'पैसा सम्हाल कर रखना और ये पाँच रुपए और ले, मेरी तरफ से तेरे लड़के के लिए कपड़ा खरीद लेना।' मालिक ने कहा। टेटकू ने मालिक के पैर छुए, बाजार से लड़के के लिए कपड़ा खरीदा और अपने गाँव के लिए निकल पड़ा। बस में बैठ गया। आधा घंटा बीत गया, बस छूटने का नाम न ले, वह बार-बार ड्राइवर की सीट की ओर देखे, खाली सीट भरे तो बस आगे बढ़े। ड्राइवर न जाने कहाँ चला गया। उसने बाहर झांककर देखा लेकिन बेकार गया क्योंकि वह ड्राइवर को पहचानता ही नहीं था। कुछ देर बाद बस भर गई, कंडक्टर ने मुंह से सीटी बजाई और बस में चढ़ गया। अचानक ड्राइवर चढ़ गया, बस का इंजन चालू हो गया, हार्न बजा, बस हिली और धीरे-धीरे आगे सरकने लगी। टेटकू सोच रहा था कि उसको ड्राइवरी सीखनी चाहिए, ड्राइवर बन जाएगा तो बस को इस तरह बेमतलब लेट नहीं होने देगा और तेजी से भगाएगा लेकिन इस बस का ड्राइवर तो एकदम बेहूदा है, रास्ते में किसी ने भी हाथ दिखाया तो बस रोक देता है। पता नहीं, कैसा चलाता है ? अचानक बस रुकी, ड्राइवर ने कंडक्टर को कुछ कहा और नीचे उतर गया। कुछ यात्री भी उतरे। धीरे-धीरे सब उतर गए। बस का एक टायर-ट्यूब पंक्चर हो गया था और ड्राइवर कंडक्टर दोनों मिलकर चक्के को निकालने में भिड़े हुए थे।
किसी प्रकार चलते-घिसटते बस उस मुख्य सड़क तक पहुँच गई जहां से जरौंधा जाने का पैदल मार्ग शुरू होता था। टेटकू उसी राह से वापस अपने घर जा रहा था जहां से एक रात वह नाराज होकर निकला था। उस काली रात और इस सुहानी सुबह में ढाई माह की दूरी है, आलस्य और परिश्रम का अंतर है, कुछ न करने के बदले कुछ कर-गुजरने का साहस है। उस रात कदम थके हुए थे, आज तरोताज़ा हैं।
कितने दिन बीत गए थे दाई के हाथ का बना साग-भात खाए, आज खाऊँगा, जी भर कर खाऊँगा लेकिन खाने के पहले तालाब में नहाऊँगा। इस मौसम में तालाब के चारों तरफ कमल के फूल खिले होंगे, उनका गुच्छा बनाकर चुपके से सुरसती को दूँगा। सुरसती बिस्तर पर लेटी होगी या फिर अपनी गोद में बच्चे को सुला रही होगी लेकिन मैं तो जाते साथ बच्चे को जगा दूँगा, उसे गोद में ले लूँगा, उसको खूब सारा प्यार करूंगा। अरे, देखो, हड़बड़ी में सुरसती के लिए पायल खरीदना भूल गया। वह मुझसे बच्चे के बदले इनाम मांगेगी तो क्या दूँगा ? कोई न कोई बहाना सोचना पड़ेगा। सुरसती सीधी है, बहाने को सच ही मानेगी। हाँ, याद आया, बोल दूँगा- 'तुम्हारे नाप की पायल नहीं थी, सुनार को नाप दे आया हूँ, अगली बार ले आऊँगा।'
गाँव नज़दीक आने लगा, एक जानी-पहचानी सुगंध टेटकू के दिमाग में छाने लगी। यह वही सुगंध जिसे वह बिलासपुर में भूल चुका था। मिट्टी की सुगंध, हरियाली का रंग, सूर्य की चमक, धूल की धमक और अपनेपन का आभास सब उसे घेर कर चारों ओर नाचने लगे। लो, यह गाँव आ गया, वही गाँव, उसका अपना गाँव। गाँव का जो व्यक्ति टेटकू को देखता, देखता रह जाता। सब आश्चर्यचकित।
'टेटकू आ गया !'
'तुम तो बता रहे थे कि टेटकू ने आत्महत्या कर ली !'
'अरे नहीं, देखो, टेटकू ज़िन्दा है !'
'कहाँ गया था ?'
'क्या जाने कहाँ गया था ?'
'किससे पूछें ?'
'उसी से पूछेंगे।'
'कौन पूछेगा ?'
'सब पूछेंगे।'
'क्या पूछेंगे ?'
'यही, कि क्या तुम क्यों ज़िन्दा हो ?'
'और ?'
'इतने दिन कैसे ज़िन्दा रहे।'
'और ?'
'ज़िन्दा कैसे रहा जाता है ?'
'और ?'
'हाँ, यह भी पूछेंगे कि अकेले होकर जीने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है ?'
'अरे, अभी टेटकू को घर तो पहुँचने दो....' समवेत स्वर उठा।
(४)
घर पहुँचकर टेटकू ने आवाज़ लगाई- 'दाई ओ।'
'कौन ?' घर के अंदर से रुक्मनी का स्वर दौड़ते हुए बाहर आया।
'मैं, टेटकू।'
'मेरा टेटकू।' रुक्मनी रोने लगी। 'कहाँ गया था तू ? बिना बताए ?'
'मैं कमाने गया था दाई, बिलासपुर।'
'मेरा बेटा, आ जा, देख, तेरा लड़का हुआ है।' रुक्मनी उसका हाथ पकड़कर झोपड़ी के अंदर ले गई, खुशी-खुशी टेटकू अंदर गया, छोटा सा बच्चा टुकुर-टुकुर देख रहा था, सुरसती समझ गई कि कौन आया है। वह पीठ फेर कर लेट गई और सुबकने लगी। रुक्मनी बोली- 'तेरा बाबू खेत गया है, मैं उसे बताती हूँ और बुलाकर लाती हूँ।' वह दौड़ती हुई खेत की ओर चली गई। घर में ढाई लोग रह गए। टेटकू, सुरसती और बेटकू।
'सुरसती, नाराज है रे ?' टेटकू ने पूछा।
'बात मत करो।' सुरसती भड़की। उसकी मुद्रा यथावत रही।
'बात मत करो ? क्यों मत करो ?'
'मैंने कहा न, बात मत करो।'
'नाराज हो ?'
'नहीं, बहुत खुश हूँ।'
'मैं उस दिन बहुत गुस्से में था इसलिए तुझे बताए बिना चला गया। गलती हो गई, देख, मैं आ गया। कितना सुंदर बच्चा है ये !' टेटकू की बात सुनकर सुरसती ने करवट बदली और मुस्कुराते हुए बच्चे को देखने लगी। टेटकू समझ गया कि बात बन गई, उसने धीरे से सुरसती को सहारा देकर उठाया और गले लगा लिया। दोनों रो रहे थे, बेटकू अब भी टुकुर-टुकुर देख रहा था।
थोड़ी देर में रुक्मनी लौट आई, बोली- 'तेरा बाबू साँझ के समय खेत से लौटेगा।' टेटकू ने रुक्मनी के हाथ में तनख्वाह में मिले रुपए रख दिया और उसके पैर छूकर बोला- 'दाई, ये मेरी पहली कमाई है, तेरी है।' रुक्मनी के हाथ सुन्न पड़ गए, गला भर आया और आँखें विस्मय से खुली रह गई। उसने जीवन में किसी ने इतने रुपए नहीं दिए थे। उसने दस रुपए टेटकू को वापस किए और धीरे से कहा- 'सुरसती को दे देना।'
शाम को मटकूदास खेत से वापस लौटा तब टेटकू घर में नहीं था। रुक्मनी ने मटकूदास को बताया कि टेटकू को बिलासपुर में नौकरी मिल गई है और उसने दो महीने की पगार उसे लाकर दी है। मटकूदास ने पूरी बात चुपचाप सुनी और चुप रहा। सब सुनकर वह खुश भी था और दुखी भी। खुश इसलिए कि टेटकू किसी काम से लग गया, उसकी आवारागर्दी बंद हुई और दुखी इसलिए कि टेटकू को काम से लगाने के लिए उसे उस पर हाथ उठाना पड़ा। अगले दिन छठी होनी थी, दोनों ने उस पर चर्चा की और खाना खाने के बाद मटकूदास सो गया। टेटकू रात को देर से लौटा। उस रात पिता-पुत्र का वार्तालाप न हो सका। अगले दिन भी चुप्पी बनी रही, दोनों एक-दूसरे से बात करने से बचते रहे।
छठी के कार्यक्रम में सुरसती के मायके वाले आए और बिरादरी और पड़ोस के आठ-दस लोग भी बुलाए गए। किसी ने बच्चे को कपड़े दिए तो किसी ने पैसे। रुक्मनी ने मेहमानों को खिलाने के लिए भात-साग-चटनी बनाया और साथ में चाँवल-दूध की मीठी खीर भी। खुशी के दो कारण बन गए थे, घर में नया मेहमान आया और टेटकू की नौकरी लग गई। जब मेहमान चले गए, सब बैठे-बैठे सुस्ता रहे थे, मटकूदास ने बात शुरू की- 'कहाँ काम मिला ?'
'एक होटल है बाबू, बिलासपुर में, पेंड्रावाला। टेटकू धीरे से बोला।
'ये कैसा नाम है ?'
'वहाँ सब लोग ऐसा ही कुछ कहते हैं।'
'क्या काम करना पड़ता है ?'
'साफ-सफाई करता हूँ, बर्तन-कड़ाही माँजता हूँ।'
'तू कर लेता है ?'
'कुछ दिन तक हाथ-पैर में बहुत दर्द हुआ, अब आदत पड़ गई।'
'मैं भी कलकत्ता जाता हूँ तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है।'
'हाँ बाबू, मेहनत नहीं करेंगे तो इतना पैसा कौन देगा ?'
'ठीक बात है। तू छुट्टी लेकर आया है ?'
'हाँ, कल वापस जाऊंगा।' टेटकू बोला। सुरसती ने घूरकर टेटकू को देखा। टेटकू सिर ऊपर करके छप्पर की तरफ देखने लगा।
'एक-दो दिन और रुक जा, फिर चले जाना।'
'मेरी जगह कोई दूसरा आ गया तो नौकरी हाथ से निकल जाएगी।'
'निकल जाएगी तो दूसरी नौकरी खोज लेना। तू घबरा मत, कुछ नहीं होगा।'
'ठीक है बाबू।'
'टेटकू, मैंने तुझको बहुत मारा, तू नाराज़ है रे ?'
'नाराज था बाबू लेकिन अब नहीं हूँ। आपने ठीक किया, मैं कमाने लायक हो गया। जिस दिन मुझे पगार मिली उस दिन मुझे समझ आया कि मेहनत का इनाम कितनी खुशी देता है।'
'तो क्या सोचा ?'
'नौकरी पर जाऊंगा। काम सीख जाऊंगा तो तनख्वाह भी बढ़ जाएगी।'
'फिर अपना ध्यान रखना, वहाँ कोई गलत संगत मत बना लेना।'
'हौ।' टेटकू ने आपने पिता को आश्वस्त किया। उधर सुरसती के आंसू बह रहे थे।
जब बाबू सो गया तब टेटकू ने सुरसती को दस रुपए अपनी जेब से निकालकर दिया। सुरसती बोली- 'मुझे क्यों दे रहे हो ? मैं क्या करूंगी ?
'इसे रख लो, परसों सुबह मैं बिलासपुर जाऊंगा, दो-तीन माह बाद आऊँगा, शायद पैसे का कुछ काम पड़े।' टेटकू ने समझाया।'
'तुम फिर जा रहे हो ?'
'जाना पड़ेगा, बाबू भी तो जाता है कलकत्ता।'
'तुम यहीं कोई काम क्यों नहीं करते ?'
'यहाँ गाँव में खेती के अलावा और क्या काम है ? बोवाई के समय छुट्टी लेकर आ जाऊंगा तब एक महीना तुम्हारे पास रहूँगा।'
'सच बोल रहे हो, झूठ तो नहीं।'
'सच बोल रहा हूँ।'
'पर इतने सारे रुपए मत दो। एक काम करो, पाँच रुपए मुझे दे दो, बाकी पाँच तुम रखो। बिलासपुर जाने का बस-किराया लगेगा और वहाँ कुछ खाने का मन करेगा तो पैसा जेब में होना चाहिए।'
'मुझे खाने के लिए वहाँ मिलता है।'
'रख लो न, गोलगप्पे खा लेना, सनीमा देख लेना और कभी-कभी दूध पी लिया करो, ताकत बनी रहती है।'
'ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।' टेटकू ने हँसते हुए कहा।
चार दिन पलक झपकते बीत गए। सुबह-सुबह टेटकू भारत के असंख्य मजबूरों की तरह नौकरी पर फिर निकल गया। नौकरी, जो इस कदर निर्मम है कि इसे न तो परिवार का महत्व समझ आता है और न अकेले जीने का दर्द। बेहूदी नौकरी।
(५)
दूकान भी वही थी, मालिक वही था लेकिन इस बार की नौकरी में टेटकू पहले की तरह दुखी नहीं था क्योंकि वह भगोड़ा नहीं बल्कि जगजाहिर नौकरी पर था। पूरा गाँव जान गया था कि टेटकू मटरगश्ती करने वाला आवारा छोकरा नहीं है, बिलासपुर की होटल में काम करने वाला टेटकूदास मानिकपुरी है।
उस्तादी एक विशिष्टता है जिसका अर्थ है होशियारी। उस्ताद का मतलब है, जो अपने कार्य में निपुण हो। उस्ताद शब्द का प्रयोग अनेक क्षेत्रों में होता है, खास तौर से संगीत में, पहलवानी में, दादागिरी में। हलवाई की दूकान में जिस व्यक्ति को मीठा और नमकीन बनाने में महारत होती है, उसे भी उस्ताद कहते हैं। इसका काम होता है, होटल में बनने वाले सामान का तालमेल बैठाना, कच्चा माल खराब न हो इसका ध्यान रखना, भट्ठी की आंच पर नज़र रखना, समय पर माल तैयार होने के बाद उसे खूबसूरती से सजाकर काउंटर पर भेजना, ग्राहक की ज़रूरत और उसके स्वाद का आकलन करना, निर्माण के दौरान सामान की गुणवत्ता का ख्याल रखना, कारखाने में हो रहे नुकसान को कम करना, मातहतों से काम लेना और मालिक तथा अन्य कामगारों के मध्य पुल का काम करना।
होटल में उस्ताद का जलवा मालिक से अधिक होता है। इसके दो कारण होते हैं, पहला, सभी कामगार उसके 'डायरेक्ट कंट्रोल' में रहते हैं और दूसरा, होटल के चलने या न चलने का पूरा दारोमदार उस्ताद के हुनर पर रहता है। उस्ताद बढ़िया तो माल बढ़िया बनता है, माल अच्छा तो ग्राहक खुश रहते हैं, ग्राहक खुश तो दूकान चलती है, दूकान चलती है तो मालिक की तिजोरी भरती है, मालिक मालदार होता है तो उसकी बीवी गहनों से लदी रहती है, गहने पहन कर बीवी अपने पति से खुश रहती है, बीवी खुश रहती है तो मालिक के घर में शांति रहती है। समझने की बात यह है कि मालिक के घर में शांति का सूत्र इसी उस्ताद के हाथ में है।
टेटकू की नज़र इस बार अपने उस्ताद की उस्तादी पर थी। उसे समझ में आ गया था कि झाड़ू-बर्तन करता रह गया तो ज़िंदगी भर वही करता रहेगा और तनख्वाह कभी नहीं बढ़ेगी जबकि उस्ताद की तनख्वाह उससे सात गुनी अधिक थी। उसने निर्णय लिया कि वह उस्ताद को पटाएगा और उसकी शागिर्दी करेगा।
एक दिन की बात है कि उस्ताद रसगुल्ला की गोली करते समय गाना गुनगुना रहा था- 'सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, हमें डर है हम खो न जायें कहीं...।' टेटकू ने हिम्मत बटोरते हुए कहा- 'गुरु जी, बहुत बढ़िया गाते हो।'
'अच्छा लगा? 'मधुमती' पिक्चर का गाना है।'
'मुझे भी गाना सिखा दो गुरु जी।'
'का करेगा गाना सीख के, फिलिम में काम करेगा? सीखना है तो मिठाई बनाना सीख, नमकीन बनाना सीख तो जिंदगी भर काम आएगा।'
'मुझे कौन सिखायेगा गुरु जी?'
'सीखेगा? मैं सिखाऊँगा।' कल्लू उस्ताद ने पूछा। टेटकू बर्तन माँजना छोडकर अपने हाथ धोया, उचक कर खड़ा हुआ और झुककर उस्ताद के पाँव पकड़ लिये। टेटकू उसके पैर को पकड़ कर वहीं बैठ गया, छोड़े न। उस्ताद बोला- 'पैर तो छोड़।'
'नहीं छोडूंगा। पहले हाँ करो कि मेरे को कारीगरी सिखाओगे।'
'अच्छा चल, सिखाऊँगा लेकिन मेरी एक शर्त है, मानेगा?'
'कौन सी शर्त?'
'जो मैं कहूँगा, मानना पड़ेगा.'
'क्या कहोगे?'
'सवाल करता है। सीधे-सीधे हाँ बोल।'
'मानूँगा।' टेटकू डरते-डरते बोला।
'जा, मेरे लिए एक बंगला पान बनवा कर लाना, थोड़ी सी तम्बाखू अलग से लेकर आना।'
'जी, गुरु जी।' टेटकू ने उस्ताद के पैर छोड़े और पान लेने के लिए तेजी से निकल गया।
टेटकू को सफाई और बर्तन साफ करने के साथ-साथ अब उस्ताद के पास बैठकर काम करने के मौके मिलने लगे। शुरुआत तो हमेशा छोटी होती है लेकिन करते-करते मनुष्य काम सीख लेता है बशर्ते वह सीखना चाहे। टेटकू को शौक था इसलिए वह उस्ताद के पीछे लगा रहता और धीरे-धीरे काम की बारीकी समझने लगा।
पीतल के बड़े गंज में 15 सेर दूध उबलने के लिये चढ़ा हुआ था। एक तरफ उस्ताद और टेटकू समोसा भर रहे थे लेकिन उस्ताद की नज़र दूध पर थी ताकि दूध न उफने। जब दूध उबलने लगा तो उसने टेटकू से कहा- 'जल्दी कर, दूध उतार, संभाल कर।'
टेटकू उठा, दोनों हाथ में छोटे-छोटे कपड़े लेकर गंज को भट्ठी से उतारने लगा। अचानक संतुलन बिगड़ा और दूध का गंज हाथ से छूट गया। उबलता हुआ दूध टेटकू के पैरों से होता हुआ जमीन में फैल गया। टेटकू के मुंह से चीख निकली, उस्ताद उठकर टेटकू की ओर दौड़ा। चीख सुनकर मालिक कारखाने में आया, उसने देखा कि दूध छलकने से टेटकू के पैरों में जलन हो रही थी। जले हुए हिस्से में तुरंत 'बरनाल' का पीला लेप करवा दिया गया। मालिक ने उस्ताद को डांटा- 'नये लड़के को दूध उतारने के लिए किसने बोला, देखो बेचारा जल गया?'
'मैंने बोला।' उस्ताद ने कहा।
'क्यों?'
'चार महीना हो गया काम करते, अभी नया है क्या?'
'तो क्या पुराना हो गया?'
'गबरू जवान है, कब काम सीखेगा?'
'लेकिन यह ठीक हुआ क्या?'
'ठीक हुआ। भट्ठी के काम में जलेगा नहीं तो काम कैसे सीखेगा सेठ जी?'
'क्यों रे, भट्ठी में ऐसे काम करते हैं?' मालिक ने टेटकू से पूछा।
टेटकू चुप। 'सावधानी से काम किया करो।' मालिक ने डपटकर कहा और बड़बड़ाते हुए वापस चला गया।
टेटकू के पैर में जलन हो रही थी। उसने उस्ताद से कहा- 'बहुत जल रहा है।'
'बच गया रे टेटकू, तेरे पैर में दूध का झाग गिरा, दूध जमीन में गिरा। अगर पैर में दूध गिरता तो समझ में आता कि जलना क्या होता है?'
'बच गया मैं.'
'हूँ...क्यों रे, तेरा हाथ जला है क्या? चल समोसा भर।' उस्ताद ने उसे डांटते हुए कहा।
समोसा भरते हुए उस्ताद टेटकू को समझा रहा था- 'क्यों, सायकल चलाना सीखा था तो गिरा था या नहीं? गिरा होगा। जब गिरा होगा तब सायकल का बेलेन्स समझ में आया होगा, वैसे ही ये है। यहाँ तो रोज का काम है, उबलता हुआ दूध, खौलता हुआ शीरा, और गरम घी, ज़रा सा ध्यान बंटा, पकड़ कमजोर हुई तो वही होगा जो आज हुआ। आज जल गया, अच्छा हुआ, अब ज़िंदगी भर इसे याद रखेगा और भट्ठी में सावधानी से काम करेगा।जवान आदमी, पंद्रह सेर दूध नहीं उठा पाया, घंटा कारीगरी सीखेगा। मालिक से मुझे ज़बरन का डांट खिलवा दिया।'
'माफ़ करना गुरु जी।'
'दूध उतारते समय क्या घरवाली की याद आ रही थी?'
'नहीं गुरु जी, लेकिन अभी याद आ रही है।'
'घर जायेगा?'
'नहीं जाऊंगा। घर जाऊंगा तो मेरी इस हालत को देखकर मुझे यहाँ कोई नहीं आने देगा, मैं वहीं अटक जाऊंगा।'
'अब दुखी मत हो, आज रात को लक्ष्मी टाकीज़ में सेकेंड शो चलेंगे, मैं तुझे 'मधुमती' पिक्चर दिखाऊँगा। वैजयंती माला को देखेगा तो तबीयत मस्त हो जाएगी।'
'पर मेरे पास टिकट के पैसे नहीं है।'
'मैं टिकट कटाऊंगा न रे पगले।' उस्ताद बोला। इस प्रस्ताव को सुनकर टेटकू अपने पैर की जलन को भूल गया और सुरसती के बदले वैजयंती माला की यादों में खो गया। समोसा भरने की गति और तेज हो गयी।
सेकेण्ड शो रात को एक बजे छूटा। गुरु-चेला टाकीज़ से पैदल वापस लौट रहे थे। फिल्म की चर्चा चल रही थी।
'कैसी लगी पिक्चर?' उस्ताद ने पूछा।
'मज़ा आ गया।'
'क्या अच्छा लगा?'
'गाने एक से एक थे गुरु जी।'
'सबसे अच्छा कौन सा लगा?'
'दैया रे दैया, चढ़ गयो पापी बिछुआ।'
'कैसे? '
'हमारे गाँव में एक लड़का है, बहुत अच्छे छत्तीसगढ़ी गीत गाता है. वो एक गाना गाया करता था- 'चाबिस रे चाबिस, मोला बिछुआ ह चाबिस, दाई ओ।'
'क्या मतलब?'
'काट दिया रे काट दिया, मुझे बिच्छू ने काट दिया, ओ मां।'
'तेरे को कभी बिच्छू ने काटा?'
'वैजयंतीमाला वाले बिच्छू ने काटा था।'
'कब रे?'
'गुरु जी, मैं आपको आज बता रहा हूँ, मैं अपने ब्याह के पहले ही बाप बन गया था।'
'आंय, ब्याह के पहले कोई कैसे बाप बनेगा?'
'जब मेरा ब्याह हुआ तब सुरसती के पेट में बेटकू आ चुका था।'
'कैसे?'
'वही, एक दिन सुरसती को देखकर बिच्छू चढ़ गया था।' टेटकू ने हंसते हुए बताया।
उस्ताद मोहल्ला तेलीपारा में एक कमरे की खोली लेकर रहता था। बात करते-करते उसका घर आ गया। उस्ताद ने दरवाजा खटखटाया, उसकी घरवाली ने खोला। साथ में एक अनजान को देखकर बोली- 'कौन है ये?'
'मेरा चेला है, साथ में काम करता है।'
'तो?'
'आज हम लोगों को कारखाने में काम निपटाते बहुत देर हो गई तो मैं इससे बोला, चल मेरे घर में सो जाना।'
'एक कमरे का घर है, ले आए एक और आदमी को यहाँ सुलाने के लिए, समझ नहीं आता तुम्हारी अकल को क्या हो गया है!'
'एक कोने में जमीन पर पड़ा रहेगा।'
'मैं नहीं मानती। उसको दरी और चादर दे दो, घर के बाहर सो जाएगा।' उस्ताद की घरवाली ने अंतिम फैसला सुनाया। टेटकू को दरी और चादर दे दिया गया। वह घर के बाहर चबूतरे पर सोने का प्रयास करता रहा। बहुत देर तक उसके दिमाग में वैजयंतीमाला की अदाएं तैरती रही फिर वैजयंतीमाला और सुरसती का चेहरा 'मिक्स' होकर गड्ड-मड्ड होने लगा और उसकी आँखें बोझिल हो गई। अचानक चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी और नींद ने आ घेरा। टेटकू को रात भर मच्छर काटते रहे और बिछुआ भी।
(६)
हलवाइयों के बीच यह धारणा है कि कसाई का कुत्ता और होटल का नौकर एक जगह नहीं टिकता (यह कहावत अब कार्पोरेट सेक्टर और पत्रकार जगत में भी चलने लगी है), वह दस जगह मुंह मारता है।
वे सभी कारोबार जो श्रमिकों पर निर्भर हैं, वे श्रमिकों के बल पर ही चलते हैं। कोई भी इकाई हो, यदि के उसके पास काम करने वाले या अच्छा काम करने वाले नहीं हैं तो व्यापार का भसकना तय है। मालिक-श्रमिक सम्बन्ध सदैव मधुर नहीं रहते क्योंकि काम लेने और काम करने की मात्रा में हमेशा अंतर रहता है लेकिन जब यह अंतर बढ़ जाता है तो खटास आने लगती है। उसके बाद दोनों अलग-अलग ढंग से एक-दूसरे से अलग होने के बहाने खोजने लगते हैं जो झटपट मिल जाते हैं और मिल कर काम करने वाले दो लोग अलग हो जाते हैं।
होटलों में यदाकदा ही कोई टिकता है, आयाराम-गयाराम होते रहता है। उस्ताद बदलते रहे लेकिन टेटकू टिका रहा। कुछ वर्षों की मेहनत के बाद वह स्वयं उस्ताद के 'लेवल' में पहुँच गया और उस्ताद बन गया। इस बीच उसने सुरसती को भी बिलासपुर बुलवा लिया, बेटकू की एक बहन भी आ गई लेकिन मां-बाप गाँव में ही थे। उसकी तनख्वाह बढ़ गई लेकिन वह नौकरी करते हुए अपनी ज़िन्दगी बसर नहीं करना चाहता था। वह इस तलाश में था कि छोटी-मोटी ही सही, एक दूकान खोल ली जाए।
गोलबाज़ार से लगा हुआ है शनीचरी पड़ाव, जहाँ ग्रामीणों की ज़रुरत के सामान की अनेक दूकानें हैं। जहां बहुत सी आरा मशीनें भी हैं, वहीँ पर बेजा कब्ज़ा पर बनी हुई एक झोपड़ीनुमा दूकान किराये पर मिल रही थी। दूकान मालिक से किराया तय हो गया लेकिन उसने एक विचित्र शर्त डाल दी, दूकान देने के लिये उसने ऐसे व्यक्ति की 'गेरेंटी' मांगी जिसे वह जानता हो। केवल एक व्यक्ति था जिसे 'वह' जानता था और टेटकू भी, वह था 'पेंड्रावाला' का मालिक। टेटकू को समझ में न आये कि वह यह बात मालिक से कैसे कहे? उसकी हिम्मत न हो और देर हो जाने पर दूकान हाथ से निकल जाने का डर अलग से था।
एक दिन उसने एक कप चाय बनाई और मालिक के सामने जा खड़ा हुआ। मालिक ने उसे देखा और पूछा- 'चाय लाया, लेकिन मैंने तो नहीं मंगाया।'
'स्पेशल चाय बनाया हूँ, आपके लिए।' टेटकू बोला.
'क्या बात है? कुछ चाहिए क्या? चाय पीते हुए मालिक ने पूछा।
'आपकी गेरेंटी चाहिए।'
'क्या ले रहे हो?'
'एक दूकान किराये पर ले रहा हूँ, छोटी सी चाय-भजिया की दूकान खोलूँगा। आप बोलोगे तब दूकान मिलेगी।'
'अरे वाह, धंधा शुरू कर रहा है। अच्छा सोचा है। जिसकी दूकान है उसे यहीं बुलवा ले, मैं बोल दूंगा। अब समझ में आया स्पेशल चाय का मतलब।' मालिक ने हंसते हुए कहा. टेटकू ने झुककर माली के पैर छुए।
टेटकू की दूकान खुल गई, साल भर में भरपूर चलने लगी। हर दिवाली के दूसरे दिन टेटकू अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपने पुराने मालिक के पैर छूने आता है, साथ में मिठाई लाता है। मालिक को मालूम है कि टेटकू ज़रूर आएगा इसलिए वह उसके बच्चों के नाप के कपड़े पहले से मंगवाकर रखता है।
टेटकू अब किसी मालिक का नौकर नहीं रहा, खुद मालिक बन गया है लेकिन वह अपने मालिक को आज भी मालिक ही मानता है।
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किस्सा चंदू पंडित का : ब्राह्मण का शाप
(१)
मध्यप्रदेश के जिला सतना के पास एक गाँव है बेरहना, वहाँ पंडित जानकीशरण पाण्डेय के घर चौथे पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया- चन्द्रशेखर। पंडित जानकीशरण मंदिर के पुजारी थे, संस्कृत के श्लोक उनकी आजीविका के स्रोत थे। पिता के सौजन्य से चन्द्रशेखर को पूजापाठ में उपयोग आने वाले श्लोक कंठस्थ हो गए थे। पिता ने बारह वर्ष की उम्र में उसका विवाह करवा दिया। गौना नहीं हुआ था इसलिए चन्द्रशेखर की पत्नी अपने मायके में रहती थी। गाँव में जीवनयापन कठिन हो रहा था इसलिए पंडित जानकीशरण सपरिवार बिलासपुर आ गए और गोंडपारा के गोवर्धनलाल गुप्ता के द्वारा निर्मित शिव मंदिर के पुजारी हो गए।
चन्द्रशेखर को अभिनय करने का बहुत शौक था। आइने के सामने खड़े होकर वह अपने चेहरे को विभिन्न मुद्राओं में निहारता और उसे लगता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब वह सिनेमा के रुपहले पर्दे पर दिलीपकुमार या देव आनंद की तरह अवतरित होगा और उसे देखकर दर्शक सीटियाँ बजाएँगे। वह मधुबाला और वैजयंतीमाला जैसी अभिनेत्रियों के साथ नायक की भूमिका में स्वयं को देखना चाहता था। उसे मालूम था कि उसका सपना बिलासपुर में नहीं बंबई में साकार होगा, उसके लिए संघर्ष करना होगा और भोले-भण्डारी की कृपा हो गई तो मधुबाला और वैजयंतीमाला उसकी बाँहों में झूलती हुई गाने गाएंगी।
जब तक बंबई का कोई स्रोत हाथ में न हो, उसकी बंबई जाने की उसकी हिम्मत न हो, जेब में पैसे भी न थे। उस बीच गोलबाजार की रुई-गद्दा गली में रामलीला की एक मंडली आई, चन्द्रशेखर रामलीला के व्यवस्थापक चतुर्भुज मिश्रा से मिला और रामलीला में अभिनय करने का अवसर मांगा। व्यवस्थापक ने उसे घूरकर देखा और पूछा- 'पहले कभी काम किया है ?'
'नहीं, पहले कभी नहीं किया है लेकिन मैं बहुत मंजा हुआ कलाकार हूँ।' पंडित बोला।
'मंजे हुए कलाकार हो ? जब कभी काम नहीं किया तो कैसे मालूम ?'
'आप रामलीला में कोई भी 'पार्ट' मुझे देकर मेरा 'टेस्ट' कर लीजिए, आपको मालूम पड़ जाएगा।'
'कोई भी पार्ट ?'
'हाँ, दे कर देखिए।'
'ठीक है, एक रुपया रोज का दूंगा, मैं सोचूंगा एक पैकेट सीज़र सिगरेट नहीं पिया।'
'ऐसा क्यों सोचते हैं आप, एक दिन ऐसा आएगा जब मेरी कद्र करोगे।' पंडित बोला। इस प्रकार पंडित चन्द्रशेखर की अभिनय-यात्रा आरंभ हो गई और वह भरत के 'रोल' के लिए चुन लिया गया।
रामलीला के कलाकार सुबह होते ही एक मील दूर स्थित अरपा नदी के तट पर चले जाते, नहा-धोकर वापस आते तब तक रसोइया भोजन तैयार कर लेता। चन्द्रशेखर सबको भोजन परोसता, उसके बाद खुद अपनी थाली लगाकर खाने बैठता। भोजन के पश्चात एक घंटा विश्राम-काल होता, उसके बाद सारे कलाकार 'रिहर्सल' के लिए एकत्रित हो जाते। चन्द्रशेखर के रिहर्सल का पहला दिन था। वह बेफिकर था। उस रात रामचरितमानस के उस दृश्य का मंचन होना था जिसमें राजकुमार भरत जब अपने नाना के घर से वापस लौटते हैं और उन्हें बताया जाता है कि राम को वनवास भेज दिया गया है और पिता का निधन हो गया है। इस समाचार को सुनकर वे दुखी हो जाते हैं और रोते हुए बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं।
दिए गए संवाद चन्द्रशेखर ने वहीं बैठे-बैठे रट लिए। चतुर्भुज कक्का ने रिहर्सल शुरू करवाई, सब पात्र अपने-अपने संवाद बोलकर अभिनय कौशल दिखा रहे थे। जब चन्द्रशेखर की बारी आई, कक्का चीखे- 'चंदू पंडित, आओ और अपना संवाद बोलो।' चन्द्रशेखर ने सभी संवाद सही कहे और अभिनय का अच्छा नमूना प्रस्तुत किया लेकिन संवाद बोलने के पश्चात बेहोश होकर उसे सामने गिर पड़ना था, वह उससे न बने। उसे डर लग रहा था कि उस तरह गिरने से कहीं उसकी नाक या दाँत न टूट जाएँ ! संवाद के तीन 'रीटेक' हुए, सब सही रहा लेकिन चंदू पंडित खड़ा का खड़ा रह जाए, गिरने की हिम्मत न करे। अगले रीटेक में चतुर्भुज कक्का चुपचाप चंदू पंडित के पीछे खड़े हो गए और जैसे ही संवाद पूरा हुआ और भरत के मूर्छित होकर गिरने का प्रसंग आया, कक्का ने चंदू पंडित के घुटने के पीछे जोरदार लात लगाई, चंदू पंडित मुंह के बल गिर पड़ा।
चंदू पंडित उठा, इधर-उधर देख कर हँसते हुए खड़ा हो गया और सीधे चतुर्भुज कक्का के पाँव पर लोटने लगा। कक्का बोले- 'वाह चंदू पंडित, तुम तो कमाल के कलाकार हो।'
'आपका आशीर्वाद है कक्का।'
'अब से अपने-आप गिर जाना, नहीं तो मुझे 'पब्लिक' के सामने तुम्हें लतियाना पड़ेगा।'
'मैं समझ गया कक्का।'
'अपनी आवाज थोड़ा तेज करो बचऊ, पीछे बैठी पब्लिक तक को साफ-साफ सुनाई पड़ना चाहिए।'
'जो आज्ञा।'
'इतनी तेज न कर देना जैसी रावण की होती है।'
'समझ गया।'
'आवाज़ में इतना दर्द होना चाहिए कि सुनने वाले को रुलाई आ जाए।'
'जी।'
'क्या जी ?'
'जी, करके बताऊंगा, आज मंच पर प्रहसन होने तो दीजिए। आप मेरी अदाकारी का लोहा मान लेंगे। जो है सो है।'
'गिरने से डरोगे तो नहीं ?'
'वह डर आपने दूर कर दिया कक्का।' चन्द्रशेखर बोला।
रात को आठ बजे से दर्शकों का मंच के सामने आकर बैठना शुरू हो गया। बच्चे अपने साथ बोरा और चादर लेकर आए थे जिसे बिछाकर उनके परिवारजनों के लिए जगह आरक्षित कर ली गई। रंगीन पर्दे के पीछे हलचल चल रही थी लेकिन दर्शकों को कुछ दिख नहीं रहा था। बच्चे इधर-उधर झांक कर देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन एक झलक दिखती फिर पर्दे की ओट हो जाती। दर्शकों को मालूम था कि आज भरत-विलाप का खेला होगा क्योंकि कल रात को भगवान राम वन की ओर प्रस्थान कर गए थे। रानी कैकेई राम को जंगल जाते देख मुस्कुरा रही थी और दुष्ट मंथरा खुशी के मारे दोहरी हुई जा रही थी। ऐसा लगे कि स्टेज में चढ़कर कैकई और मंथरा दोनों को सोंटी से अच्छी धुनाई करे लेकिन कैसे करें ? बच्चे सोचते बहुत है लेकिन जैसा सोचते हैं, वैसा बेचारे कर नहीं पाते।
इधर रात का नौ बज गया लेकिन हारमोनियम और तबला वाले मंच के सामने लगे तख्त पर विराजे नहीं। सबकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। हारमोनियम और तबला भी रखे-रखे अलसा रहे थे। छोटे बच्चों को नींद आने लगी। कुछ वहीं अपने घुटने सिकोड़ कर सो गए। अचानक एक धोती-कुर्ता-टोपीधारी, ललाट में रंगबिरंगा तिलक लगाए पंडितजी प्रगट हुए, ये चतुर्भुज कक्का थे जिन्हें सम्पूर्ण रामायण कंठस्थ थी। उनके पीछे तबला वादक भी अपनी धोती सम्हालते आ गए। दोनों अपने स्थान पर बैठ गए और अपने वाद्ययंत्र से खिलवाड़ करने लगे, चीं-चीं....ढप-ढुप। बहुत देर तक दोनों एक-दूसरे को देखकर सुर बैठाते रहे फिर मुस्कुराए और चतुर्भुज कक्का ने अलाप लेने के पहले हारमोनियम से सुर मिलाकर पब्लिक से जयकारा लगवाया- सियावर रामचंद्र की जय। पवनसुत हनुमान की जय। सीता मैया की जय। बम बम।
कुछ देर बाद पर्दे में हलचल हुई। किसी ने रस्सी खींची और पर्दा खुलना शुरू हो गया। सामने सजावट किसी राजमहल जैसी थी, असल में वह रनिवास था। बीच में रखी एक कुर्सी को लाल रंग के मखमली कपड़े से ढँक दिया गया था ताकि वह सिंहासन जैसी दिखाई पड़े। एक आदमी रानी कैकेई की वेषभूषा धारण किए हुए मंच पर आया और सिंहासन पर आसीन हो गया। उसके पीछे दूसरा आदमी मंथरा का रूप धरे लाठी टेकते हुए आ गया। मंथरा के बाल सफ़ेद थे, कमर झुकी हुई थी, आँखों और बातों में कुटिलता झलक रही थी। दोनों के मध्य संवाद आरंभ हुआ : 'मंथरा, पता करके मुझे बता कि राजकुमार भरत कब आ रहे हैं ?' कैकेई ने पूछा।
'राजमाता, राजकुमार भरत राजमहल में प्रवेश कर चुके हैं। कुछ ही क्षणों में वे आपके समक्ष होंगे।' मंथरा ने कहा।
'ये क्षण इतने लंबे क्यों लगते हैं मंथरा ?'
'प्रतीक्षा लंबी लगती ही है महारानी।'
'यह कब समाप्त होगी ?'
'होने वाली है, राजकुमार आते ही होंगे।' मंथरा ने कहा।
उसी समय चतुर्भुज कक्का ने अपने हारमोनियम को सम्हाला, जरा तन कर बैठ गए। तबलावादक को कुछ इशारा किया। तबलावादक ने तबले पर टेल्कम पावडर छिड़का और सतर्क होकर चतुर्भुज की ओर देखने लगा। चतुर्भुज कक्का ने एक लंबी तान लगाई और राग बिलावल थाट पर मधुर स्वर में गाने लगे-
'तात बात मैं सकल सँवारी, भै मंथरा सहाय बिचारी.
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ, भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ.'
'सुनतु भरतु भए बिबस बिषादा, जनु सहमेउ करि केहरि नादा.
तात तात हा तात पुकारी, परे भूमितल ब्याकुल भारी.'
गीत-संगीत थम गया। मंच पर भरत का पदार्पण हुआ। कैकेयी भरत से बोली- 'आओ पुत्र, तुम भले आए। बहुत देर लगा दी पुत्र ?'
'क्या बात है माता ? सम्पूर्ण नगर में, राज महल में इतनी शांति क्यों है ? सब लोग चुप क्यों हैं ?' भरत ने माता कैकेई के चरणस्पर्श करते हुए प्रश्न किया।
'हे पुत्र, मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा ने मेरी बहुत सहायता की लेकिन विधाता ने बीच में जरा सा काम बिगाड़ दिया। तुम्हारे पिता राजा दशरथ देवलोक पधार गए।' कैकेई ने कहा।
भरत यह सुनते ही विषाद के मारे विवश हो गए, मानो सिंह की गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे 'तात ! तात ! हा तात !' पुकारते हुए अत्यंत व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े.
भरत की भूमिका में चंदू पंडित ने ऐसा गज़ब का अभिनय किया कि दर्शक सिसकने लगे, उनके आँसू बहने लगे। चतुर्भुज कक्का प्रसन्न हो गए लेकिन चंदू पंडित की नाक में कस कर लग गया था। वह बेचारा दर्द के मारे बेहाल हो रहा था और चाहकर भी अपनी नाक को सहला नहीं पा रहा था क्योंकि भरत को मूर्छित जो
रहना था।
चन्द्रशेखर का अभिनय बढ़िया रहा। उसकी रामलीला में धाक जाम गई। कारण यह था कि रामलीला के अन्य कलाकार अपना पेट भरने के लिए काम करते थे, वे कलाकार नहीं थे जबकि चन्द्रशेखर को अभिनय करना आता था, उसके द्वारा बोले गए संवादों की अदायगी दर्शकों को प्रभावित करती थी और साथ-साथ वह अच्छा गायक भी था। चतुर्भुज कक्का ने उसे हनुमान का रोल दिया, फिर विभीषण का, वह हर रोल में बढ़िया काम करता था, परिणामस्वरूप रामलीला देखने वालों की भीड़ बढ्ने लगी और चढ़ावे की थाली में चिल्हर पैसे अधिक आने लगे। इधर चतुर्भुज कक्का ने चंदू को सम्मान देने के हिसाब से सबको भोजन परोसने के दायित्व से मुक्त कर दिया और दूसरा व्यक्ति थाली सजाकर उसे भोजन परोसने लगा। चन्द्रशेखर को दो बातें समझ में आ गई; एक, उसके पैर रामलीला में जम गए हैं और दो, उसे अब बंबई की फिल्मनगरी में पैर जमाना है।
(२)
उसके दोस्त उसे उकसाते थे- 'पंडित, निकल जा बंबई। तेरा जन्म रामलीला में काम करने के लिए नहीं हुआ है। तू गाड़ी में बैठ और बंबई में पहुँच, फिलिम वाले तेरा रास्ता देख रहे हैं। मीनाकुमारी तेरे साथ जोड़ी बनाने के लिए तरस रही है।' यह सुनकर चन्द्रशेखर को गुदगुदी तो होती लेकिन वह उसे जाहिर न करता और उदास होकर जवाब देता- 'मत चढ़ाओ यार चने के झाड़ पर, बंबई में मेरे जैसे हज़ार भटकते हैं, जो है सो है।'
'अरे नहीं, कैसी बात करता है तू ? दिलीपकुमार को देख, पूना के रेस्टोरेन्ट में सेंडविच बनाता था, बंदर जैसा गोल-गोल चेहरा, आज इंडिया भर में चमक रहा है। उसको तो एक्टिंग भी नहीं आती थी। देविकारानी ने उसे ठोक-पीट कर सिखाया तब एक्टर बना। तू तो पैदायशी कलाकार है और गायक भी है।' चन्द्रशेखर के दोस्त दुक्की ने उसको समझाया।
'तुम्हारी बात ठीक है लेकिन मैं दिलीपकुमार नहीं हूँ।'
'दिलीपकुमार कौन सा दिलीपकुमार था ? यूसुफ़ खान था। तेरा टेलेंट कोई देखेगा तब तो जानेगा कि तू कौन है।'
'जाते साथ तो कोई फिलिम में काम नहीं देगा ? वहाँ खाऊँगा क्या ?'
'सब बन जाएगा, तू हिम्मत तो कर।' दुक्की ने हौसला बढ़ाया।
इस बीच रामलीला बिलासपुर से कोरबा चली गई। चन्द्रशेखर भी साथ गया। उसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और महत्वाकांक्षा भी लेकिन हिम्मत काम नहीं कर रही थी।
वह लौटकर बिलासपुर आया, एक दिन ताव खा गया और जेब बीस रुपए रखकर सुबह की मेल गाड़ी से बंबई के लिए 'विदाउट टिकट' रवाना हो गया।
बिलासपुर से लगभग 170 किलोमीटर दूर दुर्ग और राजनांदगांव के बीच टिकट-चेकर डिब्बे में यात्रियों की टिकट जांच रहा था लेकिन चन्द्रशेखर का ध्यान उस पर नहीं गया। वह ट्रेन के बाहर दौड़ती धरती और पेड़ों को देख रहा था। वह घर से दूर, बहुत दूर एक ऐसे सपने की गोद में बैठने जा रहा था जहां प्रसिद्धि थी, धरती और धन था।
तब ही एक आवाज आयी- 'टिकट !'
'टिकट नहीं ले पाया।' वह घबराते हुए बोला।
'कहाँ से बैठे हो ?'
'रायपुर से।'
'कहाँ जाना है ?'
'थोड़ी दूर तक जाना है।'
'थोड़ी दूर मतलब?'
'जहाँ तक आप जाओगे, मैं भी चला चलूँगा.'
'मैं नागपुर तक जाऊँगा.'
'मैं भी वहीँ तक चलूँगा.'
'पेनल्टी सहित चौंसठ रुपए हुआ, निकालो।'
'काहे की पेनाल्टी?'
'बिना टिकट सफ़र कर रहा है और पूछता है, काहे की पेनाल्टी?'
'गरीब ब्राह्मण हूँ सरकार, कहाँ से पैसा लाऊंगा?'
'तो फिर पुलिस को बुलवाना पड़ेगा।'
'हम तो सुने थे कि रेल्वे ने ब्राह्मणों के लिए 'फ्री' किया हुआ है?'
'तुम सुने होगे, हमने नहीं सुना है। दिमाग मत खाओ, पैसे निकालो।'
'सरकार गरीबों के लिए आरक्षण कब लाएगी?'
'सरकार से पूछो, मैं क्या बताऊँ?'
'मेरे लिये तो आप सरकार हो, आप 'फ्री' में ले जा सकते हो मुझे।'
'नहीं, बिलकुल नहीं।'
'एक काम करो सरकार, मेरी जेब में सिर्फ पाँच रुपया है, लीजिए और छुट्टी करिए।'
'बेवकूफ समझता है क्या? अभी बोल रहा था, 'टिकट नहीं ले पाया' तो क्या पाँच रुपए में नागपुर जा रहा था?'
'पैसा कम था इसीलिए तो टिकट नहीं ले पाया सरकार, जो है, सो है।'
'पैसा निकालते हो या पुलिस को बुलाऊँ?'
'बुलवा लीजिए लेकिन आपको एक गरीब ब्राह्मण को प्रताड़ित करने का पाप आपको लगेगा।'
'ऐसे पाप हम रोज करते हैं, हमारी ड्यूटी है।'
'करते होंगे लेकिन मैं कोई ऐसा-वैसा ब्राह्मण नहीं, स्पेशल ब्राह्मण हूँ।'
'स्पेशल ब्राह्मण? यह मैं पहली बार सुन रहा हूँ।'
'आपका स्पेशल ब्राह्मण से कभी पाला नहीं पड़ा इसलिए आप नहीं जानते।'
'क्या स्पेशल है तुम में?'
'आओ, बगल में बैठो तो बताऊँ।' चन्द्रशेखर ने ज़रा खिसक कर जगह बनाई और टी॰टी॰ई॰ को अपने बगल में बिठाया, उसका हाथ अपने हाथ में लिया, ध्यान से रेखाओं को देखा और दिलीपकुमाराना अंदाज़ में बोला- 'आप आदमी ईमानदार हो, रिश्वत नहीं लेते।'
'हाँ, यह बात सच है।'
'घरवाली आपको ताने देती है, कहती है- 'ईमानदारी को चाटो और अपने गले में लाकेट बनाकर टांग लो।'
'हाँ, कहती तो है।'
'फिर लेते क्यों नहीं ? लो, पाँच रुपया रखो, जो है, सो है।' चन्द्रशेखर ने टी॰टी॰ई॰ की ऊपरी जेब में पाँच का हरा नोट ठूंस दिया। टी॰टी॰ई॰ सकुचाया और बोला- 'मेरा धर्म क्यों भ्रष्ट कर रहे हो ?'
'मैं आपका धर्म भ्रष्ट नहीं कर रहा हूँ, गृहस्थ धर्म समझा रहा हूँ सरकार।' चन्द्रशेखर ने समझाया। टी॰टी॰ई॰ कुछ समझा, कुछ नहीं समझा और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया।
नागपुर के बाद दूसरा टी॰टी॰ई॰आया, वह पाँच रुपया ले गया। भुसावल के बाद तीसरा आया, पाँच रुपया वह भी ले गया, अब चन्द्रशेखर के पास मात्र पाँच रुपया बचा। इगतपुरी स्टेशन आया, चन्द्रशेखर ने वहाँ एक दोना प्याज की भजिया और एक चाय लेकर भूख मिटाई। इस प्रकार जेब में बचे हुए रुपए लेकर वह महानगरी बंबई की ओर बढ़ चला।
6 जून 1969 को विक्टोरिया टर्मिनस में भीड़ के साथ वह भी ट्रेन से उतर गया। बहुत देर तक प्लेटफार्म में 'किसी को खोजने' की मुखमुद्रा में इधर से उधर घूमता रहा। जब सब यात्री निकल गए, गेट पर तैनात टिकट-चेकर भी चले गए तो चन्द्रशेखर भी अपना सीना ताने स्टेशन के परिसर से निकल गया। बाहर अपार जन-समुद्र फैला हुआ था।
उसे अपने पुराने दोस्त बाबूलाल से मिलना था जो दानाबंदर में दूध की गाड़ी चलाता था। वह नहीं मिला क्योंकि वह अपने गाँव गया हुआ था। पांजरापोल स्ट्रीट में बाबूलाल का एक दोस्त बद्रीप्रसाद मिला जिसने सद्भावनापूर्वक भूख से व्याकुल चन्द्रशेखर को एक होटल में पूड़ी और आलू-कुम्हड़े की सब्जी खिलवाई।चन्द्रशेखर ने उससे पूछा- 'बाबूलाल न जाने कब वापस लौटेगा, मैं कहाँ रहूँगा ?'
'मेरे साथ रहना, हम दोनों रात को दूकान बंद हो जाने के बाद फुटपाथ पर आराम से सोएँगे।'
'कुछ काम भी दिलवा दे, भाई।'
'ठीक है, कोशिश करता हूँ।' बद्रीप्रसाद ने कहा और मेरीन ड्राइव में फल की एक दूकान में उसे तीन रुपए रोजी पर लगवा दिया। तीन रुपए में भला क्या होता ? ठीक से पेट भी नहीं भरता था लेकिन वह और क्या करता?
(३)
कुछ दिनों बाद उसका साथी बाबूलाल गाँव से वापस आ गया। वह बाबूलाल की झोपड़ी में रहने लग गया। कुछ और काम की तलाश करने के साथ-साथ चन्द्रशेखर बंबई के सभी फिल्म स्टुडियो के चक्कर लगाता, गेट में घुसने के प्रयास करता और हर जगह दरबान की डांट खाता, फिर भी हौसला बनाए रखता। कार में आते-जाते कलाकार दिख जाते तो भी उसके दिल को तसल्ली हो जाती। बार-बार हाज़री बजाने से दरबान भी उसे पहचान गए क्योंकि कोई रोज आकर सामने खड़ा हो जाए तो दरबान क्या दरवाजा भी चेहरा पहचान लेता है। धीरे से दरवाजे के उस पार जाने का मौका मिलने लगा किन्तु अंदर न तो उसे कोई देखता, न भाव देता। सब अपने-अपने काम में मशगूल। कोई क्या जाने कि बिलासपुर से एक नवयुवक फिल्मों में नायक बनने के लिए आया है ?
ढूंढते-खोजते चन्द्रशेखर को एक ट्रांसपोर्टर के यहाँ ट्रक के क्लीनर का काम मिल गया। भूखा पेट इन्सान से जो न करवा ले, चन्द्रशेखर मधुबाला की बाहों के बदले ट्रक के हिचकोलों में झूलने लगा।
एक दिन की बात है, ट्रक में गंधक के ड्रम लोड थे, उन्हें बन्दरगाह ले जाकर जहाज में चढ़ाने के लिए उतारना था। बन्दरगाह के बाहर ट्रकों की कतार लगी थी, एक के बाद एक ट्रक आगे बढ़ते जाते तब पीछे वाली ट्रक को थोड़ा और आगे खिसकने का मौका मिलता। अचानक ट्रक ड्राइवर का पेट गुड़गुड़ाया, वह नीचे उतरा और जगह खोज कर उकड़ू बैठ गया।
इस बीच उसके आगे खड़ा ट्रक थोड़ा आगे बढ़ा तो पीछे वाले ट्रक के ड्राइवर ने हार्न बजाना शुरू कर दिया। ड्राइवर लौटा नहीं था और हार्न की आवाज़ ने चन्द्रशेखर की नाक में दम कर दिया। वह चिढ़कर अपनी ट्रक से उतरकर पीछे वाली ट्रक के ड्राइवर के पास गया और बोला- 'ड्राइवर के पेट में दर्द हुआ है, पीछे तरफ गया है, जैसे ही आएगा, ट्रक बढ़ाएगा, तुम हल्ला क्यों मचा रहे हो ?'
'क्यों तुम्हारा डरैवर घर में नहीं करता क्या ?'
'क्या पता, किया कि नहीं किया ?'
'उसको अभी जाना था?'
'अभी लगी, तब गया।'
'तू गाड़ी आगे बढ़ा दे।'
'मैं ट्रक चलाना नहीं जानता।'
'ओए, कैसा कलीनर है तू, ट्रक सटार्ट करना नहीं जानता?'
'स्टार्ट हो जाएगी लेकिन कभी चलाया नहीं।'
'तो क्या तू जिंदगी भर कलीनर बने रहेगा ?'
'क्या मतलब ? मैं यहाँ हीरो बनने आया हूँ।'
'अबे, हीरो बाद में बनना, पहले डरैवर बन जा। गाड़ी में चाभी है कि नहीं ?'
'चाभी तो लटक रही है।'
'जा के चाभी को घुमा, अकसीलटर दबाना, गाड़ी आगे बढ़ जाएगी फिर बरेक लगा देना। की तेरे से इतना नहीं होगा, खोते ?' सरदारजी भड़के। चन्द्रशेखर ने तुरंत निर्णय लिया और ड्राइवर सीट पर जा बैठा, इग्निशन की चाभी घुमा दी। ट्रक का इंजन चालू हुआ, गाड़ी झटके से आगे बढ़ी और बढ़ गई। चन्द्रशेखर खुश हो गया। थोड़ा आगे बढ़ाकर उसे ट्रक रोकना था लेकिन ट्रक रुकी नहीं, सामने खड़ी ट्रक से जा भिड़ी। बहुत ज़ोर की आवाज़ हुई। टक्कर के कारण ट्रक के पीछे लदे गंधक के ड्रम उछलकर सड़क में लुढ़कने लगे। चन्द्रशेखर की जान सूख गई। वह तेजी से दरवाजा खोलकर बाहर उतरा और वहाँ से सरपट भागा, फिर उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
डेरे में पहुँचकर चन्द्रशेखर ने अपने मित्र बाबूलाल को ट्रक वाला किस्सा बताया तो उसने अपना माथा पीट लिया। वह सोच में पड़ गया कि इस 'महान' व्यक्ति को किस काम से लगाया जाए। उसने चन्द्रशेखर से पूछा- 'मेरे एक पहचान वाले को रसोईया की ज़रूरत है, करेगा क्या ?'
'यार, मैंने कभी खाना नहीं बनाया।'
'बात बनाना आता है न ? खाना बनाना भी आ जाएगा।'
'ठीक है, वहाँ लगवा दे।' चन्द्रशेखर बोला। चन्द्रशेखर को काम मिल गया। उसने मालकिन को समझाया कि वह गाँव से आया है इसलिए शहरी किस्म का खाना बनाना नहीं आता लेकिन सीख लेगा। मालकिन उसे पाक-विधियां बताती जिसे चन्द्रशेखर देखते-देखते सीख गया। वहाँ उसे तनख्वाह मिलती थी और 'फ्री' का भोजन, नास्ता और चाय भी। कभी-कभी मौका ताड़कर वह दूध की मलाई चट कर जाता और पूछताछ होने पर 'मुझे क्या मालूम ?' की मुखमुद्रा बना लेता।
उस घर में एक दिन सत्यनारायण की कथा का आयोजन हुआ। एक पुरोहित आए, उन्होंने पूजा करवाई। पूजा के अन्त में उन्होंने एक मंत्र पढ़ा जिसे सुनकर चन्द्रशेखर उखड़ गया और बोला- 'मन्त्र गलत पढ़ रहे हो पंडित, कैसी पूजा करवा रहे हो ?'
'मन्त्र गलत है ? कैसे कह रहे हो तुम ? तुम जानते हो कि सही क्या है ?' पुरोहित रुष्ट हो गया। चन्द्रशेखर ने शुद्ध मन्त्र को सस्वर सुना दिया। पुरोहित शर्मिंदा हो गया और चुपचाप दक्षिणा लेकर निकल लिया।चन्द्रशेखर के मालिक-मालकिन बहुत प्रभावित हुए और पूछा- 'तुमको यह सब कैसे मालूम ?'
'मेरे पिता पुरोहित हैं। मैं बचपन से इसी वातावरण में पला हूँ।'
'पूजा-पाठ करवाना जानते हो ?'
'हाँ, जन्म से लेकर मरण तक के समस्त संस्कार करवा सकता हूँ।'
'तो फिर बाहर से पुरोहित बुलवाने की क्या ज़रूरत है, इन्हीं से करवा लिया करो।' मालिक ने मालकिन से कहा। उस दिन के बाद चन्द्रशेखर के साथ बातचीत करने के उनके तरीके में बहुत बदलाव आ गया। उसका घर में सम्मान होने लगा। भोजन चन्द्रशेखर ही बनाता था लेकिन अब वह परोसता नहीं था, मालकिन उसे परोसती थी। वे दोनों खुश और चन्द्रशेखर भी।
एक दिन की बात है, मालिक और चन्द्रशेखर एक साथ भोजन करने बैठे। चन्द्रशेखर ने देखा कि भिन्डी की बासी सब्जी उसकी थाली में परोसी गई लेकिन मालिक को नहीं परोसी गई। उसे बहुत खराब लगा, उसने उस सब्जी का आधा हिस्सा मालिक की थाली में रख दिया। मालकिन का दिमाग सरक गया। उसने पूछा- 'पंडित, तुमने ऐसा क्यों किया ?'
'इनके भले के लिए किया।'
'क्या भला ?'
'मैं अगर ऐसा नहीं करता तो मालिक अगले जन्म में सुअर बनते।'
'क्या बकवास कर रहे हो ?'
'सही कह रहा हूँ।' चन्द्रशेखर ने कहा और गरुण पुराण का एक मन्त्र बताया और स्वयं के बचाव का यत्न किया लेकिन मालकिन अपने पति के सुअर बनने वाली बात से बहुत आहत हो गई और उसी दिन चन्द्रशेखर को घर के काम से मुक्त कर दिया। चन्द्रशेखर फिर सड़क पर आ गया।
चन्द्रशेखर के लिए फिल्मों में काम मिलना जितना मुश्किल था, उससे अधिक मुश्किल वहाँ टिक कर जीना था। उसने कई नौकरियाँ की लेकिन नौकरी करने के लिए जैसी मानसिकता की ज़रूरत होती है, वह उसके पास नहीं थी। अक्खड़ स्वभाव वाला इन्सान नौकरी के लायक नहीं होता, व्यापार के लायक भी नहीं होता, सच पूछिए तो किसी लायक नहीं होता। बातचीत की विनम्रता के साथ स्वभाव में सरलता का मनुष्य की सफलता में बहुत सहयोग होता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अक्खड़ व्यक्ति हमेशा असफल होता है, ऐसे व्यक्ति को सफलता के लिए स्वयं में अतिरिक्त गुण विकसित करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए बिलासपुर के पंडित सत्यदेव दुबे अक्खड़ स्वभाव वाले थे। फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने उनके बारे में लिखा है- 'पंडित सत्यदेव दुबे हिन्दी नाटकों के द्रोणाचार्य थे और दुर्वासा भी।' वे किसी हद तक सनकी, बेहद क्रोधी थे लेकिन प्रबल ज्ञानी थे। अपने ज्ञान, नवोन्मेषी कल्पना और लगन को सीढ़ी बनाकर वे नाट्यजगत के शिखर तक पहुंचे और हिन्दी-मराठी सिनेमा में स्वयं को स्थापित किया।
चन्द्रशेखर केवल भाग्य के भरोसे फिल्मों में काम करने पहुँच गया। भाग्य चमकता भी है लेकिन उसके लिए धैर्य रखना होता है। नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार ने फिल्म 'अमन' (1967) में 'एक्स्ट्रा' कलाकार की हैसियत से शवयात्रा की भीड़ में खड़े एक नवयुवक का रोल किया था। चन्द्रशेखर की लगातार दौड़धूप के परिणामस्वरूप उसे एक फिल्म में काम मिल गया। फिल्म निर्देशक धीरुभाई देसाई ने निर्माणाधीन फिल्म 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा' (1970) में एक अच्छा रोल देने का वादा किया लेकिन फिल्म की शूटिंग शुरू होने में तीन-चार माह की देर थी।
(४)
बंबई में खाली पेट में भोजन भरना बहुत बड़ी समस्या होती है। चन्द्रशेखर को समझ में आ गया कि वह नौकरी नहीं कर पाएगा। उसे पुरोहिती आती थी, वह सम्मान वाला काम था। उसने बंबई के मंदिर में अपना डेरा जमाया और वहाँ के महंत को पंडिताई का काम हासिल करने का माध्यम बनाया। पूजा कराने के लिए उसे एक फिल्म निर्माता के घर जाने का अवसर मिला, वे थे पन्नालाल माहेश्वरी जिन्होंने 'काजल' (1965) और 'नीलकमल' (1968) बनाई थी।
चन्द्रशेखर उस सुबह भालिभांति दाढ़ी बनाकर, सज-धज कर पन्नालाल माहेश्वरी के घर पूजा कराने के लिए निकल पड़ा। उसके कदमों में उत्साह था, मन में बसी महत्वाकांक्षा पूरी होने का एक सूत्र पकड़ में आने वाला था। उसने कालबेल दबाई, गृहणी उसे अंदर ले गई। पूजन आरंभ हुआ और सम्पन्न हो गया। गृहणी ने दक्षिणा दी और आदर सहित प्रणाम किया। चन्द्रशेखर ने आशीष दिया- 'सौभाग्यवती भव।'
अपनी पोथी और आसनी समेटकर झोले में रखने के बाद चन्द्रशेखर ने कहा- 'माते, आपसे एक निवेदन है।'
'जी, कहिए पंडितजी।' गृहणी ने कहा।
'मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से यहाँ आया हूँ। फिल्मों में काम करने की कामना से यहाँ आया और पुरोहिती कर रहा हूँ। जो है सो है, आप मेरी सिफ़ारिश कर देंगी तो माहेश्वरी जी मुझे अपनी फिल्म में कोई न कोई रोल दे देंगे।'
'आप माहेश्वरी जी से बात करिए।'
'मैंने उन्हें कभी देखा नहीं, वे मुझे जानते नहीं, माते।'
'देखिये पंडित जी, वे मेरे घर के काम में दखल नहीं देते, मैं उनके काम में दखल नहीं देती।'
'मैं दखल देने के के लिए नहीं कह रहा हूँ, सिफ़ारिश करने के लिए कह रहा हूँ।'
'वे इसे दखल मानते हैं। बहुत गुस्सैल हैं, मेरी हिम्मत नहीं है उनसे कुछ बोलने की।'
'किसी दिन अच्छे-भले मूड में हों तो कह दीजिएगा, मैं आपका पुत्रवत हूँ माते।'
'फिल्म बनाने वाले का मूड कभी अच्छा नहीं होता, वे हर समय तनाव में रहते हैं। मैं झूठी बात करने वाली औरत नहीं हूँ। मुझे क्षमा करें पंडित जी।' गृहणी ने इतना कहकर वार्ता समाप्त की और हाथ जोड़ते हुए चन्द्रशेखर को विदा कर दिया।
चन्द्रशेखर जब से बंबई आया था, यही देखते-सुनते आ रहा था, उसे ऐसे वार्तालापों का अभ्यास हो चुका था। अब वह उस खबर का इंतज़ार कर रहा था जब 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा' की शूटिंग और उसकी अभिनय यात्रा आरंभ होगी।
अंततः चन्द्रशेखर को फिल्म 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा' में 'ब्रेक' मिलना तय हुआ। जब भी उसे समय मिलता, स्टुडियो जाता और फिल्म के बारे में पूछताछ कर लेता। अंततः फिल्म बनना शुरू हुई। मुख्य कलाकार थे- महिपाल, जयमाला और जीवन। एक दिन फिल्म के निर्देशक ने चन्द्रशेखर को अगली सुबह 9 बजे स्टुडियो पहुँचने के लिए कहा।चन्द्रशेखर ने पूछा- 'मुझे क्या रोल दे रहे हैं ?'
'सुबह बता देंगे।'
'संवाद क्या बोलना है ?'
'सुबह बता देंगे।' उत्तर मिला।
चन्द्रशेखर के कुछ साथियों ने साथ चलकर शूटिंग देखने की इच्छा जाहिर की तो वे भी साथ चल पड़े।चन्द्रशेखर की खुशी का ठिकाना न था। बिलासपुर से इतनी दूर वह आया, कुछ बनने, जिसकी शुरुआत आज होने वाली थी। वह खिन्न था कि उसे एक धार्मिक फिल्म में काम करना पड़ रहा था लेकिन उसे यह भी मालूम था कि भारत भूषण, निरूपाराय, जीवन जैसे अनेक कलाकार धार्मिक फिल्मों में काम करते-करते ऐतिहासिक और सामाजिक फिल्मों में अवसर पाने लगे और लोकप्रिय हो गए। नहीं मामा से काना मामा अच्छा।
दोपहर दो बजे तक वह इधर से उधर भटकता रहा। कोई कुछ बता नहीं रहा था। किसी से कुछ पूछे तो कहते- 'बताते है।' अचानक निर्देशक ने उसे बुलाया, जब तक चन्द्रशेखर उनके पास पहुंचता, मेक-अप-मेन आ गया।
निर्देशक 'चेयर' पर बैठा था, उसने मेक-अप-मेन से कहा- 'इसका बंदर का मेक-अप कर दो।'
चन्द्रशेखर का खून खौलने लगा। वह चीखा- 'तेरी मैया की....' और उसने एक ज़ोर का झापड़ निर्देशक के गाल पर लगाया। वह चेयर सहित जमीन पर लोटने लगा। हाहाकार मच गया। सब चन्द्रशेखर की ओर दौड़े, चन्द्रशेखर अपने रौद्ररूप में था, चीखा- 'खबरदार किसी ने मुझे हाथ लगाया। आज यहाँ खून की नदी बह जाएगी।' लोग ठिठक गए क्योंकि चन्द्रशेखर को उसके हट्टे-कट्टे-मुस्टंडे साथियों ने सुरक्षा के लिए घेर रखा था। हर तरफ आवाज उठने लगी- 'वाचमेन....गुरखा, दौड़ो ...इधर आओ...निकालो... इन बदमाशों को।' उधर चन्द्रशेखर चिल्ला रहा था- 'धार्मिक फिल्म बना रहा है, अपने आपको कमीना वी॰शांताराम समझता है। मुझे छः महीने से घुमा रहा है, कहता था, अच्छा रोल दूँगा और मेरा बंदर का मेक-अप करवा रहा है। अरे तू बंदर, तेरा बाप बंदर, तेरा मामा बंदर। आज तू इस दुखी ब्राह्मण का शाप सुन ले, जब तू मरेगा तो तेरी लाश अंतिम संस्कार के लिए तरस जाएगी और तेरी लाश पर बंदर नाचेंगे। सुन ले रे, जो मैं कह रहा हूँ, उसे सुन ले।'
चन्द्रशेखर के साथी उसे स्टुडियो से सुरक्षित बाहर निकाल ले गए। इस घटना के चर्चे बंबई के सभी स्टुडियो में पहुँच गए, सभी दरवाजों में चन्द्रशेखर का प्रवेश निषिद्ध हो गया। अभिनय-संसार की एक प्रबल संभावना का असमय-पूर्व गर्भपात हो गया।
(५)
चन्द्रशेखर अब पंडित चन्द्रशेखर शास्त्री जी महाराज हो गए हैं। अभिनय-संसार के व्यामोह से मुक्त होकर अब वे रामायण-भागवत की कथा, पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड करवाते हैं। प्रतिदिन सुबह के अखबार में शोक-संदेश का 'कालम' देखते हैं और 'उपयोगी' मृतक के घर शोक व्यक्त करते हुए अपनी पुरोहिती की 'ऑन डोर' मार्केटिंग करते हैं। शवयात्रा के बरास्ते गरुण पुराण होते हुए शांतिपूजन तक तेरह दिनों तक मृतक के परिवार को आर्थिक रूप से पस्त करने में व्यस्त रहते है।
अधिकतर बिलासपुर में रहते हैं, कभी-कभार अपने यजमानों के आमंत्रण पर मुंबई भी जाते हैं।आपको पंडित चन्द्रशेखर शास्त्रीजी महाराज से कोई कार्य हो तो लेखक के पास उनका मोबाइल नंबर है, नंबर बताने की मेरी फीस है- एक सौ एक रुपए।
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किस्सा महेश चौकसे का : पक्का व्यापारी
(१)
बिलासपुर का मोहल्ला तारबाहर 'रेलवे एरिया' और 'टाउन एरिया' की सीमा है। सौ साल पहले यह हिस्सा कंटीले तार से घेरा गया था क्योंकि तार के घेरे के उस पार एकदम सन्नाटा था, जंगली जानवरों का डर था और चर्चा यह भी थी कि वहाँ रात में जिन्न विचरते हैं इसलिए बस्ती के लोग उस पार नहीं जाया करते थे। वैसे, जंगली जानवर और जिन्न भी इन्सानों के डर से इस पार नहीं आते थे।
इस बस्ती में दो लोगों का विकट आतंक था, मोना खान और बिशुन मोंगरे का। उनके डर का आलम यह था कि शहर के लोग अंधेरा होने के बाद तारबाहर की सड़क से आना-जाना बंद कर देते थे। जिन्न और भूत-प्रेत के संकट से सबको बचाने वाला हनुमान-चालीसा भी इन उपद्रवियों पर असर नहीं करता था। कोई भरोसा नहीं था कि ये दो बदमाश किसके पेट में छुरा घुसेड़कर निकाल लें और लूटपाट करके भाग जाएँ।
अपने देश में आबादी इस तरह बढ़ रही है कि जिस जगह पर सन्नाटा पसरा होता है, वह भी धीरे-धीरे आबाद हो जाती है। तारबाहर के अन्न उत्पादक खेत अब शिशु-उत्पादक घरों में तब्दील हो गए हैं। जिस जगह जाने से लोग डरते थे वहाँ अब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च बन गए और बाजार सज गए हैं। रेलवे कालोनी से लगे इस भू-क्षेत्र में गरीब और मज़बूर लोगों ने अपने लिये छोटे-छोटे घर बनाए और वे कालान्तर में फैलते गए। चूंकि इस मोहल्ले में मुस्लिम परिवार अधिक संख्या में बसे हैं इसलिए उनके घरों के आस-पास मुर्गे-मुर्गियाँ दौड़-भाग करते रहती थी। किशोर-वय के मनचले किसी बीमार और कमजोर मुर्गे को सड़क से निकलते साइकल सवार के सामने अचानक छोड़ देते और फड़फड़ाता हुआ मुर्गा यदि उसकी सायकल से कुचल गया तो समझ लीजिए कि मुर्गा फेकने वालों के लिए एक मुर्गा फंस गया। आसपास में छुपे वे बदमाश बाहर निकलकर भीड़ लगा लेते, साइकल सवार से झगड़ा करते और दो रुपए के मुर्गे के दस रुपए वसूल करने के बाद ही उसको वहाँ से जाने की इजाज़त देते। मुर्गे के असल मालिक को दो रुपए मिल जाते, बाकी आठ रुपए शोहदों में बंट जाता और फिर उसका मुर्ग-मुसल्लम और दारू वाली पार्टी होती। ये चतुर बदमाश यदि फिजूलखर्च न होते तो वे इतनी चील-बुद्धि के थे कि आज वे अंबानी-अदानी की हैसियत के बराबर होते!
फिर भी, मोहल्ला तारबाहर में एक चतुर खिलाड़ी लड़कपन की उम्र में आया, रहने नहीं, दूकान चलाने, वह भी राशन की। नाम था मुंशीराम, मुंशीराम उपवेजा। सीएमडी कालेज में पढ़ता, पढ़ता क्या था, नेतागिरी करता था। बातें करने और बातें बनाने में बेमिसाल। इलेक्शन जीतना हो या परीक्षा देना हो, वह सफलता के लिए किये गए हर उपाय को जायज़ मानता था। उसने तारबाहर के आतंकी मोना खान को अपना सहयोगी बनाया। मोना खान लोगों को धमकाने का काम करता था और मुंशीराम मुस्कुराकर भरमाने का। राशन की दूकान और मनमोहक भाषण के भरोसे उसकी तरक्की होती गई और एक दिन वह बिलासपुर की नगरपालिका का 'डिप्टी मेयर' बन गया। यह 'तारबाहर इफेक्ट' था। हमारे देश के गणतन्त्र में बाल्मीकि को महर्षि बाल्मीकि में 'शिफ्ट' करने के प्रयोग निरन्तर जारी हैं !
मुंशीराम ने अपनी योग्यता का चौतरफा उपयोग किया और अब उस पर माँ लक्ष्मी की 'किरपा' बरस रही है. वह बिलासपुर की सबसे शानदार टाकीज़, एक 'थ्री-स्टार' नुमा होटल और अनेक जमीन-ज़ायदाद का मालिक है। आर्थिक वैभव ने मुंशीराम के प्रतिष्ठा स्वाभाविक रूप से बढ़ा दी और अब वह एक अत्यंत सम्माननीय नागरिक के रूप में जाना जाता है।
आप यह न समझिएगा कि लेखक आपको मुंशीराम की कथा बताने वाला है, उसका ज़िक्र तो तारबाहर की पुण्यभूमि की बात निकली इसलिए आ गया; दरअसल, आपको उस व्यक्ति के बारे में बताना है जो इस कथा-लेखक के साथ दसवीं कक्षा तक साथ में पढ़ा और अपनी घरेलू परेशानियों के चलते पढ़ाई छोड़कर तारबाहर चौक की एक पान की दूकान में बैठ गया।
चेहरे पर चेचक के गहरे दाग लिए, दसवी कक्षा में मेरे साथ पढ़ रहे महेश के पिता रामदयाल चौकसे सात भाई थे और मध्यप्रदेश के जिला सिवनी के सहजपुरी गाँव में रहते थे। कृषक थे, कमाई में दम न था, परिवार का खर्च मुश्किल से चलता था। रामदयाल का विवाह करना था, जिनके बच्चे ज्यादा होते हैं वे बच्चों के ब्याह करने के हड़बड़ी में रहते हैं ताकि उनके सामने सबकी गृहस्थी बस जाए और गंगा नहाएँ। मध्यप्रदेश के ही जिला मंडला के ककईया गाँव की एक खूबसूरत लड़की का पता चला तो रामदयाल की अम्मा ने लड़की को देखे बिना संबंध तय कर दिया और श्यामाबाई बहू बनकर घर आ गई।
रामदयाल के मामा बिलासपुर में ठेकेदारी का काम करते थे, उन्होंने रामदयाल को बिलासपुर बुला लिया और प्रताप टाकीज़ में सायकल स्टेंड का ठेका दिलवा दिया। कुछ दिनों बाद रेल्वे स्टेशन के स्टेंड का ठेका मिला। मोहल्ला टिकरापारा में रहते-रहते चार लड़कों और एक लड़की से घर भरपूर हो गया लेकिन कमाई का साधन ठीक-ठाक नहीं बन पाया और परिवार के दिन बड़े कष्ट में बीत रहे थे। उनके घर में नागिनबाई नाम की महिला झाड़ू-पोछा का काम करती थी। उसे रेल्वे में कार्यरत मृत पति के एवज़ में पचीस वर्गफुट का एक भूखंड तारबाहर की सीमा में पान की दूकान खोलने के लिए मिला जिसे उसने अपने मालिक रामदयाल को चलाने के लिए दे दिया। सुनसान इलाका था इसलिए धंधा कम था, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना जब असंभव हो गया तो रामदयाल ने अपने बेटे महेश की पढ़ाई छुड़वा दी और वह अपने पिता के साथ पान की दूकान में बैठने लगा।
पान की दूकान में दो बातें ज़रूर होती हैं, एक उधारी का चलन और दूसरा ग्राहक की पहचान। उधारी वाली बात तो आसानी से समझ में आ जाती है अर्थात ग्राहक ने कहा- 'लिख लेना' याने उधारी हो गई। उधार लेकर वापस करने वाले बहुत कम होते हैं, अधिकतर ग्राहक उधार बढ़ाकर अंतर्ध्यान हो जाते हैं। ऐसे ग्राहक कहीं रास्ते में सपड़ा गए तो ताव से कहेंगे- 'कहीं भागे जा रहे हैं क्या ?' मजबूर दूकानदार उसे भगोड़ा भी नहीं कह पाता क्योंकि ऐसा कहने से पैसा वापस मिलने की उम्मीद का आखिरी धागा भी टूट जाता है। जिसके व्यापार में ऐसे ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है, उसका बंटाधार होना तय है। बेईमान सर्वत्र व्याप्त हैं, जरा सी असावधानी हुई और दुर्घटना घटी। रामदयाल बहुत सीधे आदमी थे, किसी को मना करना नहीं जानते थे इसलिए उधारी-छाप ग्राहकों ने उनकी दशा को दुर्दशा में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पान दूकान की दूसरी खासियत होती है, ग्राहक की पहचान। इस अर्थ यह है कि पान खाने वाला यह उम्मीद करता है कि पान वाला उसे देखते ही समझ जाए कि उसके पान में क्या-क्या और कितना डालना है ? इस बात को ग्राहक अपने सम्मान से जोड़कर देखता है और मनचाहा पान तैयार हो जाने पर प्रसन्नता की अनुभूति करता है। सिगरेट पीनेवाला सिर्फ इतना कहेगा- 'सिगरेट देना।' अब यह पान वाले का परम कर्तव्य है कि वह ग्राहक की पसंद का 'ब्रांड' मुहैया करे। इन छोटी-छोटी बातों की सावधानी रखने से पान की दूकानें चलती हैं या असावधान होने पर बैठ जाती हैं।
पान दूकानों के आसपास रोचकता और बेहूदगी का मिलाजुला माहौल रहता है। रोचक इस तरह कि देश-विदेश की समस्त घटनाओं का 'आँखों देखा' विवरण अनवरत उपलब्ध रहता है। इन घटनाओं के भीतर की अदृश्य बातें भी यहाँ दृश्यमान हो जाती हैं। गपोड़ी और आत्ममुग्ध लोग दिन भर आते रहते हैं, उनके चेहरे बदलते रहेंगे, मुद्दे बदल जाएंगे, बहस छिड़ जाएगी, निर्णय सुना दिए जाएंगे। पुरानी भीड़ छंट जाएगी, नयी लग जाएगी।
आती-जाती लड़कियों पर नयनों के बाण चलेंगे, वाक्प्रहार होंगे, रोमांटिक गाने गुनगुनाए जाएगे और फिर वीभत्स ठहाके। पान खाने वाले पान चबाएंगे, रस-पान करेंगे और वहीं 'पिच-पिच' करते हुए चित्रकारी का हुनर दिखाएंगे। सिगरेट पीने वाले आसमां की ओर देखते हुए कश खीचेंगे, थोड़ा सा धुआँ अपने सीने में रखेंगे और बाकी जनता-जनार्दन को अर्पित कर देंगे ताकि सिगरेट न पीनेवाले उस धुएँ की गंध का निःशुल्क आनंद ले सकें।
बिलासपुर में संतोष-भुवन होटल के पास एक 'बरऊ पान वाला' था, जायसवाल। वह अपने ग्राहकों का स्वागत सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए करता था इसलिए उसका आदर-भाव स्वीकार करने के लिए सुबह से लेकर रात तक उसकी दूकान में भीड़ लगी रहती थी। घर में तो हमारी दो कौड़ी की इज्ज़त नहीं है, शहर में कोई तो है जो इज्ज़त देता है और प्यार से पान भी खिलाता है! इसी प्रकार गोलबाजार में भरतसिंह ठाकुर की पान दूकान खूब चलती थी। वे दो भाई थे, भरत और शत्रुघन। बड़े भाई भरत के रहते दूकान में भीड़ लगी रहती क्योंकि वह ग्राहकों की बात में शामिल होते थे, ठहाका मार कर हँसते थे और रोचक अपशब्दों का प्रयोग भी किया करते थे लेकिन शत्रुघन के सामने ग्राहक कम हो जाते थे क्योंकि वे धीर-गंभीर स्वभाव के थे, ग्राहक उनसे बिदकते थे।
गोलबाजार में सुरेश शुक्ला की पान दूकान हुआ करती थी जिसका नाम था- 'बेगम पसंद पान की दूकान' जहां महिलाओं की पसंद का ख्याल करते हुए मीठे स्वाद वाला पान बना कर उसके ऊपर चांदी का वर्क लपेटा जाता था जिसे विवाहित पुरुष अपने घर ले जाकर पत्नी को प्यार से खिलाते थे, फिर दोनों मिलकर खिलखिलाते थे।
(२)
तारबाहर चूंकि शहर से बाहर था इसलिए वहाँ ग्राहकों की आवक-जावक कम थी। रेल्वे में काम करने वाले पान के शौकीन नहीं थे, हाँ, सिगरेट पीने वाले कुछ ज़रूर थे। पास में ही सीएमडी कालेज था, कुछ छात्र जिनका पढ़ाई में दिल नहीं लगता था वे घूमते-मँडराते वहाँ आते इसलिए कुछ देर चहल-पहल बनी रहती, उसके बाद वही सन्नाटा।
महेश ने जब पढ़ाई छोड़ कर अपनी दूकान में बैठना शुरू किया तो उसने ग्राहक बढ़ाने के कुछ उपाय किए और पान दूकान को 'जनरल स्टोर' का रूप दे दिया। उसकी दूकान का सबसे बड़ा आकर्षण था, विदेशी सामान जिसे उस जमाने में 'स्मगल्ड गूड्स' कहा जाता था, आसानी से मिलने लगा और शहर के ग्राहक वहाँ मजबूरन टपकने लगे। महेश ने वहाँ रेल्वे के अफसरों से जान-पहचान बढ़ाई और बगल में चाय दूकान खोलने के लिए 100 वर्गफीट जमीन का अपने नाम से आबंटन करवा लिया। पान के साथ चाय की दूकान भी चलने लगी, गरम-गरम समोसा और आलूबड़ा भी बनने लगा।
महेश पक्का व्यापारी निकला। पक्का व्यापारी उसे कहते हैं जो एकाग्रचित्त होकर व्यापार करता है। ऐसे व्यक्ति को अपने व्यापार के अलावा अन्य किसी गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं होता। कोई जिए या मरे, कोई आये या जाए, कोई हँसे या रोये, व्यापारी को अपने व्यापार से मतलब रहता है।
बिलासपुर के ही गोलबाजार में किराना के बड़े व्यापारी थे मालिकराम। खुलने से लेकर बंद होने तक दूकान में जम कर बैठते थे, 24 में से 12 घंटे तक उनके फोन का 'रिसीवर' उनके कान से चिपका रहता था ताकि देश-दिसावर के ताजा भाव-ताव उन्हें मालूम होते रहें। उनको यदि कहीं फोन लगाना होता तो रात के बारह बजे के बाद ट्रंक-काल लगाते क्योंकि उस समय आधा चार्ज लगता था। रात को कई बार जागते, फोन पर बात करते और फिर फोन की अगली घंटी आने तक झपकी ले लेते। उनके लिए बचपन में पढ़ी एक कविता सटीक बैठती है- 'हरे रंग का है यह तोता, जाने कब जगता कब सोता।'
जिस दिन मालिकराम की बड़ी लड़की की शादी थी, वे शाम को सात बजे तक दूकानदारी करते बैठे रहे, अगली सुबह नौ बजे दूकान खोल कर बैठ गए। ऐसे व्यक्ति को कहते हैं, एकाग्रचित्त व्यापारी। महेश को भी मालिकराम वाला संक्रामक रोग लग गया था।
इसके अलावा महेश में और भी कुछ ऐसे गुण थे जो मालिकराम में भी नहीं थे। महेश ने अच्छे व्यवहार को अपनी सफलता की सीढ़ी बनाया। गम खाना और कम खाना, ये दोनों गुण उसने आजीवन निभाए। परिचितों और ग्राहकों से बातचीत में मिठास रहती ही थी, अपने 'स्टाफ' से भी वह मीठी भाषा में बात करता। जैसे किसी की 'ड्यूटी' सुबह छः बजे है और वह साढ़े आठ बजे आया तो महेश खड़े होकर उसका स्वागत करता और हाथ जोड़कर उससे कहता- 'आइये पिताजी, आप आ गए ! मैं तो सोच रहा था कि आज आप शायद नहीं आएंगे।'
'देर हो गई सेठ जी।'
'चलो कोई बात नहीं, अब काम से लगो।' महेश कहता। महेश जानता था कि व्यापार का आधार 'स्टाफ' होता है इसलिए उसे संभालकर रखना बहुत ज़रूरी है। संतोष नायक नामक एक उड़िया बालक महेश की चाय दूकान में 10/- प्रति माह के वेतन पर काम से लगा और उसने पचास वर्षों तक काम किया। सन 2005 में जब उसकी मृत्यु हुई तब उसका वेतन 12000/- प्रति माह चल रहा था।
खैर, अपन आगे बढ़ गए, वापस चलते हैं। महेश की पान के साथ चाय की दूकान भी चलने लगी लेकिन गृहस्थी का बोझ फिर भी नहीं सम्हल रहा था। उन्हीं दिनों 'चड्डा कृषि फार्म' के मालिक चमनलाल चड्डा महेश से मिलने उसकी दूकान पहुंचे। उन्होंने गन्ने का रस निकालने की मशीन लगाने का सुझाव दिया और वहाँ एक बोर्ड लग गया 'मधुशाला', जहां गन्ने का मीठा-ठंडा रस मिलने लगा। गन्ने के रस ने महेश की ज़िंदगी में रस घोल दिया, उसके परिवार के अच्छे दिन शुरू हो गए।
महेश के साथ उसके सब भाई भी मिलकर काम करते थे, पिता रामदयाल की दूकान में सक्रियता कम हो गई और वे घर के कामकाज में व्यस्त रहने लगे। टिकरापारा गुजरातियों का मोहल्ला है। गुजराती परिवार उन्मुक्त स्वभाव के होते हैं। खाने-पीने का शौक और आपसी मेल-जोल उनके स्वभाव में होता है। महेश का परिवार गुजराती नहीं था, फिर भी उसका घर मोहल्लेवालों के आवागमन से भरपूर रहता। आसपास के घरों से बहुत प्रेमव्यवहार था, रोज के रोज ढोकला, थेपला, दहीबड़ा और सब्जियों का आदानप्रदान चलते रहता। रात को बारह बजे तक गप-शप और हंसी-ठट्ठा होता, कैरम की भिड़ंत होती, ताश-पत्ती का फड़ जमता और बीच-बीच में नास्ता-चाय के दौर भी।
महेश की माँ जितनी खूबसूरत थी उतनी ही व्यवहारकुशल भी। घर में उन्हीं का दबदबा था, सब उनसे डरते थे और पतिदेव उनके सामने सहमे-सहमे रहते थे। लड़के भी उनकी बात अनसुनी कर देते थे इसलिए रामदयाल ने 'चुप रहो और मुस्कुराओ' की नीति अपना ली थी। क्या करोगे ? सीधे आदमी को अपनी घरवाली और घरवालों, सबसे डर कर रहने का अभ्यास हो जाता है !
एक दिन खाना खाते समय रामदयाल ने श्यामाबाई से कहा- 'महेश शादी लायक हो गया है, कोई लड़की देखो।'
'महेश के लिए लड़की ? मेरी देखी हुई है।' श्यामाबाई ने कहा।
'कौन ?'
'जबलपुर के पास कालादेही है न ? वहाँ लड़की अच्छी है, अपने घर लायक है।'
'तुम कहाँ देखी उसको ?'
'मंडला में, एक शादी में आई थी, वहीं।'
'रिश्तेदार कैसे हैं ?'
'क्या करना रिश्तेदार से, लड़की अच्छी है तो सब ठीक है।'
'वे लोग अपने घर में लड़की देंगे ?'
'क्यों नहीं देंगे ? किस बात की कमी है जो हमें मना करेंगे ?'
'तो फिर बात चलाओ।'
'ठीक है, आपने मायके खबर करती हूँ, वे लोग सिलसिला चलाएंगे। लड़केवाले हैं, हम थोड़े ही बात शुरू करेंगे ! रिश्ता तो उधर से ही आना चाहिए।'
'जैसा तुम ठीक समझो, अगले मुहूर्त में काम हो जाए तो अच्छा है।' रामदयाल ने धीरे से कहा।
बातचीत का सिलसिला चला, बात बन गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा तक नहीं, घरवालों ने बात पक्की कर दी महेश का विवाह 7 मार्च 1976 को मालती से हो गया। महेश का पहला विवाह तो व्यापार के साथ हो चुका था, अब एक और आ गयी, उसकी दूसरी पत्नी।
(३)
शुरुआती दौर में सब भाई एक ही दूकान में साथ-साथ रहते थे, फिर सबकी शहर की अलग-अलग जगहों पर रसवंती की दूकानें खुल गई। सभी दूकानों के लिए चड्डा कृषि फार्म से गन्ना आता था। जब मांग बढ़ गई तो गन्ने का भाव बढ़ गया जिससे रसवंती की दूकानों को होने वाला फायदा कम हो गया। चूंकि चड्डा कृषि फार्म की 'मोनोपली' थी इसलिए गन्ने को बिना छांटे लेना पड़ता था, मोटा, पतला, सूखा सब एक साथ तौला जाता था याने सब धान बाईस पसेरी।
उसी समय रामदयाल को मंडला जाने का मौका पड़ा। उस क्षेत्र में गन्ने की भरपूर फसल होती थी, वहाँ भाव कम थे, 'क्वालिटी' बेहतर थी। प्रयोग के तौर पर वहाँ से एक ट्रक गन्ना बिलासपुर भेजा गया। यहाँ आकर भाड़ा सहित वह चड्डा कृषि फार्म के भाव से बीस रुपए क्विंटल सस्ता पड़ा। महेश और उसके भाइयों की दूकानों में बाहर का गन्ना खपने लगा। फिर बाप-बेटों के बीच सलाह-मशविरा हुआ जिसमें तय किया गया कि बिलासपुर में चड्डा कृषि फार्म के वर्चस्व को तोड़ा जाए और शहर के सभी गन्नारस की दूकानों को गन्ना की आपूर्ति चौकसे परिवार करे। रामदयाल मंडला और आसपास के क्षेत्रों में घूम-घूमकर गन्ना खरीदकर बिलासपुर भेजते और उनके पुत्र गन्नारस के साथ-साथ गन्ना बेचने वाले 'स्टाकिस्ट' बन गए।
माल की बिक्री बढ़ाने की नई जुगत सोची गई जिसके अंतर्गत गोलबाजार में स्थित छितानी-मितानी धर्मशाला में शहर के समस्त गन्नारस विक्रेताओं को बुलाकर 'बिलासपुर गन्नारस विक्रेता संघ' का गठन किया गया जिसमें ज़ोर-शोर से चड्डा कृषि फार्म की मनमानी पर चर्चा हुई तथा उसका बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया। बैठक में महेश के छोटे भाई दिनेश को अध्यक्ष बनाया गया। जब दूकानदारों ने अध्यक्ष से पूछा- 'वहाँ से नहीं लेंगे तो गन्ना कहाँ से मिलेगा ?' तब अध्यक्ष ने कहा- 'हम देंगे और चड्डा कृषि फार्म से पंद्रह रुपये प्रति क्विंटल सस्ता देंगे।' जिस चमनलाल ने चौकसे परिवार के चमन को गुलज़ार किया, उसी चमनलाल के गन्ने के व्यापार को चौकसे परिवार ने हिलाकर रख दिया। खैर, प्यार और व्यापार में सब वाजिब है।
महेश की चाय दूकान ने रेल्वे से और जमीन जुगाड़ कर ली, उसमें 'महेश स्वीट्स' खुल गई। कुछ वर्षों के बाद 'रसोई' खुली, फिर 'होटल श्यामा', उसके बाद बुधवारी में 'महेश स्वीट्स एंड रेस्टोरेंट' और हाल ही में 'रसोई इन'। यह प्रगति रातों-रात नहीं हुई, इसके पीछे महेश और उसके भाइयों का अनवरत परिश्रम का फल है। पान बेचने वाला महेश आज बिलासपुर की एक हस्ती है और अपनी मेहनत से समृद्धि की ओर बढ़ने वाले अजेय व्यक्ति के रूप में स्थापित है। इतनी सफलता के बाद भी महेश का कमाया पैसा उसकी जेब में है, सिर में नहीं चढ़ा। आज भी जब उसकी दूकान का कर्मचारी देर से आता है तो महेश उससे कहता है- 'आइये पिताजी, आप आ गए ! मैं तो सोच रहा था कि शायद आप नहीं आएंगे।'
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बिलासपुर का मोहल्ला तारबाहर 'रेलवे एरिया' और 'टाउन एरिया' की सीमा है। सौ साल पहले यह हिस्सा कंटीले तार से घेरा गया था क्योंकि तार के घेरे के उस पार एकदम सन्नाटा था, जंगली जानवरों का डर था और चर्चा यह भी थी कि वहाँ रात में जिन्न विचरते हैं इसलिए बस्ती के लोग उस पार नहीं जाया करते थे। वैसे, जंगली जानवर और जिन्न भी इन्सानों के डर से इस पार नहीं आते थे।
इस बस्ती में दो लोगों का विकट आतंक था, मोना खान और बिशुन मोंगरे का। उनके डर का आलम यह था कि शहर के लोग अंधेरा होने के बाद तारबाहर की सड़क से आना-जाना बंद कर देते थे। जिन्न और भूत-प्रेत के संकट से सबको बचाने वाला हनुमान-चालीसा भी इन उपद्रवियों पर असर नहीं करता था। कोई भरोसा नहीं था कि ये दो बदमाश किसके पेट में छुरा घुसेड़कर निकाल लें और लूटपाट करके भाग जाएँ।
अपने देश में आबादी इस तरह बढ़ रही है कि जिस जगह पर सन्नाटा पसरा होता है, वह भी धीरे-धीरे आबाद हो जाती है। तारबाहर के अन्न उत्पादक खेत अब शिशु-उत्पादक घरों में तब्दील हो गए हैं। जिस जगह जाने से लोग डरते थे वहाँ अब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च बन गए और बाजार सज गए हैं। रेलवे कालोनी से लगे इस भू-क्षेत्र में गरीब और मज़बूर लोगों ने अपने लिये छोटे-छोटे घर बनाए और वे कालान्तर में फैलते गए। चूंकि इस मोहल्ले में मुस्लिम परिवार अधिक संख्या में बसे हैं इसलिए उनके घरों के आस-पास मुर्गे-मुर्गियाँ दौड़-भाग करते रहती थी। किशोर-वय के मनचले किसी बीमार और कमजोर मुर्गे को सड़क से निकलते साइकल सवार के सामने अचानक छोड़ देते और फड़फड़ाता हुआ मुर्गा यदि उसकी सायकल से कुचल गया तो समझ लीजिए कि मुर्गा फेकने वालों के लिए एक मुर्गा फंस गया। आसपास में छुपे वे बदमाश बाहर निकलकर भीड़ लगा लेते, साइकल सवार से झगड़ा करते और दो रुपए के मुर्गे के दस रुपए वसूल करने के बाद ही उसको वहाँ से जाने की इजाज़त देते। मुर्गे के असल मालिक को दो रुपए मिल जाते, बाकी आठ रुपए शोहदों में बंट जाता और फिर उसका मुर्ग-मुसल्लम और दारू वाली पार्टी होती। ये चतुर बदमाश यदि फिजूलखर्च न होते तो वे इतनी चील-बुद्धि के थे कि आज वे अंबानी-अदानी की हैसियत के बराबर होते!
फिर भी, मोहल्ला तारबाहर में एक चतुर खिलाड़ी लड़कपन की उम्र में आया, रहने नहीं, दूकान चलाने, वह भी राशन की। नाम था मुंशीराम, मुंशीराम उपवेजा। सीएमडी कालेज में पढ़ता, पढ़ता क्या था, नेतागिरी करता था। बातें करने और बातें बनाने में बेमिसाल। इलेक्शन जीतना हो या परीक्षा देना हो, वह सफलता के लिए किये गए हर उपाय को जायज़ मानता था। उसने तारबाहर के आतंकी मोना खान को अपना सहयोगी बनाया। मोना खान लोगों को धमकाने का काम करता था और मुंशीराम मुस्कुराकर भरमाने का। राशन की दूकान और मनमोहक भाषण के भरोसे उसकी तरक्की होती गई और एक दिन वह बिलासपुर की नगरपालिका का 'डिप्टी मेयर' बन गया। यह 'तारबाहर इफेक्ट' था। हमारे देश के गणतन्त्र में बाल्मीकि को महर्षि बाल्मीकि में 'शिफ्ट' करने के प्रयोग निरन्तर जारी हैं !
मुंशीराम ने अपनी योग्यता का चौतरफा उपयोग किया और अब उस पर माँ लक्ष्मी की 'किरपा' बरस रही है. वह बिलासपुर की सबसे शानदार टाकीज़, एक 'थ्री-स्टार' नुमा होटल और अनेक जमीन-ज़ायदाद का मालिक है। आर्थिक वैभव ने मुंशीराम के प्रतिष्ठा स्वाभाविक रूप से बढ़ा दी और अब वह एक अत्यंत सम्माननीय नागरिक के रूप में जाना जाता है।
आप यह न समझिएगा कि लेखक आपको मुंशीराम की कथा बताने वाला है, उसका ज़िक्र तो तारबाहर की पुण्यभूमि की बात निकली इसलिए आ गया; दरअसल, आपको उस व्यक्ति के बारे में बताना है जो इस कथा-लेखक के साथ दसवीं कक्षा तक साथ में पढ़ा और अपनी घरेलू परेशानियों के चलते पढ़ाई छोड़कर तारबाहर चौक की एक पान की दूकान में बैठ गया।
चेहरे पर चेचक के गहरे दाग लिए, दसवी कक्षा में मेरे साथ पढ़ रहे महेश के पिता रामदयाल चौकसे सात भाई थे और मध्यप्रदेश के जिला सिवनी के सहजपुरी गाँव में रहते थे। कृषक थे, कमाई में दम न था, परिवार का खर्च मुश्किल से चलता था। रामदयाल का विवाह करना था, जिनके बच्चे ज्यादा होते हैं वे बच्चों के ब्याह करने के हड़बड़ी में रहते हैं ताकि उनके सामने सबकी गृहस्थी बस जाए और गंगा नहाएँ। मध्यप्रदेश के ही जिला मंडला के ककईया गाँव की एक खूबसूरत लड़की का पता चला तो रामदयाल की अम्मा ने लड़की को देखे बिना संबंध तय कर दिया और श्यामाबाई बहू बनकर घर आ गई।
रामदयाल के मामा बिलासपुर में ठेकेदारी का काम करते थे, उन्होंने रामदयाल को बिलासपुर बुला लिया और प्रताप टाकीज़ में सायकल स्टेंड का ठेका दिलवा दिया। कुछ दिनों बाद रेल्वे स्टेशन के स्टेंड का ठेका मिला। मोहल्ला टिकरापारा में रहते-रहते चार लड़कों और एक लड़की से घर भरपूर हो गया लेकिन कमाई का साधन ठीक-ठाक नहीं बन पाया और परिवार के दिन बड़े कष्ट में बीत रहे थे। उनके घर में नागिनबाई नाम की महिला झाड़ू-पोछा का काम करती थी। उसे रेल्वे में कार्यरत मृत पति के एवज़ में पचीस वर्गफुट का एक भूखंड तारबाहर की सीमा में पान की दूकान खोलने के लिए मिला जिसे उसने अपने मालिक रामदयाल को चलाने के लिए दे दिया। सुनसान इलाका था इसलिए धंधा कम था, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना जब असंभव हो गया तो रामदयाल ने अपने बेटे महेश की पढ़ाई छुड़वा दी और वह अपने पिता के साथ पान की दूकान में बैठने लगा।
पान की दूकान में दो बातें ज़रूर होती हैं, एक उधारी का चलन और दूसरा ग्राहक की पहचान। उधारी वाली बात तो आसानी से समझ में आ जाती है अर्थात ग्राहक ने कहा- 'लिख लेना' याने उधारी हो गई। उधार लेकर वापस करने वाले बहुत कम होते हैं, अधिकतर ग्राहक उधार बढ़ाकर अंतर्ध्यान हो जाते हैं। ऐसे ग्राहक कहीं रास्ते में सपड़ा गए तो ताव से कहेंगे- 'कहीं भागे जा रहे हैं क्या ?' मजबूर दूकानदार उसे भगोड़ा भी नहीं कह पाता क्योंकि ऐसा कहने से पैसा वापस मिलने की उम्मीद का आखिरी धागा भी टूट जाता है। जिसके व्यापार में ऐसे ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है, उसका बंटाधार होना तय है। बेईमान सर्वत्र व्याप्त हैं, जरा सी असावधानी हुई और दुर्घटना घटी। रामदयाल बहुत सीधे आदमी थे, किसी को मना करना नहीं जानते थे इसलिए उधारी-छाप ग्राहकों ने उनकी दशा को दुर्दशा में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पान दूकान की दूसरी खासियत होती है, ग्राहक की पहचान। इस अर्थ यह है कि पान खाने वाला यह उम्मीद करता है कि पान वाला उसे देखते ही समझ जाए कि उसके पान में क्या-क्या और कितना डालना है ? इस बात को ग्राहक अपने सम्मान से जोड़कर देखता है और मनचाहा पान तैयार हो जाने पर प्रसन्नता की अनुभूति करता है। सिगरेट पीनेवाला सिर्फ इतना कहेगा- 'सिगरेट देना।' अब यह पान वाले का परम कर्तव्य है कि वह ग्राहक की पसंद का 'ब्रांड' मुहैया करे। इन छोटी-छोटी बातों की सावधानी रखने से पान की दूकानें चलती हैं या असावधान होने पर बैठ जाती हैं।
पान दूकानों के आसपास रोचकता और बेहूदगी का मिलाजुला माहौल रहता है। रोचक इस तरह कि देश-विदेश की समस्त घटनाओं का 'आँखों देखा' विवरण अनवरत उपलब्ध रहता है। इन घटनाओं के भीतर की अदृश्य बातें भी यहाँ दृश्यमान हो जाती हैं। गपोड़ी और आत्ममुग्ध लोग दिन भर आते रहते हैं, उनके चेहरे बदलते रहेंगे, मुद्दे बदल जाएंगे, बहस छिड़ जाएगी, निर्णय सुना दिए जाएंगे। पुरानी भीड़ छंट जाएगी, नयी लग जाएगी।
आती-जाती लड़कियों पर नयनों के बाण चलेंगे, वाक्प्रहार होंगे, रोमांटिक गाने गुनगुनाए जाएगे और फिर वीभत्स ठहाके। पान खाने वाले पान चबाएंगे, रस-पान करेंगे और वहीं 'पिच-पिच' करते हुए चित्रकारी का हुनर दिखाएंगे। सिगरेट पीने वाले आसमां की ओर देखते हुए कश खीचेंगे, थोड़ा सा धुआँ अपने सीने में रखेंगे और बाकी जनता-जनार्दन को अर्पित कर देंगे ताकि सिगरेट न पीनेवाले उस धुएँ की गंध का निःशुल्क आनंद ले सकें।
बिलासपुर में संतोष-भुवन होटल के पास एक 'बरऊ पान वाला' था, जायसवाल। वह अपने ग्राहकों का स्वागत सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए करता था इसलिए उसका आदर-भाव स्वीकार करने के लिए सुबह से लेकर रात तक उसकी दूकान में भीड़ लगी रहती थी। घर में तो हमारी दो कौड़ी की इज्ज़त नहीं है, शहर में कोई तो है जो इज्ज़त देता है और प्यार से पान भी खिलाता है! इसी प्रकार गोलबाजार में भरतसिंह ठाकुर की पान दूकान खूब चलती थी। वे दो भाई थे, भरत और शत्रुघन। बड़े भाई भरत के रहते दूकान में भीड़ लगी रहती क्योंकि वह ग्राहकों की बात में शामिल होते थे, ठहाका मार कर हँसते थे और रोचक अपशब्दों का प्रयोग भी किया करते थे लेकिन शत्रुघन के सामने ग्राहक कम हो जाते थे क्योंकि वे धीर-गंभीर स्वभाव के थे, ग्राहक उनसे बिदकते थे।
गोलबाजार में सुरेश शुक्ला की पान दूकान हुआ करती थी जिसका नाम था- 'बेगम पसंद पान की दूकान' जहां महिलाओं की पसंद का ख्याल करते हुए मीठे स्वाद वाला पान बना कर उसके ऊपर चांदी का वर्क लपेटा जाता था जिसे विवाहित पुरुष अपने घर ले जाकर पत्नी को प्यार से खिलाते थे, फिर दोनों मिलकर खिलखिलाते थे।
(२)
तारबाहर चूंकि शहर से बाहर था इसलिए वहाँ ग्राहकों की आवक-जावक कम थी। रेल्वे में काम करने वाले पान के शौकीन नहीं थे, हाँ, सिगरेट पीने वाले कुछ ज़रूर थे। पास में ही सीएमडी कालेज था, कुछ छात्र जिनका पढ़ाई में दिल नहीं लगता था वे घूमते-मँडराते वहाँ आते इसलिए कुछ देर चहल-पहल बनी रहती, उसके बाद वही सन्नाटा।
महेश ने जब पढ़ाई छोड़ कर अपनी दूकान में बैठना शुरू किया तो उसने ग्राहक बढ़ाने के कुछ उपाय किए और पान दूकान को 'जनरल स्टोर' का रूप दे दिया। उसकी दूकान का सबसे बड़ा आकर्षण था, विदेशी सामान जिसे उस जमाने में 'स्मगल्ड गूड्स' कहा जाता था, आसानी से मिलने लगा और शहर के ग्राहक वहाँ मजबूरन टपकने लगे। महेश ने वहाँ रेल्वे के अफसरों से जान-पहचान बढ़ाई और बगल में चाय दूकान खोलने के लिए 100 वर्गफीट जमीन का अपने नाम से आबंटन करवा लिया। पान के साथ चाय की दूकान भी चलने लगी, गरम-गरम समोसा और आलूबड़ा भी बनने लगा।
महेश पक्का व्यापारी निकला। पक्का व्यापारी उसे कहते हैं जो एकाग्रचित्त होकर व्यापार करता है। ऐसे व्यक्ति को अपने व्यापार के अलावा अन्य किसी गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं होता। कोई जिए या मरे, कोई आये या जाए, कोई हँसे या रोये, व्यापारी को अपने व्यापार से मतलब रहता है।
बिलासपुर के ही गोलबाजार में किराना के बड़े व्यापारी थे मालिकराम। खुलने से लेकर बंद होने तक दूकान में जम कर बैठते थे, 24 में से 12 घंटे तक उनके फोन का 'रिसीवर' उनके कान से चिपका रहता था ताकि देश-दिसावर के ताजा भाव-ताव उन्हें मालूम होते रहें। उनको यदि कहीं फोन लगाना होता तो रात के बारह बजे के बाद ट्रंक-काल लगाते क्योंकि उस समय आधा चार्ज लगता था। रात को कई बार जागते, फोन पर बात करते और फिर फोन की अगली घंटी आने तक झपकी ले लेते। उनके लिए बचपन में पढ़ी एक कविता सटीक बैठती है- 'हरे रंग का है यह तोता, जाने कब जगता कब सोता।'
जिस दिन मालिकराम की बड़ी लड़की की शादी थी, वे शाम को सात बजे तक दूकानदारी करते बैठे रहे, अगली सुबह नौ बजे दूकान खोल कर बैठ गए। ऐसे व्यक्ति को कहते हैं, एकाग्रचित्त व्यापारी। महेश को भी मालिकराम वाला संक्रामक रोग लग गया था।
इसके अलावा महेश में और भी कुछ ऐसे गुण थे जो मालिकराम में भी नहीं थे। महेश ने अच्छे व्यवहार को अपनी सफलता की सीढ़ी बनाया। गम खाना और कम खाना, ये दोनों गुण उसने आजीवन निभाए। परिचितों और ग्राहकों से बातचीत में मिठास रहती ही थी, अपने 'स्टाफ' से भी वह मीठी भाषा में बात करता। जैसे किसी की 'ड्यूटी' सुबह छः बजे है और वह साढ़े आठ बजे आया तो महेश खड़े होकर उसका स्वागत करता और हाथ जोड़कर उससे कहता- 'आइये पिताजी, आप आ गए ! मैं तो सोच रहा था कि आज आप शायद नहीं आएंगे।'
'देर हो गई सेठ जी।'
'चलो कोई बात नहीं, अब काम से लगो।' महेश कहता। महेश जानता था कि व्यापार का आधार 'स्टाफ' होता है इसलिए उसे संभालकर रखना बहुत ज़रूरी है। संतोष नायक नामक एक उड़िया बालक महेश की चाय दूकान में 10/- प्रति माह के वेतन पर काम से लगा और उसने पचास वर्षों तक काम किया। सन 2005 में जब उसकी मृत्यु हुई तब उसका वेतन 12000/- प्रति माह चल रहा था।
खैर, अपन आगे बढ़ गए, वापस चलते हैं। महेश की पान के साथ चाय की दूकान भी चलने लगी लेकिन गृहस्थी का बोझ फिर भी नहीं सम्हल रहा था। उन्हीं दिनों 'चड्डा कृषि फार्म' के मालिक चमनलाल चड्डा महेश से मिलने उसकी दूकान पहुंचे। उन्होंने गन्ने का रस निकालने की मशीन लगाने का सुझाव दिया और वहाँ एक बोर्ड लग गया 'मधुशाला', जहां गन्ने का मीठा-ठंडा रस मिलने लगा। गन्ने के रस ने महेश की ज़िंदगी में रस घोल दिया, उसके परिवार के अच्छे दिन शुरू हो गए।
महेश के साथ उसके सब भाई भी मिलकर काम करते थे, पिता रामदयाल की दूकान में सक्रियता कम हो गई और वे घर के कामकाज में व्यस्त रहने लगे। टिकरापारा गुजरातियों का मोहल्ला है। गुजराती परिवार उन्मुक्त स्वभाव के होते हैं। खाने-पीने का शौक और आपसी मेल-जोल उनके स्वभाव में होता है। महेश का परिवार गुजराती नहीं था, फिर भी उसका घर मोहल्लेवालों के आवागमन से भरपूर रहता। आसपास के घरों से बहुत प्रेमव्यवहार था, रोज के रोज ढोकला, थेपला, दहीबड़ा और सब्जियों का आदानप्रदान चलते रहता। रात को बारह बजे तक गप-शप और हंसी-ठट्ठा होता, कैरम की भिड़ंत होती, ताश-पत्ती का फड़ जमता और बीच-बीच में नास्ता-चाय के दौर भी।
महेश की माँ जितनी खूबसूरत थी उतनी ही व्यवहारकुशल भी। घर में उन्हीं का दबदबा था, सब उनसे डरते थे और पतिदेव उनके सामने सहमे-सहमे रहते थे। लड़के भी उनकी बात अनसुनी कर देते थे इसलिए रामदयाल ने 'चुप रहो और मुस्कुराओ' की नीति अपना ली थी। क्या करोगे ? सीधे आदमी को अपनी घरवाली और घरवालों, सबसे डर कर रहने का अभ्यास हो जाता है !
एक दिन खाना खाते समय रामदयाल ने श्यामाबाई से कहा- 'महेश शादी लायक हो गया है, कोई लड़की देखो।'
'महेश के लिए लड़की ? मेरी देखी हुई है।' श्यामाबाई ने कहा।
'कौन ?'
'जबलपुर के पास कालादेही है न ? वहाँ लड़की अच्छी है, अपने घर लायक है।'
'तुम कहाँ देखी उसको ?'
'मंडला में, एक शादी में आई थी, वहीं।'
'रिश्तेदार कैसे हैं ?'
'क्या करना रिश्तेदार से, लड़की अच्छी है तो सब ठीक है।'
'वे लोग अपने घर में लड़की देंगे ?'
'क्यों नहीं देंगे ? किस बात की कमी है जो हमें मना करेंगे ?'
'तो फिर बात चलाओ।'
'ठीक है, आपने मायके खबर करती हूँ, वे लोग सिलसिला चलाएंगे। लड़केवाले हैं, हम थोड़े ही बात शुरू करेंगे ! रिश्ता तो उधर से ही आना चाहिए।'
'जैसा तुम ठीक समझो, अगले मुहूर्त में काम हो जाए तो अच्छा है।' रामदयाल ने धीरे से कहा।
बातचीत का सिलसिला चला, बात बन गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा तक नहीं, घरवालों ने बात पक्की कर दी महेश का विवाह 7 मार्च 1976 को मालती से हो गया। महेश का पहला विवाह तो व्यापार के साथ हो चुका था, अब एक और आ गयी, उसकी दूसरी पत्नी।
(३)
शुरुआती दौर में सब भाई एक ही दूकान में साथ-साथ रहते थे, फिर सबकी शहर की अलग-अलग जगहों पर रसवंती की दूकानें खुल गई। सभी दूकानों के लिए चड्डा कृषि फार्म से गन्ना आता था। जब मांग बढ़ गई तो गन्ने का भाव बढ़ गया जिससे रसवंती की दूकानों को होने वाला फायदा कम हो गया। चूंकि चड्डा कृषि फार्म की 'मोनोपली' थी इसलिए गन्ने को बिना छांटे लेना पड़ता था, मोटा, पतला, सूखा सब एक साथ तौला जाता था याने सब धान बाईस पसेरी।
उसी समय रामदयाल को मंडला जाने का मौका पड़ा। उस क्षेत्र में गन्ने की भरपूर फसल होती थी, वहाँ भाव कम थे, 'क्वालिटी' बेहतर थी। प्रयोग के तौर पर वहाँ से एक ट्रक गन्ना बिलासपुर भेजा गया। यहाँ आकर भाड़ा सहित वह चड्डा कृषि फार्म के भाव से बीस रुपए क्विंटल सस्ता पड़ा। महेश और उसके भाइयों की दूकानों में बाहर का गन्ना खपने लगा। फिर बाप-बेटों के बीच सलाह-मशविरा हुआ जिसमें तय किया गया कि बिलासपुर में चड्डा कृषि फार्म के वर्चस्व को तोड़ा जाए और शहर के सभी गन्नारस की दूकानों को गन्ना की आपूर्ति चौकसे परिवार करे। रामदयाल मंडला और आसपास के क्षेत्रों में घूम-घूमकर गन्ना खरीदकर बिलासपुर भेजते और उनके पुत्र गन्नारस के साथ-साथ गन्ना बेचने वाले 'स्टाकिस्ट' बन गए।
माल की बिक्री बढ़ाने की नई जुगत सोची गई जिसके अंतर्गत गोलबाजार में स्थित छितानी-मितानी धर्मशाला में शहर के समस्त गन्नारस विक्रेताओं को बुलाकर 'बिलासपुर गन्नारस विक्रेता संघ' का गठन किया गया जिसमें ज़ोर-शोर से चड्डा कृषि फार्म की मनमानी पर चर्चा हुई तथा उसका बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया। बैठक में महेश के छोटे भाई दिनेश को अध्यक्ष बनाया गया। जब दूकानदारों ने अध्यक्ष से पूछा- 'वहाँ से नहीं लेंगे तो गन्ना कहाँ से मिलेगा ?' तब अध्यक्ष ने कहा- 'हम देंगे और चड्डा कृषि फार्म से पंद्रह रुपये प्रति क्विंटल सस्ता देंगे।' जिस चमनलाल ने चौकसे परिवार के चमन को गुलज़ार किया, उसी चमनलाल के गन्ने के व्यापार को चौकसे परिवार ने हिलाकर रख दिया। खैर, प्यार और व्यापार में सब वाजिब है।
महेश की चाय दूकान ने रेल्वे से और जमीन जुगाड़ कर ली, उसमें 'महेश स्वीट्स' खुल गई। कुछ वर्षों के बाद 'रसोई' खुली, फिर 'होटल श्यामा', उसके बाद बुधवारी में 'महेश स्वीट्स एंड रेस्टोरेंट' और हाल ही में 'रसोई इन'। यह प्रगति रातों-रात नहीं हुई, इसके पीछे महेश और उसके भाइयों का अनवरत परिश्रम का फल है। पान बेचने वाला महेश आज बिलासपुर की एक हस्ती है और अपनी मेहनत से समृद्धि की ओर बढ़ने वाले अजेय व्यक्ति के रूप में स्थापित है। इतनी सफलता के बाद भी महेश का कमाया पैसा उसकी जेब में है, सिर में नहीं चढ़ा। आज भी जब उसकी दूकान का कर्मचारी देर से आता है तो महेश उससे कहता है- 'आइये पिताजी, आप आ गए ! मैं तो सोच रहा था कि शायद आप नहीं आएंगे।'
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किस्सा चमनलाल चड्ढा का : पाकिस्तान से आया हिन्दुस्तानी
(१)
नदियों के किनारे बस्तियाँ बसती हैं, बस्तियों में लोग बसते हैं और लोगों में मनुष्यता बसती है। नदी का जल हमें जीवन देता है और निरंतर प्रवाहवान बने रहने का सबक भी। बिलासपुर के बीच में बहती अरपा नदी के कुछ इस पार लोग बसे, कुछ उस पार। जीवनदायिनी है अरपा। बिलासपुर में अधिकतर लोग आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसे, कुछ दूरदराज़ से आए। गाँवों में जो जमीन से जुड़े थे वे जमीन से ही जुड़े रह गए लेकिन जो धनपति बन गए वे बिलासपुर आकर बस गए क्योंकि यहाँ व्यापार था, स्कूल-कालेज थे, सिनेमा घर थे, अस्पताल थे और ऐश्वर्य भी। गाँव का मजदूर गाँव में और गाँव का गौंटिया शहर में।
उन दिनों साल में एक फसल हुआ करती थी, धान की। चार महीने का काम था और आठ महीने का लंबा विश्राम। बड़े-बूढ़े तो आपस में बतियाकर समय काट लेते थे, युवकों के पास कोई काम न था। महिलाएं रसोई में भात-साग पका रही थी और लड़कियां अपने-आप पक रही थी, तेरह-चौदह की हुई, उनका ब्याह किया, वे भी किसी और की रसोई में खाना पकाने लगती। युवकों के पास कोई उत्पादक काम न था लेकिन चढ़ती जवानी के अपने काम होते हैं, चहलकदमी होती है, दिल लगता है तो कभी टूट भी जाता है। वैसे, दिल का लगना और टूटना शहरों की समस्या है, गांवों की नहीं क्योंकि ग्रामीण परिवेश में प्यार-मोहब्बत को लेकर शहरों के मुक़ाबले अधिक खुलापन होता है।
परिवार से जुड़े रहने के कई फायदे हैं, कोई कमा रहा है, कोई खाना पका रहा है, कोई खिला रहा है। थोड़ी-बहुत डांट पड़ती है तो उसको सुन लेने में क्या हर्ज़ है ? गाँव की लड़कियां घर का काम सीखकर अपनी जीवन-यात्रा नियोजित कर लेती हैं लेकिन लड़कों के सामने 'कमाऊ पूत' बनने की बड़ी चुनौती होती है। उनकी सबसे बड़ी समस्या है, पढ़ना। रोजगार के अच्छे अवसर शिक्षा से जुड़े हुए हैं लेकिन सबका दिल तो पढ़ाई में लगता नहीं। स्कूल में या तो शैतानी सूझती है या नींद आती है। घर का काम, स्कूल का काम और अपना काम- इस तीनों में अपना काम ही मुश्किल से हो पाता है, घर और स्कूल का काम कब करें ? अपना काम यानी गाँव में घूमना-फिरना, गप्प-सड़ाका करना, हंसी-ठट्ठा करना, ताश खेलना, बीड़ी का सुट्टा लगाना आदि।
खेतिहरों और व्यापारियों के परिवारों में परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। व्यापारी का बच्चा बचपन से ही व्यापार से जुड़ जाता है। जब शिशु रहता है तब से वह अपनी अबोध दृष्टि से लेनदेन देखता है, सिक्के से खेलता है या नोट को हाथ में लेकर उसे मोड़ने-तोड़ने-मसलने की कोशिश करता है। थोड़ा और बड़ा होता है तो 'कैश बॉक्स' को ललचाई दृष्टि से देखता है। किशोरावस्था उसका प्रशिक्षण काल होता है। युवक होते ही वह दायित्व संभाल लेता है और अपनी प्रतिभा से पारिवारिक व्यापार को अपने ढंग से बढ़ाने के प्रयत्न करता है। इस स्थिति में दो पीढ़ियों की कार्यशैली का अंतर उपस्थित होता है। आम तौर पर पुराने सदस्य नवागंतुकों के लिए रास्ता छोड़ देते हैं और अपनी सक्रियता को खाता-बही, लिखा-पढ़ी, बैंक, कोर्ट-कचहरी और 'टेक्सेशन' आदि की दिशा में मोड़ देते हैं। इस प्रकार दोनों पीढ़ियाँ मिलजुल कर व्यापार को विकसित करते हैं।
बिलासपुर आप्रवासियों का शहर है। हर कोई कहीं-न-कहीं से आकर यहाँ बसा है। कुछ व्यापार करने आए तो कुछ नौकरी करने। नौकरी करने के लिए सर्वाधिक लोग रेल्वे में आए, ज़्यादातर बंगाल, ओडिशा, बिहार, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु से। अन्य नौकरियों में अन्य प्रदेशों के भी लोग आए। इन नौकरीपेशा लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए व्यापार फले-फूले। छोटा सा कस्बा धीरे-धीरे शहर का आकार लेने लगा। आज़ादी के पहले आसपास के कस्बों और गावों के लोग यहाँ आए, कुछ मारवाड़-राजस्थान से भी आए। देश की आज़ादी के दौरान पाकिस्तान के पंजाब और सिंध के प्रवासियों ने इस शहर के दरवाजे में दस्तक दी। अपना घर-द्वार और संपत्ति छोड़ कर आए इन मुसीबतज़दा परिवारों ने बामुश्किल अपने अस्तित्व को बचाने और नया संसार रचने की कोशिश की।
बिलासपुर में उन दिनों बहुत से परिवार आए। चूंकि वे भारत के उत्तरी भाग से आए थे, वे सब गोरे-चिट्टे थे। सिंधियों के आवास के लिए 'केंप' जैसी व्यवस्था मोहल्ला जरहाभाटा में बनाई गई थी, जिसे सिंधी कालोनी कहा जाता था, अनेक परिवार वहां एक साथ बसे। कुछ परिवार अपनी दूकानों के पीछे रिहाइश बनाकर अन्य मोहल्लों में बस गए। लेकिन पंजाब से आए परिवारों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, उन्हें जहां किराए पर घर मिले, वे वहाँ टिक गए। पंजाबियों के परिवारों में कुछ सिख थे, लेकिन अधिकतर मोना पंजाबी। मोना पंजाबी का अर्थ है, पंजाब के वे रहवासी जिन्होंने सिख पंथ नहीं अपनाया।
यह कहानी एक ऐसे मोना पंजाबी की है जिसका रंग सांवला था लेकिन खोपड़ी गजब की थी। अविभाजित पंजाब के डिस्ट्रिक्ट जेलम के गाँव टालियावालां के चमनलाल चड्डा हिन्दुस्तानी फौज में इलेक्ट्रीशियन थे। अफसर की मातहती से आहत होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। उन्हीं दिनों देश के विभाजन का कहर सामने आ गया। अपनी नव-विवाहिता कुलवंती को लेकर वे जम्मू पहुँच गए। किसी के साथ साझेदारी में बिजली के सामान बेचने की दूकान खोली, घाटा होने के बाद साझेदार को वहीं छोड़ा और बिलासपुर आ पहुंचे। कुलवंती गर्भवती थी, शहर नया था, फटेहाली थी। मोहल्ला गोंडपारा के राजाराम मंदिर के बाड़े में एक छोटा सा घर किराया पर लेकर रहने लगे। आर्थिक तंगी के बीच बिलासपुर के दीक्षित अस्पताल में कुलवंती ने 6 जनवरी 1948 को एक शिशु को जन्म दिया, नाम रखा गया, प्राण।
कुलवंती की देखरेख और उसका इंतज़ाम चमनलाल को करना था। प्रसूता को पिलाने के लिए मसाले वाला पानी उबालना, दोनों समय का खाना बनाना और दौड़-भाग में बीस दिन बीत गए। एक दिन कुलवंती ने चमनलाल से कहा- 'सुनो जी, अब मैं ठीक हो गई हूँ, घर का चूल्हा-चौका सम्हाल लूँगी। तुम अब अपना काम देखो। घर में राशन भी खत्म होने वाला है, बाहर निकलोगे तब तो काम बनेगा।'
'हो जाएगा, सब हो जाएगा। अभी तुम बहुत कमज़ोर हो, कुछ दिन और आराम कर लो।'
'हो गया मेरा आराम। तुमको चूल्हे का धुआं सहते हुए खाना बनाते देखती हूँ तो मुझे रोना आता है।'
'तुमको नहीं लगता क्या ?'
'लगता क्यों नहीं लेकिन हमारी आदत हो गई है। तुमको तो चूल्हे में ठीक से लकड़ी लगाना नहीं आता इसीलिए धुआं ज्यादा होता है।'
'अरे वाह, क्या मैं चूल्हा जलाना नहीं जानता ? ऐसा कौन सा काम है जो मैं नहीं जानता ? असल में लकड़ी गीली है, इसलिए धुआं होता है ।'
'अच्छा, तो तुम सब काम जानते हो ?'
'हूँ।'
'बच्चे को नौ महीने गर्भ में पाल सकते हो क्या ?'
'हा हा हा, इसके अलावा सब कर सकता हूँ।'
'शादी होकर दूसरे के घर जाकर रह सकते हो ?'
'नहीं, ये भी नहीं कर सकता।'
'तो फिर काहे का घमंड ? ऐसा कौन सा काम है जो मैं नहीं जानता.....' कुलवंती ने हँसते हुए ताना मारा- 'जिसकी बंदरिया, उसी से नाचती है। तुम जाओ, कल से अपना बैपार देखो।'
(२)
बिलासपुर के मोहल्ला सरकंडा में एक सेठ रहते थे, बनवारीलाल अग्रवाल जिन्हें अंग्रेज़ सरकार ने 'राय साहब' का तमगा दिया था इसलिए उनका प्रचलित नाम था 'रायसाहब बनवारीलाल।' उनके पास राइस मिल थी, कार थी, कई ट्रक थे। चमनलाल की उनसे गहरी दोस्ती हो गई।
अंग्रेज भारत छोड़कर वापस जा रहे थे, इसलिए उनके द्वारा बिलासपुर के आसपास स्थापित सैनिक अड्डों का बेशुमार असवाब वे कबाड़ के रूप बेचना चाहते थे जिसे रायसाहब बनवारीलाल और रामप्रसाद जैसे व्यापारियों ने औने-पौने दाम में खरीदा और उसे बिलासपुर से बाहर बेच कर बहुत लाभ कमाया। चमनलाल ने भी इसी धंधे को पकड़ा और अपनी कमाई लेकर कलकत्ता गए और बिलासपुर में एक नए व्यापार की शुरुआत की।
कलकत्ता से उन्होंने 'ग्रामोफोन' लाकर बिलासपुर को 'लाउड स्पीकर' से परिचित कराया। पुराने जमाने का रेकार्ड प्लेयर जिस पर तवा चढ़ाकर, चाबी भर कर, सुई को धीरे से रख दिया जाता और पोंगे से जब ज़ोहरा बाई अंबालावाली, उमादेवी, पंकज मालिक और के.एल.सहगल के गानों की सुरीली आवाज़ फैलती तो सड़क पर सुनने वालों का मजमा लग जाता। आसपास के राजा-महाराजा, गौटिया, मालगुजार और सेठ अपने यहाँ शादी-ब्याह के कार्यक्रम में ग्रामोफोन बजवाते थे क्योंकि चमनलाल ने उस अनुसंधान को बिलासपुर में लाकर 'फर्स्ट प्रमोटर' होने का फायदा उठाया और उसका मनमाना किराया वसूल किया, इतना अधिक किराया कि आप-हम कल्पना नहीं कर सकते।
उन्हीं दिनों बिलासपुर के 55 मील दूर स्थित गाँव कवर्धा में एक यज्ञ का आयोजन हुआ। उस समय के हिसाब से वह विशाल कार्यक्रम था, जहाँ अंधकार को चकाचौंध में बदलने का ठेका चमनलाल को मिला। चमनलाल कलकत्ता गए, वहाँ से बड़े-बड़े जनरेटर और असंख्य बल्व तथा वायर ट्रक में लदवाकर कवर्धा ले आए और यज्ञस्थल को जगमगा दिया। आप कल्पना कीजिए, उस समय यदि कोई व्यक्ति टार्च की रोशनी देख लेता था तो उसे देखकर भूत-प्रेत होने का भय लगता था। मिट्टीतेल से जलने वाली कंडील से आगे की बात वे सोच भी नहीं सकते थे। बिजली के बल्व वहाँ के रहवासियों के लिए चमत्कार था। सब तरफ हल्ला हो गया और आसपास की आबादी यज्ञ देखने उमड़ पड़ी। चमनलाल का चमन आबाद हो गया।
चमनलाल ने मोहल्ला कुड़ुदंड में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीदा, अपना घर बनवाया और उसमें अपनी दो लड़कियों और पाँच लड़कों के साथ सपरिवार रहने लगे। गोलबाजार में दो दूकानें और गोदाम किराए पर लिए जहां वे लाउडस्पीकर और बेट्री का व्यापार करते थे। पाँच छः साल के बाद दूकानों को बंद कर दिया और 'ट्रक ट्रांसपोर्टिंग' का काम शुरू किया। उनकी आठ ट्रकें चलने लगी जो दिन-रात अनाज और बीड़ीपत्ता की ढुलाई करती थी।
(३)
सन 1962 की उस सुबह बिलासपुर में बहुत गहमा-गहमी थी, भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आने वाले थे। दोपहर बारह बजे उनका भाषण रघुराजसिंह स्टेडियम मे होना था। बिलासपुर में नेहरु जी पहली बार आ रहे थे। पूरा शहर उन्हें सुनने उमड़ पड़ा और आसपास के ग्रामीण अपनी बैलगाड़ियों में लद कर उन्हें देखने पहुँच गए। पूरे शहर की सड़कें भीड़ से भरपूर थी, बैलगाड़ियाँ सड़क के किनारे खड़ी थी और हर व्यक्ति के कदम स्टेडियम की ओर बढ़ रहे थे। स्टेडियम छोटा पड़ गया, लोग स्टेडियम से लगे खेतों पर जमकर बैठ गए। ऐसा जन सैलाब बिलासपुर की धरती ने फिर कभी नहीं देखा।
उसी दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने चमनलाल को अंदर तक हिला दिया। सायकल के पीछे बैठा युवक उनकी एक ट्रक के नीचे आ गया और उसकी दुर्घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। घटना कचहरी के चढ़ाव पर हुई जहां बिछी हुई मुरम पर साइकलचालक का संतुलन बिगड़ गया और वे दोनों सड़क पर गिर गए, उनमें से एक युवक ट्रक के पिछले चक्के के नीचे आ गया। मृत युवक बिलासपुर के एक सरकारी अधिकारी का था, अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र। ट्रक का ड्राइवर गाड़ी लेकर घर पहुंचा और चमनलाल को घटना की जानकारी दी। चमनलाल चिंतित हो गए। वे ड्राइवर के साथ ट्रक में बैठकर कोतवाली गए, पुलिस को घटना के बारे में बताया जबकि उस समय तक पुलिस को दुर्घटना की कोई खबर नहीं थी। पुलिस ने ड्राइवर को थाने में रोक लिया और ट्रक जब्त कर ली।
शाम को मृतक के बारे में चमनलाल को मालूम पड़ा। मृतक के पिता बिलासपुर जिलाधीश कार्यालय में भू-अधीक्षक थे. चमनलाल की उस परिवार का सामना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्हें हिम्मत जुटाने में डेढ़ दिन लग गए। शाम के समय मृतक का घर खोजते उसके परिवार से मिलने गए। पूरा परिवार बिलख रहा था, लेकिन जो होना था वह हो चुका था। आधे घंटे तक चमनलाल उन सब की बात सुनते रहे फिर बोले- 'जितना आपका दुख है, उतना मेरा दुख है।'
'आप हमारे दुख को क्या समझेंगे ? जिसका बेटा जाता है, दुख वही जानता है।' मृतक युवक के पिता ने कहा।
'आप ठीक हो, जी। जान-बूझ कर तो हुआ नहीं, अनहोनी थी, हो गई।'
'आपकी ट्रक का ड्राइवर उसको बचा सकता था।'
'ड्राइवर को तो दिखाई नहीं पड़ा, बच्चा पिछले चक्के के नीचे आ गया।'
'हम सब उसके सहारे थे, वह तो हमें छोड़कर चला गया।'
'मैं आप लोगों की मदद करना चाहता हूँ, कोई व्यापार लगवा सकता हूँ।'
'हमने कभी व्यापार किया नहीं, हम नहीं कर पाएंगे।'
'तो आप जो भी कहें, मैं आपको दे सकता हूँ।'
'पैसे का क्या करेंगे , आप हमारा बेटा वापस कर दो ?'
'आपका बेटा मैं कहाँ से वापस लाऊं ? एक काम कीजिए, मेरा बेटा ले लीजिए।'
'आपका बेटा ?'
'हाँ, पाँच हैं, एक बेटा आपकी सेवा करेगा।' चमनलाल ने कहा और रोने लगे। घर के अंदर से एक महिला का सिसकता स्वर बाहर घिसट कर आया- 'एक माँ तो दुखी है, क्या दूसरी माँ को भी दुखी करना है ?'
मनुष्य के जीवन में कल क्या होने वाला है कोई नहीं जानता। जैसा होना होता है, वैसे हालात बन जाते हैं। सड़क दुर्घटना ने चमनलाल को इस कदर आहत कर दिया कि उन्होंने ट्रांसपोर्ट का व्यापार बंद करने का फैसला ले लिया और उसे समेटना शुरू कर दिया। एक-एक करके सारे ट्रक बेच दिए और मुर्गीपालन करने लगे। पंद्रह साल के अंतराल में चमनलाल ने कितने सारे काम किए, सेना में नौकरी, कबाड़ का व्यापार, बिजली का सामान, लाउड स्पीकर, बेट्री की दूकान, ट्रांसपोर्टिंग और अब मुर्गी-पालन !
एक बात ज़रूर रही कि बिलासपुर में आकर चमनलाल ने जिस काम में हाथ डाला, भरपूर कमाई की। उनमें ग्राहकों की जरूरत को समझने का अद्भुत कौशल था। ग्राहक को आज क्या चाहिए ? कल किस वस्तु की मांग आने वाली है ? नई वस्तु को ग्राहक की मांग कैसे बनाया जाए ? इन बातों को वे सफ़ल व्यापारी की तरह समय से पूर्व ताड़ कर उस पर काम करना शुरू कर देते थे। वे कुछ नया करने के फ़िराक में रहते थे। वे जिस काम को हाथ लगाते, चल पड़ता। उनके खून में व्यापार के अतिसक्रिय कीटाणु थे। उनकी सफलता का सूत्र था, दूरदृष्टि, उत्कट लगन और भरपूर परिश्रम।
वैसे भी देखने में यह आया है कि जो व्यक्ति विस्थापित होकर किसी नए शहर में अपने पैर जमाने की कोशिश करता है, वह अपनी सफलता के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाता है। उसका दिमाग और शरीर अपने लक्ष्य को हासिल करने के पुरजोर कोशिश करता है। चमनलाल पाकिस्तान से भारत आए, बिना किसी संदर्भ और जान-पहचान के बिलासपुर में टिक गए। परिवार मज़े से चलने लगा। बच्चे बढ़ रहे थे, पढ़ रहे थे। चमनलाल के सिर के बाल पकने लगे, शरीर फैलने लगा, उन्हें शहर के लोग 'चड्डा जी' कहते थे। मुर्गीपालन के व्यापार में आशातीत सफलता हासिल करने के बाद भी चमनलाल की मुर्गियों से दोस्ती अधिक दिन नहीं चली। उसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि वे शहर के लिए एक उदाहरण बन गए।
(४)
चमनलाल जिंदगी भर जुनूनी इन्सान रहे, जिस काम के पीछे लग गए, लग गए। उनकी मुर्गियों ने इतने अधिक अंडे दिए कि उनकी खपत के लिए कि उन अंडों को लेकर बिलासपुर से बाहर बेचने के लिए निकलना पड़ा। आसपास सौ-दो सौ किलोमीटर तक 'चड्डा पोल्ट्री फार्म' की सील लगे अंडे ग्राहकों की पहली पसंद बन गए। वे अपनी मुर्गियों को अपने खेत में उगाई हुई ताज़ी सब्जियाँ खिलाते थे इसलिए उनके अंडे अधिक स्वादिष्ट होते थे। कुछ ही समय में अंडों का उत्पादन इतना अधिक होने लगा कि उसे बाजार में भेजना और खपाना बहुत बड़ी समस्या बन गई क्योंकि अंडा खाने का रिवाज मुसलमानों, ईसाइयों, पंजाबियों और सिंधियों में ही था, हिन्दू परिवार अंडे से परहेज करते थे इसलिए पूर्ति और मांग में नकारात्मक अंतर आ गया। धीरे-धीरे उन्होंने उस उद्योग को समेट लिया और कृषि की ओर मुड़ गए। घर से जुड़ा हुआ पाँच एकड़ का एक भूखंड ले लिया और उसमें फल, सब्जी और अनाज उगाने लगे।
चमनलाल के पास भी हमारे आपके जैसी एक बुद्धि थी लेकिन उनकी अक्ल चौतरफा घूमती थी। वे फोटोग्राफी के शौकीन थे। शिकार के शौकीन थे। बिलासपुर के समीप स्थित अचानकमार के जंगल में उन्होंने दो शेर निपटाए थे। बिलासपुर शहर की पहली 'राजदूत' मोटरसाइकल वे रायपुर से खरीदकर लाए थे। पंजाब से जितने लोग बिलासपुर आए वे यहाँ आकर छत्तीसगढ़िया हो गए, पंजाबियत खो बैठे लेकिन चमनलाल आजीवन पंजाबी बने रहे। रहनसहन और वेषभूषा सदा पंजाबियों जैसी रही। ढीला-ढाला बड़े घेर वाला पैजामा और आधे बांह की कमीज उनकी स्थायी वेषभूषा थी जिसे कुलवंती घर में ही सिलती थी।
सन 1964 में देश अकाल की चपेट में आ गया, अन्न का उत्पादन कम हो गया और आबादी बढ़ गई। भारत सरकार के सामने दुर्भिक्ष एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या के रूप में आ खड़ा हुआ। उससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय हरित क्रान्ति आन्दोलन' की शुरुआत की जिसमें एम.एस.स्वामीनाथन के मार्गदर्शन में अनेक योजनाओं को शुरू किया गया। प्रमुखतः वितरण व्यवस्था को नियोजित करने के लिए ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली' का क्रियान्वयन, कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए ‘नेशनल बेंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट' (नाबार्ड) तथा अनाज के भंडारण के लिए ‘भारतीय खाद्य निगम' का गठन किया गया।
तात्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सोमवार के दिन एक समय का उपवास रखने की अपील की जिसे चमनलाल ने अपने घर में अपनाया लेकिन वे सोचा करते थे कि 'एक समय न खाने' से क्या देश की खाद्य समस्या का समाधान हो जाएगा ? चमनलाल का दिमाग अब अन्न-उत्पादन की ओर चल पड़ा। उन्होंने बिलासपुर शहर से पाँच किलोमीटर की अलग-अलग दूरी पर स्थित सकरी और मंगला गांव में 65 एकड़ कृषि योग्य जमीन खरीदी और दो सौ मजदूरों के सहयोग से खेती करने लगे और अपने स्तर पर अन्न की समस्या के समाधान में भिड़ गए।
मंगला की जमीन अनुपजाऊ थी, पड़ती जमीन, जिसे चमनलाल ने सस्ते भाव में खरीद लिया। जमीन में रेत की मात्रा अधिक थी इसलिए उपजाऊ बनाने के लिए आर्गेनिक और गोबर खाद मिलाकर तैयार करके उसमें केला, पपीता और गन्ना के पौधे रोपे गए। इन सभी की भरपूर पैदावार हुई। केले का पूरा उत्पादन बिलासपुर में ही खप जाता था। पपीता यहाँ की जरूरत से बहुत अधिक होता था इसलिए उसे बड़े-बड़े टोकरों में पैक करके ट्रेन के जरिए कलकत्ता भेजा जाता, लगभग दो क्विंटल प्रतिदिन। गन्ना की मांग बिलासपुर में केवल दीवाली के ग्यारह दिन बाद होने वाले एकादशी के त्यौहार में होती थी, इसलिए नियमित मांग व्यवस्थित करने के लिए उन्होंने शहर के तीन व्यक्तियों को गन्ने का रस बेचने की दूकान शुरू करने के लिए प्रेरित किया और मनोहर टाकीज़ के सामने, तारबाहर चौक और बुधवारी बाजार में यह नया व्यापार शुरू हो गया। इस प्रकार 'चड्डा फार्म' का गन्ना स्वादिष्ट और सस्ते पेय के रूप में नगरवासियों को उपलब्ध हो गया।
(५)
एक दिन रायसाहब बनवारीलाल और उनके मित्र सेठ रामप्रसाद अग्रवाल आपसी चर्चा में व्यस्त थे। जिस दिन दोनों की बैठक जमती, उस दिन पूरा दिन बीत जाता और शाम हो जाती लेकिन बातचीत का सिलसिला न थमता। वे लोग व्यापार की, समाज की, परिवार की और राजनीति की बातें करते और अपने विचारों से एक-दूसरे को सहयोग दिया करते थे।
रायसाहब की गद्दी में आज राजनीति पर चर्चा चल रही है। 'रायसाहब, आपको राजनीति में उतरना चाहिए।' सेठ रामप्रसाद बोले।
'इरादा तो बन रहा है, विधानसभा की टिकट के लिए मुख्यमंत्री श्यामाचरण से मेरी बात हुई थी।' रायसाहब बनवारीलाल ने बताया।
'क्या बोले वो ?'
'हंस रहे थे।'
'क्यों ?'
'क्या पता ?'
'इतनी सी बात नहीं समझे रायसाहब !'
'क्या ?'
'उनकी मुस्कान का मतलब रहा होगा कि टिकट 'फोकट' में थोड़े मिलेगी।'
'तो कैसे मिलेगी ?'
'जैसे आप अपना व्यापार चलाते हो, राजनीति उनका व्यापार है, बाल-बच्चे हैं।'
'कैसा किया जाए ?'
'चतरू डाक्टर उनके साढ़ू हैं वो आपके लिए कह दें तो आपका काम बन सकता है लेकिन चतरू बाबू आपका राजनीति में आगे बढ़ना पसंद नहीं करेंगे, उनका स्वभाव किसी को आगे बढ़ाने का नहीं है।'
'यह तो मैं भी जानता हूँ। फिर, कैसा किया जाए ?'
'पहले रायपुर जाओ, पद्मिनी भाभी को खुश करो और भोपाल पहुँच जाओ, काम बन जाएगा।' सेठ रामप्रसाद ने सलाह दी। इतने में चमनलाल चड्डा भी आ पहुंचे।
'आओ, चमनलाल।' रायसाहब बोले।
'क्या चर्चा चल रही है, आप लोगों की ?' चमनलाल ने पूछा।
'रायसाहब को एम.एल.ए. की टिकट चाहिए, चुनाव लड़ने का मन है।' बीच में सेठ रामप्रसाद बोल पड़े।
'व्यापार छोडकर राजनीति में जाओगे क्या, रायसाहब ?'
'क्यों नहीं ? जब तुम व्यापार छोड़कर खेती कर सकते हो तो क्या हम राजनीति नहीं कर सकते ?' रायसाहब ने पूछा।
'कर सकते हो लेकिन जनता में पकड़ होनी चाहिए तब तो वोट मिलेगा।'
'मुझे बिलासपुर के आसपास किसी भी विधानसभा क्षेत्र की टिकट दिलवा दो, मैं जीत कर बताऊंगा।'
'कैसे जीत जाओगे ?'
'चुनाव 'पैसा' जीतता है, 'केन्डीडेट' नहीं।'
'क्या पैसे में इतनी ताकत है ?'
'देखना, यही पैसा टिकट दिलवाएगा, वोट दिलवाएगा और मुझे एम.एल.ए. बनवाएगा, चमनलाल।'
'इसीलिए आप लोग 'सेठ जी' कहलाते हैं क्योंकि आप पैसे की ताकत पहचानते हैं और पैसे को काम से लगाते हैं।'
'पैसा तो तुम्हारे पास भी बहुत है ?'
'है लेकिन मेरा मजदूर जैसा स्वभाव है। मैं मजदूरी में अपनी अक्ल लगाता हूँ, पैसे में नहीं। इसीलिए आप दोनों सेठ हो और मैं हूँ 'किसान' चमनलाल।'
चमनलाल की पढ़ाई लाहौर में हुई थी, एफ.ए. पास थे। एफ.ए.अर्थात 'एंट्रेन्स' के समकक्ष। पाकिस्तान से भागे तो पढ़ाई-लिखाई छूट गई लेकिन पुस्तकें पढ़ने का शौक उनके पीछे लग गया। उनको हिन्दी भाषा पढ़नी-लिखनी नहीं आती थी लेकिन अंग्रेजी, उर्दू, फारसी के अच्छे जानकार थे। घर में समृद्ध लाइब्रेरी थी जिसमें कृषि और बागवानी से संबन्धित पुस्तकों का खासा संग्रह था। वे उपज बढ़ाने के लिए उपयोगी अधिकाधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश करते, देश भर में आयोजित प्रदर्शनियों और सेमिनारों में भाग लेते, कृषि वैज्ञानिकों और कृषकों से चर्चा करते और उसे अपने खेतों में ले आते। अन्न, फल और सब्जी के उत्पादन में मिली सफलता ने आसपास के कृषकों को आकर्षित किया और बिलासपुर के आसपास के गाँव की ज़मीनें चार महीने की फसल के बदले बारह महीने की फसल उगलने वाली बन गई।
15 दिसंबर 1981 को पेट में हुई तकलीफ के कारण 62 वर्ष की उम्र में बिलासपुर का आधुनिक अन्नदूत इस चमन को हरा-भरा छोड़ कर असमय चला गया।
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नदियों के किनारे बस्तियाँ बसती हैं, बस्तियों में लोग बसते हैं और लोगों में मनुष्यता बसती है। नदी का जल हमें जीवन देता है और निरंतर प्रवाहवान बने रहने का सबक भी। बिलासपुर के बीच में बहती अरपा नदी के कुछ इस पार लोग बसे, कुछ उस पार। जीवनदायिनी है अरपा। बिलासपुर में अधिकतर लोग आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसे, कुछ दूरदराज़ से आए। गाँवों में जो जमीन से जुड़े थे वे जमीन से ही जुड़े रह गए लेकिन जो धनपति बन गए वे बिलासपुर आकर बस गए क्योंकि यहाँ व्यापार था, स्कूल-कालेज थे, सिनेमा घर थे, अस्पताल थे और ऐश्वर्य भी। गाँव का मजदूर गाँव में और गाँव का गौंटिया शहर में।
उन दिनों साल में एक फसल हुआ करती थी, धान की। चार महीने का काम था और आठ महीने का लंबा विश्राम। बड़े-बूढ़े तो आपस में बतियाकर समय काट लेते थे, युवकों के पास कोई काम न था। महिलाएं रसोई में भात-साग पका रही थी और लड़कियां अपने-आप पक रही थी, तेरह-चौदह की हुई, उनका ब्याह किया, वे भी किसी और की रसोई में खाना पकाने लगती। युवकों के पास कोई उत्पादक काम न था लेकिन चढ़ती जवानी के अपने काम होते हैं, चहलकदमी होती है, दिल लगता है तो कभी टूट भी जाता है। वैसे, दिल का लगना और टूटना शहरों की समस्या है, गांवों की नहीं क्योंकि ग्रामीण परिवेश में प्यार-मोहब्बत को लेकर शहरों के मुक़ाबले अधिक खुलापन होता है।
परिवार से जुड़े रहने के कई फायदे हैं, कोई कमा रहा है, कोई खाना पका रहा है, कोई खिला रहा है। थोड़ी-बहुत डांट पड़ती है तो उसको सुन लेने में क्या हर्ज़ है ? गाँव की लड़कियां घर का काम सीखकर अपनी जीवन-यात्रा नियोजित कर लेती हैं लेकिन लड़कों के सामने 'कमाऊ पूत' बनने की बड़ी चुनौती होती है। उनकी सबसे बड़ी समस्या है, पढ़ना। रोजगार के अच्छे अवसर शिक्षा से जुड़े हुए हैं लेकिन सबका दिल तो पढ़ाई में लगता नहीं। स्कूल में या तो शैतानी सूझती है या नींद आती है। घर का काम, स्कूल का काम और अपना काम- इस तीनों में अपना काम ही मुश्किल से हो पाता है, घर और स्कूल का काम कब करें ? अपना काम यानी गाँव में घूमना-फिरना, गप्प-सड़ाका करना, हंसी-ठट्ठा करना, ताश खेलना, बीड़ी का सुट्टा लगाना आदि।
खेतिहरों और व्यापारियों के परिवारों में परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। व्यापारी का बच्चा बचपन से ही व्यापार से जुड़ जाता है। जब शिशु रहता है तब से वह अपनी अबोध दृष्टि से लेनदेन देखता है, सिक्के से खेलता है या नोट को हाथ में लेकर उसे मोड़ने-तोड़ने-मसलने की कोशिश करता है। थोड़ा और बड़ा होता है तो 'कैश बॉक्स' को ललचाई दृष्टि से देखता है। किशोरावस्था उसका प्रशिक्षण काल होता है। युवक होते ही वह दायित्व संभाल लेता है और अपनी प्रतिभा से पारिवारिक व्यापार को अपने ढंग से बढ़ाने के प्रयत्न करता है। इस स्थिति में दो पीढ़ियों की कार्यशैली का अंतर उपस्थित होता है। आम तौर पर पुराने सदस्य नवागंतुकों के लिए रास्ता छोड़ देते हैं और अपनी सक्रियता को खाता-बही, लिखा-पढ़ी, बैंक, कोर्ट-कचहरी और 'टेक्सेशन' आदि की दिशा में मोड़ देते हैं। इस प्रकार दोनों पीढ़ियाँ मिलजुल कर व्यापार को विकसित करते हैं।
बिलासपुर आप्रवासियों का शहर है। हर कोई कहीं-न-कहीं से आकर यहाँ बसा है। कुछ व्यापार करने आए तो कुछ नौकरी करने। नौकरी करने के लिए सर्वाधिक लोग रेल्वे में आए, ज़्यादातर बंगाल, ओडिशा, बिहार, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु से। अन्य नौकरियों में अन्य प्रदेशों के भी लोग आए। इन नौकरीपेशा लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए व्यापार फले-फूले। छोटा सा कस्बा धीरे-धीरे शहर का आकार लेने लगा। आज़ादी के पहले आसपास के कस्बों और गावों के लोग यहाँ आए, कुछ मारवाड़-राजस्थान से भी आए। देश की आज़ादी के दौरान पाकिस्तान के पंजाब और सिंध के प्रवासियों ने इस शहर के दरवाजे में दस्तक दी। अपना घर-द्वार और संपत्ति छोड़ कर आए इन मुसीबतज़दा परिवारों ने बामुश्किल अपने अस्तित्व को बचाने और नया संसार रचने की कोशिश की।
बिलासपुर में उन दिनों बहुत से परिवार आए। चूंकि वे भारत के उत्तरी भाग से आए थे, वे सब गोरे-चिट्टे थे। सिंधियों के आवास के लिए 'केंप' जैसी व्यवस्था मोहल्ला जरहाभाटा में बनाई गई थी, जिसे सिंधी कालोनी कहा जाता था, अनेक परिवार वहां एक साथ बसे। कुछ परिवार अपनी दूकानों के पीछे रिहाइश बनाकर अन्य मोहल्लों में बस गए। लेकिन पंजाब से आए परिवारों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, उन्हें जहां किराए पर घर मिले, वे वहाँ टिक गए। पंजाबियों के परिवारों में कुछ सिख थे, लेकिन अधिकतर मोना पंजाबी। मोना पंजाबी का अर्थ है, पंजाब के वे रहवासी जिन्होंने सिख पंथ नहीं अपनाया।
यह कहानी एक ऐसे मोना पंजाबी की है जिसका रंग सांवला था लेकिन खोपड़ी गजब की थी। अविभाजित पंजाब के डिस्ट्रिक्ट जेलम के गाँव टालियावालां के चमनलाल चड्डा हिन्दुस्तानी फौज में इलेक्ट्रीशियन थे। अफसर की मातहती से आहत होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। उन्हीं दिनों देश के विभाजन का कहर सामने आ गया। अपनी नव-विवाहिता कुलवंती को लेकर वे जम्मू पहुँच गए। किसी के साथ साझेदारी में बिजली के सामान बेचने की दूकान खोली, घाटा होने के बाद साझेदार को वहीं छोड़ा और बिलासपुर आ पहुंचे। कुलवंती गर्भवती थी, शहर नया था, फटेहाली थी। मोहल्ला गोंडपारा के राजाराम मंदिर के बाड़े में एक छोटा सा घर किराया पर लेकर रहने लगे। आर्थिक तंगी के बीच बिलासपुर के दीक्षित अस्पताल में कुलवंती ने 6 जनवरी 1948 को एक शिशु को जन्म दिया, नाम रखा गया, प्राण।
कुलवंती की देखरेख और उसका इंतज़ाम चमनलाल को करना था। प्रसूता को पिलाने के लिए मसाले वाला पानी उबालना, दोनों समय का खाना बनाना और दौड़-भाग में बीस दिन बीत गए। एक दिन कुलवंती ने चमनलाल से कहा- 'सुनो जी, अब मैं ठीक हो गई हूँ, घर का चूल्हा-चौका सम्हाल लूँगी। तुम अब अपना काम देखो। घर में राशन भी खत्म होने वाला है, बाहर निकलोगे तब तो काम बनेगा।'
'हो जाएगा, सब हो जाएगा। अभी तुम बहुत कमज़ोर हो, कुछ दिन और आराम कर लो।'
'हो गया मेरा आराम। तुमको चूल्हे का धुआं सहते हुए खाना बनाते देखती हूँ तो मुझे रोना आता है।'
'तुमको नहीं लगता क्या ?'
'लगता क्यों नहीं लेकिन हमारी आदत हो गई है। तुमको तो चूल्हे में ठीक से लकड़ी लगाना नहीं आता इसीलिए धुआं ज्यादा होता है।'
'अरे वाह, क्या मैं चूल्हा जलाना नहीं जानता ? ऐसा कौन सा काम है जो मैं नहीं जानता ? असल में लकड़ी गीली है, इसलिए धुआं होता है ।'
'अच्छा, तो तुम सब काम जानते हो ?'
'हूँ।'
'बच्चे को नौ महीने गर्भ में पाल सकते हो क्या ?'
'हा हा हा, इसके अलावा सब कर सकता हूँ।'
'शादी होकर दूसरे के घर जाकर रह सकते हो ?'
'नहीं, ये भी नहीं कर सकता।'
'तो फिर काहे का घमंड ? ऐसा कौन सा काम है जो मैं नहीं जानता.....' कुलवंती ने हँसते हुए ताना मारा- 'जिसकी बंदरिया, उसी से नाचती है। तुम जाओ, कल से अपना बैपार देखो।'
(२)
बिलासपुर के मोहल्ला सरकंडा में एक सेठ रहते थे, बनवारीलाल अग्रवाल जिन्हें अंग्रेज़ सरकार ने 'राय साहब' का तमगा दिया था इसलिए उनका प्रचलित नाम था 'रायसाहब बनवारीलाल।' उनके पास राइस मिल थी, कार थी, कई ट्रक थे। चमनलाल की उनसे गहरी दोस्ती हो गई।
अंग्रेज भारत छोड़कर वापस जा रहे थे, इसलिए उनके द्वारा बिलासपुर के आसपास स्थापित सैनिक अड्डों का बेशुमार असवाब वे कबाड़ के रूप बेचना चाहते थे जिसे रायसाहब बनवारीलाल और रामप्रसाद जैसे व्यापारियों ने औने-पौने दाम में खरीदा और उसे बिलासपुर से बाहर बेच कर बहुत लाभ कमाया। चमनलाल ने भी इसी धंधे को पकड़ा और अपनी कमाई लेकर कलकत्ता गए और बिलासपुर में एक नए व्यापार की शुरुआत की।
कलकत्ता से उन्होंने 'ग्रामोफोन' लाकर बिलासपुर को 'लाउड स्पीकर' से परिचित कराया। पुराने जमाने का रेकार्ड प्लेयर जिस पर तवा चढ़ाकर, चाबी भर कर, सुई को धीरे से रख दिया जाता और पोंगे से जब ज़ोहरा बाई अंबालावाली, उमादेवी, पंकज मालिक और के.एल.सहगल के गानों की सुरीली आवाज़ फैलती तो सड़क पर सुनने वालों का मजमा लग जाता। आसपास के राजा-महाराजा, गौटिया, मालगुजार और सेठ अपने यहाँ शादी-ब्याह के कार्यक्रम में ग्रामोफोन बजवाते थे क्योंकि चमनलाल ने उस अनुसंधान को बिलासपुर में लाकर 'फर्स्ट प्रमोटर' होने का फायदा उठाया और उसका मनमाना किराया वसूल किया, इतना अधिक किराया कि आप-हम कल्पना नहीं कर सकते।
उन्हीं दिनों बिलासपुर के 55 मील दूर स्थित गाँव कवर्धा में एक यज्ञ का आयोजन हुआ। उस समय के हिसाब से वह विशाल कार्यक्रम था, जहाँ अंधकार को चकाचौंध में बदलने का ठेका चमनलाल को मिला। चमनलाल कलकत्ता गए, वहाँ से बड़े-बड़े जनरेटर और असंख्य बल्व तथा वायर ट्रक में लदवाकर कवर्धा ले आए और यज्ञस्थल को जगमगा दिया। आप कल्पना कीजिए, उस समय यदि कोई व्यक्ति टार्च की रोशनी देख लेता था तो उसे देखकर भूत-प्रेत होने का भय लगता था। मिट्टीतेल से जलने वाली कंडील से आगे की बात वे सोच भी नहीं सकते थे। बिजली के बल्व वहाँ के रहवासियों के लिए चमत्कार था। सब तरफ हल्ला हो गया और आसपास की आबादी यज्ञ देखने उमड़ पड़ी। चमनलाल का चमन आबाद हो गया।
चमनलाल ने मोहल्ला कुड़ुदंड में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीदा, अपना घर बनवाया और उसमें अपनी दो लड़कियों और पाँच लड़कों के साथ सपरिवार रहने लगे। गोलबाजार में दो दूकानें और गोदाम किराए पर लिए जहां वे लाउडस्पीकर और बेट्री का व्यापार करते थे। पाँच छः साल के बाद दूकानों को बंद कर दिया और 'ट्रक ट्रांसपोर्टिंग' का काम शुरू किया। उनकी आठ ट्रकें चलने लगी जो दिन-रात अनाज और बीड़ीपत्ता की ढुलाई करती थी।
(३)
सन 1962 की उस सुबह बिलासपुर में बहुत गहमा-गहमी थी, भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आने वाले थे। दोपहर बारह बजे उनका भाषण रघुराजसिंह स्टेडियम मे होना था। बिलासपुर में नेहरु जी पहली बार आ रहे थे। पूरा शहर उन्हें सुनने उमड़ पड़ा और आसपास के ग्रामीण अपनी बैलगाड़ियों में लद कर उन्हें देखने पहुँच गए। पूरे शहर की सड़कें भीड़ से भरपूर थी, बैलगाड़ियाँ सड़क के किनारे खड़ी थी और हर व्यक्ति के कदम स्टेडियम की ओर बढ़ रहे थे। स्टेडियम छोटा पड़ गया, लोग स्टेडियम से लगे खेतों पर जमकर बैठ गए। ऐसा जन सैलाब बिलासपुर की धरती ने फिर कभी नहीं देखा।
उसी दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने चमनलाल को अंदर तक हिला दिया। सायकल के पीछे बैठा युवक उनकी एक ट्रक के नीचे आ गया और उसकी दुर्घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। घटना कचहरी के चढ़ाव पर हुई जहां बिछी हुई मुरम पर साइकलचालक का संतुलन बिगड़ गया और वे दोनों सड़क पर गिर गए, उनमें से एक युवक ट्रक के पिछले चक्के के नीचे आ गया। मृत युवक बिलासपुर के एक सरकारी अधिकारी का था, अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र। ट्रक का ड्राइवर गाड़ी लेकर घर पहुंचा और चमनलाल को घटना की जानकारी दी। चमनलाल चिंतित हो गए। वे ड्राइवर के साथ ट्रक में बैठकर कोतवाली गए, पुलिस को घटना के बारे में बताया जबकि उस समय तक पुलिस को दुर्घटना की कोई खबर नहीं थी। पुलिस ने ड्राइवर को थाने में रोक लिया और ट्रक जब्त कर ली।
शाम को मृतक के बारे में चमनलाल को मालूम पड़ा। मृतक के पिता बिलासपुर जिलाधीश कार्यालय में भू-अधीक्षक थे. चमनलाल की उस परिवार का सामना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्हें हिम्मत जुटाने में डेढ़ दिन लग गए। शाम के समय मृतक का घर खोजते उसके परिवार से मिलने गए। पूरा परिवार बिलख रहा था, लेकिन जो होना था वह हो चुका था। आधे घंटे तक चमनलाल उन सब की बात सुनते रहे फिर बोले- 'जितना आपका दुख है, उतना मेरा दुख है।'
'आप हमारे दुख को क्या समझेंगे ? जिसका बेटा जाता है, दुख वही जानता है।' मृतक युवक के पिता ने कहा।
'आप ठीक हो, जी। जान-बूझ कर तो हुआ नहीं, अनहोनी थी, हो गई।'
'आपकी ट्रक का ड्राइवर उसको बचा सकता था।'
'ड्राइवर को तो दिखाई नहीं पड़ा, बच्चा पिछले चक्के के नीचे आ गया।'
'हम सब उसके सहारे थे, वह तो हमें छोड़कर चला गया।'
'मैं आप लोगों की मदद करना चाहता हूँ, कोई व्यापार लगवा सकता हूँ।'
'हमने कभी व्यापार किया नहीं, हम नहीं कर पाएंगे।'
'तो आप जो भी कहें, मैं आपको दे सकता हूँ।'
'पैसे का क्या करेंगे , आप हमारा बेटा वापस कर दो ?'
'आपका बेटा मैं कहाँ से वापस लाऊं ? एक काम कीजिए, मेरा बेटा ले लीजिए।'
'आपका बेटा ?'
'हाँ, पाँच हैं, एक बेटा आपकी सेवा करेगा।' चमनलाल ने कहा और रोने लगे। घर के अंदर से एक महिला का सिसकता स्वर बाहर घिसट कर आया- 'एक माँ तो दुखी है, क्या दूसरी माँ को भी दुखी करना है ?'
मनुष्य के जीवन में कल क्या होने वाला है कोई नहीं जानता। जैसा होना होता है, वैसे हालात बन जाते हैं। सड़क दुर्घटना ने चमनलाल को इस कदर आहत कर दिया कि उन्होंने ट्रांसपोर्ट का व्यापार बंद करने का फैसला ले लिया और उसे समेटना शुरू कर दिया। एक-एक करके सारे ट्रक बेच दिए और मुर्गीपालन करने लगे। पंद्रह साल के अंतराल में चमनलाल ने कितने सारे काम किए, सेना में नौकरी, कबाड़ का व्यापार, बिजली का सामान, लाउड स्पीकर, बेट्री की दूकान, ट्रांसपोर्टिंग और अब मुर्गी-पालन !
एक बात ज़रूर रही कि बिलासपुर में आकर चमनलाल ने जिस काम में हाथ डाला, भरपूर कमाई की। उनमें ग्राहकों की जरूरत को समझने का अद्भुत कौशल था। ग्राहक को आज क्या चाहिए ? कल किस वस्तु की मांग आने वाली है ? नई वस्तु को ग्राहक की मांग कैसे बनाया जाए ? इन बातों को वे सफ़ल व्यापारी की तरह समय से पूर्व ताड़ कर उस पर काम करना शुरू कर देते थे। वे कुछ नया करने के फ़िराक में रहते थे। वे जिस काम को हाथ लगाते, चल पड़ता। उनके खून में व्यापार के अतिसक्रिय कीटाणु थे। उनकी सफलता का सूत्र था, दूरदृष्टि, उत्कट लगन और भरपूर परिश्रम।
वैसे भी देखने में यह आया है कि जो व्यक्ति विस्थापित होकर किसी नए शहर में अपने पैर जमाने की कोशिश करता है, वह अपनी सफलता के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाता है। उसका दिमाग और शरीर अपने लक्ष्य को हासिल करने के पुरजोर कोशिश करता है। चमनलाल पाकिस्तान से भारत आए, बिना किसी संदर्भ और जान-पहचान के बिलासपुर में टिक गए। परिवार मज़े से चलने लगा। बच्चे बढ़ रहे थे, पढ़ रहे थे। चमनलाल के सिर के बाल पकने लगे, शरीर फैलने लगा, उन्हें शहर के लोग 'चड्डा जी' कहते थे। मुर्गीपालन के व्यापार में आशातीत सफलता हासिल करने के बाद भी चमनलाल की मुर्गियों से दोस्ती अधिक दिन नहीं चली। उसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि वे शहर के लिए एक उदाहरण बन गए।
(४)
चमनलाल जिंदगी भर जुनूनी इन्सान रहे, जिस काम के पीछे लग गए, लग गए। उनकी मुर्गियों ने इतने अधिक अंडे दिए कि उनकी खपत के लिए कि उन अंडों को लेकर बिलासपुर से बाहर बेचने के लिए निकलना पड़ा। आसपास सौ-दो सौ किलोमीटर तक 'चड्डा पोल्ट्री फार्म' की सील लगे अंडे ग्राहकों की पहली पसंद बन गए। वे अपनी मुर्गियों को अपने खेत में उगाई हुई ताज़ी सब्जियाँ खिलाते थे इसलिए उनके अंडे अधिक स्वादिष्ट होते थे। कुछ ही समय में अंडों का उत्पादन इतना अधिक होने लगा कि उसे बाजार में भेजना और खपाना बहुत बड़ी समस्या बन गई क्योंकि अंडा खाने का रिवाज मुसलमानों, ईसाइयों, पंजाबियों और सिंधियों में ही था, हिन्दू परिवार अंडे से परहेज करते थे इसलिए पूर्ति और मांग में नकारात्मक अंतर आ गया। धीरे-धीरे उन्होंने उस उद्योग को समेट लिया और कृषि की ओर मुड़ गए। घर से जुड़ा हुआ पाँच एकड़ का एक भूखंड ले लिया और उसमें फल, सब्जी और अनाज उगाने लगे।
चमनलाल के पास भी हमारे आपके जैसी एक बुद्धि थी लेकिन उनकी अक्ल चौतरफा घूमती थी। वे फोटोग्राफी के शौकीन थे। शिकार के शौकीन थे। बिलासपुर के समीप स्थित अचानकमार के जंगल में उन्होंने दो शेर निपटाए थे। बिलासपुर शहर की पहली 'राजदूत' मोटरसाइकल वे रायपुर से खरीदकर लाए थे। पंजाब से जितने लोग बिलासपुर आए वे यहाँ आकर छत्तीसगढ़िया हो गए, पंजाबियत खो बैठे लेकिन चमनलाल आजीवन पंजाबी बने रहे। रहनसहन और वेषभूषा सदा पंजाबियों जैसी रही। ढीला-ढाला बड़े घेर वाला पैजामा और आधे बांह की कमीज उनकी स्थायी वेषभूषा थी जिसे कुलवंती घर में ही सिलती थी।
सन 1964 में देश अकाल की चपेट में आ गया, अन्न का उत्पादन कम हो गया और आबादी बढ़ गई। भारत सरकार के सामने दुर्भिक्ष एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या के रूप में आ खड़ा हुआ। उससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय हरित क्रान्ति आन्दोलन' की शुरुआत की जिसमें एम.एस.स्वामीनाथन के मार्गदर्शन में अनेक योजनाओं को शुरू किया गया। प्रमुखतः वितरण व्यवस्था को नियोजित करने के लिए ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली' का क्रियान्वयन, कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए ‘नेशनल बेंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट' (नाबार्ड) तथा अनाज के भंडारण के लिए ‘भारतीय खाद्य निगम' का गठन किया गया।
तात्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सोमवार के दिन एक समय का उपवास रखने की अपील की जिसे चमनलाल ने अपने घर में अपनाया लेकिन वे सोचा करते थे कि 'एक समय न खाने' से क्या देश की खाद्य समस्या का समाधान हो जाएगा ? चमनलाल का दिमाग अब अन्न-उत्पादन की ओर चल पड़ा। उन्होंने बिलासपुर शहर से पाँच किलोमीटर की अलग-अलग दूरी पर स्थित सकरी और मंगला गांव में 65 एकड़ कृषि योग्य जमीन खरीदी और दो सौ मजदूरों के सहयोग से खेती करने लगे और अपने स्तर पर अन्न की समस्या के समाधान में भिड़ गए।
मंगला की जमीन अनुपजाऊ थी, पड़ती जमीन, जिसे चमनलाल ने सस्ते भाव में खरीद लिया। जमीन में रेत की मात्रा अधिक थी इसलिए उपजाऊ बनाने के लिए आर्गेनिक और गोबर खाद मिलाकर तैयार करके उसमें केला, पपीता और गन्ना के पौधे रोपे गए। इन सभी की भरपूर पैदावार हुई। केले का पूरा उत्पादन बिलासपुर में ही खप जाता था। पपीता यहाँ की जरूरत से बहुत अधिक होता था इसलिए उसे बड़े-बड़े टोकरों में पैक करके ट्रेन के जरिए कलकत्ता भेजा जाता, लगभग दो क्विंटल प्रतिदिन। गन्ना की मांग बिलासपुर में केवल दीवाली के ग्यारह दिन बाद होने वाले एकादशी के त्यौहार में होती थी, इसलिए नियमित मांग व्यवस्थित करने के लिए उन्होंने शहर के तीन व्यक्तियों को गन्ने का रस बेचने की दूकान शुरू करने के लिए प्रेरित किया और मनोहर टाकीज़ के सामने, तारबाहर चौक और बुधवारी बाजार में यह नया व्यापार शुरू हो गया। इस प्रकार 'चड्डा फार्म' का गन्ना स्वादिष्ट और सस्ते पेय के रूप में नगरवासियों को उपलब्ध हो गया।
(५)
एक दिन रायसाहब बनवारीलाल और उनके मित्र सेठ रामप्रसाद अग्रवाल आपसी चर्चा में व्यस्त थे। जिस दिन दोनों की बैठक जमती, उस दिन पूरा दिन बीत जाता और शाम हो जाती लेकिन बातचीत का सिलसिला न थमता। वे लोग व्यापार की, समाज की, परिवार की और राजनीति की बातें करते और अपने विचारों से एक-दूसरे को सहयोग दिया करते थे।
रायसाहब की गद्दी में आज राजनीति पर चर्चा चल रही है। 'रायसाहब, आपको राजनीति में उतरना चाहिए।' सेठ रामप्रसाद बोले।
'इरादा तो बन रहा है, विधानसभा की टिकट के लिए मुख्यमंत्री श्यामाचरण से मेरी बात हुई थी।' रायसाहब बनवारीलाल ने बताया।
'क्या बोले वो ?'
'हंस रहे थे।'
'क्यों ?'
'क्या पता ?'
'इतनी सी बात नहीं समझे रायसाहब !'
'क्या ?'
'उनकी मुस्कान का मतलब रहा होगा कि टिकट 'फोकट' में थोड़े मिलेगी।'
'तो कैसे मिलेगी ?'
'जैसे आप अपना व्यापार चलाते हो, राजनीति उनका व्यापार है, बाल-बच्चे हैं।'
'कैसा किया जाए ?'
'चतरू डाक्टर उनके साढ़ू हैं वो आपके लिए कह दें तो आपका काम बन सकता है लेकिन चतरू बाबू आपका राजनीति में आगे बढ़ना पसंद नहीं करेंगे, उनका स्वभाव किसी को आगे बढ़ाने का नहीं है।'
'यह तो मैं भी जानता हूँ। फिर, कैसा किया जाए ?'
'पहले रायपुर जाओ, पद्मिनी भाभी को खुश करो और भोपाल पहुँच जाओ, काम बन जाएगा।' सेठ रामप्रसाद ने सलाह दी। इतने में चमनलाल चड्डा भी आ पहुंचे।
'आओ, चमनलाल।' रायसाहब बोले।
'क्या चर्चा चल रही है, आप लोगों की ?' चमनलाल ने पूछा।
'रायसाहब को एम.एल.ए. की टिकट चाहिए, चुनाव लड़ने का मन है।' बीच में सेठ रामप्रसाद बोल पड़े।
'व्यापार छोडकर राजनीति में जाओगे क्या, रायसाहब ?'
'क्यों नहीं ? जब तुम व्यापार छोड़कर खेती कर सकते हो तो क्या हम राजनीति नहीं कर सकते ?' रायसाहब ने पूछा।
'कर सकते हो लेकिन जनता में पकड़ होनी चाहिए तब तो वोट मिलेगा।'
'मुझे बिलासपुर के आसपास किसी भी विधानसभा क्षेत्र की टिकट दिलवा दो, मैं जीत कर बताऊंगा।'
'कैसे जीत जाओगे ?'
'चुनाव 'पैसा' जीतता है, 'केन्डीडेट' नहीं।'
'क्या पैसे में इतनी ताकत है ?'
'देखना, यही पैसा टिकट दिलवाएगा, वोट दिलवाएगा और मुझे एम.एल.ए. बनवाएगा, चमनलाल।'
'इसीलिए आप लोग 'सेठ जी' कहलाते हैं क्योंकि आप पैसे की ताकत पहचानते हैं और पैसे को काम से लगाते हैं।'
'पैसा तो तुम्हारे पास भी बहुत है ?'
'है लेकिन मेरा मजदूर जैसा स्वभाव है। मैं मजदूरी में अपनी अक्ल लगाता हूँ, पैसे में नहीं। इसीलिए आप दोनों सेठ हो और मैं हूँ 'किसान' चमनलाल।'
चमनलाल की पढ़ाई लाहौर में हुई थी, एफ.ए. पास थे। एफ.ए.अर्थात 'एंट्रेन्स' के समकक्ष। पाकिस्तान से भागे तो पढ़ाई-लिखाई छूट गई लेकिन पुस्तकें पढ़ने का शौक उनके पीछे लग गया। उनको हिन्दी भाषा पढ़नी-लिखनी नहीं आती थी लेकिन अंग्रेजी, उर्दू, फारसी के अच्छे जानकार थे। घर में समृद्ध लाइब्रेरी थी जिसमें कृषि और बागवानी से संबन्धित पुस्तकों का खासा संग्रह था। वे उपज बढ़ाने के लिए उपयोगी अधिकाधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश करते, देश भर में आयोजित प्रदर्शनियों और सेमिनारों में भाग लेते, कृषि वैज्ञानिकों और कृषकों से चर्चा करते और उसे अपने खेतों में ले आते। अन्न, फल और सब्जी के उत्पादन में मिली सफलता ने आसपास के कृषकों को आकर्षित किया और बिलासपुर के आसपास के गाँव की ज़मीनें चार महीने की फसल के बदले बारह महीने की फसल उगलने वाली बन गई।
15 दिसंबर 1981 को पेट में हुई तकलीफ के कारण 62 वर्ष की उम्र में बिलासपुर का आधुनिक अन्नदूत इस चमन को हरा-भरा छोड़ कर असमय चला गया।
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किस्सा कल्लू कारीगर का : लिव-इन-रिलेशनशिप
(१)
उत्तरप्रदेश के किसी शहर से बिलासपुर आया कल्लू। असली नाम मालूम नहीं, जाति मालूम नहीं, जन्मस्थान मालूम नहीं, केवल नाम मालूम है, वह भी असली है कि नहीं, मालूम नहीं। उसके शरीर का रंग सुर्ख काला था, संभवतः इसीलिए उसका नाम कल्लू पड़ गया होगा। सिर में बाल रहे होंगे लेकिन उन्हें किसी ने कभी देखा नहीं क्योंकि ना जाने क्यों, वह हर पंद्रह दिन की आड़ में अपना सिर घुटवा लेता। उसकी खोपड़ी हर समय चमचमाती रहती क्योंकि वह प्रतिदिन उसमें ढेर सारा सरसों का तेल चुपड़ लेता था। जब भी बात करता तो हंस कर बात करता, उसके काले-कलूटे चेहरे पर मोती की तरह दमकते दाँत बेहद आकर्षक लगते थे। अनुमान है कि उसने जब बिलासपुर की धरती पर कदम रखे होंगे, वह बीस-एक वर्ष का रहा होगा। मिठाई बनाने का कारीगर था, 'पेंड्रावाला' में काम पूछने आया, वहाँ के मालिक रूपनारायण ने उसे काम में रख लिया, पाँच सौ रुपया महीने की पगार पर, जो उस समय के हिसाब से बहुत अधिक थी। उसकी कारीगरी गजब की थी। केशरिया पेड़ा हो दूध की केशरिया कलाकंद, बालूशाही हो या गुलाबजामुन, जलेबी हो या मलाई पूरी, ऐसा स्वादिष्ट बनाता था कि जिसने चख लिया, समझ लो लहट गया।
गोलबाजार में मिठाई की बहुत सी दूकानें थे, आसपास, कुछ लोग उसे मिठाई लाइन भी कहते थे। सब के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा थी, सब एक दूसरे से जलते थे। दूसरी दूकान में घुस रहा ग्राहक सीने में बरछी की तरह घुसता था। इसके कारण पुराने 'नौकरों' को बरगलाना, या फोड़ना, अधिक तनख्वाह के लालच देकर अपनी दूकान में रख लेना सामान्य बात थी। इस बात पर हलवाइयों में आपसी कहा-सुनी हो जाती थी, यहाँ तक कि दुश्मनी जैसी हो जाती थी। होशियार हलवाइयों ने इसका एक और तोड़ खोजा कि किसी चलती दूकान के अच्छे कारीगर को शहर छोड़कर चले जाने के दो-चार हजार रुपए उसके जेब में ठूंस दिये जाते और उसे शहर से बाहर भगा दिया जाता था। चालू भाषा में कहें तो अत्यंत 'असहिष्णु' माहौल था।
अब ऐसा भी नहीं था कि लट्ठ चलते रहे हों लेकिन सबके सीने में ईर्ष्या की आग सुलगती रहती थी। ऊपरी तौर पर बड़ा प्रेमभाव था, एक-दूसरे के यहाँ आना-जाना था लेकिन आना-जाना इसलिए था कि मुसकुराते हुए जासूसी कर ली जाए कि 'क्या हो रहा है ?', 'कौन काम कर रहा है ?', 'कितने ग्राहक आ रहे हैं ?' आदि। गोलबाजार में तीन सगे भाइयों की दूकानें थी, छेदीलाल खंडेलवाल की 'इंद्रपुरी', दशरथलाल की 'मौसा जी मथुरा वाले' और मूलचंद की 'नीलकमल'। तीनों दूकाने आसपास थी, तीनों भाइयों में घनघोर शीतयुद्ध था, यद्यपि खुला युद्ध नहीं होता था। कई बार नौकरों की 'आवाजाही' के प्रकरण भी उनमें कड़ुवाहट बढ़ाने में सहायक होते थे। इधर 'पेंड्रावाला' में कल्लू उस्ताद के आगमन से ग्राहक बढ़े तो 'नीलकमल' के मालिक मूलचंद के दिन का चैन गड़बड़ा गया। इस बीच 'नीलकमल' के मालिक ने 'मौसा जी मथुरा वाले' के कारीगर विश्वनाथ पटेरिया को फोड़ लिया, बात बिगड़ गई लेकिन दशरथलाल सीधे-सादे व्यक्ति थे, छोटे भाई के उत्पात को चुपचाप सह गए। अब 'पेंड्रावाला' और 'नीलकमल' में वर्चस्व की कुश्ती शुरू हुई और गोलबाजार की मिठाई दूकानें शहर के आकर्षण का केन्द्र बन गई। दूकान की सजावट, मिठाई की सजावट और हलवाइयों के चेहरे की सजावट दिनोंदिन बढ़ती गई, ग्राहकों के मजे हो गए। मिठाई सस्ती हो गई, गुणवत्ता बेहतर हो गई, कलकत्ते से नई डिज़ाइनों के मिठाई के डिब्बे आ गए, ग्राहकों को इनामी कूपन के ज़रिए इनाम-अकराम बंटने लगे। शहर भर के लोग अपनी जेबों में नोट भरकर गोलबाजार के इन हलवाइयों की दूकानों में उमड़ पड़े।
वैसे तो सब दूकानों के ग्राहक अलग-अलग थे, विवाद से बचने के लिए सबने अपने 'स्पेशलाइजेशन' कर लिए थे, जैसे 'पेंड्रावाला' में देशी घी से बनने वाली मिठाई, नमकीन और पूरी-सब्जी, 'नीलकमल' और 'मौसा जी मथुरा वाले' में खट्टी-मीठी चटनी वाला नास्ता तथा चाय-काफी, गयाप्रसाद पांडे के यहाँ आलूबड़ा, प्याजी-बड़ा, जलेबी और चालू चाय, 'बृजवासी' के यहाँ दही और गरम-गरम मलाईदार दूध आदि। फिर भी, इन सब दूकानों में एक चीज 'कामन' थी, वह थी मिठाई जो आपसी प्रतिस्पर्धा की बड़ी वजह बनी रहती।
'पेंड्रावाला' और 'नीलकमल' के मध्य प्रतिस्पर्धा की वजह को समझना आवश्यक है। दोनों दूकाने आसपास थी। 'पेंड्रावाला' के मालिक रूपनारायण और 'नीलकमल' के मालिक मूलचंद खंडेलवाल के बीच गहरी दोस्ती थी। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे और उनके आपस में पतंग और डोर जैसे अन्योन्याश्रित संबंध थे। दोनों आक्रामक स्वभाव के थे, बातें करने में उस्ताद थे, एक सुर में गाते थे, एक ढंग से सोचते थे जबकि रूपनारायण खाँटी कांग्रेसी थे और मूलचंद घोर जनसंघी! मूलचंद ने जब नगरपालिका का पार्षद वाला चुनाव लड़ा तो रूपनारायण ने अपने दोस्त को जिताने के लिए अस्थाई तौर पर जनसंघी बनना जरूरी समझा और मूलचंद को जिताने के लिए जी-जान से भिड़ गए। स्टेट बैंक से एक-एक के नये नोटों की गड्डियों का इंतजाम किया और बाज़ार वार्ड के झोपड़ीवासियों का दिल खरीद लिया। मूलचंद के चुनाव जीतने के बाद रूपनारायण पुनः जनसंघियों को गरियाने लगे। वे दोनों अपशब्दों के प्रयोग करने में इस कदर प्रवीण थे कि उनका कोई भी दिन, कोई भी वार्ता या कोई भी वाक्य बिना गाली के पूरा नहीं होता था। वे किसी के भी लिए 'भो' और 'मा' शब्द से आरंभ होने वाले अपशब्दों का उच्चारण करके ही तृप्ति का अनुभव करते थे।
सोचने की बात यह है कि जब इतनी गहरी दोस्ती थी तो इतना 'कांपिटीशन' क्यों होता था ? होता यह था कि चार-छः महीने में वे दोनों किसी ना किसी बात पर लड़ लेते थे, बातचीत बंद हो जाती, आना-जाना बंद हो जाता, और पीठ पीछे भयंकरतम गाली-गलौच का दौर शुरू हो जाता। उसके बाद दोनों एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देने का संकल्प अपने मन में पारित करते और जड़ से मिटा देने का मानसिक प्रयास आरंभ कर देते। आखिर नुकसान पहुंचाते तो भी क्या? तो, व्यापार को 'डेमेज' करने की कोशिश करते लेकिन उनकी कोशिशों से उन दोनों का व्यापार और बढ़ जाता था और गोलबाजार के अन्य हलवाइयों का व्यापार कमजोर पड़ जाता था।
ये झगड़ा बहुत अधिक नहीं चलता था लेकिन जब तक चलता था तब तक इस दोनों के 'कामन' मित्रों के 'अच्छे दिन' आ जाते थे।
(नमूना वार्तालाप : दृश्य स्थान : 'पेंड्रावाला') :
रूपनारायण - 'आओ शुक्लाजी, क्या हाल है ?'
शुक्लाजी - 'बढ़िया है, क्या तुम्हारा मूलचंद से झगड़ा हो गया है ?'
रूपनारायण - 'तुमको कैसे मालूम ?'
शुक्ला जी - 'कल गया था उसके पास, बहुत ऊटपटाँग बोल रहा था तुम्हारे बारे में।'
रूपनारायण - 'ऐसा क्या ?'
रूपनारायण ने स्टाफ को आवाज दी- 'अबे छोटू इधर आ, शुक्लाजी के लिए बढ़िया चाय बना कर ला, अदरक डाल देना। शुक्लाजी, समोसा खाओगे क्या? गरम है।'
शुक्लाजी - 'अभी इच्छा तो नहीं है पर 'पेंड्रावाला' का समोसा खाए बिना रहा भी नहीं जाता।'
रूपनारायण - 'ला रे, अच्छे से प्लेट साफ करके दो समोसा ले कर आ। हाँ, तो मुल्लू क्या कह रहा था ?'
शुक्लाजी - 'तुम्हारे समोसे की बुराई कर रहा था। कह रहा था कि वह धोती-कुर्ता पहनने वाला हलवाई क्या जाने कि समोसा कैसे बनता है।'
रूपनारायण - 'ऐसा बोला क्या ? अच्छा, तुम बताओ शुक्लाजी अभी जो समोसा खा रहे हो वह कैसा है ?'
शुक्लाजी - 'बहुत बढ़िया है, वाह।'
रूपनारायण - 'सादा खा रहे हो, या दही-खटाई वाला ?'
शुक्लाजी - 'ये तो सादा है और बहुत बढ़िया स्वाद है।'
रूपनारायण - 'नीलकमल में सादा समोसा नहीं मिलता, क्यों नहीं मिलता ?'
शुक्लाजी - 'क्यों नहीं मिलता ?'
रूपनारायण - 'क्योंकि वहाँ समोसे में कोई स्वाद नहीं रहता, दही-खटाई-नमक-मिर्ची डालकर समोसे का 'डिफ़ेक्ट' छुपाता है और हमारे समोसे की बुराई करता है, भो.....।'
शुक्लाजी - 'सच कह रहे हो, तुम्हारा समोसा शहर ऊपर है, कोई छू नहीं सकता।'
रूपनारायण - 'अबकी बार जब जाना तो उससे बोलना कि रूपनारायण बोला है कि समोसा बनाना सीखना है तो वह कुछ दिन मेरी दूकान में आकर नौकरी करके सीख ले, मैं सिखा दूँगा।'
शुक्लाजी - 'तो, चलूँ रूपनारायण। समोसा और चाय में मज़ा आ गया। चलता हूँ।'
(नमूना वार्तालाप : दृश्य स्थान : 'नीलकमल') :
इंदरलाल - 'नमस्कार मूलचंद।'
मूलचंद - 'आओ इन्दर, बैठो, कैसे हो ?'
इंदरलाल - 'मैं अच्छा हूँ। क्या बात है, आजकल रूपनारायण तुम्हारे साथ नहीं दिखता ?'
मूलचंद - 'किस आदमी का नाम ले लिया सुबह-सुबह! थर्ड क्लास आदमी है, दोस्ती करने लायक नहीं है।'
इंदरलाल - 'तुम्हारा पुराना यार है, ऐसा क्यों कहते हो ?'
मूलचंद - 'उसके दिल में मैल है, जलता है मुझसे।'
इंदरलाल - 'अरे नहीं, मैं कल गया था, तुम्हारी तारीफ कर रहा था।'
मूलचंद - 'मेरी तारीफ, रूपनारायण कर रहां था ? हो नहीं सकता। वह तो सबको अपने पास बैठा कर फ्री में चाय-नास्ता कराता है और मुझे गाली बकता है।'
इंदरलाल - 'तुम लोगों की गाली भी कोई गाली है ! ये तो तुम दोनों के बात करने का लहज़ा है यार।'
मूलचंद - 'छोड़ो उसको, कुछ खाओगे क्या ? रसमलाई मंगवाऊँ ?'
इंदरलाल - 'रहने दो, अभी मेरा पेट खराब चल रहा है।'
मूलचंद - ' खा ले यार, ये नीलकमल की रसमलाई है, मेडिसिन है। पेंड्रावाला जैसा घटिया माल मेरे यहाँ नहीं बनता।'
इंदरलाल - 'खिलाओ, तुम्हारी बात कौन टाल सकता है। जिसको बिलासपुर शहर में रहना है उसे मूलचंद की बात तो मानना पड़ेगा।'
मूलचंद - 'कहाँ मर गए सब लोग ? कौन है यहाँ ? ला, इन्दर भैया के लिए एक प्लेट ठंडी रसमलाई ला, रबड़ी ज्यादा डालना।'
रसमलाई खाने के बाद इंदरलाल ने कहा- 'यार, मूलचंद, तुम्हारी रसमलाई का कोई जवाब नहीं। चलो, फिर किसी दिन फुर्सत से आऊँगा। यार, तुम रूपनारायण से दोस्ती कर लो।'
मूलचंद - 'दुबारा ऐसा बोलोगे तो रसमलाई नहीं खिलाऊंगा।'
इंदरलाल - 'तुम दोनों सदे-बदे हो, मुझे मत सिखाओ। अभी झगड़ा है, कल दोस्त बन जाओगे और सब दोस्तों को गरियाओगे। मैं चलता हूँ, बाद में आऊँगा।'
(२)
इस लेखक के साथ परेशानी यह है कि लिखते-लिखते बहक जाता है। इस कथा में कल्लू की कहानी बतानी थी, वही कल्लू नामक कारीगर की, लेकिन कहानी है कि भटक कर रूपनारायण और मूलचंद की दोस्ती-यारी की तरफ चली गई। दरअसल, कल्लू की कहानी में जो 'ट्विस्ट' आने वाला है उसमें इन दोनों दोस्तों के झगड़े का बड़ा योगदान है। 'ट्विस्ट' के बारे में बाद में चर्चा होगी, अभी यह जानिए कि कल्लू ने 'पेंड्रावाला' में बहुत मेहनत और लगन से काम किया। दूकानदारी दोगुनी हो गई। वह अच्छा कारीगर होने के साथ-साथ कुशल प्रबन्धक भी था और अपने मातहतों से डट कर काम लेता था। मूलचंद ने उसे बरगलाने के कई प्रयास किए लेकिन कल्लू टस से मस नहीं हुआ। कल्लू अपने मालिक का अहसान मानता था कि उसने बिलासपुर में आश्रय और रोजगार दिया। रूपनारायण कल्लू का बहुत ध्यान रखते थे और रुपये-पैसे से संतुष्ट रखते थे। कल्लू का नाम अब 'कल्लू उस्ताद' हो गया था।
सन १९९३ में अमेरिका में एक अंग्रेजी फिल्म बनी थी, नाम था- . इस फिल्म में डेविड नामक पात्र की कहानी थी जो कुशल आर्किटेक्ट है और उसकी पत्नी डायना रीयल इस्टेट एजेन्ट है। अमेरिका में आयी मंदी की वजह से डेविड आर्थिक संकट में फंस जाता और लिया हुआ कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता है। एक रात जान गेज़ नामक एक धनाड्य व्यक्ति ने डेविड और डायना को डिनर पर आमंत्रित किया। धनपति डायना पर मोहित हो जाता है और डायना के साथ एक रात बिताने के लिए सहमत होने पर एक मिलियन डालर देने का 'प्रपोज़ल' देता है। डेविड अर्थसंकट से घिरा हुआ था, अब धर्मसंकट में फंस गया। डायना से उसका प्यार और नैतिकता डेविड को इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से रोक रहे थे जबकि एक मिलियन डालर की राशि उसके आर्थिक संकट को दूर कर सकती थी। डेविड को धर्मसंकट से उबारने में डायना पहल करती है, जान गेज़ के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है और डेविड के 'बैंक बेलेन्स' में एक मिलियन डालर बढ़ाने का उपकार कर देती है। फिल्म का यह कथानक कल्लू उस्ताद की भविष्य की घटना से कुछ-कुछ जुड़ता हुआ सा लगता है।
इस फिल्म की चर्चा इसलिए निकली क्योंकि इसके कथानक में अनेक विरोधाभासी मनस्थितियाँ हैं। कर्ज़ तले दबा हुआ एक कसमसाता हुआ इंसान है और अनायास उसके समक्ष एक मिलियन डालर जैसी बड़ी राशि मिलने की लालच, जिसके एवज़ में पश्चिमी सोच के हिसाब से एक रात की रतिक्रिया कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। दूसरी तरफ उसकी प्यारी पत्नी का अपने आर्थिक लाभ के लिए उच्चस्तरीय वेश्यावृत्ति जैसा उपयोग जिसके लिए पति स्वयं को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहा था। संभवतः उस प्रस्ताव की रकम कम होने पर इंकार करना आसान होता लेकिन लेकिन उतनी बड़ी राशि को ठुकराना पति के लिए कठिन हो गया। धन के समक्ष प्यार और नैतिकता का प्रभाव कमजोर पड़ गया !
वैसा ही कल्लू उस्ताद के साथ हुआ। जब मूलचंद ने कल्लू को एक दूकान का मालिक बनने का लालच दिया तो वह पिघल कर मूलचंद की मुट्ठी में समा गया और वह 'पेंड्रावाला' की नौकरी छोडकर एक छोटी सी चाय दूकान का मालिक बन गया।
अब आप समझ ही गए होंगे कि इस घटना से रूपनारायण और मूलचंद के बीच तनातनी और अधिक बढ़ गई होगी। वे दोनों दोस्ती और झगड़ा, दिल लगा कर किया करते थे। फर्क सिर्फ इतना होता था कि दोस्ती के दौरान वे दूकान में कम बैठते थे और तनातनी के समय अधिक क्योंकि बोल-चाल बंद होने के कारण दोनों का साथ घूमना-फिरना और 'अन्य गतिविधियां' कम हो जाती थी।
तो कल्लू मिठाई बनाने वाले कारीगर से चाय वाला बन गया, एक तरह से उसकी कला का अवमूल्यन हो गया लेकिन परिश्रम का अधिमूल्यन हो गया। नौकर से मालिक बन गया। जब जेब में गर्मी बढ़ी तो वह दिमाग में चढ़ने लगी। उसका दिन का समय दूकान में कट जाता लेकिन रात अकेले नहीं कटती थी। अचानक कल्लू की मुलाक़ात एक युवती से हो गई जिसे कल्लू ने अपने घर में 'रख' लिया। 'रख लिया' को आप समझ गए ? इसे पुराने जमाने में 'रखैल रखना' कहते थे, छत्तीसगढ़ में 'चूड़ी पहनाना' कहते हैं और आधुनिक परिभाषा में 'लिव-इन-रिलेशनशिप', अर्थात विवाहमुक्त किन्तु आनंदयुक्त जीवन। जेब की गर्मी ने कल्लू पर अपना असर और बढ़ाया तो उसके कई दोस्त-यार बन गए और पीना-पिलाना शुरू हो गया। 'पीना-पिलाना' को समझ गए आप ? देसी ठर्रा चढ़ाना, छत्तीसगढ़ में ऐसे व्यक्ति को 'दरुहा' कहते हैं और आधुनिक परिभाषा में 'सोशल ड्रिंकर', अर्थात टुन्न किन्तु मदमस्त जीवन।
रूपनारायण और मूलचंद हमेशा की तरह पुनः दोस्त बन गए और उनकी जुगलबंदी चलने लगी। उनकी इस पुनःनवीनीकृत मित्रता का शिकार कल्लू बना। मूलचंद ने एक दिन अचानक कल्लू को दूकान खाली करने के लिए कह दिया। मूलचंद की यह छोटी सी दूकान नीलकमल और मालिकराम मेलाराम की दुकान के बीच में बनाई गई थी। वहाँ पाँच फुट की एक गली थी जिसका पब्लिक के आने-जाने के लिए निरर्थक सा उपयोग होता था। जनसंघ शासित नगरपालिका थी इसलिए मूलचंद ने अपने प्रभाव का उपयोग करके गली को बिना किसी अवरोध के छोटी-छोटी दूकानों में परिवर्तित कर लिया। वैसे भी, हमारे शहर की नगरपालिका (अब नगरनिगम) दरवाजे में खड़ी ग्राहक अगोरती वेश्या की तरह है जिसे केवल पैसे से मतलब है। यह तो अच्छा हुआ कि शाहजहाँ ने ताजमहल बिलासपुर में नहीं बनवाया अन्यथा वह भी किसी प्रभावपति को निगम ने उसे भी 'एलाट' कर दिया होता। यहाँ आप यह अर्थ न निकालिएगा कि निगम के अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि भ्रष्ट या बेईमान हैं, वे तो ऐसी गन्दी कमाई को हाथ नहीं लगाते। 'सिस्टम' यह है कि आपको निगम के स्वामित्ववाली कोई जगह या दूकान या भवन चाहिए तो आपस में 'रेट' तय कर लीजिए। कुल कीमत का आधा निगम के ख़जाने में जमा हो जाएगा, आपको पक्की रसीद मिलेगी, शेष आधा सम्बंधित अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि के बाल-बच्चों को पूर्वनिर्धारित मात्रा में निछावर के रूप में वितरित कर दिया जाता है।
'पंद्रह दिन में दूकान खाली करो' की नोटिस से भयभीत कल्लू गोलबाजार में इधर-उधर भटकते हुए कोई दूकान खोजने लगा। छितानी-मितानी धर्मशाला वाली गली में उसे एक दूकान किराए में मिल गई, वह जरा बड़ी भी थी, कल्लू वहाँ 'शिफ्ट' हो गया। कुछ ही दिनों में उसका धंधा वहां भी चमक गया। उसकी चाय और आलू की भजिया की खुशबू दूर-दूर तक फैलने लगी। सुबह से रात तक ग्राहकों का मजमा लगा रहता और कल्लू की चांदी कटने लगी। शाम के समय उसकी रखैल दूकान में आती और बड़े नोट समेटकर अपने ब्लाउज़ के अन्दर सम्हाल कर रख लेती और कल्लू उसे मुस्कुराता देखता रहता।
(३)
इस दुनिया का भी अजीब हाल है, जरा सा सुख घर आता है तो दुख दरवाजा खटखटाने लगता है। कल्लू भी तो इसी दुनिया का आदमी था, भला वह कैसे बचता ?
जब धंधा या नौकरी अच्छी चल रही हो तो इन्सान को 'फील-गुड' होने लगता है। घर में प्रेम-व्यवहार हो तो और भी अच्छा लगता है लेकिन शांत जल में कोई-न-कोई कंकड़ टपक ही जाता है और उसकी लहरों में हाहाकार मच जाता है। यह समझना बड़ा मुश्किल है कि जीवन में मधुरता कैसे बनी रहे ? अच्छा करो तो बुरा वापस आता है और अगर बुरा करो तो बुरा वापस आना ही है। इसका एक अर्थ यह निकलता है कि अच्छाई 'वन वे ट्रेफिक' है, जैसे गुलाब के पौधे की कलम इस उम्मीद से जमीन में खोंसो कि एक दिन इसमें गुलाब के खुशबूदार फूल होंगे, रोज खाद-पानी दिया, वह बढ़ा और जंगली काँटेदार पौधा निकल गया, गुलाब का फूल कभी उगा ही नहीं। हर मनुष्य से यह भूल होती है, उसी प्रकार कल्लू से भी हुई। उसकी प्राणप्यारी एक दिन घर का सारा गहना-गुरिया और धन-दौलत लेकर लापता हो गई। कल्लू बेसहारा हो गया, बाजार की देनदारी चढ़ गई, वह कर्जदार हो गया और उसका धंधा बैठ गया। कल्लू को अब केवल 'लालपरी' का सहारा था, वह उसी में डूब गया पर ऐसा कितने दिन चलता ?
कल्लू ने एक बार व्यापार कर लिया तो वह नौकरी करने लायक न बचा। उसने शादी-ब्याह में काम करना शुरू किया और साल-दो-साल में शहर की सभी बड़े घरों की शादियों के काम उसे मिलने लगे। कुछ समय बाद उसने खुद काम करना बंद कर दिया और अपने मातहतों से काम करवाने लगा. बताने का अर्थ यह है कि वह 'वर्कर' से 'डायरेक्टर' बन गया, इस कारण काम बिगड़ने लगा तो उसका नाम भी बिगड़ने लगा। बाजार में नए प्रतिस्पर्धी आ गए, कल्लू के बुरे दिन फिर लौट आए। उसका शरीर और मनोबल टूटने लगा, अत्यधिक शराबखोरी ने अपना असर दिखाया और कल्लू असमय इस दुनिया से चला गया।
श्मशान में उसी कल्लू का शरीर आग की लपटों से घिरा हुआ था जो केशरिया पेड़ा हो या दूध की केशरिया कलाकंद, बालूशाही हो या गुलाबजामुन, जलेबी हो या मलाई पूरी, ऐसा स्वादिष्ट बनाता था कि जिसने चख लिया, समझ लो फँस गया।
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उत्तरप्रदेश के किसी शहर से बिलासपुर आया कल्लू। असली नाम मालूम नहीं, जाति मालूम नहीं, जन्मस्थान मालूम नहीं, केवल नाम मालूम है, वह भी असली है कि नहीं, मालूम नहीं। उसके शरीर का रंग सुर्ख काला था, संभवतः इसीलिए उसका नाम कल्लू पड़ गया होगा। सिर में बाल रहे होंगे लेकिन उन्हें किसी ने कभी देखा नहीं क्योंकि ना जाने क्यों, वह हर पंद्रह दिन की आड़ में अपना सिर घुटवा लेता। उसकी खोपड़ी हर समय चमचमाती रहती क्योंकि वह प्रतिदिन उसमें ढेर सारा सरसों का तेल चुपड़ लेता था। जब भी बात करता तो हंस कर बात करता, उसके काले-कलूटे चेहरे पर मोती की तरह दमकते दाँत बेहद आकर्षक लगते थे। अनुमान है कि उसने जब बिलासपुर की धरती पर कदम रखे होंगे, वह बीस-एक वर्ष का रहा होगा। मिठाई बनाने का कारीगर था, 'पेंड्रावाला' में काम पूछने आया, वहाँ के मालिक रूपनारायण ने उसे काम में रख लिया, पाँच सौ रुपया महीने की पगार पर, जो उस समय के हिसाब से बहुत अधिक थी। उसकी कारीगरी गजब की थी। केशरिया पेड़ा हो दूध की केशरिया कलाकंद, बालूशाही हो या गुलाबजामुन, जलेबी हो या मलाई पूरी, ऐसा स्वादिष्ट बनाता था कि जिसने चख लिया, समझ लो लहट गया।
गोलबाजार में मिठाई की बहुत सी दूकानें थे, आसपास, कुछ लोग उसे मिठाई लाइन भी कहते थे। सब के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा थी, सब एक दूसरे से जलते थे। दूसरी दूकान में घुस रहा ग्राहक सीने में बरछी की तरह घुसता था। इसके कारण पुराने 'नौकरों' को बरगलाना, या फोड़ना, अधिक तनख्वाह के लालच देकर अपनी दूकान में रख लेना सामान्य बात थी। इस बात पर हलवाइयों में आपसी कहा-सुनी हो जाती थी, यहाँ तक कि दुश्मनी जैसी हो जाती थी। होशियार हलवाइयों ने इसका एक और तोड़ खोजा कि किसी चलती दूकान के अच्छे कारीगर को शहर छोड़कर चले जाने के दो-चार हजार रुपए उसके जेब में ठूंस दिये जाते और उसे शहर से बाहर भगा दिया जाता था। चालू भाषा में कहें तो अत्यंत 'असहिष्णु' माहौल था।
अब ऐसा भी नहीं था कि लट्ठ चलते रहे हों लेकिन सबके सीने में ईर्ष्या की आग सुलगती रहती थी। ऊपरी तौर पर बड़ा प्रेमभाव था, एक-दूसरे के यहाँ आना-जाना था लेकिन आना-जाना इसलिए था कि मुसकुराते हुए जासूसी कर ली जाए कि 'क्या हो रहा है ?', 'कौन काम कर रहा है ?', 'कितने ग्राहक आ रहे हैं ?' आदि। गोलबाजार में तीन सगे भाइयों की दूकानें थी, छेदीलाल खंडेलवाल की 'इंद्रपुरी', दशरथलाल की 'मौसा जी मथुरा वाले' और मूलचंद की 'नीलकमल'। तीनों दूकाने आसपास थी, तीनों भाइयों में घनघोर शीतयुद्ध था, यद्यपि खुला युद्ध नहीं होता था। कई बार नौकरों की 'आवाजाही' के प्रकरण भी उनमें कड़ुवाहट बढ़ाने में सहायक होते थे। इधर 'पेंड्रावाला' में कल्लू उस्ताद के आगमन से ग्राहक बढ़े तो 'नीलकमल' के मालिक मूलचंद के दिन का चैन गड़बड़ा गया। इस बीच 'नीलकमल' के मालिक ने 'मौसा जी मथुरा वाले' के कारीगर विश्वनाथ पटेरिया को फोड़ लिया, बात बिगड़ गई लेकिन दशरथलाल सीधे-सादे व्यक्ति थे, छोटे भाई के उत्पात को चुपचाप सह गए। अब 'पेंड्रावाला' और 'नीलकमल' में वर्चस्व की कुश्ती शुरू हुई और गोलबाजार की मिठाई दूकानें शहर के आकर्षण का केन्द्र बन गई। दूकान की सजावट, मिठाई की सजावट और हलवाइयों के चेहरे की सजावट दिनोंदिन बढ़ती गई, ग्राहकों के मजे हो गए। मिठाई सस्ती हो गई, गुणवत्ता बेहतर हो गई, कलकत्ते से नई डिज़ाइनों के मिठाई के डिब्बे आ गए, ग्राहकों को इनामी कूपन के ज़रिए इनाम-अकराम बंटने लगे। शहर भर के लोग अपनी जेबों में नोट भरकर गोलबाजार के इन हलवाइयों की दूकानों में उमड़ पड़े।
वैसे तो सब दूकानों के ग्राहक अलग-अलग थे, विवाद से बचने के लिए सबने अपने 'स्पेशलाइजेशन' कर लिए थे, जैसे 'पेंड्रावाला' में देशी घी से बनने वाली मिठाई, नमकीन और पूरी-सब्जी, 'नीलकमल' और 'मौसा जी मथुरा वाले' में खट्टी-मीठी चटनी वाला नास्ता तथा चाय-काफी, गयाप्रसाद पांडे के यहाँ आलूबड़ा, प्याजी-बड़ा, जलेबी और चालू चाय, 'बृजवासी' के यहाँ दही और गरम-गरम मलाईदार दूध आदि। फिर भी, इन सब दूकानों में एक चीज 'कामन' थी, वह थी मिठाई जो आपसी प्रतिस्पर्धा की बड़ी वजह बनी रहती।
'पेंड्रावाला' और 'नीलकमल' के मध्य प्रतिस्पर्धा की वजह को समझना आवश्यक है। दोनों दूकाने आसपास थी। 'पेंड्रावाला' के मालिक रूपनारायण और 'नीलकमल' के मालिक मूलचंद खंडेलवाल के बीच गहरी दोस्ती थी। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे और उनके आपस में पतंग और डोर जैसे अन्योन्याश्रित संबंध थे। दोनों आक्रामक स्वभाव के थे, बातें करने में उस्ताद थे, एक सुर में गाते थे, एक ढंग से सोचते थे जबकि रूपनारायण खाँटी कांग्रेसी थे और मूलचंद घोर जनसंघी! मूलचंद ने जब नगरपालिका का पार्षद वाला चुनाव लड़ा तो रूपनारायण ने अपने दोस्त को जिताने के लिए अस्थाई तौर पर जनसंघी बनना जरूरी समझा और मूलचंद को जिताने के लिए जी-जान से भिड़ गए। स्टेट बैंक से एक-एक के नये नोटों की गड्डियों का इंतजाम किया और बाज़ार वार्ड के झोपड़ीवासियों का दिल खरीद लिया। मूलचंद के चुनाव जीतने के बाद रूपनारायण पुनः जनसंघियों को गरियाने लगे। वे दोनों अपशब्दों के प्रयोग करने में इस कदर प्रवीण थे कि उनका कोई भी दिन, कोई भी वार्ता या कोई भी वाक्य बिना गाली के पूरा नहीं होता था। वे किसी के भी लिए 'भो' और 'मा' शब्द से आरंभ होने वाले अपशब्दों का उच्चारण करके ही तृप्ति का अनुभव करते थे।
सोचने की बात यह है कि जब इतनी गहरी दोस्ती थी तो इतना 'कांपिटीशन' क्यों होता था ? होता यह था कि चार-छः महीने में वे दोनों किसी ना किसी बात पर लड़ लेते थे, बातचीत बंद हो जाती, आना-जाना बंद हो जाता, और पीठ पीछे भयंकरतम गाली-गलौच का दौर शुरू हो जाता। उसके बाद दोनों एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देने का संकल्प अपने मन में पारित करते और जड़ से मिटा देने का मानसिक प्रयास आरंभ कर देते। आखिर नुकसान पहुंचाते तो भी क्या? तो, व्यापार को 'डेमेज' करने की कोशिश करते लेकिन उनकी कोशिशों से उन दोनों का व्यापार और बढ़ जाता था और गोलबाजार के अन्य हलवाइयों का व्यापार कमजोर पड़ जाता था।
ये झगड़ा बहुत अधिक नहीं चलता था लेकिन जब तक चलता था तब तक इस दोनों के 'कामन' मित्रों के 'अच्छे दिन' आ जाते थे।
(नमूना वार्तालाप : दृश्य स्थान : 'पेंड्रावाला') :
रूपनारायण - 'आओ शुक्लाजी, क्या हाल है ?'
शुक्लाजी - 'बढ़िया है, क्या तुम्हारा मूलचंद से झगड़ा हो गया है ?'
रूपनारायण - 'तुमको कैसे मालूम ?'
शुक्ला जी - 'कल गया था उसके पास, बहुत ऊटपटाँग बोल रहा था तुम्हारे बारे में।'
रूपनारायण - 'ऐसा क्या ?'
रूपनारायण ने स्टाफ को आवाज दी- 'अबे छोटू इधर आ, शुक्लाजी के लिए बढ़िया चाय बना कर ला, अदरक डाल देना। शुक्लाजी, समोसा खाओगे क्या? गरम है।'
शुक्लाजी - 'अभी इच्छा तो नहीं है पर 'पेंड्रावाला' का समोसा खाए बिना रहा भी नहीं जाता।'
रूपनारायण - 'ला रे, अच्छे से प्लेट साफ करके दो समोसा ले कर आ। हाँ, तो मुल्लू क्या कह रहा था ?'
शुक्लाजी - 'तुम्हारे समोसे की बुराई कर रहा था। कह रहा था कि वह धोती-कुर्ता पहनने वाला हलवाई क्या जाने कि समोसा कैसे बनता है।'
रूपनारायण - 'ऐसा बोला क्या ? अच्छा, तुम बताओ शुक्लाजी अभी जो समोसा खा रहे हो वह कैसा है ?'
शुक्लाजी - 'बहुत बढ़िया है, वाह।'
रूपनारायण - 'सादा खा रहे हो, या दही-खटाई वाला ?'
शुक्लाजी - 'ये तो सादा है और बहुत बढ़िया स्वाद है।'
रूपनारायण - 'नीलकमल में सादा समोसा नहीं मिलता, क्यों नहीं मिलता ?'
शुक्लाजी - 'क्यों नहीं मिलता ?'
रूपनारायण - 'क्योंकि वहाँ समोसे में कोई स्वाद नहीं रहता, दही-खटाई-नमक-मिर्ची डालकर समोसे का 'डिफ़ेक्ट' छुपाता है और हमारे समोसे की बुराई करता है, भो.....।'
शुक्लाजी - 'सच कह रहे हो, तुम्हारा समोसा शहर ऊपर है, कोई छू नहीं सकता।'
रूपनारायण - 'अबकी बार जब जाना तो उससे बोलना कि रूपनारायण बोला है कि समोसा बनाना सीखना है तो वह कुछ दिन मेरी दूकान में आकर नौकरी करके सीख ले, मैं सिखा दूँगा।'
शुक्लाजी - 'तो, चलूँ रूपनारायण। समोसा और चाय में मज़ा आ गया। चलता हूँ।'
(नमूना वार्तालाप : दृश्य स्थान : 'नीलकमल') :
इंदरलाल - 'नमस्कार मूलचंद।'
मूलचंद - 'आओ इन्दर, बैठो, कैसे हो ?'
इंदरलाल - 'मैं अच्छा हूँ। क्या बात है, आजकल रूपनारायण तुम्हारे साथ नहीं दिखता ?'
मूलचंद - 'किस आदमी का नाम ले लिया सुबह-सुबह! थर्ड क्लास आदमी है, दोस्ती करने लायक नहीं है।'
इंदरलाल - 'तुम्हारा पुराना यार है, ऐसा क्यों कहते हो ?'
मूलचंद - 'उसके दिल में मैल है, जलता है मुझसे।'
इंदरलाल - 'अरे नहीं, मैं कल गया था, तुम्हारी तारीफ कर रहा था।'
मूलचंद - 'मेरी तारीफ, रूपनारायण कर रहां था ? हो नहीं सकता। वह तो सबको अपने पास बैठा कर फ्री में चाय-नास्ता कराता है और मुझे गाली बकता है।'
इंदरलाल - 'तुम लोगों की गाली भी कोई गाली है ! ये तो तुम दोनों के बात करने का लहज़ा है यार।'
मूलचंद - 'छोड़ो उसको, कुछ खाओगे क्या ? रसमलाई मंगवाऊँ ?'
इंदरलाल - 'रहने दो, अभी मेरा पेट खराब चल रहा है।'
मूलचंद - ' खा ले यार, ये नीलकमल की रसमलाई है, मेडिसिन है। पेंड्रावाला जैसा घटिया माल मेरे यहाँ नहीं बनता।'
इंदरलाल - 'खिलाओ, तुम्हारी बात कौन टाल सकता है। जिसको बिलासपुर शहर में रहना है उसे मूलचंद की बात तो मानना पड़ेगा।'
मूलचंद - 'कहाँ मर गए सब लोग ? कौन है यहाँ ? ला, इन्दर भैया के लिए एक प्लेट ठंडी रसमलाई ला, रबड़ी ज्यादा डालना।'
रसमलाई खाने के बाद इंदरलाल ने कहा- 'यार, मूलचंद, तुम्हारी रसमलाई का कोई जवाब नहीं। चलो, फिर किसी दिन फुर्सत से आऊँगा। यार, तुम रूपनारायण से दोस्ती कर लो।'
मूलचंद - 'दुबारा ऐसा बोलोगे तो रसमलाई नहीं खिलाऊंगा।'
इंदरलाल - 'तुम दोनों सदे-बदे हो, मुझे मत सिखाओ। अभी झगड़ा है, कल दोस्त बन जाओगे और सब दोस्तों को गरियाओगे। मैं चलता हूँ, बाद में आऊँगा।'
(२)
इस लेखक के साथ परेशानी यह है कि लिखते-लिखते बहक जाता है। इस कथा में कल्लू की कहानी बतानी थी, वही कल्लू नामक कारीगर की, लेकिन कहानी है कि भटक कर रूपनारायण और मूलचंद की दोस्ती-यारी की तरफ चली गई। दरअसल, कल्लू की कहानी में जो 'ट्विस्ट' आने वाला है उसमें इन दोनों दोस्तों के झगड़े का बड़ा योगदान है। 'ट्विस्ट' के बारे में बाद में चर्चा होगी, अभी यह जानिए कि कल्लू ने 'पेंड्रावाला' में बहुत मेहनत और लगन से काम किया। दूकानदारी दोगुनी हो गई। वह अच्छा कारीगर होने के साथ-साथ कुशल प्रबन्धक भी था और अपने मातहतों से डट कर काम लेता था। मूलचंद ने उसे बरगलाने के कई प्रयास किए लेकिन कल्लू टस से मस नहीं हुआ। कल्लू अपने मालिक का अहसान मानता था कि उसने बिलासपुर में आश्रय और रोजगार दिया। रूपनारायण कल्लू का बहुत ध्यान रखते थे और रुपये-पैसे से संतुष्ट रखते थे। कल्लू का नाम अब 'कल्लू उस्ताद' हो गया था।
सन १९९३ में अमेरिका में एक अंग्रेजी फिल्म बनी थी, नाम था- . इस फिल्म में डेविड नामक पात्र की कहानी थी जो कुशल आर्किटेक्ट है और उसकी पत्नी डायना रीयल इस्टेट एजेन्ट है। अमेरिका में आयी मंदी की वजह से डेविड आर्थिक संकट में फंस जाता और लिया हुआ कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता है। एक रात जान गेज़ नामक एक धनाड्य व्यक्ति ने डेविड और डायना को डिनर पर आमंत्रित किया। धनपति डायना पर मोहित हो जाता है और डायना के साथ एक रात बिताने के लिए सहमत होने पर एक मिलियन डालर देने का 'प्रपोज़ल' देता है। डेविड अर्थसंकट से घिरा हुआ था, अब धर्मसंकट में फंस गया। डायना से उसका प्यार और नैतिकता डेविड को इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से रोक रहे थे जबकि एक मिलियन डालर की राशि उसके आर्थिक संकट को दूर कर सकती थी। डेविड को धर्मसंकट से उबारने में डायना पहल करती है, जान गेज़ के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है और डेविड के 'बैंक बेलेन्स' में एक मिलियन डालर बढ़ाने का उपकार कर देती है। फिल्म का यह कथानक कल्लू उस्ताद की भविष्य की घटना से कुछ-कुछ जुड़ता हुआ सा लगता है।
इस फिल्म की चर्चा इसलिए निकली क्योंकि इसके कथानक में अनेक विरोधाभासी मनस्थितियाँ हैं। कर्ज़ तले दबा हुआ एक कसमसाता हुआ इंसान है और अनायास उसके समक्ष एक मिलियन डालर जैसी बड़ी राशि मिलने की लालच, जिसके एवज़ में पश्चिमी सोच के हिसाब से एक रात की रतिक्रिया कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। दूसरी तरफ उसकी प्यारी पत्नी का अपने आर्थिक लाभ के लिए उच्चस्तरीय वेश्यावृत्ति जैसा उपयोग जिसके लिए पति स्वयं को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहा था। संभवतः उस प्रस्ताव की रकम कम होने पर इंकार करना आसान होता लेकिन लेकिन उतनी बड़ी राशि को ठुकराना पति के लिए कठिन हो गया। धन के समक्ष प्यार और नैतिकता का प्रभाव कमजोर पड़ गया !
वैसा ही कल्लू उस्ताद के साथ हुआ। जब मूलचंद ने कल्लू को एक दूकान का मालिक बनने का लालच दिया तो वह पिघल कर मूलचंद की मुट्ठी में समा गया और वह 'पेंड्रावाला' की नौकरी छोडकर एक छोटी सी चाय दूकान का मालिक बन गया।
अब आप समझ ही गए होंगे कि इस घटना से रूपनारायण और मूलचंद के बीच तनातनी और अधिक बढ़ गई होगी। वे दोनों दोस्ती और झगड़ा, दिल लगा कर किया करते थे। फर्क सिर्फ इतना होता था कि दोस्ती के दौरान वे दूकान में कम बैठते थे और तनातनी के समय अधिक क्योंकि बोल-चाल बंद होने के कारण दोनों का साथ घूमना-फिरना और 'अन्य गतिविधियां' कम हो जाती थी।
तो कल्लू मिठाई बनाने वाले कारीगर से चाय वाला बन गया, एक तरह से उसकी कला का अवमूल्यन हो गया लेकिन परिश्रम का अधिमूल्यन हो गया। नौकर से मालिक बन गया। जब जेब में गर्मी बढ़ी तो वह दिमाग में चढ़ने लगी। उसका दिन का समय दूकान में कट जाता लेकिन रात अकेले नहीं कटती थी। अचानक कल्लू की मुलाक़ात एक युवती से हो गई जिसे कल्लू ने अपने घर में 'रख' लिया। 'रख लिया' को आप समझ गए ? इसे पुराने जमाने में 'रखैल रखना' कहते थे, छत्तीसगढ़ में 'चूड़ी पहनाना' कहते हैं और आधुनिक परिभाषा में 'लिव-इन-रिलेशनशिप', अर्थात विवाहमुक्त किन्तु आनंदयुक्त जीवन। जेब की गर्मी ने कल्लू पर अपना असर और बढ़ाया तो उसके कई दोस्त-यार बन गए और पीना-पिलाना शुरू हो गया। 'पीना-पिलाना' को समझ गए आप ? देसी ठर्रा चढ़ाना, छत्तीसगढ़ में ऐसे व्यक्ति को 'दरुहा' कहते हैं और आधुनिक परिभाषा में 'सोशल ड्रिंकर', अर्थात टुन्न किन्तु मदमस्त जीवन।
रूपनारायण और मूलचंद हमेशा की तरह पुनः दोस्त बन गए और उनकी जुगलबंदी चलने लगी। उनकी इस पुनःनवीनीकृत मित्रता का शिकार कल्लू बना। मूलचंद ने एक दिन अचानक कल्लू को दूकान खाली करने के लिए कह दिया। मूलचंद की यह छोटी सी दूकान नीलकमल और मालिकराम मेलाराम की दुकान के बीच में बनाई गई थी। वहाँ पाँच फुट की एक गली थी जिसका पब्लिक के आने-जाने के लिए निरर्थक सा उपयोग होता था। जनसंघ शासित नगरपालिका थी इसलिए मूलचंद ने अपने प्रभाव का उपयोग करके गली को बिना किसी अवरोध के छोटी-छोटी दूकानों में परिवर्तित कर लिया। वैसे भी, हमारे शहर की नगरपालिका (अब नगरनिगम) दरवाजे में खड़ी ग्राहक अगोरती वेश्या की तरह है जिसे केवल पैसे से मतलब है। यह तो अच्छा हुआ कि शाहजहाँ ने ताजमहल बिलासपुर में नहीं बनवाया अन्यथा वह भी किसी प्रभावपति को निगम ने उसे भी 'एलाट' कर दिया होता। यहाँ आप यह अर्थ न निकालिएगा कि निगम के अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि भ्रष्ट या बेईमान हैं, वे तो ऐसी गन्दी कमाई को हाथ नहीं लगाते। 'सिस्टम' यह है कि आपको निगम के स्वामित्ववाली कोई जगह या दूकान या भवन चाहिए तो आपस में 'रेट' तय कर लीजिए। कुल कीमत का आधा निगम के ख़जाने में जमा हो जाएगा, आपको पक्की रसीद मिलेगी, शेष आधा सम्बंधित अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि के बाल-बच्चों को पूर्वनिर्धारित मात्रा में निछावर के रूप में वितरित कर दिया जाता है।
'पंद्रह दिन में दूकान खाली करो' की नोटिस से भयभीत कल्लू गोलबाजार में इधर-उधर भटकते हुए कोई दूकान खोजने लगा। छितानी-मितानी धर्मशाला वाली गली में उसे एक दूकान किराए में मिल गई, वह जरा बड़ी भी थी, कल्लू वहाँ 'शिफ्ट' हो गया। कुछ ही दिनों में उसका धंधा वहां भी चमक गया। उसकी चाय और आलू की भजिया की खुशबू दूर-दूर तक फैलने लगी। सुबह से रात तक ग्राहकों का मजमा लगा रहता और कल्लू की चांदी कटने लगी। शाम के समय उसकी रखैल दूकान में आती और बड़े नोट समेटकर अपने ब्लाउज़ के अन्दर सम्हाल कर रख लेती और कल्लू उसे मुस्कुराता देखता रहता।
(३)
इस दुनिया का भी अजीब हाल है, जरा सा सुख घर आता है तो दुख दरवाजा खटखटाने लगता है। कल्लू भी तो इसी दुनिया का आदमी था, भला वह कैसे बचता ?
जब धंधा या नौकरी अच्छी चल रही हो तो इन्सान को 'फील-गुड' होने लगता है। घर में प्रेम-व्यवहार हो तो और भी अच्छा लगता है लेकिन शांत जल में कोई-न-कोई कंकड़ टपक ही जाता है और उसकी लहरों में हाहाकार मच जाता है। यह समझना बड़ा मुश्किल है कि जीवन में मधुरता कैसे बनी रहे ? अच्छा करो तो बुरा वापस आता है और अगर बुरा करो तो बुरा वापस आना ही है। इसका एक अर्थ यह निकलता है कि अच्छाई 'वन वे ट्रेफिक' है, जैसे गुलाब के पौधे की कलम इस उम्मीद से जमीन में खोंसो कि एक दिन इसमें गुलाब के खुशबूदार फूल होंगे, रोज खाद-पानी दिया, वह बढ़ा और जंगली काँटेदार पौधा निकल गया, गुलाब का फूल कभी उगा ही नहीं। हर मनुष्य से यह भूल होती है, उसी प्रकार कल्लू से भी हुई। उसकी प्राणप्यारी एक दिन घर का सारा गहना-गुरिया और धन-दौलत लेकर लापता हो गई। कल्लू बेसहारा हो गया, बाजार की देनदारी चढ़ गई, वह कर्जदार हो गया और उसका धंधा बैठ गया। कल्लू को अब केवल 'लालपरी' का सहारा था, वह उसी में डूब गया पर ऐसा कितने दिन चलता ?
कल्लू ने एक बार व्यापार कर लिया तो वह नौकरी करने लायक न बचा। उसने शादी-ब्याह में काम करना शुरू किया और साल-दो-साल में शहर की सभी बड़े घरों की शादियों के काम उसे मिलने लगे। कुछ समय बाद उसने खुद काम करना बंद कर दिया और अपने मातहतों से काम करवाने लगा. बताने का अर्थ यह है कि वह 'वर्कर' से 'डायरेक्टर' बन गया, इस कारण काम बिगड़ने लगा तो उसका नाम भी बिगड़ने लगा। बाजार में नए प्रतिस्पर्धी आ गए, कल्लू के बुरे दिन फिर लौट आए। उसका शरीर और मनोबल टूटने लगा, अत्यधिक शराबखोरी ने अपना असर दिखाया और कल्लू असमय इस दुनिया से चला गया।
श्मशान में उसी कल्लू का शरीर आग की लपटों से घिरा हुआ था जो केशरिया पेड़ा हो या दूध की केशरिया कलाकंद, बालूशाही हो या गुलाबजामुन, जलेबी हो या मलाई पूरी, ऐसा स्वादिष्ट बनाता था कि जिसने चख लिया, समझ लो फँस गया।
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किस्सा जगदीशनारायण का : कितना बदल गया इंसान
(१)
जगदीशनारायण के पिता कृषक थे। विंध्यप्रदेश (अब मध्यप्रदेश) में नागौद के पास रौढ़ नामक गाँव में उनकी खेती थी। वे गेहूं से भरे बोरे को अपने कन्धों में लादकर सोलह मील दूर सतना की मंडी तक बेचने के लिए जाते थे। कृषक जीवन की असुविधाओं से त्रस्त होकर उनके पितामह में से किसी ने व्यापार अपना लिया होगा और उसके बाद परिवार में व्यापार की परंपरा चल निकली। जगदीशनारायण के पिता गल्लेलाल नागौद छोड़कर छत्तीसगढ़ के एक गाँव अकलतरा में आकर बस गए।
जगदीशनारायण का जन्म अकलतरा में हुआ था। युवावस्था में ही प्लेग के प्रकोप से बचने के लिए अपना परिवार लेकर अकलतरा छोड़ना पड़ा और जगदीशनारायण अपना परिवार लेकर बिलासपुर-कटनी मार्ग में स्थित एक गाँव जैथारी आ गए। उनके तीन लड़के थे- राम प्रसाद, दरबारी लाल और तीसरे का नाम मालूम नहीं है। उनकी पत्नी पुनिया किसी असाध्य रोग का शिकार हो गईं जिसका इलाज उन दिनों मुमकिन न था। लोग जड़ी-बूटी या घरेलू दवाओं से उपचार करते थे, शेष भगवान भरोसे था। पुनिया की तबियत न संभली और अपने तीन छोटे बच्चों को छोड़कर इस संसार से विदा हो गई। पुनिया के पार्थिव शरीर के साथ जगदीश नारायण का वैवाहिक जीवन भी भस्मीभूत हो गया। उनका सबसे छोटा बच्चा उस समय मात्र तीन माह का था। पत्नी के इस तरह जाने के बाद तीनों बच्चों का भार जगदीशनारायण पर आ गया। अब वे ही बच्चों के बाप थे और माँ भी। इस बीच, बिन माँ का दुधमुंहा बच्चा भी एक दिन चल बसा। कहते हैं- 'मुसीबत जब आती है तो सब तरफ से आती है' यह लोकोक्ति कितनी सटीक है- इसे बाद में होने वाली घटनाएँ सिद्ध करेंगी।
हुआ ये, कि पुनिया के पास कुछ नकद पूँजी थी जिसे वे गाँव के जरूरतमंद लोगों को उनके गहने अपने पास रख कर उधार दिया करती थी। इसी ब्याज की कमाई से उनका काम चलता था क्योंकि जगदीशनारायण की मिठाई दूकान से कुछ खास आमदनी न थी। जगदीशनारायण को ताश खेलने का बहुत शौक था जिसके कारण पुनिया परेशान रहती थी। एक रात, पुनिया जुए के फड़ में खुद पहुँच गयी और जगदीशनारायण को पकड़ कर घर ले आयी और खूब फटकार लगाई।
मैं आपको यह बता रहा था कि पुनिया ने लोगों के गहने घर में एक संदूक में सँभाल कर रखे थे पर उसकी मृत्यु के बाद जब लोग उधार वापस करके अपने गहने छुड़ाने आये तो संदूक से किसी का कोई गहना न मिला, सब गायब। कुछ पता न चला, जगदीशनारायण अवाक् रह गए। 'दुबले को दो अषाढ़'; पत्नी गयी तो साथ छूट गया, घर में धन सम्पदा तो थी नहीं, ऊपर से दूसरों के गहने भी लापता हो गए। लोगों का तगादा शुरू हो गया, गहनों की कीमत बहुत अधिक थी, कैसे देते ? जगदीशनारायण ने अपनी दूकान और घर बेच कर हिसाब चुकता किया, सबको हाथ जोड़े और डबडबाई आँखों से जैथारी को छोड़ती ट्रेन में बैठ गए। पूरी रात ट्रेन में सफर करने के बाद जब सुबह हुई तो वे मनेन्द्रगढ़ रेल्वे स्टेशन में अपना सामान उतारते अपनी एक और संघर्ष यात्रा के लिए खुद को तैयार कर रहे थे। न जाने विधाता ने उनके भाग्य में क्या लिख रखा था ?
(२)
मैं आपसे जिस जैथारी नामक गाँव का जिक्र कर रहा था- वहां जगदीशनारायण के पड़ोस में एक और परिवार रहता था- लप्पूलाल का। पड़ोस के नाते आपस में बहुत प्रेम था और एक दूसरे के घर आना जाना था। उनका एक बेटा और तीन बेटियां थी। उनकी सबसे छोटी बेटी सुंदरिया, पुनिया के कामकाज में हाथ बटाने के लिए अक्सर घर आया करती थी। लप्पूलाल आर्थिक रूप से विपन्न थे, किसी प्रकार गुजारा चलता था। उनकी वैद्यकीय प्रतिभा की ख्याति आसपास कई गाँव तक फैली थी। सांप और बिच्छू का जहर उतारने में उनको महारत हासिल थी। रात-बिरात कोई दुखियारा घर आया और अनुनय विनय की- 'दद्दा, बच्चे को सांप ने काट लिया है, चलो उसके प्राण बचा लो' तो लप्पूलाल चले उपचार करने, न रात की चिंता न बरसात की। आवागमन के साधन भी उन दिनों कुछ भी न थे, दो पैरों का सहारा था। दस पांच मील भी चलना पड़े तो भी कोई बात नहीं, अपना कर्तव्य समझ कर निकल पड़ते। सुन्दरिया की माँ चिल्लाती रहती- ‘इतनी रात है, क्यों अपनी जान जोखिम में डालते हो ?' पर वे अनसुनी कर देते, उन्हें अपनी तकलीफ से ज्यादा दूसरों की फिक्र रहती। रुपये पैसे की भी कोई इच्छा नहीं। कैसा युग था जब इंसान की कीमत थी और इंसानियत की भी, और अब ? अब, पैसा ही सब कुछ है। कितना बदल गया इंसान ?
उन्हीं दिनों लप्पूलाल के घर में भी एक हृदयविदारक घटना हो गई। उनके युवा पुत्र बेटालाल की पत्नी हैजे के प्रकोप में चल बसी। गाँव में अंतिम संस्कार की खबर भेजी गयी पर कोई न आया। लोग शव के आसपास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए क्योंकि रोग संक्रमण का डर था। मजबूर ससुर लप्पूलाल और विकल पति बेटालाल दोनों ने मिलकर अर्थी बनाई और श्मशान की ओर ले चले। दो कंधे ही चार बन गए। रोते-बिलखते पिता-पुत्र किसी प्रकार शवदाह करके जब घर लौट रहे थे तो गाँव छोड़ने का मन बना चुके थे। कर्मकांड निपटा कर अपने बच्चों को लेकर एक रात वे सब भी जैथारी के स्टेशन में खडी ट्रेन में बैठ गए और मनेन्द्रगढ़ के लिए रवाना हो गए।
जगदीशनारायण और लप्पूलाल, दोनों परिवारों में एक जैसा संकट आया, दोनों ने गाँव छोड़ा और संयोगवश मनेन्द्रगढ़ में ही आकर बस गए। किसी के दुःख को वही समझ पाता है जो वैसी ही परिस्थिति से स्वयं गुजरा हो। दोनों परिवार फटेहाल और लुटे-पिटे अपने अस्तित्व को सहेजने में एक दूसरे का साथ देने के लिए जैसे स्वाभाविक रूप से अन्योन्याश्रित बन गए। भला भविष्य को कौन बूझ पाया है ?
(३)
जगदीशनारायण ने मनेन्द्रगढ़ में फिर से मिठाई की दूकान खोल ली। मध्यप्रांत में सरगुजा की कोरिया इस्टेट में स्थित इस गाँव की आबादी अधिक न थी। इस्टेट में राजा का शासन था। तब तक पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजों का साम्राज्य स्थापित हो चुका था। कोरिया जैसी सैकडों इस्टेट अपने राज्य से लगान एवं अन्य राजस्व की वसूली करके अपना खजाना बढ़ाते थे, ऐश-ओ-आराम से रहते थे और अपनी आय का कुछ हिस्सा अंग्रेज शासकों को प्रसन्न करने के लिए चढ़ावे में दे आया करते थे। कोरिया में जंगलों और खदानों की भरमार थी लेकिन सब ओर गरीबी ही गरीबी थी। मनेन्द्रगढ़ आसपास के गाँवों के लिए आपूर्ति स्थल था, ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए पैदल या बैलगाड़ी से आते, वस्तुविनिमय (सामान के बदले सामान) या नकद के माध्यम से अनाज, कपड़े और श्रृंगार की वस्तुएं खरीदते। दूर से आते इसलिए भूख लगती तो किसी हलवाई की दूकान में मीठी रसीली जलेबी, बेसन के लड्डू जैसी वस्तुएं खाकर शौक पूरा करते या पूड़ी-सब्जी खाकर पेट भर लेते।
जगदीशनारायण की दूकान खरामा-खरामा चलती रही, किसी प्रकार गुजारा चलता था। घर में बिना माँ के दो बच्चे थे जिनकी देखरेख भगवान भरोसे थी। दूकान में पूड़ी-सब्जी खा लेते या बच्चे कभी जिद करते तो बाबा चांवल-दाल बनाते और सब मिल बैठकर खाते। इतनी तकलीफों के बावजूद भी वे दूसरे विवाह के लिए तैयार न होते थे। रिश्तेदार और परिचित बहुतेरे समझाते- 'अभी क्या उम्र है तुम्हारी जगदीशनारायण ? पूरी जिंदगी पड़ी है, छोटे-छोटे बच्चे बिना माँ के इधर-उधर भटकते हैं, ब्याह कर लो, बच्चों को माँ मिल जायेगी, तुम्हारा साथ बन जायेगा। कम से कम घर में रोज चूल्हा तो जलेगा।'
जगदीशनारायण टस से मस न होते, कहते- 'सौतेली माँ आएगी तो बच्चों के साथ अन्याय हो सकता है, ऐसा न होने दूंगा।'
जगदीशनारायण और उनके पड़ोसी लप्पूलाल के जो सम्बन्ध जैथारी में स्थापित हुए थे, वे मनेन्द्रगढ़ में भी कायम रहे। जगदीशनारायण के यहाँ जब कभी मेहमान आते या तीज-त्यौहार होता तब लप्पूलाल की छोटी बेटी सुन्दरिया घर आ जाती और सारा काम संभाल लेती। गरीब परिवार में पली-बढ़ी इस तेरह वर्षीया लड़की में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने, उसका अनुकूलन करने की अद्भुत क्षमता थी। परंपरागत हस्तशिल्प में निपुण, भोजन बनाने में पारंगत और खिलाने-पिलाने में सदैव उत्साहित रहने वाली सुंदरिया को शादी-ब्याह में गाये जाने वाले पचासों गीत याद थे। बेसुरी थी लेकिन खूब गाती थी। सुन्दरिया से घर में बहुत मदद थी इसलिए वह जगदीशनारायण के परिवार की एक सदस्य की तरह बन गयी। जगदीशनारायण के किसी शुभचिंतक ने सुझाया- 'लप्पूलाल की बिटिया से ब्याह कर लो, उसका स्वभाव अच्छा है, कामकाज में तेज है' तो वे एकबारगी चुप रह गए। मौन को स्वीकृति समझ शुभचिंतक ने सुंदरिया के पिता लप्पूलाल से बात की लेकिन लप्पूलाल ने साफ इन्कार कर दिया और कहा- 'दुजहा (जिसका दूसरा विवाह हो रहा हो) को नहीं ब्याहूँगा अपनी बिटिया, हाँ, उनके बड़े लड़के रामप्रसाद को अपनी लड़की ब्याहने के लिए तैयार हूँ।'
यह बात जब जगदीशनारायण तक पहुंची तो वे खुशी-खुशी तैयार हो गए। सुंदरिया का विवाह रामप्रसाद से हो गया जो उस समय पंद्रह वर्ष के थे।
है न मजेदार वाक्या ! कन्या के विवाह की बात पिता के लिए प्रस्तावित की गयी और विवाह बेटे से तय हो गया, आपने ऐसा कभी सुना ?
(४)
मनेन्द्रगढ़ (सरगुजा) के आसपास का क्षेत्र जंगलों से परिपूर्ण था। वहां एक वृक्ष 'खैर' की छाल को प्रोसेस करके कत्था बनाया जाता था, जिसका उपयोग पान बनाने में होता है। पान खाना सम्पूर्ण उत्तर भारत में अत्यंत लोकप्रिय रहा है। पान के लालित्यपूर्ण स्वाद के लिए कत्था एक अनिवार्य सामग्री होती है- इसी से होठों में लाली आती है। कत्था का उत्पादन भारत के कुछ विशिष्ट जंगलों में ही होता है। कोरिया के जंगलों में भी इसके वृक्ष प्रचुर मात्रा में पाए जाते थे। कोरिया इस्टेट के राजा निर्धारित राज्य शुल्क लेकर खैर की छाल निकालने का लायसेंस दिया करते थे। जगदीश नारायण के बड़े लड़के रामप्रसाद को उस वर्ष का ठेका मिल गया।
मनेन्द्रगढ़ के ही एक प्रतिष्ठित सेठ को जब उस अनुमतिपत्र के बारे में भनक लगी तो संभावित लाभ को भाँपते हुए साझेदारी के लिए उन्होंने प्रस्ताव दिया, पूँजी लगाने का वायदा किया और बराबर के हिस्सेदार बन गए। रामप्रसाद ने अपना पूरा ध्यान इस काम में लगा दिया। सन 1935-36 में किये गए इस कार्य में भरपूर उत्पादन हुआ इसलिए अच्छे मुनाफे का अनुमान था। ठेके की अवधि पूरी होने पर सेठ जी ने हिसाब-किताब तैयार किया और घाटे का हिसाब रामप्रसाद के हाथ में थमा दिया जबकि रामप्रसाद लगभग एक लाख रुपये लाभ होने का अनुमान लगाए बैठे थे पर चूंकि हिसाब केवल सेठ के पास था इसलिए जो सेठ ने कहा, वो ठीक! पूरी मेहनत मटियामेट होने से उत्तेजित रामप्रसाद ने जब अपने पिता को प्रकरण बताया तो वे 'जैसी ईश्वर की इच्छा' कह कर चुप हो गए। जगदीशनारायण बेहद सहनशील व्यक्ति थे, व्यथा में चुप रहने की आदत ने उनका फिर साथ दिया।
जगदीशनारायण की आर्थिक स्थिति और बिगड़ती गयी। यहाँ तक कि एक दिन जेब में बिलकुल पैसे न थे। पड़ोस की एक दुकान से उन्होंने एक कट्टा बीड़ी मंगवाई तो दुकानदार ने उधार देने से मना कर दिया। अपमान कहीं भीतर तक चुभ गया। उन्होंने दोनों बेटों को घर तथा दूकान का सामान समेटने के लिए कहा। बच्चों ने पूछा- 'दादू कहाँ जाओगे?'
'जहाँ प्रभु की इच्छा, अब इस गाँव में भी हमारा दाना-पानी नहीं रहा।' जगदीशनारायण बोले।
वे सब अपना सामान लेकर स्टेशन आ गए ताकि बिलासपुर होते हुए कलकत्ता जा सकें। मिठाई बनाने का जरूरी सामान और अपनी गृहस्थी बांध कर वे सब सपरिवार स्टेशन के प्लेटफार्म में बैठे थे तब ही कोरिया इस्टेट के दीवान जगदीशनारायण को खोजते वहां पहुँच गए। राज्य के इतने बड़े अधिकारी को इस तरह सामने आया देख सब हड़बड़ा कर खड़े हो गए। जगदीशनारायण ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया- 'दीवान जी, आपने कैसे तकलीफ की ?'
'राजासाहेब को तुम्हारे साथ हुई नाइंसाफी का पता चल गया है। उन्हें आज ही खबर लगी कि तुम लोग मनेन्द्रगढ़ छोड़ कर जा रहे हो इसलिए उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है और कहा है कि गाँव छोड़कर जाने की जरुरत नहीं। अगले साल का ठेका फिर तुम्हें ही मिलेगा लेकिन अब किसी से साझेदारी न करना।'
दीवान जी की बातें सुन कर जगदीशनारायण की आँखें सजल हो आयीं और उन्होंने भरे गले से कहा- 'मेहरबानी आपकी। राजासाहेब हुजूर को हमारा प्रणाम कहियेगा, हम पर उनकी बहुत कृपा रही है लेकिन माफ करिए, मैंने गाँव छोड़ दिया। मैं स्टेशन आ गया, अब वापस न जाऊंगा।'
दीवान ने आश्चर्य से उन लोगों को देखा और भारी कदमों से वापस चले गए। कुछ देर बाद ट्रेन आयी और जगदीशनारायण का भविष्य उसमें सवार हो गया। वाष्प इंजन का धुआँ रेल के डिब्बे में घुस रहा था, कोयले के बारीक कण बार-बार आँखों में प्रवेश कर रहे थे और जगदीशनारायण अपनी आखों को मलते हुए सोच रहे थे- 'जो किया, क्या सही किया ?'
ट्रेन के बाहर घुप्प अँधेरा था, न कुछ दिखाई देता था, न कुछ समझ आता था। जगदीशनारायण की जिंदगी की तरह ट्रेन भी हवाओं का सीना चीरते हुए आगे बढती चली जा रही थी।
(५)
12 मई 1937 की अल-सुबह ट्रेन बिलासपुर आकर रुकी। कलकत्ता जाने वाली मेल का समय शाम को था इसलिए जगदीशनारायण समय बिताने के इरादे से परिवार को प्लेटफार्म में ही छोड़ बस्ती में घूमने चले आये। स्टेशन से करीब पांच मील दूर गोलबाजार में उनके एक पूर्वपरिचित इस्माइलभाई पेटीवाले रहते थे, उनसे मुलाकात हो गयी। जगदीशनारायण ने जब कलकत्ता जाने के बारे में उन्हें बताया तो इस्माइलभाई ने कहा- 'इतनी दूर क्यों जा रहे हो ? कलकत्ता बहुत बड़ा शहर है, वहां मत जाओ, यहीं रुक जाओ। ये छोटी बस्ती है, भले लोग हैं, यहीं गुजर बसर हो जायेगी। वैसे काम क्या करोगे ?'
‘मिठाई बनाना जानते हैं, जिंदगी भर यही काम किया है।' जगदीशनारायण ने बताया।
इस्माइलभाई ने उन्हें सदरबाजार के प्रतिष्ठित धनिक समाजसेवी द्वारिकाप्रसाद दुबे का सूत्र बताया तो जगदीशनारायण हिम्मत करके उनके पास पहुँच गये और अपना इतिहास और वर्तमान बता कर उनसे सहयोग के लिए विनती की। द्वारिका बाबू ने पूछा- ‘जेब में कुछ हैं ?'
‘बाबू , एक रूपया दस आना है।' जगदीशनारायण ने झिझकते हुए बताया।
‘इतने कम में व्यापार कैसे शुरू करोगे ?' द्वारिका बाबू चौंके।
‘आपकी कृपा हो जाये तो धीरे से सब बन जाएगा। एक छोटी सी दुकान दिलवा दीजिये।'
‘देखो वह दुकान ठीक है, तुम्हारा काम चल जाएगा ?' द्वारिका बाबू ने सामने की ओर उंगली से इशारा करके पूछा।
‘चल जाएगा।' जगदीशनारायण ने कहा।
अगली सुबह दुकान प्रारंभ करने की तैयारी चालू हो गयी। उसी शाम को शुभ घ
ड़ी में जगदीशनारायण ने भट्ठी की पूजा की, नारियल फोड़ा और बिलासा केवटिन की बसाई बस्ती बिलासपुर में एक नया अध्याय लिखा जाने लग गया।
ड़ी में जगदीशनारायण ने भट्ठी की पूजा की, नारियल फोड़ा और बिलासा केवटिन की बसाई बस्ती बिलासपुर में एक नया अध्याय लिखा जाने लग गया।
जगदीशनारायण के पड़ोस में सेठ बिसेसरलाल की गद्दी थी। प्रत्येक शाम वे तांगे में बैठ कर दो-तीन घंटे के लिए अपनी गद्दी में आते थे। बगल में खुली हलवाई की दुकान में जलने वाली भट्ठी से आने वाला धुआँ सेठजी को नागवार गुजरा, उन्होंने मुनीम को तलब किया और धुआँ बंद करवाने की हिदायत दी। मुनीम ने जगदीशनारायण से शिकायत की तो पास में खड़े रामप्रसाद भड़क गए और कहा- ‘क्या हम अपना धंधा बंद कर दें?' जगदीशनारायण ने बीच बचाव किया और कहा- ‘कल से धुआँ नहीं होगा।' उसके बाद धुआं बंद हो गया। सेठ बिसेसरलाल को कुछ दिनों बाद धुएं वाली बात की याद आई तो उन्होंने मुनीम से पूछताछ की तब मुनीम ने बताया- 'शाम होने के पहले ही भट्ठी बुझा दी जाती है ताकि आपको तकलीफ न हो। अब वहां आपके आने के बाद कोई सामान नहीं बनता।'
आप, आज के माहौल में इस प्रकार की घटना को पढ़ कर तनिक विस्मित हो रहे होंगे लेकिन उस युग में आज जैसी बेअदबी नहीं थी, किसी की तकलीफ को समझना, बड़ों की बात को आदेश जैसा मानना- परम कर्तव्य माना जाता था।
सेठ बिसेसरलाल ने प्रभावित होकर जगदीशनारायण को अपने पास बुलाया और उनके विगत की जानकारी ली। सब कुछ सुनकर उनके मन में मदद का भाव आया और उन्होंने नजदीक में ही गोलबाजार में बन रही नगरपालिका की नई दुकानों में से एक दुकान अपने प्रभाव का उपयोग कर जगदीशनारायण को दिलवा दी। कालांतर में वही दुकान 'पेन्ड्रावाला' के नाम से मशहूर हुई, जिसकी मिठाई, नमकीन और पूड़ी-साग की खुशबू सौ-पचास मील इस कदर फैली कि जगदीशनारायण का परिवार बिलासपुर में ही सुव्यवस्थित हो गया। दूकान चल पड़ी तो जगदीशनारायण के अच्छे दिन आ गये, कम से कम घर में खाने-पीने की सुविधा बन गयी।
पूरे गोलबाज़ार में एक ही हेंडपंप था, पड़ोस में, बिरजी हलवाई की दूकान के सामने जिससे सब लोग पानी लिया करते थे। एक दिन बिरजी हलवाई ने पानी ले जाने पर रोक लगा दी। समस्या यह थी कि बिना पानी के दूकानदारी कैसे हो? जगदीशनारायण के पास इतनी गुंज़ाइश नहीं थी कि हेंडपंप खरीद कर अपनी दूकान में लगवा सकें। दूकानदारी ठप होने लगी जिसकी खबर जगदीशनारायण की बहू को मिली। बहू ने चुपचाप एक पड़ोसी के माध्यम से पच्चीस रुपये ससुर को भिजवाये ताकि ससुर को मालूम न पड़े कि रुपया बहू का है। उन रुपयों से दूकान में खुद का नल लग गया और पानी के लिये दूसरे पर निर्भरता समाप्त हो गयी।
जगदीशनारायण की आँखें बड़ी और लाल रंग की थी, जब वे ग्राहक से नास्ता करने के बाद कड़क आवाज़ में पूछते- 'क्या-क्या खाया ?' तो ग्राहक डर के मारे झूठ नहीं बोल पाता था, वैसे, उस युग में झूठ बोलने वाले बहुत कम थे लेकिन थे।
समय की मार ने उन्हें कठोर बना दिया था लेकिन उनके पास ऐसा दिल भी था जो दूसरों के लिए धड़कता था। उनकी पत्नी उनकी युवावस्था में ही उन्हें छोड़कर सदा के लिये चली गई, वे एकाकी जीवन के अभ्यस्त हो गए और स्वयं को भगवान राम के चरणों में अर्पित कर दिया। तुलसीदास का ग्रन्थ 'रामचरित मानस' उन्हें कंठस्थ था। आसपास के क्षेत्रों के परिचित लोग उनके पास आते और अपनी पारिवारिक-आर्थिक समस्याओं पर उनका मार्गदर्शन लेते। जगदीशनारायण उन्हें रामचरित मानस की किसी चौपाई या दोहे को सुनाकर उनकी समस्या का त्वरित समाधान कर देते।
एक सुबह जगदीशनारायण दूकान की गद्दी पर बैठे गुनगुना रहे थे- 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इंसान. सूरज न बदला, चाँद न बदला, न बदला रे आसमान, कितना बदल गया इंसान...', उसी समय समीप के एक गाँव से उनके एक परिचित आये, आपस में जय गोपाल हुई. कुशल-क्षेम के पश्चात् जगदीशनारायण ने पूछा- 'क्या बात है, कुछ चिंतित से दिख रहे हैं?'
'बिटिया का ब्याह तय हो गया है, दस दिन बाद का मुहूर्त है।' वे बोले।
'यह तो ख़ुशी की बात है, परेशानी क्या है?'
'दादू, पैसा कम पड़ रहा है। पंद्रह सौ रुपये की व्यवस्था हो गयी है पर उतने में काम नहीं चलेगा, और लगेगा.'
'कितना लगेगा?'
'पंद्रह सौ और हो जाता तो बिटिया का ब्याह अच्छे से निपट जाता।'
'चिंता मत करो, सब हो जाएगा। ऊपर वाला सबके काज करवाता है.'
'भगवान को हाथ जोड़कर घर से निकला हूँ, आपके पास आया हूँ, मेरी सहायता कर दीजिये।'
'अपने फिकर करने से कुछ नहीं होता. वो है न ऊपर वाला, भरोसा रखो, वो कुछ करेगा। बैठो नास्ता कर लो, दिन भर में अपना बाज़ार का काम-काज निपटा लो, शाम को छः बजे यहीं आना.' जगदीशनारायण ने उनकी हिम्मत बंधाई।
शाम के समय जगदीशनारायण अपने मित्रों से दूकान के बाहर कुर्सी पर बैठे बातचीत कर रहे थे, उसी समय सुबह वाले सज्जन आकर वहां खड़े हो गए। जगदीशनारायण उन्हें दूकान के भीतर ले गए, उस समय वहां कोई ग्राहक न था। अपने कुर्ते की जेब से एक लाल रंग की थैली निकाली और उन्हें सौंपते हुए बोले- 'लो, ये दो हज़ार हैं, फ़िज़ूल ख़र्च मत करना, जो देना हो लड़की को देना ताकि भविष्य में अड़चन के समय उसके काम आए।'
'दादू, आपने संकट के समय में मेरी मदद की, आपका पैसा मैं एक साल के भीतर वापस कर दूंगा।' उनके रूंधे गले से शब्द निकले।
'वापस करने की ज़रुरत नहीं, यह मेरी तरफ से कन्यादान समझकर रख लो, बिटिया को मेरा आशीर्वाद देना।' जगदीशनारायण ने कहा।
बात पुरानी हो गयी। इस घटना के बाद जगदीशनारायण संसार छोड़ कर चले गए। उनकी मृत्यु के पंद्रह वर्ष बाद जगदीशनारायण के बड़े बेटे रामप्रसाद के पास एक नवयुवक आया और उसने दो हज़ार रूपए दिये। रामप्रसाद ने पूछा- 'ये किस बात का?'
'मेरे पिता मृत्युशैय्या पर पड़े हैं। उन्होंने इसे भेजा है कि जगदीशनारायण को दे आओ, मेरी बहन के विवाह में उन्होंने मदद की थी।' युवक बोला।
'पिताजी को गुजरे तो एक अरसा बीत गया। मैं इसे कैसे लूं? आप रुपये वापस ले जाओ।' रामप्रसाद बोले।
'इसे आप ही रख लीजिए, मेरे पिता जी को मुक्ति मिल जायेगी। वे बेहोशी में इसी रुपये को वापस करने की बात बार-बार बोल रहे हैं, अगर आप नहीं लेंगे तो उनके प्राण अटके हुए हैं, नहीं छूटेंगे।'
'लेकिन जिनको देना था, वे तो नहीं रहे, फिर अपने पिता को क्या बताओगे?'
'मैं उनको बोल दूंगा कि जगदीशनारायण मिले थे, उनको रुपया वापस कर आया हूँ। शायद बेहोशी में उन्हें यह बात सुनाई पड़ जाये और उनके प्राण शांति से निकल जाएँ।' युवक ने रोते हुए कहा।
रामप्रसाद ने उसका मन रखने के लिये रुपये ले लिये।
(६)
शाम के वक्त दूकान में ग्राहक कम आते थे इसलिए जगदीशनारायण की बैठक दूकान के बाहर लगती थी।लकड़ी की कुर्सियां बिछ जाती जिसमें उनके मित्रगण आकर बैठते, दीन-दुनिया की चर्चा होती, चाय के दौर चलते। साहित्यकार प्यारेलाल गुप्त, द्वारिकाप्रसाद तिवारी 'विप्र', वैद्य सिद्धनाथ, बालमुकुन्द गुप्ता मास्टरसाहब और चौधरीराम उनकी बैठक के नियमित साथी थे।
इनमें से गुप्ता मास्टर काफी बुजुर्ग थे, शरीर से शिथिल थे. बोलते कम थे और सुनते अधिक थे। लम्बी नाक और बड़े-बड़े कान वाले मास्टरसाहब खद्दर का कुरता-धोती पहनते थे और सिर पर सफ़ेद टोपी लगाते थे।उनकी शिकायत रहती थी कि उन्हें जो चाय मिलती है वह ठंडी रहती है।
उस दिन ऐसा हुआ, जगदीशनारायण के सब दोस्त आ पहुंचे, गप-शप चल रही थी। चार-पांच कप चाय बनाकर लाने का आदेश हुआ। उस समय जगदीशनारायण का मंझला पोता गद्दी पर बैठा था. वह गद्दी से उठा और बोला- 'आज आप लोगों की चाय मैं बनाता हूँ।'
'ठीक है, तुम बनाओ.' जगदीशनारायण बोले। उसने कोयले वाली भट्टी पर चाय का गंज चढ़ाया और एक खाली कप की डंडी को चिमटे से पकड़कर भट्टी की आंच दिखा कर मस्त गरम कर दिया और उस कप में चाय छानकर मास्टर साहब को दे दी और शेष सामान्य कप अन्य को दे दिये।
मास्टर साहब ने कप को उँगलियों से पकड़ा तो उन्हें ज़रा गरम सा लगा लेकिन जैसे ही कप को उन्होंने अपने होंठो से लगाकर चाय सुड़की, वे चीख उठे- 'अरे बाप रे...'. उनके हाथ का संतुलन बिगड़ गया, थोड़ी सी चाय उनके कुरते पर छलक कर गिर गई। जगदीशनारायण ने पूछा- 'क्या हुआ मास्टर साहब?'
'आज चाय बहुत ही गरम है।' मास्टर साहब मुंह से हवा छोड़ते हुए बोले। उस गरम चाय का रहस्य आज तक कोई और नहीं जान पाया।
जगदीशनारायण की दूकान 'पेंड्रा वाला' में सभी वस्तुएँ देशी घी से बनाई जाती थी, मिठाई, नमकीन और पूड़ी सब्जी। पूड़ी सब्जी की लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि बिलासपुर के आसपास सौ-पचास मील दूर बैठे किसी व्यक्ति को अगर पूड़ी सब्जी की याद आ गई तो वह अगले दिन बिलासपुर जाने के लिए कोई न कोई बहाना अवश्य खोजता जैसे, 'कचहरी में पेशी है', 'कलेक्टर आफिस जाना है', 'आर॰टी॰ओ॰ का काम है', 'डाक्टर को दिखाना है', 'खरीदी करना है', 'बैंक में काम है' आदि कुछ भी काम 'खोजा' जाएगा और उसे बिलासपुर जाने वाली अगली ट्रेन या बस में बैठकर रवाना होना ही है। बिलासपुर पहुँच कर खोजा गया काम बाद में होगा, पहले जगदीशनारायण की दूकान में पूड़ी सब्जी का आस्वादन होगा क्योंकि घर से निकलने का असली मकसद पहले पूरा होना चाहिए।
स्थानीय निवासियों को इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी, घर से पैदल निकले, गोलबाजार पहुंचे और सीधे 'पेंड्रावाला' में घुस जाते और आदेश देते- 'आधा पाव पूरी देना।' पलाश के पत्तों से बने दोने में आधा पाव में तीन फूली हुई खरी पूरियाँ परोसी जाती और साथ में आलू की छिलके वाली रसीली सब्जी। बस, साथ में आचार-चटनी कुछ नहीं। मर्जी हो तो आधा पाव दही मँगवा लो या आधा पाव रबड़ी और फिर परमानंद।
(७)
अब जगदीश नारायण की दूकान में काम करने वाले दो श्रमिक के बारे में कुछ ज़रूरी बातें जानिए। छेदी और कंधई बिलासपुर में बहने वाली अरपा नदी के किनारे बसे मोहल्ले पचरीघाट में रहते थे। छेदी अविवाहित था और कंधई विवाहित। कंधई की पहली शादी से बच्चे नहीं हुए तो उसने पहली पत्नी की सहमति से दूसरी औरत को घर लाकर रख लिया और बाप बनने का सतत प्रयास किया लेकिन वह अंततः असफल रहा।
छेदी और कंधई की झोपड़ी अलग-अलग किन्तु अगल-बगल थी। दोनों भाइयों के बीच अज्ञात कारण से बातचीत बंद थी लेकिन वे दोनों एक ही दूकान में काम करते थे। छेदी तुनकमिज़ाज था जबकि कंधई शांत लेकिन दोनों का झगड़ा दूकान में भी जारी रहता। बात-बात में दोनों झगड़ते, एक-दूसरे के दोष खोजते और किसी दिन बात बढ़ जाती तो छेदी गुस्से में यह कहते हुए दूकान के बाहर निकल जाता- 'मैं अब काम नहीं करूंगा।' दो-तीन दिन बीतने के बाद सिर झुकाए फिर आ जाता और अपने काम से लग जाता। पुरानी कहावत है- 'न धोबी के आन परौहन, न गदहा के आन गुसाईं' अर्थात धोबी के काम केवल गधा आता है और गधे को धोबी के अलावा कोई नहीं अपनाता।
कंधई अधिक तनख्वाह पाता था क्योंकि वह 'उस्ताद' था। वह मिठाई, नमकीन, जलेबी, खोवे की जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन, रबड़ी, कलाकंद, मैसूर पाक, बालूशाही का अच्छा कारीगर था और फटाफट जलेबी बनाने और पूड़ियाँ तलने में माहिर था।
छेदी अकुशल श्रमिक था, उसका काम कारखाने के बर्तन मांजना, दूध उबालना, आटा सानना और सब्जी बनाना था। छेदी के हाथ की बनी आलू की सब्जी का अनुपम स्वाद उन्हें आज भी याद होगा जिन्होंने उस समय इसका स्वाद लिया होगा। अधिकतर लोग तो इस संसार से विदा हो चुके होंगे, वे भी 'ऊपर' आलू की रसीली सब्जी को अवश्य याद करते होंगे।
अब आप यह जानिए कि छेदी उस स्वादिष्ट सब्जी को कैसे बनाता था?
आलू किसी भी सब्ज़ी के साथ घुल-मिल जाता है। गृहिणी को किसी सब्जी की मात्रा बढ़ानी हो और 'बेसिक' सब्जी कम हो तो आलू मदद के लिए सदैव तैयार रहते हैं। आलू को जिस तरह से भी पकाओ, उसका स्वाद लाजवाब रहता है।
आलू की रसीली सब्जी बनाना एकदम आसान है। आम तौर पर इसे उबालकर बनाया जाता है लेकिन छेदी न तो उबालता था और न ही छीलता था, वरन कच्चे आलू को अच्छी तरह धोकर, उस के छोटे टुकड़े बनाता था। जलती भट्ठी पर रखे बड़े गंज में ज़रूरत के हिसाब से देशी घी डालता, गरम घी में जीरा, उसके बाद खलबट्टे में कूटकर तैयार किया गया हरी मिर्च और अदरक का कचूमर। एक मिनट बाद कटा हुआ आलू बर्तन में पहुँच जाता और उस पर स्वादानुसार नमक, हल्दी, लाल मिर्च, पिसी धनिया, गरम मसाला डालने के बाद गंज को पानी से भर कर, ढँक कर धीमी आंच में पकने के लिए छोड़ दिया जाता। आलू पकने के बाद भट्ठी से उतार कर छेदी तैयार सब्जी को लकड़ी की दाबी से कुचरता जिससे आलू का रस ज़रा गाढ़ा हो जाता। उसके ऊपर हरी धनिया के बारीक टुकड़े डालकर मिलाता और सब्जी तैयार।
उन दिनों सब्जी में टमाटर और प्याज डालने का चलन नहीं था, उत्तर और मध्य भारत में यह बहुत बाद में पंजाब की पाक-शैली के प्रवेश के पश्चात सब्जी बनाने की विधियों में शामिल हुआ। बनाना एकदम आसान लेकिन स्वाद में अपूर्व। कई लोग पूड़ी कम खाते, सब्जी अधिक। जगदीशनारायण की दूकान में सब्जी चाहे जितनी खाओ, उसका पैसा नहीं लगता था, कुछ चतुर ग्राहक इस सुविधा का भरपूर लाभ उठाते थे।
(८)
किसी रात, सोते समय जगदीशनारायण को आवाज सुनाई पड़ी- 'दादू, दादू।'
'कौन है?' जगदीश नारायण ने सोते से उठकर पूछा।
'हम हैं, शिवनायक सिंह, गौरेला वाले।'
'आओ शिवनायक सिंह। क्या बात है? इतनी रात को?'
'हाँ दादू, ट्रेन छह घंटा लेट हो गई, हम लोग भूखे है, क्या करें?'
'चलो दूकान चलते हैं।' जगदीशनारायण ने मच्छरदानी से बाहर निकलते हुए कहा।
जगदीशनारायण ने अपने पोते को जगाया और चल पड़े। दूकान के दरवाजे खोलकर बल्व जलाया, उन सब को बेंच पर बिठाया और जगदीशनारायण खुद आटा गूँथने लगे। पोते को कहा- 'गंज में सब्जी बची है उसे भट्ठी पर गरम करने के लिए रख दो और दूसरी भट्ठी पर घी की कड़ाही चढ़ाओ।'
कुछ देर में गरम पूड़ियाँ उतरने लगी। नाती ने सबको परोसकर भरपेट खिलाया। हाथ धोने के बाद शिवनायक सिंह ने पूछा- 'दादू, कितना पैसा हुआ ?'
'काहे का पैसा ? पैसा तब देना पड़ता है जब दूकानदारी का समय ग्राहक आता है, अभी हमारी दूकान बंद है। हम तो इसलिए यहाँ आए कि रात को आप लोग भूखे कैसे सो पाओगे?'
जगदीशनारायण ने अपने कंधे में गमछा डालते हुए कहा और अपने पोते के साथ गहराती रात में घर की ओर वापस चल पड़े।
सन 1959 में जगदीशनारायण को गले में केन्सर हो गया। उन्हें इलाज के लिए बम्बई (मुम्बई) के टाटा मेमोरियल केन्सर हास्पिटल ले जाया गया जहाँ उनकी रेडियोथेरेपी की गयी। वहां से लौटकर उन्होंने व्यापार से निवृत्ति ले ली और घर में कैद हो गए. बब्बाजी के केन्सर की तकलीफ बढती गयी, उन्हें फिर बम्बई ले जाया गया लेकिन हालत न सुधरी और वापस घर लौट आये। तब बिलासपुर के ही एक नामी वैद्य उनके जीवन की पारी सम्हालने के लिए आगे आए क्योकि उनका दावा था कि वे 'अर्बुद' (केन्सर) का निदान जानते थे। आयुर्वेदिक औषधियां देने के साथ ही साथ उन्होंने एक अजीब प्रयोग भी किया- केन्सरग्रस्त गले पर उन्होंने एक छिद्र किया तथा प्रतिदिन उसमें एक जोंक (एक कीड़ा) डालते। उनका मानना था कि जोंक मवाद को चूस लेगी जिससे केन्सर के कीटाणु समाप्त हो जाएँगे लेकिन वह सब कष्ट भुगतते मनुष्य के लिए और अधिक यातनादायक सिद्ध हुआ। वह प्रयोग मृत्यु का सामना करते व्यक्ति व परिवारजनों के लिए झूठी दिलासा थी, उपचार के नाम पर ठगी थी। जगदीशनारायण की पीड़ा और बढ़ गई, आवाज गुम हो गई, भोजन बंद हो गया, उनका जीवन समाप्ति की ओर था। पीड़ा उनके चेहरे में झलकती थी पर वे कभी कुछ कहते न थे।
आखिर किस पाप की सजा उन्हें मिली? जिस व्यक्ति ने मात्र तीस वर्ष की आयु में विधुर होने के पश्चात सन्यासियों की तरह जीवन बिताया, आर्थिक रूप से समर्थ होने के बाद उन्होंने परिचितों-अपरिचितों की जितनी मदद की, उन पैसों से वे अपार धन-संपदा एकत्रित कर सकते थे परन्तु वैसा न कर एक दयालु मनुष्य की तरह रहे। वे निश्चयतः साधु पुरुष थे। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि ईश्वर पर गहरी आस्था रखने वाले मनुष्य पर ईश्वर ने कैसा व्यवहार निश्चित किया?
1 फरवरी 1962 की सुबह 61 वर्ष की आयु में जगदीशनारायण की जीवन यात्रा पूर्ण हो गई।
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किस्सा बजरंग केडिया का : अखबार से लिपटा आम
(१)
बड़े शहरों में बातें बतंगड़ नहीं बनती लेकिन छोटी बस्तियों की बातों के पंख होते हैं। सबसे बड़ी वजह होती है, आपसी सरोकार, उसके बाद होती हैं कई छोटी-मोटी बतकहियाँ। छोटी बस्ती का हर व्यक्ति अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ अच्छी तरह से बंद रखता है, यहाँ तक कि रोशनदान भी लेकिन वही व्यक्ति दूसरे के दरवाजे, खिड़कियों और रोशनदान की दरारों से झांक कर अंदर के हाल-चाल को जानने और उसे प्रसारित करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है। पुराने जमाने में 'यू ट्यूब' नहीं था इसलिए पुरुषों की बहुत सी जिज्ञासाएँ बड़ी मुश्किल और जुगाड़ से शांत होती थी। ऐसा न समझें कि 'यू ट्यूब' में उपलब्ध अनावृत्त चित्र देखना ही एक मात्र उत्सुकता रही होगी वरन यह जानकारी भी आवश्यक थी कि किसके घर में क्या चल रहा है, क्या हो रहा है ? कुछ नहीं हो रहा है तो क्यों नहीं हो रहा है ?
पुराने समय में परिवारों में बहुत पूछताछ हुआ करती थी। कहाँ जा रहे हो ? क्यों जा रहे हो ? कब आओगे ? वर्तमान समय में ऐसे सवाल दम तोड़ चुके हैं, किसी से कुछ पूछना मना है क्योंकि परिवारों में भी अब लोकतन्त्र की आहट हो चुकी है जो 'पूछे जाने' को अपना अपमान समझती है। 'कहीं भी जाएँ', 'कुछ भी करें', तुमसे मतलब ? पुरानी रवायत जितनी गलत थी, उतनी नई शैली भी गलत है लेकिन हमारी दुनिया आज तक भगवान बुद्ध के मध्यमार्ग को अपनाने या समझने में असफल रही है। हम सदा से अति के शिकार रहे हैं और शायद हमेशा रहेंगे।
तो अपनी बात छोटी बस्तियों से शुरू हुई थी इसलिए इस कथा को जब आप पढ़ें तो किसी कम आबादी वाली छोटी सी बस्ती की कल्पना करें। उस दृश्य को अपने जेहन में लाएँ जैसा माहौल देश की आज़ादी के आसपास के समय में रहा होगा। उस समय 'इलेक्ट्रिसिटी' नहीं थी, स्कूल-कालेज नहीं थे, अस्पताल नहीं थे, आधुनिकता लिए हुए मकान नहीं थे, घरों में नल नहीं थे, दूकानों में शटर नहीं थे। पुरुष धोती-कुर्ता पहनते थे, महिलाएं घूँघट काढ़ कर भोजन बनाती-परसती थी, बच्चे निक्कर पहनकर धूल भरी सड़कों में खेलते थे। सब को एक-दूसरे से सरोकार था, सबके सुख और दुख सबके थे।
बिलासपुर से नजदीक ही एक छोटी सी बस्ती है, अकलतरा, आपको वहाँ ले चलता हूँ जहां के रहवासी उन दिनों के अभाव में भी मस्ती से जीते थे और हर रात को सोते समय अभाव से मुक्त होने के सुंदर-सलोने सपने देखते थे। अगली सुबह नीम की मुखारी करते हुए वे सपनों को याद करते और उन मीठी यादों को कुल्ले की कड़ुआहट साथ पानी में बहा देते।
जड़ों से उखाड़कर नई जमीन में किसी पौधे को लगाकर पुनर्जीवित करना बेहद कठिन होता है, केवल धान का पौधा ही ऐसा है जो उखड़ने के बाद फिर रोपे जाने के बाद पनपता है लेकिन बाकी उखड़ते ही अधमरे हो जाते हैं या मुर्झा कर प्राणविहीन हो जाते हैं। प्राण केवल उनके बचते हैं जिनकी जिजीविषा-शक्ति अत्यंत प्रबल रहती है।
पूरी दुनिया के लोग भटकते हैं, कोई रोजगार-व्यापार के लिए, कोई नौकरी के लिए, कोई आसरे के लिए, कोई पढ़ने के लिए, कोई कुछ जानने के लिए, कोई घूमने के लिए तो कोई अपना मुंह छुपाने के लिए। अपने घर को छोड़कर दूसरी दुनिया में जाने का निर्णय लेने वाले या तो अपने हालात से मजबूर होते हैं या वे दुस्साहसी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि जिसने अपना घर-परिवार छोड़ा, किसी नई जगह में जाकर बस गया, वह एक-न-एक दिन खुद को साबित कर देता है। आप तो जानते हैं कि गर्म-रेतीले रेगिस्तान में भटकता इंसान पानी और छांह की तलाश में अनवरत चलते रहता है क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं होता।
(२)
इस कहानी को भारत के उस रेगिस्तानी इलाके से शुरू करते हैं जिसे अब रंगीला राजस्थान कहते हैं।
अतिप्राचीनकाल में राजस्थान वैसा बीहड़ मरुस्थल नहीं था, जैसा आज है. वहां सरस्वती और दृषदवती जैसी जलवती नदियाँ बहती थी लेकिन ऋतु-परिवर्तन के कारण भौगोलिक परिस्थितियाँ बदली और वहां की हरियाली थार मरुभूमि में परिवर्तित हो गई। राज्य के पूर्वी भाग को छोड़कर पूरा प्रदेश बूंद-बूंद पानी के लिए तरसता था। पानी नहीं था इसलिए कृषि भी कम होती थी। इन इलाकों में कम पानी से होने वाली उपजें हुआ करती थी जैसे ज्वार, बाजरा, काकड़ी, मिर्च, सांगरी आदि। लोगों के पास रोजगार नहीं थे इसलिए हरेक घर में फुर्सत का साम्राज्य था, शतरंज की चाल थी, गप-शप थी, बहसबाजी थी, कभी-कभी लट्ठ भी चल जाते थे।
बीसवी शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेजों ने भारत में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे और कलकत्ता को उन्होंने अपना 'गेट-वे' बनाया। जिन बड़े घरानों का नाम आज सम्पूर्ण भारत में उजागर है जैसे बिरला, डालमिया, मोदी, बांगड़, जालान आदि, वे राजस्थान से कलकत्ता पहुंचे लोग हैं जो अंग्रेजों को मजदूर मुहय्या कराने या दलाली जैसा छोटा-मोटा काम किया करते थे। इनको अपने काम की देखरेख के लिए आदमी चाहिए थे, बंगालियों का काम उन्हें पसंद नहीं था क्योंकि वह घड़ी देखकर काम करने वाला समुदाय था जबकि उन्हें दिन-रात काम करने वाले कर्मठ लोग चाहिए थे। व्यापार का हिसाब-किताब रखने के लिए विश्वसनीय मुनीम भी चाहिए थे इसलिए वे 'देश' के परिचित लोगों को कलकत्ता बुलाकर बसाने और काम सिखाने लगे। धीरे-धीरे कलकत्ता 'मिनी राजस्थान' हो गया।
घर में किसी का कहना न मानने वाले महाआलसी युवक कलकत्ता पहुँच कर परम आज्ञाकारी बन गए, दिन-रात गरीबी और बदहाली में जीने वाले लोग अपने घर मनीआर्डर भेजने लगे। सूखा कंठ लिए पानी के प्यासे मनुष्यों के गले हुबली नदी के मीठे पानी से तर हो गए, हफ्ते में एक बार नहाने वाले प्रतिदिन स्नान करने लगे। रोजगार और पानी की उपलब्धि ने उन्हें जीने का नया सलीका सिखाया, नई भाषा सिखाई, नए खान-पान से जोड़ा और सबके बीच रह कर काम करना सिखाया। रूखे-सूखे राजस्थान से आया पीली पगड़ी वाला इंसान जब कलकत्ता में रोज-रोज की बरसात देखता तो अपना काम छोड़कर पानी की बरसती बूंदों को निहारता और मन में सोचता- 'क्यों यह बेशकीमती पानी सड़क पर बरसकर नालियों में निरर्थक बह जाता है ?'
राजस्थान के अलग-अलग इलाकों के लोग कलकत्ता आए। पुराने राजस्थान और हरयाणा से अधिकांश बनिया जाति के लोग आए जो सेठों की गद्दी में दिन भर काम करते और रात को उसी गद्दी पर सो जाते। उसी गद्दी के पीछे संडास थे, नहानी-घर थे, रसोई थी। वही छोटी सी दुनिया उनकी दुनिया बन गई। कुछ मारवाड़ क्षेत्र से आए, उनमें जो ब्राह्मण थे वे पूजा-पाठ कराने लगे, कुछ रसोइया बन गए। वहीं से नाई आए और दर्जी भी। राजस्थान में मुस्लिम परिवार भी बहुत बड़ी संख्या में थे जो आम तौर पर कारीगरी के काम में सिद्धहस्त थे, वे भी आए। कलकत्ता का भद्रजन इन लोगों को न चाहते हुए भी पसंद करता था क्योंकि बंगाली बुद्धिजीवी था, श्रमजीवी नहीं। राजस्थान और बिहार से आए लोग भले ही मैले-कुचैले कपड़े पहनते थे लेकिन वे बेहद परिश्रमी थे, उनके काम के लोग थे।
राजस्थान से आए इन लोगों को कलकत्ते में 'मारवाड़ी' कहा जाता था। इन मारवाड़ियों ने अपने परिश्रम, दृढ़संकल्प और बुद्धि-चातुर्य से बहुत कम समय में अपनी उपस्थिति पूरे भारत में दर्ज़ कर दी और देश की आज़ादी के आस-पास चांदी के सिक्के उनकी तिजोरियों में भरने लगे। ये सिक्के यूं ही नहीं आ गए, इसके लिए वे भूखे रहे, जमीन पर सोए, परिवार से दूर रहे, इधर-उधर भटकते रहे, बीमार पड़े और कुछ बेचारे असमय मर-खप गए लेकिन हार नहीं मानी और आगे बढ़ते रहे।
(३)
राजस्थान में झुन्झुनूं से कुछ दूर एक छोटा से गाँव केड में शाम के समय सिर में साफा बांधे दो बुजुर्ग रस्सी से बुनी चारपाइयों पर आमने-सामने बैठे हुक्का पी रहे थे। गर्मी के दिन थे, हवा अपने साथ रेत उड़ाकर ला रही थी। वे अपनी आँखों को सहलाते हुए उड़ती धूल को गुस्से में देख रहे थे। बुजुर्गों के पास आँखें थी लेकिन धूल की आँखें नहीं थी इसलिए वह इन बुजुर्गों की असुविधा पर गौर नहीं कर पाती और बार-बार आकर उन्हें छूते हुए निकल जाती। कुछ देर बाद हवा शांत हुई और उन दोनों में बातचीत का सिलसिला चल पड़ा।
'आज क्या खाए ?'
'बाजरे की रोटी और प्याज।'
'रोज-रोज वही खाना, ऊब गए भाया।'
'तो और क्या खाओगे ?'
'जो मिलेगा, वही खाएँगे।'
'और क्या हाल-चाल है ?'
'रामलाल के यहाँ चिट्ठी आई है कलकत्ता से, वहाँ बहुत सारे गोरे समंदर-पार से आ रहे हैं।'
'ये गोरे क्यों आ रहे हैं ?'
'अपना व्यापार करने के लिए, कुछ माल अपने देश से लाएँगे, कुछ यहाँ से ले जाएंगे।'
'हमारे यहाँ क्या है जो ले जाएंगे ?'
'कुछ होगा तब तो यहाँ आए हैं।'
'कलकत्ते का क्या हाल लिखा है चिट्ठी में ?'
'बड़ा शहर है, वहाँ व्यापार अच्छा चल रहा है। पानी जहाज से माल आता है और जाता है।'
'रामबिलास का छोरा वहीं है न ?'
'हाँ, वहीं एक सेठ के पास जम गया है। रहने-खाने का बढ़िया इंतजाम है, हर महीने घर में पैसा भेजता है।'
'हमारा रघुनाथ भी चला जाता तो अच्छा रहता। दिन भर इधर से उधर बागता-फिरता है, साल-दो साल में उसका गौना होगा, घरवाली आएगी, उसके पहले काम से लग जाता।'
'क्या बोलते हो ? उतनी दूर, परदेश में अपने छोरे को भेजोगे ?'
'यहाँ तो कुछ है नहीं, वहाँ अगर उसका काम जम गया तो कम से कम उसका परिवार चल जाएगा और बाद में अपने भाइयों को भी वहीं बुला लेगा।'
'ठीक है, रामबिलास से बात करता हूँ, वह कलकत्ते चिट्ठी लिखेगा तो उससे पूछ लेगा।'
'ठीक है।'
हुक्के की आंच कम हो गई थी इसलिए उसे फूंका, बुझती आंच को जगाया और फिर दोनों बुजुर्ग किसी और चर्चा में लग गए।
कुछ दिन बीते, कलकत्ता से बुलावा आ गया। रघुनाथ को जब खबर मिली तो वह घर से इतनी दूर जाने के नाम से घबराया लेकिन बाप के समझाने-बुझाने पर मान गया लेकिन उसकी माँ न मानी। उसका रो-रो कर बुरा हाल हो गया, उसने खाना-पीना छोड़ दिया। माँ बोली- 'जैसा रूखा-सूखा हमारे भाग्य में है, खा लेंगे। एक लड़का है, उसको अपने पास ही रखूंगी। एक बार घर से दूर निकल गया तो सदा के लिए परदेश का हो जाएगा। बहू जब आएगी तो वह भी वहीं चली जाएगी, मैं रघु को न जाने दूँगी।'
एक दिन रोती-कलपती माँ को छोड़कर रघुनाथ अपने घर से निकल पड़ा क्योंकि केड के इस छोरे को किसी नई दुनिया में जाकर अपनी ज़ोर आजमाइश करनी थी। राजस्थान की हज़ारों माँओं ने इस तरह आंसू बहाए लेकिन वे आंसू रेगिस्तान की गर्म रेत में टपके और सूख गए। हर युग में मनुष्य ने जीवन का संघर्ष निर्ममता से किया है।
(४)
रघुनाथ जैसे हजारों कलकत्ता पहुंचे जिनके पास न तो शैक्षिक योग्यता थी, न किसी कार्य में दक्षता लेकिन वे सब वहाँ मेहनतकश इंसान बना दिए गए। उनसे हर किस्म का काम लिया गया, कभी यह, कभी वह, उनके लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं था। असल बात थी कि जिसने उन्हें कलकत्ता बुलाया है उस सेठ के धनोत्पादन में वह व्यक्ति कितना मददगार है। सच पूछिए तो बंधुवा मजदूरी थी, चौबीस घंटे की नौकरी, जिसमें कुछ समय आँख मूँदने के लिए भी मिल जाया करता था। यह जरूरी नहीं था कि कोई मुनीम है तो मुनीमी ही करेगा, उसे सुपरवाइजरी या हमाली करनी पड़ सकती थी और जरूरत पड़ने पर सेठानी की मालिश भी। जो प्रवासी शहरी माहौल में खुद को नहीं ढाल पाते थे उन्हें बाहरी काम में लगा दिया जाता था, जैसे उन्हें माल-खरीदी के लिए बाहर भेज दिया जाता था या आसपास के गाँव में दूकान खोलकर गद्दी में बैठा देते थे। केड गाँव से कलकत्ते गए रघुनाथ, जिसका पूरा नाम रघुनाथ राय था, को शहर से दूर उड़ीसा में महानदी के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में भेज दिया गया ताकि वहाँ से ग्रामीण और जंगली इलाकों की वनोपज़ और खाद्यान्न इकट्ठा करके कलकत्ता 'इम्पोर्ट' किया जाए और उसके बदले में नमक और नारियल की खपत वहां की जाए।
उस समय रेललाइन बंबई से कलकत्ता की बिछ गई थी लेकिन अंदरूनी हिस्सों में आवागमन का साधन केवल बैलगाड़ी थी। उड़ीसा राज्य में महानदी का उपयोग नाव के जरिए माल को लाने-भेजने के लिए किया जाता था। महानदी गहरी थी और उसका विस्तार छतीसगढ़ तक फैला हुआ था। रघुनाथ महानदी के पास एक झोपड़ी में रहते, वहीं कुछ बनाकर खा लेते और रात को मच्छरों की 'सिंफनी' सुनते-सुनते सो जाते ताकि सुबह के समय आने वाले मल्लाह से माल की 'डिलवरी' लें और 'डिलवरी' दें।
दिन बीतते गए, घर से बाहर निकला रघुनाथ बाहर का ही रह गया। रघुनाथ के लड़के बच्चे हुए, बड़े होकर वे भी अपने देश वापस नहीं गए। फर्क इतना हुआ कि रघुनाथ को नौकरी करते-करते व्यापार करने के गुर समझ में आ गए और अपने लड़कों को व्यापार करवा दिया। रघुनाथ उड़ीसा की महानदी से खिसकते हुए छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी में 'शिफ्ट' हो गए। वे बंबई-कलकत्ता रेल लाइन पर स्थित बिलासपुर के समीप अकलतरा बस्ती में पहुँच गए। बड़े लड़के रामेश्वर ने अकलतरा में धंधा करना शुरू कर दिया और छोटे मदनलाल अकलतरा से दस कोस दूर जोंधरा में बस गए और कृषि करने लगे। मदनलाल के घर में सन 1939 में एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम बजरंगलाल रखा गया।
(५)
बजरंग अपनी छः बहनों के बीच अकेला भाई बनकर मदनलाल और जड़िया बाई के घर में जन्मा। जोंधरा गाँव में स्कूल न था इसलिए बजरंग को पढ़ने के लिए अकलतरा भेज दिया गया जहां मदनलाल के बड़े भाई रामेश्वर रहते थे। किसी और के घर रहना कष्टदायक होता है, भले ही वह ताऊ का घर हो, दूसरे का घर आखिर दूसरे का होता है। यद्यपि ताऊ बजरंग का बहुत ध्यान रखते थे लेकिन ताई के द्वारा उनके खुद के बच्चों की देखरेख और बजरंग के साथ होने वाले व्यवहार में बहुत अंतर हो जाया करता था।
बजरंग सांवला था। भारत में काले रंग के बच्चे, स्त्री हो या पुरुष, पसंद नहीं किए जाते क्योंकि त्वचा के रंग का प्रभाव भारतीय समाज में बहुत गहरा है। गोरा रंग तुरंत असर करता है, आकर्षण उत्पन्न करता है, वहीं पर काला रंग विकर्षण। भारत के हिन्दू समाज में भगवान कृष्ण ने सांवलों को बहुत सहारा दिया है लेकिन वह सहारा 'खुद को तसल्ली' देने जैसा है। बजरंग को उसके बचपन में शायद ही किसी ने प्यार से गोद में उठाया होगा, सिर्फ इसलिए कि वह मोटा और काला था, शायद वह गोद में उठाने लायक नहीं जन्मा था। उसकी माँ ने अकलतरा जाने के पहले उसे सिखाया था- 'बेटा, जो मिले खा लो, जहां जगह मिले सो जाओ और जैसा हो उसे मंजूर कर लो।'
किसी जमाने में अकलतरा बड़ी व्यापारिक मंडी थी, धनाड्य लोगों की बस्ती थी। आम तौर पर व्यापारी धन-केन्द्रित होते है, व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं लेकिन अकलतरा की तासीर कुछ अलग थी, बड़े आदमियों के घरों में साहित्य, संगीत और नाट्य प्रेमी युवा पैदा हो गए थे जिन्होंने पढ़ने का शौक पूरा करने के लिए एक छोटे से कमरे में सार्वजनिक लाइब्रेरी खोल रखी थी। बजरंग को बचपन से ही पत्रिकाओं को पढ़ने का शौक था इसलिए वह रोज लायब्रेरी में जाता और वहाँ का शुल्क न पटा न पाने के बदले रोज लाइब्रेरी की झाड़ू-बुहारी करता। कुछ समय बाद वह लायब्रेरियन वाला काम करने लगा।
लाइब्रेरी में 'चंदा मामा', 'नन्दन', 'चम्पक', 'बालभारती' और 'पराग' आती थी जो बजरंग को घंटों तक अपने से उलझाए रखती। खास तौर से 'चंदा मामा' के नए अंक के आने का उसे बेसब्री से इंतज़ार रहता। 'चंदा मामा' की सचित्र कहानियाँ और उन कहानियों में छुपे संदेश उसके मस्तिष्क में दिन-रात छाए रहते। बजरंग अपने भविष्य को नहीं जानता था लेकिन वह अपने वर्तमान को अध्ययन से जोड़कर उसके मज़े ले रहा था। थोड़ा बड़े होने पर बजरंग ने उपन्यासों को पढ़ना शुरू किया और उनमें इस कदर खो गया जैसे वह लाइब्रेरी उसी के लिए खोली गई हो।
मनुष्य का गर्भाधान जितना अनियोजित होता है उतना ही उसका जीवन भी। जैविक क्रिया से उत्पन्न मनुष्य यद्यपि अन्य जीवों की तरह ही जन्म लेता है लेकिन अन्य जीवों की तुलना में इसके जीवित बचे रहने की संभावना अधिक होती है क्योंकि यह बुद्धिमान और सामाजिक प्राणियों के बीच रहता है। परिवार में पालन-पोषण होता है और शिक्षा-दीक्षा होती है इसलिए वयस्क होने तक उस पर जो 'व्यय' किया जाता है, वह 'कर्ज़' की तरह उस पर चढ़ा रहता है जिसे समय आने पर उसे ब्याज सहित अदा करना होता है। साहूकार और बैंक चक्रवृद्धि-ब्याज की दर से कर्ज़ का ब्याज लेते हैं लेकिन परिवार में 'दुश्चक्रवृद्धि' की दर से ब्याज लगता है, अर्थात लेनदेन का कोई हिसाब नहीं, चाहे जितना पटाओ वह बढ़ते ही रहता है। जो लोग उऋण होना चाहते हैं वे जीवन भर मूलधन और ब्याज पटाते रहते हैं लेकिन फिर भी उन पर कर्ज़ नहीं उतरता, वहीं पर जो 'डिफाल्ट' कर जाते हैं उनका कर्ज़ 'राईट ऑफ़' कर दिया जाता है और वे सुखी जीवन व्यतीत करते हैं।
अजीब दुनिया है ये !
बचपन में बजरंग की नत्थू से खूब जमती थी। दोनों साथ पढ़ते थे, साथ घूमते थे और साथ खेलते थे। नत्थू वहाँ के प्रतिष्ठित लिखमानिया परिवार का लड़का था जिसके पास कैरमबोर्ड, साँप-सीढ़ी, टेनिस, हाकी, फुटबाल आदि खेल का बहुत सारा सामान था। अभाव में जी रहे बजरंग के लिए नत्थू का साथ किसी वरदान से कम नहीं था। यह दोस्ती सातवी कक्षा तक ही चली, क्योंकि अकलतरा में उससे आगे की शिक्षा नहीं थी, बजरंग आगे की पढ़ाई के लिए अकलतरा से बिलासपुर आ गया। उसने म्युनिसिपल स्कूल में आठवी कक्षा में प्रवेश ले लिया, गोंडपारा में एक कमरा किराये से ले लिया जिसमें चार-पाँच लड़के मिलजुल कर रहते। घर के सामने भागीरथी भोजनालय में खाना खा लेता और खाली समय में बिलासपुर शहर के मज़े लेता। उसके घर के पास सदरबाज़ार था जहां उसका एक सहपाठी रहता था, इंदर सोंथालिया, जिससे उसकी पक्की दोस्ती हो गई। अकलतरा के नत्थू की कमी इंदर ने पूरी कर दी।
म्युनिसिपल स्कूल बिलासपुर का नामी स्कूल था, भगवती प्रसाद पांडे वहाँ के हेडमास्टर थे, एक से बढ़कर एक शिक्षक थे वहाँ। दुबले-पतले-पोपले, धोती-कुर्ता-टोपीधारी भगवती प्रसाद पांडे बहुत कड़क इंसान थे। स्कूल के छात्र उनकी लपलपाती बेंत से बहुत डरते थे, शिक्षक भी भयभीत रहते थे, यहाँ तक की स्कूल की दीवारें भी उनको देखकर थर्राती थी। मिडिल और हाई स्कूल में कुल मिलकर डेढ़ हज़ार विद्यार्थी पढ़ते थे लेकिन स्कूल में चूँ से चाँ नहीं होती थी। स्कूल के मैदान से लगा हुआ था, शनीचरी पड़ाव, जहां शनिवार के दिन बाज़ार भरता था। बाजार भरने के अलावा वहाँ प्रदर्शनी 'मीना बाज़ार' लगती थी, सर्कस भी लगता था।
बजरंग जब आठवी कक्षा में था, उन्हीं दिनों वहाँ एक सर्कस आया, सर्कस का नाम था 'ग्रेट जेमिनी सर्कस'। देखते-ही-देखते चार दिन में तम्बू तन गया, कनात लग गई, लाइट फिट हो गई और बड़े-बड़े रंगीन पोस्टर लग गए जिसमें शेर, हाथी, बंदर, ऊंट और घोड़े के चित्र बने हुए थे। एक अन्य पोस्टर में कम कपड़े पहनी हुई करतब दिखाती लड़कियों के चित्र बने हुए थे जिसमें एक जोकर को उन्हें ध्यान से देखते हुए दर्शाया गया था। बजरंग और इंदर स्कूल से छूटकर सीधे सर्कस के पंडाल के नजदीक खड़े हो जाते, रोज की 'प्रोग्रेस' देखते और लड़कियों के आकर्षक पोस्टर को गहराई तक झाँकने की कोशिश में लगे रहते। जिस दिन सर्कस का उदघाटन था, पूरे शहर में चर्चा थी क्योंकि उसी दिन सर्कस वालों ने हाथी, ऊंट और घोड़ों के साथ सभी कलाकारों का जुलूस बैंड-बाजे के साथ निकाला था। शाम होते-होते सर्कस देखने और सर्कस देखने वालों की भीड़ को देखने वाले पंडाल के सामने जमा होने लगे।
बजरंग और इंदर भी उसी भीड़ में थे, उनके पास टिकट खरीदने के पैसे न थे इसलिए एक कोने में खड़े होकर भीतर घुसने के जुगाड़ में लगे हुए थे।
गेट में दो मोटे-तगड़े आदमी तैनात थे जो भीतर जाने वालों की टिकट जांच कर रहे थे और 'शो' चालू होने के आधा घंटे बाद तक खड़े रहे। उन दोनों के हटते ही बजरंग और इंदर सावधानी से प्रवेश द्वार की ओर बढ़े और धीरे से परदा हटा कर अंदर घुसे। इतने में एक व्यक्ति की दहाड़ने जैसी आवाज़ आई- 'कौन है ?' दोनों उल्टे पैर सरपट भागे, उनकी कई घंटों की कठिन तपस्या व्यर्थ हो गई। गोलबाजार तक दौड़ते आए और एक चबूतरे में बैठकर सुस्ताने लगे। दिल की धड़कन तनिक थमी तो सर्कस देखने के अन्य विकल्पों पर उन दोनों के मध्य चर्चा हुई :
'अब कैसा करें ?' बजरंग ने पूछा।
'कैसा करें ? सामने दो मुस्टंडे खड़े रहते हैं, उनकी नज़र से बचना मुश्किल है।' इंदर ने कहा।
'फिर?'
'दूकान से पैसा चुरा सकता हूँ लेकिन दो टिकट का एक रुपया लगेगा, बहुत होता है। बापू से कभी मार नहीं खाया, अगर पकड़ा गया तो पिट जाऊंगा।'
'चोरी की बात मत सोच, कोई उपाय सोच।'
'किसी प्रकार अंदर घुस जाऊँ, फिर काम बन जाएगा।'
'पर घुसेगा कैसे ?'
'एक उपाय है।'
'क्या ?'
'कल सुबह जल्दी तैयार हो जाना, मैं साढ़े नौ बजे आऊँगा।'
'क्या करेगा ?'
'सुबह बताऊंगा।' इंदर ने वार्तालाप पूरा किया।
अगली सुबह स्कूल की तैयारी से बस्ता लेकर दोनों निकले। स्कूल 11 बजे लगता था, उनके पास डेढ़ घंटे का समय था, वे सधे कदमों से सर्कस के प्रवेश-द्वार तक पहुँच गए। द्वार खुला था, सावधानीपूर्वक अंदर घुसे और चल पड़े। अंदर बहुत गर्मी थी। कुछ आदमी और लड़कियां अभ्यास कर रहे थे। एक लड़की की नज़र इन पर पड़ी, वह इनकी ओर इशारा करती हुई चीखी- 'ई...ई...ई।' उनके साथ अभ्यास कर रहे आदमियों ने इन्हें देखा और इनकी ओर दौड़ पड़े। नेपाली जैसा दिख रहे उस आदमी ने उनका हाथ पकड़ कर पूछा- 'कैसे घुसा ?'
'मालिक साहब से मिलना है।' इंदर ने साहस बटोरते हुए कहा।
'क्या करेगा ?'
'मिलना है, काम है।'
'मालिक नई रहता, मेनेजर है।'
'ठीक है, मेनेजर से मिलवाओ।' इंदर ने कहा। वह आदमी दोनों को लेकर मैनेजर के पास ले गया। मैनेजर मद्रासी था, हिन्दी नहीं जानता था। उसने इशारे से पूछा जिसका अर्थ था- 'क्यों आया?'
'हम दोनों कलाकार है, एक्टर, आपके सर्कस में काम करेंगे। इंदर ने कहा। मैनेजर को कुछ समझ में नहीं आया। नेपाली ने दुभाषिए का काम संभाला।
'यहाँ एक्टर का काम नहीं है, करतब दिखाना पड़ता है।' मैनेजर ने कहा।
'कैसा करतब ?'
'कभी सर्कस नहीं देखा क्या ?'
'नहीं।'
'तो देखो।'
'पर हमारे पास पैसा नहीं है।' बजरंग बोला।
'पैसा नहीं है ? अच्छा रुको।' मैनेजर ने कहा और कुछ खोजने लगा। उसने दो पर्चियाँ बनाई और देते हुए बोला- 'ये फ्री पास है, सेकेंड शो में आ जाना। कल सुबह आकर मुझे बताना कि वैसा कर लोगे या नहीं।'
'ठीक है, हम लोग चलते है।' इंदर ने नमस्ते करते हुए कहा।
उस दिन स्कूल की पढ़ाई में उनका मन नहीं लगा, स्कूल का ब्लेक-बोर्ड उन्हें सर्कस का तम्बू लग रहा था और शिक्षक जोकर। रात को सेकेंड शो में वे दोनों ठाठ से अंदर गए और शान से सर्कस देख रहे थे। सर्कस के करतब दिखाना उनके बूते का नहीं था लेकिन अपना काम निकालने का गुर वे कम उम्र में ही सीख गए थे।
(६)
बजरंग की पढ़ाई का सिलसिला अधिक नहीं चल सका, परिवार की जिम्मेदारियों ने उसे अकलतरा वापस बुला लिया। अकलतरा में पिता और ताऊ की एक राइस मिल थी, आपसे बटवारे में आधा बजरंग के पिता मदनलाल को मिला। बजरंग के पिता मदन लाल बहुत सीधे-सादे मनुष्य थे, दुनियादारी के तौर-तरीकों से नावाकिफ। बजरंग ने पढ़ाई छोड़ कर परिवार के रथ की लगाम अपने हाथों में ली लेकिन रथ के घोड़े गायब थे। राइस मिल थी लेकिन पूंजी नहीं थी जैसे, किसी के पास खेत हों किन्तु पानी न हो।
संयुक्त परिवार में चल रही परिपाटी से बाहर निकलना बेहद कठिन होता है. परिवार के प्रत्येक सदस्य की क्रिया-प्रतिक्रिया को परम्परा और पारिवारिक मूल्यों की कसौटी पर कसा जाता है। परिवार की परंपरा और मूल्य पर बहस नहीं की जा सकती, भले ही वे आधुनिक जीवन के लिए अनुपयुक्त क्यों न हों। परिवार का प्रमुख निर्णय लेने का अधिकार अपने हाथ में रखता है और पूरे परिवार का भविष्य उसकी सोच पर निर्भर रहता है।
व्यापारियों के घर में विरासत के रूप में आम तौर पर पुश्तैनी व्यापार मिलता है, जो सम्पूर्ण परिवार के भरण-पोषण का स्रोत होता है। जन्म और मृत्यु पर होने वाला खर्च अधिक नहीं होता लेकिन विवाह संस्कार का खर्च कमर-तोड़ होता है। परंपरा से चले आ रहे वैवाहिक तौर-तरीके दहेज और दिखावे की गिरफ्त में सभी इस तरह जकड़े हुए हैं कि कोई चाह कर भी उससे बाहर नहीं निकल सकता।
बजरंग के सामने आस्तित्व का संकट था। वह अपने परिवार को आर्थिक रूप से सम्पन्न देखना चाहता था। उसे तीन बहनों का विवाह करना था लेकिन आर्थिक परेशानियों के चलते वह पहल नहीं कर रहा था। एक दिन उसकी माँ ने पूछा- 'बहनें ब्याहने लायक हो गई हैं, उनका ख्याल है या नहीं ?'
'है माँ लेकिन पैसा नहीं है।'
'पैसा नहीं है ? तो आ जाएगा।'
'कहाँ से आ जाएगा ? साहूकार से उधार लेकर राइस मिल चला रहा हूँ। सारी कमाई ब्याज और घर-खर्च में निकल जाती है, ब्याह के वास्ते पैसा कहाँ से आएगा ?'
'बेटा, पैसा आ जाएगा। मारवाड़ी की गाड़ी कभी नहीं रुकती। तू लड़का खोज, सब ठीक हो जाएगा।' माँ ने कहा।
इस तरह बहनों के विवाह होते गए और बजरंग पर कर्ज़ चढ़ता गया, मिल से होने वाली कमाई और खर्च के बीच संतुलन गड़बड़ा गया और उसकी साख पर बट्टा लगने लगा लेकिन उसने अपना मानसिक संतुलन बनाए रखा।
इस बीच सोलह वर्ष के बजरंग का विवाह समीपस्थ गाँव नैला की कमला से हो गया। विवाह के बाद आर्थिक दशा बिगड़ती गई और बजरंग को उड़ीसा जाकर एक खदान में नौकरी करनी पड़ी। नौकरी रास न आई, फिर बिलासपुर की याद आई और बिलासपुर में बारह साल में बारह साझेदारी की, बारह किस्म के धंधे किए लेकिन बारह रुपए भी बैंक के बचत खाते में जमा न हुए। इस बीच तीन बच्चे हो गए, किराए का एक छोटा घर विद्यानगर में ले लिया और गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह घिसटती रही।
मनुष्य को यदि धन कमाना है तो धन में ध्यानस्थ होना पड़ेगा, उसे कमाई के अलावा कुछ और नहीं सूझना चाहिए। इश्क़ में आशिक़ की दीवानगी की तरह, सोते-जागते एक ही धुन होनी चाहिए, पैसा कमाने की। जिन्होंने भी दौलत कमाई है, उनकी लाटरी नहीं निकली। उन्होंने सही दिशा में प्रयत्न किए, दूरदृष्टि का उपयोग किया, अनथक परिश्रम किया, फ़िजूलखर्ची से बचकर रहे और परम स्वार्थी बने।
बजरंग ने अनथक परिश्रम किया, धनोपार्जन के सारे प्रयास किए। रंगीन बुश्शर्ट पहने और सफ़ेद धोती का एक छोर अपने कंधे में डाले श्यामवर्णी बजरंग की तोंद बढ़ते जा रही थी लेकिन जेब खाली थी। गोलबाजार के हरदेवलाल मंदिर के पास एक छोटी सी दूकान की गद्दी में बैठे बजरंग के बचपन का पाठक लेखक बनने के लिए ज़ोर लगा रहा था लेकिन बजरंगलाल और लेखन ?
(७)
बजरंग को जितना पढ़ने का शौक था उतना नाटक देखने और शास्त्रीय संगीत सुनने का था। चाहे जितनी व्यस्तता हो, व्यापार से समय निकाल कर नाटक और संगीत के कार्यक्रमों में वह पहुँच जाता और उसकी समीक्षात्मक रिपोर्ट बनाकर बिलासपुर से प्रकाशित होने वाले इकलौते दैनिक अखबार 'बिलासपुर टाइम्स' में छपने के लिए दे आता। अखबार के मालिक और संपादक द्वारिका प्रसाद चौबे उसकी बनाई रिपोर्ट को अवश्य छापते। बजरंग की लेखन शैली से प्रभावित होकर एक दिन उन्होंने कहा- 'बजरंग, क्या तुम प्रतिदिन समय निकाल कर 'प्रेस' में आ सकते हो ?'
'क्यों, मेरा क्या काम है ?' बजरंग ने प्रश्न किया।
'मैं चाहता हूँ कि तुम हमारे 'पेपर' में व्यापार और साहित्य वाला 'पेज' लिखो।'
'ठीक है, मैं अपनी दूकान से समय निकाल कर आ जाया करूंगा।' बजरंग ने स्वीकृति दी।
जिस साझेदारी में बजरंग का व्यापार था, उसमें बैंक का काम उसी के जिम्मे था, अर्थात बैंक में पैसा जमा करना और उसका 'ड्राफ्ट' बनवाना। पैसा जमा करने और ड्राफ्ट बनने के बीच चार-पाँच घंटे का समय लग जाता था, बजरंग उस बीच प्रेस आ जाता और 'आर्टिकल' तैयार करता। पार्टनर समझता था कि बजरंग बैंक में होगा लेकिन वह तो 'बिलासपुर टाइम्स' के सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस में अपने जीवन की नई इबारत लिखने में लगा हुआ था। यह सिलसिला करीब चार साल चला। बजरंग के लेखों की चर्चा शहर में होने लगी, 'बिलासपुर टाइम्स' की प्रसार संख्या व्यापारियों और साहित्यप्रेमियों के बीच बढ़ने लगी। बजरंग अब व्यापारी के साथ ही साथ पत्रकार भी हो गया और धोती-बुश्शर्ट के बदले फुलपेंट में शर्ट 'इन' करके पहनने लगा।
'बिलासपुर टाइम्स' के चौबे जी साम्यवादी सोच वाले व्यक्ति थे लेकिन शहर की राजनीति में साम्यवादी जनाधार नहीं के बराबर था इसलिए उनके अखबार में कांग्रेस के समर्थन और जनता पार्टी के विरोध में खबरें छपा करती थी। शहर में राजनीति और पत्रकारिता का माहौल कांग्रेस के पक्ष में था इसलिए उसके तोड़ के लिए अकलतरा से ही बिलासपुर आकर बस गए श्यामलाल अग्रवाल ने एक नया दैनिक अखबार निकालने का निर्णय लिया जिसका नाम रखा गया- 'लोक स्वर'। श्यामलाल अग्रवाल ने अपने पुराने परिचित बजरंग को 'लोकस्वर' से जोड़ लिया और 16 अगस्त 1979 की सुबह 'लोकस्वर' के अंतिम पृष्ठ के नीचे वाले कालम में प्रकाशित हुआ, 'प्रधान संपादक- बजरंग केडिया।' 'बिलासपुर टाइम्स' सांध्य दैनिक था जबकि 'लोकस्वर' शहर का प्रथम प्रातःकालीन अखबार।
'बिलासपुर टाइम्स' में चार वर्ष की निःशुल्क सेवा और 'लोकस्वर' में पाँच वर्ष तक की 'शून्य-लाभ' साझेदारी के बाद बजरंग केडिया के अखबार-प्रबंधन और पत्रकारिता की ख्याति न केवल शहर में बल्कि नागपुर स्थित 'दैनिक नवभारत' के प्रधान कार्यालय तक पहुँच गई। 'दैनिक नवभारत' का 'मेनेजमेंट' बिलासपुर संस्करण शुरू करना चाहता था। बजरंग केडिया और श्यामलाल अग्रवाल की 'लोकस्वर' साझेदारी डगमगा रही थी, उसी समय बिलासपुर के विधायक श्री बिसाहूराम यादव ने 'दैनिक नवभारत' के प्रबंधन को बजरंग केडिया का नाम सुझाया। बिसाहूराम यादव विधायक होने के पूर्व लंबे समय तक 'दैनिक नवभारत' के बिलासपुर प्रतिनिधि थे। चूंकि वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे इसलिए वे नवभारत समूह से अलग हो गए। उनकी सलाह का वहाँ बहुत वजन था इसलिए बजरंग केडिया को बातचीत के लिए नागपुर बुलाया गया।
बजरंग अपने बालसखा इंदर सोंथलिया के साथ नागपुर पहुंचे। 'दैनिक नवभारत' के मालिक श्री रामगोपाल माहेश्वरी और उनके पुत्र प्रकाश माहेश्वरी ने बजरंग केडिया का साक्षात्कार लिया।
'अपने बारे में बताइये।' प्रकाश माहेश्वरी ने प्रश्न किया।
'मूल रूप से मैं व्यापारी हूँ, तेल का व्यापार करता हूँ। अकलतरा में एक राइस मिल थी, उस जगह पर कई गोदाम बना दिए हैं जिन्हें 'फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया' को किराए पर दिया है, जोंधरा में पैतृक कृषि भूमि है।'
'पत्रकारिता ?'
'पढ़ने-लिखने का शौक बचपन से था, संयोग से 'बिलासपुर टाइम्स' और 'लोकस्वर' से जुड़ा और नौ साल से पत्रकारिता कर रहा हूँ।'
'परिवार ?'
'दो लड़के, दो लड़कियां, सबका ब्याह हो चुका, अब पारिवारिक ज़िम्मेदारी से मुक्त हूँ।'
'जब आपके पास इतना सब है तो आप नौकरी क्यों करेंगे ?' यह प्रश्न समूह के प्रमुख रामगोपाल माहेश्वरी ने किया।
'मैं नौकरी नहीं, पत्रकारिता करूंगा। मैंने नौ साल तक इसे किया है, मुझे यह काम अच्छा लगा, बहुत अच्छा लगा।' बजरंग ने उत्तर दिया।
'पर यह तो बहुत मेहनत वाला काम है ?'
'मेहनत से कौन डरता है जी ! बचपन से मेहनत कर रहा हूँ। आप तो जानते हैं कि व्यापार में साहबों की खुशामद करनी पड़ती है, तेजी-मंदी का तनाव सहना पड़ता है, मैं इनसे छुटकारा पाना चाहता हूँ।'
'यह सब अखबार चलाने वाले को भी करना पड़ता है।'
'अखबार वाले को खुशामद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ अपना काम कहना पड़ता है। सच तो यह है कि साहब लोग हमारी खुशामद करते हैं।'
'फिर क्या सोचा ?'
'सब सोच कर आपके पास आया हूँ, पत्रकारिता करूंगा।' बजरंग केडिया ने भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहा।
बजरंग केडिया को 'दैनिक नवभारत' का प्रबंध संपादक नियुक्त कर दिया गया और बिलासपुर में संस्करण शुरू करने की योजना को तेजी से पूरा करने के निर्देश दिए गए। 13 अगस्त 1984 को उन्होंने 'लोकस्वर' छोड़ा और 26 सितंबर 1984 को 'दैनिक नवभारत' का बिलासपुर संस्करण आरंभ हो गया, मात्र 43 दिनों में !
'नवभारत' के बिलासपुर संस्करण के प्रकाशन की शुरुआत 20,000 प्रतियों से शुरू हुई जो बिलासपुर शहर के अतिरिक्त रायगढ़, अम्बिकापुर, जांजगीर, कोरबा, सरगुजा और ओड़ीशा के राऊरकेला तक पाठकों को पहुंचाया जाता था। दस वर्ष के अंदर 'नवभारत' की प्रसार संख्या 69,000 पहुँच गई। पूरे क्षेत्र में 'नवभारत' पढ़ना पाठकों की आदत में शुमार जैसा हो गया था। 'नवभारत' के प्रतिस्पर्धी अखबार, सब मिल कर भी इस प्रसार संख्या का 15% भी नहीं छू पाते थे। बजरंग केडिया की 'टीम' ने उनके नेतृत्व में सफलता और लोकप्रियता के अविश्वसनीय प्रतिमान स्थापित किए।
एक बार 'नवभारत' में शहर के एक कुख्यात अपराधी की कारगुजारियों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट छपी। अपने खिलाफ रिपोर्ट पढ़कर वह व्यक्ति क्रोधित होकर नवभारत-कार्यालय पहुंचा और बजरंग केडिया से भिड़ गया।
'मेरे खिलाफ छापने का मतलब समझते हो तुम ?'
'आपके खिलाफ ? क्या छप गया ?' अन्जान बनते हुए बजरंग ने कहा।
'तुमको नहीं मालूम ?'
'मैंने नहीं देखा।'
'तो, मँगवा कर पढ़ो।' उसने कहा। बजरंग केडिया ने अखबार मंगवाया, उसे बैठने के लिए कहा, उसके लिए पानी मंगवाया और उस समाचार को बड़े ध्यान से पढ़ने लगे। समाचार पढ़ने के बाद उससे कहा- 'इसमें जो लिखा हुआ है, क्या वह गलत है ?'
'सरासर झूठ है।'
'तो आप सच लिखकर दे दीजिए, हम आपका छाप देंगे, हमारी आपसे कोई दुश्मनी तो है नहीं।' बजरंग केडिया ने उसे समझाया, गरम चाय पिलाया और प्रेमपूर्वक वापस भेज दिया। अपराधी ने अपनी सफाई में कुछ भी लिखकर नहीं दिया और उस आदतन अपराधी के खिलाफ अखबार में छपा समाचार निर्विवादित रहा।
मदनलाल के घर जन्मे कृष्णवर्णी बजरंग का नाम उसके जीवन में कई बार बदला; किशोरावस्था में बजरंग, राइस मिल चलाते समय बजरंग सेठ, नौकरी करते समय बी॰एल॰केडिया, मालधक्का में तेल और अनाज बेचते समय बजरंग लाल, पत्रकारिता की शुरुआत में बजरंग जी और 'नवभारत' में प्रबंध संपादक बनने के उपरांत केडिया जी। पत्रकारिता में मिले इस अवसर ने बजरंग के जीवन में वह सब दे दिया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बजरंग उन दिनों बिलासपुर के उन हस्तियों में से था जिससे संबंध बनाए रखने की ज़रूरत सबको महसूस होती थी। राजनीति के महारथी 'कैसे हैं, केडिया जी ?' कहते हुए हाज़िरी बजाने आया करते थे, अफसर फोन लगाकर हाल-चाल पूछा करते थे, उद्योगपति और व्यापारी उसके सतत संपर्क में रहते और सामान्यजन यद्यपि उनके आमने-सामने नहीं पड़ता था लेकिन 'नवभारत वाले केडिया जी' को अखबार के माध्यम से खूब पहचानता था।
धन, पद, बल और यश यथोचित दिशा में प्रयत्न करने से उचित समय आने पर हासिल हो जाते हैं लेकिन इसकी संभाल बहुत कठिन है। बजरंग के जीवन में ऐसा समय आ गया जिसमें वह हर दृष्टि से समर्थ हो गया लेकिन उसने इन उपलब्धियों को अपने दिमाग में चढ़ने नहीं दिया। एक विनीत व्यापारी जैसा स्वभाव सदा बनाए रखा क्योंकि वह पत्रकारिता को अपना शौक, अखबार चलाने को व्यापार और स्वयं को 'नवभारत' का वेतनभोगी नौकर मानता था।
(८)
सन 1999 में बजरंग की उम्र 60 वर्ष की होने वाली थी, सेवानिवृत्ति का समय नजदीक था इसलिए उसके दिमाग में सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन की फिक्र होने लगी। उसी समय 'रीडर्स डाइजेस्ट' में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था- 'Budget your life' जिसमें सेवानिवृत्ति के बाद वाले समय के बहुत से महत्वपूर्ण सूत्र थे। उनमें से एक सूत्र था- 'वह समय आ रहा है जब तुम आगंतुकों के आने की राह देखोगे' और दूसरा- 'वह समय आ रहा है जब फोन की घंटी बजेगी तो तुम खुश होगे।'
बजरंग के पास चार विकल्प थे। पहला विकल्प था, सक्रिय राजनीति में प्रवेश। यद्यपि बजरंग को कांग्रेस की ओर से आम चुनाव में टिकट देने का खुला प्रस्ताव था लेकिन पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण राजनीति की खामियों और उसकी अल्पायु से वह परिचित था इसलिए उस दलदल से पर्याप्त दूरी बनाकर रखी। दूसरा विकल्प था, कोई व्यापार करने या उद्योग लगाने का। यह कार्य 'पुनः मूषको भव' हो जाता इसलिए वह सिरे से ख़ारिज़ हो गया। तीसरा विकल्प था, किसी अन्य अखबार से जुड़ना। यह ठीक समझ में आया बशर्ते कोई सम्मानजनक प्रस्ताव मिले। चौथा विकल्प था, अपने पैतृक कार्य कृषि से जुड़ना। बजरंग ने तीसरे और चौथे विकल्प को अपने भविष्य के लिए खुला रखा।
इस बीच बजरंग को सन 1988 में बिलासपुर-कोटा मार्ग पर पच्चीसवें किलोमीटर पर स्थित भरारी गाँव में 5 एकड़ बंजर जमीन सस्ते में मिल गई। जमीन की कीमत बढ़ेगी, इस आशा में बजरंग ने बचत का पैसा वहाँ 'इन्वेस्ट' कर दिया। इस बीच आसपास की और ज़मीनें जुड़ती गई और सन 1994 में वह 43 एकड़ का बड़ा भूखंड हो गया।
धीरे-धीरे सन 1999 भी आ गया लेकिन 'नवभारत' ने बजरंग को नहीं छोड़ा, सन 2000, 2001 और 2002 भी निकल गया लेकिन बजरंग और 'नवभारत' की युगलबंदी चलती रही। 16 अगस्त 2003 को 19 साल की निर्बाध सेवा के पश्चात बजरंग को सेवानिवृत्ति मिली। 'नवभारत' के बाद 'जनसत्ता' (रायपुर संस्करण) के संपादक का कार्यभार मिल गया लेकिन रायपुर-बिलासपुर 'अप-डाउन' के लायक उम्र न थी इसलिए उसे छोड़ दिया।
बिलासपुर के 100 किलोमीटर की त्रिज्या में अमरूद और आम की फसल के लिए बहुत अनुकूल जलवायु है। हमारी पुरानी पीढ़ी आम के पौधे लगाती थी जिसके मीठे आम उनकी अगली पीढ़ी अपने बुजुर्गों को याद करती हुई चूसती थी। आधुनिक कृषि अनुसंधानों ने पौधा लगाने और फल होने के बीच का समय कम कर दिया था और आम के मीठे फल मात्र चौथे वर्ष में पेड़ की डालों में आने लगे। बिलासपुर के कृषि वैज्ञानिक (अब स्वर्गीय) डा॰ रामलाल कश्यप के आम के वृक्षों पर किए गए अनुसंधान को राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश और दिल्ली राज्यों में अभूतपूर्व सफलता मिली और वे भारतवर्ष में आम की आधुनिक खेती के 'रोल माडल' बन गए। डा॰ कश्यप ने बजरंग केडिया को भरारी की जमीन में आम के पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया लेकिन वह बंजर जमीन थी, कृषियोग्य नहीं थी इसलिए बजरंग हिचकिचा रहे थे। डा॰ रामलाल कश्यप ने समझाया कि लाल मिट्टी में आम की फसल निश्चयतः अच्छी होगी, वे विशेषज्ञ थे इसलिए उनकी बात मानकर बजरंग तैयार हो गए। डा॰ रामलाल कश्यप ने शर्त रखी- 'जैसा मैं कहूँ, बिलकुल वैसा करना और मुझसे बहस नहीं करना।' बजरंग ने शर्त मंजूर कर ली और 12 एकड़ में आम के पौधे आधुनिक विधि से रोप दिए गए। यह बिलासपुर शहर के आसपास के क्षेत्र का प्रथम आधुनिक व्यक्तिगत आम्रकुंज था।
पौधों की सिंचाई के लिए 'ड्रिप इरीगेशन सिस्टम' लगाया गया ताकि आसानी से जरूरी मात्रा में पौधों को पानी पहुंचाया जा सके। खाद के खर्च को कम करने के लिए शुरुआत में 9 विशालकाय टंकियों में दस हजार आस्ट्रेलियन केचुए पाले गए जो अब करोड़ों की संख्या में तैयार हो गए हैं। इन टंकियों में केचुओं के आहार के लिए हर माह 6 ट्रेक्टर गोबर, बाग का कचरा और सूखी पत्तियों को डाला जाता है। केचुओं द्वारा उत्सर्जित मल का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है जिससे रासायनिक खाद में होने वाला व्यय कम हो गया। आँधी-तूफान की गति तेज को अवरोधित करने के लिए बाग की सीमा में चारों ओर नीलगिरी और बांस के पेड़ लगाए गए हैं। यदि वायु गति 70 किलोमीटर प्रति घंटा हो तो ये पेड़ उसकी गति को 35-40 किलोमीटर प्रति घंटा तक कर देते हैं जिससे आँधी-तूफान से फलों को होने वाला नुकसान कम हो जाता है। खेत का जलस्तर को बनाए रखने के लिए पौन एकड़ में एक डबरी (तालाब) बनाई गई जिसमें बारिश का पानी बहकर आता और भरता है और साल भर सुरक्षित रहता है। बंदरों के उत्पात से मुक्ति पाने के लिए बजरंग ने पाँच खूंखार डाबरमेन कुत्ते पाल रखे हैं जो शुद्ध शाकाहारी हैं लेकिन इतनी तेज आवाज़ में भौकते हैं बंदरों का झुंड उनके बाग से दूर-दूर ही रहता है। आसपास के गाँव बेरोजगारी से परेशान थे, अब, लगभग 150 ग्रामीणों को बजरंग केडिया के बाग में प्रतिदिन काम मिलता है।
पेड़-पौधों को उर्वरक और पानी देने के अलावा उन्हें 'म्यूजिक सिस्टम' के माध्यम से शास्त्रीय संगीत भी सुनाया जाता है ताकि उनका समुचित विकास हो सके। उनके बाग में 1400 विभिन्न प्रजातियों के आम के वृक्ष हैं जिनमें से 'हापुस' का स्वाद और मीठापन अपूर्व है। उनके बाग का 'लंगड़ा' आम मई माह की शुरुआत में तैयार होकर बनारस पहुँच जाता है जबकि बनारस में उसकी फसल जून के आखिर में आकर शेष भारत में जाती है। इनके अलावा दशेरी, बंबईय्या, आम्रपाली आदि अनेक मनभावन आमों की भरपूर फसल होती है। आम के वृक्षों के अतिरिक्त चीकू के 110, अमरूद के 450, मुनगा के 500, नारियल के 62, काजू के 90, आंवला के 140 पेड़ हैं। उस परिसर में 550 नीम, 400 बांस और 700 नीलगिरी के वृक्ष भी अपनी हरियाली बिखेर रहे हैं।
बजरंग केडिया उस संघर्षशील मनुष्य का नाम है जिसने अपनी छुपी प्रतिभा का सकारात्मक उपयोग किया और अभाव से प्रभाव तक की यात्रा में बिना थके चलता रहा.
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किस्सा प्रभुदत्त खेड़ा का : पढ़ा लिखा आदमी
(१)
उन दिनों हिंदुस्तान बहुत बड़ा था, पूरब से पच्छिम तक खूब फैला हुआ था. हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दू थे और मुसलमान और पठान भी, सिख थे और ईसाई भी लेकिन सब हिंदुस्तानी थे. इन सबका रहन-सहन, खान-पान अलहदा था, वेशभूषा और बोली अलग-अलग थी लेकिन सबका दिल एक-दूसरे के लिये एक जैसा धड़कता था. इसी हिन्दुस्तान में एक शहर था लाहौर, वही लाहौर जो अपने सीने हिंदुस्तानियत का ज़ज्बा समेटे रहता था और दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसा हसीन शहर माना जाता था. इसी लाहौर में सन १९२८ की गर्मियों में सोमदत्त खेड़ा के घर में पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया, प्रभु दत्त.
सोमदत्त कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट थे, उनकी दिली ख्वाहिश थी कि प्रभुदत्त भी खूब पढ़े लेकिन उनके साथ समय ने कुछ ऐसा खेल किया कि उन्हें लाहौर छोड़ कर लुधियाना के पास झंग नामक गाँव में जाकर बसना पड़ा. झंग छोटी बस्ती थी, एक स्कूल था जिसमें प्राथमिक शाला लगती थी. एक हेड मास्टर था जो मास्टर भी था और पोस्टमास्टर भी. अकेला मास्टर पहली से लेकर चौथी कक्षा तक सबको पढ़ाता था. एक बड़ा कमरा जिस पर टिन की चादर लगी थी, उसी की छाँव में थोड़ी-थोड़ी दूर पर जूट से बनी पांत पर बैठकर बच्चे उर्दू भाषा में पढ़ते थे.
मास्टर जी का रुतबा गज़ब का होता था. ऊंचे-पूरे पंजाबी मर्द वाला कद्दावर शरीर, बदन पर आधे बांह की लम्बी कमीज़, सलवारनुमा पैजामा, सिर पर सफ़ेद पगड़ी, पगड़ी के ऊपर तना हुआ कलफदार तुरला और ऊपर से कड़क आवाज़- 'ओये खोते...'
मास्टर जी एक क्लास को पढ़ाते फिर उन्हें कुछ पढने या रटने का काम देकर दूसरी क्लास को पढ़ाते और इसी तरह तीसरी और चौथी क्लास को. किसी की क्या मजाल कि कोई विद्यार्थी दाएं-बाएँ झाँक ले क्योंकि उनकी नज़र हर समय हर पर रहती थी. उनके हाथ में तैनात 'रूल' और आँखों में सतर्कता का भय पूरे कमरे में व्याप्त रहता था. वे सुनिश्चित करते थे कि सब बच्चों को एक से लेकर बीस तक का पहाड़ा और पउआ, अद्धा, पौना रटा हुआ होना चाहिए.
विद्यार्थियों के पास लिखने के लिये लकड़ी की पटिया होती थी जिसे तख्ती कहते थे. उस पर सफ़ेद गेरू की मिट्टी, जिसे गाचनी कहते थे, का लेप लगाया जाता था और बेत से बनी कलम को काली स्याही में डुबा कर बच्चे उस पर खुशखती लिखा करते थे. रोज के रोज घर से लिखकर लाने के लिए पाठ दिया जाता था जिसे लिखकर बच्चे इस 'खुशखत' को मास्टर जी को दिखाया करते थे.
चूँकि स्कूल की छत टिन की थी इसलिए गर्मी के दिनों में बहुत तपती थी. पंजाब की भीषण गर्मी में पसीना बहता रहता लेकिन पढ़ाई चलती रहती. वहां बारिश कम होती थी लेकिन जब होती तो टिन की चादर पर पानी की बूँदें इतना शोर करती कि मास्टर जी की आवाज़ बच्चों को सुनाई नहीं पड़ती थी लेकिन किसी में हिम्मत नहीं थी कि कोई कह दे- 'मास्टर जी, सुनाई नहीं पड़ रहा है.'
यदि कोई लड़का किसी दिन स्कूल नहीं आता तो चार लड़कों को उसके घर भेजा जाता ताकि वे उसको पकड़कर या सशरीर उठाकर स्कूल लाएं.
ठण्ड के दिनों में स्कूल के मैदान में बरगद के पेड़ के पास खुली धूप में पढ़ाई होती. गाँव के लोग, जिनमें बच्चों के अभिभावक भी होते थे, वे भी वहां बिछी हुई खाट पर बैठे-बैठे बच्चों को पढ़ते हुए चुपचाप देखते रहते और अपने भाग्य पर अफ़सोस करते कि उनके ज़माने में स्कूल नहीं थे, वे पढ़ न सके.
बच्चों की ग़लती होने पर उनके सामने बच्चों की ठोकाई होती थी, बेंत से सोंटाई होती थी या 'रूल' से गदेलियाँ लाल होती थी लेकिन कोई भी मना नहीं करता था. वे सोचते कि मास्टर को मारने का अधिकार है, वे मारेंगे नहीं तो बच्चे पढेंगे कैसे?
उस समय केवल बड़ी जगहों में पोस्ट आफिस हुआ करते थे. स्कूल के मास्टर पोस्ट मास्टर थे और पोस्टमेन भी. गाँवों की डाक मोटे झोले में लेकर हरकारे पोस्ट आफिस से पैदल निकलते थे और मीलों दूर पगडंडियों के सहारे गाँव-गाँव डाक बाँटते निकल जाते और लिखी हुई चिट्ठियाँ लेकर वापस पोस्ट आफिस आते. इन हरकारों के पास एक भाला होता था जिसके सिरे में घंटी लगी रहती थी. जब वे चलते तो घंटियाँ बजती रहती थी. घंटियों की आवाज़ सुनकर जंगली जानवर समझ जाते थे कि कोई आदमी रास्ते से गुजर रहा है परन्तु उस पर हमला नहीं करना है. घंटी की धुन पर हरकारा पंजाबी लोकगीत गाता हुआ अपना सफ़र तय कर लेता और इस तरह सुख-दुख के समाचार घर-घर पहुँच जाते.
मास्टर जी स्कूल की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद चिट्ठियों की छंटाई करते थे और शाम के समय चिट्ठियां पहुंचा देते. अधिकतर लोग पढ़ना नहीं जानते थे इसलिए मास्टर जी से ही पढ़वा लेते. ख़ुशी की खबर होती तो मास्टर जी को गुड़ खिलाते, मीठी लस्सी पिलाकर विदा करते.
मास्टर जी ने किसी घर के बाहर आवाज़ लगाईं- 'तार आया है.' तो तार का नाम सुनते ही बिना पढ़े घर में रोना शुरू हो जाता क्योंकि टेलीग्राम आम तौर पर शोक सन्देश लेकर आते थे. इसलिए मास्टर जी अक्सर तार को विद्यार्थियों के माध्यम से भिजवा देते क्योंकि दुःख का सन्देश उन्हें भी दुखी कर देता था.
(२)
पंजाब में पंजाबियत कुछ खास रंग लिये हुई थी. पंजाबी हर मामले में मज़बूत था, मेहनत हो या खाना-पीना, लड़ना-भिड़ना हो या भाईचारा. आम तौर पर कृषि पर आधारित जीवन था इसलिए समृद्धि नहीं थी लेकिन जीवन मज़े में चलता था. प्रभुदत्त के घर में सामान्य आर्थिक परिस्थिति थी. उसके पिता चाहते थे कि परभू पढ़-लिख ले क्योंकि अब सब तरफ पढ़ाई का हल्ला है, पढ़ाई करने से अकल बढ़ेगी और कोई सरकारी नौकरी लग गयी तो लड़के की ज़िन्दगी बदल जायेगी. मास्टर जी बता रहे थे- 'तुम्हारा लड़का पढ़ने में तेज है. याददाश्त भी अच्छी है, तरक्की करेगा' तो सुनकर अच्छा लगा और उम्मीद भी बनी.
प्रभुदत्त चुप्पा लड़का था. खेल-कूद में उसका दिल नहीं लगता था, अधिकतर घर में ही रहता और मां के काम में हाथ बंटाता. उसकी अहमद से पटती थी, दोनों खेत की मेढ़ पर बैठे-बैठे आपस में बात करते रहते थे, आज क्या-क्या खाया, स्कूल में क्यों मार पड़ी, बाऊ जी क्यों गुस्सा हो रहे थे, मां क्यों रोई आदि अनेक ज्वलंत प्रश्न थे जिस पर वे अपनी कहानियाँ सुनाते और सोचते कि कब बड़े हों और कब इन यातनाओं से मुक्ति मिले! एक दिन की चर्चा में प्रभुदत्त ने अहमद से पूछा- 'तू मांस क्यों खाता है?'
'क्या पता? मैं तो बचपन से खा रहा हूँ.'
'मांस के लिये जानवर की हत्या करनी पड़ती है न?'
'हाँ, ये तो है.'
'फिर?'
'फिर क्या, तुम मेरे घर में पैदा हुए होते तो तुम भी खाते.'
'हूँ. हम लोग नहीं खाते इसलिए यह सवाल मेरे दिमाग में आता है और तुम्हारे दिमाग में नहीं आता.'
'तू भी खाया कर, बहुत अच्छा लगता है.'
'नहीं, मुझे मत बोल. अरे सुन न, तेरी अम्मी सेवई की खीर बहुत अच्छी बनाती है लेकिन एक ही बार खिलाती है, ईद में. क्या बीच में नहीं बना सकती?'
'मैं अम्मी से पूछ कर बताऊंगा, तेरे को खाना है क्या?'
'हाँ यार, बहुत याद आती है.'
'कल बताता हूँ.' अहमद ने कहा.
अगली सुबह दोनों दोस्त अपने-अपने घर से स्कूल जाने के लिये निकले, एक तिगड्डे पर मिले. मिलते ही प्रभु ने पूछा- 'क्या हुआ?'
''क्या?'
'अम्मी से पूछा सेवई की खीर के लिये?'
'पूछा.'
'कब आऊं तेरे घर?'
'कभी भी आ जा लेकिन अभी घर में सेवई ख़त्म हो गई है. दूध की कोई कमी नहीं इसलिए सेवई के बदले चांवल की खीर बनेगी तेरे लिये लेकिन एक शर्त है.'
'क्या?'
'अम्मी कह रही थी कि तुझे अकेली खीर नहीं मिलने वाली, साथ में रोटी तरकारी खानी पड़ेगी.'
'मंज़ूर है, कब आना है?'
'बताऊंगा, अम्मी से पूछ कर बताऊंगा.'
'ठीक है.'
'अच्छा ये बता कि तू घर में भी पढ़ता है क्या?'
'हाँ, रोज पढ़ता हूँ. सोने के पहले एक घंटा रोज.'
'यार मेरा दिल पढने में नहीं लगता. न स्कूल में, न घर में.'
'क्यों?'
'क्या पता? मुझे तो पढ़ाई बेकार लगती है. चौथी जमात तक पढूंगा किसी प्रकार फिर छोड़ दूंगा, घर का काम करूंगा.'
'तेरी मरज़ी लेकिन मैं तो पढूंगा.'
'पढ़कर क्या करेगा?'
'मैं? मैं पढ़कर मास्टर जी बनूँगा.'
'मास्टर जी? तेरे बाऊ जी तो किसी से कह रहे थे कि तुझे पटवारी बनवाएंगे. फिर तू मास्टर जी क्यों बनना चाहता है?'
'इसलिए कि मैं जानना चाहता हूँ कि बिना मारे-पीटे भी विद्यार्थियों को पढाया जा सकता है क्या?'
'तेरे मन में ये बात क्यों आई?'
'तू जानता है कि गांव के कितने बच्चे मार की डर से स्कूल नहीं जाते?'
'हाँ, ये बात तो है.'
'वे सब अनपढ़ रह जाएंगे न?'
'हाँ.'
'अँगरेज़ सरकार हमें पढ़ाना चाहती है ताकि हम दुनिया को जान सकें.'
'पढ़ने से दुनिया मालूम होती है क्या?'
'और क्या?' प्रभुदत्त ने कहा. इतने में स्कूल आ गया. दोनों अपनी कक्षा में बैठ गए.
अहमद मन ही मन सोच रहा था कि उसका पढ़ने में दिल नहीं लगता तो वह दुनिया कैसे जानेगा? क्या दुनिया को जानना ज़रूरी है?
प्रश्न यह है कि शिक्षा के माध्यम से क्या हम दुनिया को जान सकते हैं? शिक्षा विविध भाषाओं से हमारी जान-पहचान कराती है, जानकारियों का पुलिंदा हमारे सामने पेश करती है, हमें जोड़-घटाना, गुणा-भाग करना सिखाती है, ज्ञान-विज्ञान से जोड़ती है. समझदारी विकसित करती है और आपसी प्रतिस्पर्धा का भाव रोपती है. सफल होने पर खुश होना सिखाती है और असफल होने पर पुनः प्रयास करने की उत्तेजना पैदा करती है.
चूँकि आदि काल से वर्तमान तक पढ़ाई सामूहिक क्रिया रही है इसलिए यह हमें समाज के विभिन्न समूहों से जोड़ती है और दूसरों के साथ ताल-मेल करके जीना सिखाती है. दुनिया के साथ चलना और सहयोग करना और विपरीत विचारों का सम्मान करना सिखाती है.
तो क्या दुनिया को अनुभव से जाना जा सकता है? अनुभव हमारे जीवन में हुई घटनाओं की स्मृतियाँ हैं. किसी एक क्रिया की प्रतिक्रिया अनेक ढंग से हो सकती है. हम किसी को देखकर मुस्कुराएं तो उत्तर में मुस्कराहट वापस आ सकती है, 'कोई जवाब नहीं' वापस आ सकता है, उपेक्षा वापस आ सकती है या नाराजगी भी. इस स्थिति में मुस्कुराने की प्रतिक्रिया में भी भ्रम की स्थिति है इसलिए मुस्कराहट का उपयोग सोच-समझ कर किया जाता है. जब मुस्कराहट जैसा मधुर व्यवहार अलग-अलग ढंग परिणाम देता है तो दुनिया को कैसे जाना जाए?
यह समस्या केवल अहमद जैसे विद्यार्थी की ही नहीं है, प्रत्येक जिज्ञासु की है जो शिक्षा से जुड़कर दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा है. तो क्या शिक्षा हमें दुनियादारी नहीं सिखाती?
सिखाती है, दुनियादारी सिखाती है लेकिन दुनिया के रहस्य नहीं बताती बल्कि उन रहस्यों को जानने की राह बताती है लेकिन रास्ता इतना लम्बा है कि मंजिल नज़र ही नहीं आती.
बस, चलते रहो, चलते रहो.
अहमद ने तय किया कि वह भी पढ़ाई में मन लगाएगा. प्रभुदत्त और अहमद मिल-जुल कर बातें करते और पढ़ते भी. समय बीतता गया और वे दोनों चौथी कक्षा पास हो गए. आगे की पढ़ाई झंग में संभव नहीं थी इसलिए प्रभुदत्त का झंग से पांच मील दूर मिघियाना के स्कूल में दाखिला करवा दिया गया लेकिन अहमद झंग में ही रह गया क्योंकि उसके अब्बा उसे झंग से बाहर जाकर पढ़ने के खिलाफ़ थे. अहमद ने अपनी तरफ से बहुत कोशिश की, अम्मी से कहलवाया लेकिन बात नहीं बनी और उसकी पढ़ाई झंग के स्कूल की चारदीवारी में कैद होकर रह गई. जिस दिन प्रभु झंग से जा रहा था, वह दिन दोनों दोस्तों के लिये बहुत भारी पड़ा. अहमद रो रहा था कि वह झंग से निकल नहीं पाया और प्रभु रो रहा था कि वह झंग से निकल कर अपने जिगरी दोस्त से बहुत दूर जा रहा था. क्या पता फिर मुलाकात हो, न हो!
(३)
प्रभुदत्त के पिता चाहते थे कि वह मेट्रिक पास कर ले और उसके बाद कोई सरकारी नौकरी कर ले लेकिन प्रभु को आगे पढने की ललक थी इसलिए उसने मेट्रिक पास होने के बाद जिद करके लाहौर के कालेज में बी.ए. की पढ़ाई शुरू कर दी. सन १९४७ में देश को आज़ादी मिलने वाली थी, उसी समय विभाजन की गाज गिरी और प्रभुदत्त का हिन्दुस्तान अचानक पाकिस्तान बन गया. उसके बाद पूरे पंजाब में गुंडागर्दी का नंगा आतंक फ़ैल गया और दोनों देशों की आबादी अपनी जान बचाने की फ़िक्र में इधर से उधर होने लगी. बहुत कम समय में हिन्दुस्तानी लोग हिन्दू और मुसलमान बन गये और अपनी मिट्टी छोड़कर अन्जानी मिट्टी में आशियाना खोजने लगे. प्रभुदत्त का परिवार लाहौर से भागकर दिल्ली आ पहुंचा और शरणार्थियों के केम्प में रहने लगा.
शरणार्थी शिविर में भीड़ बढ़ती जा रहे थी. रोज जत्थे के जत्थे पहुँच रहे थे. जगह कम पड़ रही थी. इंतजाम था लेकिन नाकाफ़ी साबित हो रहा था. सब तरफ बदहवासी पसरी हुई थी. किसी को आसरा चाहिए तो किसी को खाना. कोई अपना सामन सहेज रहा है तो कोई रिश्ते. कोई अपने किसी परिवारजन को खोज रहा है तो कोई खुद को.
प्रभुदत्त के परिवार को एक तम्बू में जगह मिल गयी. और भी बहुत से परिवार साथ में थे. सब एक-दूसरे को अपने दुखड़े सुना रहे थे. कुछ छाती पीट कर रो रहे थे, कुछ सुबक रहे थे, कुछ के आंसू पूरी तरह सूख चुके थे. वहां पर कुछ लोग अपने गुमे हुए परिजनों को खोज रहे थे. एक पंजाबी औरत अपने जवान बेटे को खोज रही थी- 'सतपाल....मेरा सतपाल.' अचानक प्रभुदत्त को देखकर वह दौड़ती आयी और उससे लिपट गयी- 'सतपाल, तू कहाँ गुम गया था रे? मैं कितने दिन से तुझे ढूंढ रही थी, मेरा प्यारा बेटा.'
प्रभुदत्त को कुछ समझ में न आया. ये औरत कौन है जो मुझे अपना बेटा सतपाल समझ रही है? प्रभुदत्त ने कहा- 'मैं सतपाल नहीं हूँ, प्रभु हूँ.'
'अरे, तूने अपना नाम भी बदल लिया मुन्डा?'
'आपको धोखा हो रहा है बी जी, मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ.'
'चल, मुझे अन्धी समझ रहा है? तेरी भी आँखें नहीं हैं क्या? हाय रब्बा, तू अपनी मां को नहीं पहचानता?'
'चल, मैं तुझे अपनी मां से मिलवाता हूँ.' प्रभुदत्त बोला और उस औरत को अपनी मां के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया.
'ये है मेरी माँ.' वह बोला.
'ये कैसे होगी तेरी मां? तू मेरा पुत्तर है सतपाल. मां की आँख धोखा नहीं खाती.' वह रोते-कलपते बोली.
प्रभुदत्त की मां को सारा माज़रा समझ में आ गया. उसने सतपाल की मां को अपने पास बैठाया, उसकी करुण गाथा सुनी. वह अकेली थी, भटक रही थी. सहारा ज़रूरी था. प्रभुदत्त की मां ने उससे कहा- 'तुम घबराओ नहीं. हमारे साथ रहो. जब तक सतपाल नहीं मिलता, प्रभु को अपना बेटा सतपाल समझो.'
दोनों की मां एक-दूसरे के गले से लिपट कर रो रही थी जैसे दो गुमी हुई सगी बहनें अरसे बाद अचानक मिली हों.
(४)
बी.ए. की पढ़ाई लाहौर में अधूरी छूट गयी थी उसे दिल्ली में पूरा करके प्रभुदत्त ने मनोविज्ञान में एम.ए. किया, फिर मास्टर ऑफ़ लिटरेचर किया. प्रभुदत्त विवाह योग्य हो गये इसलिए जब माता-पिता ने विवाह की बात की तो प्रभुदत्त ने पी.एच.डी.वाला अड़ंगा लगा दिया. 'मलेर कोटला (लुधियाना-पाकिस्तान) के मुस्लिम बच्चों की परवरिश' विषय पर सन १९७१ में शोध पूरा हो पाया और प्रभुदत्त के उम्र हो गयी, ४१ वर्ष.
अपनी बहू की शक्ल देखने की ख्वाहिश अपने सीने में समेटे हुए माता-पिता इस संसार से मुक्त हो गये. प्रभुदत्त अकेले रह गये और अकेले रहना सीख गये. प्रभुदत्त को यू.जी.सी. की पोस्ट डाक्टरल फेलोशिप मिल गयी. उसे पूरा करने के बाद भारत सरकार के शिक्षा विभाग और एन.सी.आर.टी. में दस वर्षों तक नौकरी की. पी.एच.डी. के बाद प्रभुदत्त दिल्ली विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान का अध्यापन करने लगे और १९९३ में सेवानिवृत्त हो गए.
विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान प्रभुदत्त अपने छात्रों को भारत के उन सुदूर गांवों में अध्ययन के लिये ले जाते थे जहाँ सामाजिक परिस्थितियों का व्यवहारिक अध्ययन किया जा सके. उसी सिलसिले में एक दिन वे ट्रेन से बिलासपुर स्टेशन में उतरे और बिलासपुर से लगे अचानकमार के जंगल में जीवनयापन कर रहे आदिवासियों के रहन-सहन को बहुत नज़दीक से देखने का उन्हें मौक़ा मिला. अचानकमार का जंगल उन्हें भा गया और वहां के आदिवासियों का भोलापन भी. विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होने के बाद एक झोला में अपने कपड़े रखकर लमनी नामक गाँव में पहुँच गए और आदिवासियों के उत्थान के लिये अपना जीवन अर्पित कर दिया.
अचानकमार के जंगल प्रकृति की अनोखी देन हैं जहाँ पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, नदी-नाले और मनुष्य एक-दूसरे से मिल-जुल कर रहते हैं. अचानकमार का जंगल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मध्यप्रदेश के अनुपपुर के बीच फैला हुआ है जिसका भौगोलिक क्षेत्र ५५१.१५ वर्ग किलोमीटर है. यह मैकाल पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत विंध्याचल और सतपुड़ा पहाड़ों को अपने सीने में समेटे हुए है. अचानकमार भारत के सबसे बड़े वर्षा-वनों में से एक है जिसमें जून से सितम्बर माह तक दक्षिण-पूर्वी मानसून के कारण भरपूर बारिश होती है. तीन बड़ी नदियाँ, नर्मदा, जोहिला और सोन इस पहाड़ी क्षेत्र से बहती हुई दो विपरीत दिशाओं में विभाजित होकर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती हैं.
अचानकमार में १५१ परिवारों की १५०० प्रजातियों के पौधे पाये जाते हैं. यहाँ १०५ औषधीय गुण वाले पौधे हैं जिनमें से २५ पौधे दुर्लभ प्रजाति के हैं. ऊंचे और सीधे खड़े साल. साजा, बीजा और बांस के वृक्षों की उपस्थिति में सम्पूर्ण वन गमकता-महकता है. पक्षियों की चहचाहट के साथ-साथ जंगली पशुओं की भी शरणस्थली है अचानकमार जहाँ २००४ की गणना के अनुसार २६ शेर, ४६ तेंदुवा, २८ भालू, १९३६ चीतल, १३६९ साम्भर ३७६ हिरन और असंख्य बन्दर हैं. इनके अतिरिक्त काला हिरण, लोमड़ी, जंगली भालू, सियार, भेड़िया, उड़ती गिलहरी, सांप, मेंढक और असंख्य बायसन की बहुतायत है. अचानकमार में इन जीवों के साथ मनुष्यों की भी आबादी रहती है जो आदिवासी कहलाते हैं. इन आदिवासियों ने वृक्षों और पक्षियों को सहेज कर रखा था.
आदिवासी दो शब्दों से मिलकर बना है, आदि और वासी, जिसका अर्थ है मूल निवासी. भारत की जनसँख्या का 8.6% (लगभग 10 करोड़) जितना बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है. आदिवासियों की जीवनशैली पर विश्व के समाजशास्त्रियों ने गहराई में जाकर अनेक अध्ययन किये है. स्टीफन कोरी के अनुसार- 'आदिवासियों ने अपनी जीवनशैली को पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं की सीमा में बाँध रखा है, वे आत्मनिर्भर है और आधुनिक समाज की मुख्यधारा से सर्वथा अलग हैं.' इस बात पर व्यापक मतभेद है कि उन्हें आदिवासी ही रहने दिया जाये या आधुनिक जगत की वैज्ञानिक प्रगति से जोड़ा जाए. आधुनिक विश्व उन्हें अपने साथ सम्मिलित करना चाहता है लेकिन अनेक विद्वान उनकी सहज जीवनशैली पर गैरज़रूरी अतिक्रमण और दखल मानते हैं क्योंकि उनकी आवश्यकताएं सीमित हैं, वे प्रकृति के सहयोग से अपना जीवनयापन करते हैं, मस्त हैं जबकि आधुनिक दुनिया जीवन की विभिन्न समस्याओं से घिरी हुई है, त्रस्त है.
प्रभुदत्त खेड़ा ने अध्यापन के दौरान आदिवासियों के जीवन का न केवल अध्ययन किया बल्कि वे देश के सभी आदिवासी क्षेत्रों में अपने छात्रों के साथ जाकर उन्हें आमने-सामने समझने की कोशिश की. उन्होंने देखा कि आदिवासी अपने में खुश हैं लेकिन पेट की भूख और अज्ञानता से जूझ रहे हैं. सूर्य और चन्द्रमा की किरणों से उनका दिन और रात का वास्ता है लेकिन आधुनिकता की कोई किरण उनके जीवन में नहीं पहुंची है. आधुनिक समाज से जोड़ने के लिए उनमें शिक्षा का प्रसार ज़रूरी समझ में आया इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापकी से निवृत्त होने के बाद प्रभुदत्त बिलासपुर के समीप अचानकमार के जंगल में आ बसे, छोटे से गाँव लमनी में.
(५)
लमनी में मुश्किल से बीस परिवार थे, उनकी छोटी-छोटी झोपड़ियां बांस और पत्तियों की बुनावट से बनी हुई थी. परिवार के पुरुष सदस्य रोज सुबह भाला या तीर-कमान लेकर शिकार के लिए निकलते, जो मिल जाता उसे घर में लाकर लकड़ी की आंच में भून कर खा लेते. औरतें लकड़ी और पत्ता बीनने निकलती, लौटकर भोजन पकाती. शाम को सबका मिलना-जुलना होता, गीत-संगीत होता और नृत्य. सात बजते-बजते सब अपनी झोपड़ियों में लौट जाते, सो जाते क्योंकि उनका दैनिक जीवन पौ फटने के पहले ही शुरू हो जाता था.
गहरे रंग के लोगों के बीच एक गौरवर्णी जब घने जंगल से घिरे लमनी गाँव में उतरा तो लोग समझे कि कोई घूमने-फिरने वाला आदमी आया है लेकिन जब वह वहां रुक गया और वहीँ रहने लगा तब वे उसे रोज दूर से देखते, घूर कर देखते लेकिन चुप रहते. दोनों एक दूसरे की भाषा से अनभिज्ञ थे लेकिन प्रभुदत्त की आत्मीय मुस्कान ने उनके बीच बातचीत की खिड़कियाँ खोल दी. आँखों-आँखों में बातें होने लगी, वे एक-दूसरे को समझने की कोशिश करने लगे. कुछ दिनों बाद वहां के आदिवासियों को यह समझ में आ गया कि गोरे रंग का यह ठिगना सा व्यक्ति उनसे प्यार करता है, उनका हितवा है और उनके लिये कुछ करने आया है. प्रभुदत्त को देखते ही बच्चे 'दिल्ली-साब' चिल्लाते हुए पास आ जाते क्योंकि प्रभुदत्त के कंधे में लटकते झोले में उनके लिये कुछ-न-कुछ अवश्य रहता था, भुना हुआ चना या मुर्रा या बताशा या मीठी गोलियां.
विकसित विश्व की सुविधाओं से बहुत दूर थे अचानकमार जंगल के निवासी, फिर भी उन्हें प्रकृति से जो मिलता था, उससे उनका काम चल जाता था. ज़रूरतें उनकी सीमित थी लेकिन उनका जीवन अभावग्रस्त था. बूढ़े लोग हड्डी के ढांचे थे, बच्चे कुपोषित थे. युवा मज़बूत थे लेकिन उनका यौवन ज़ल्दी मुरझा जाता था. किसी बीमारी ने यदि आक्रमण किया तो बैगा की झाड़-फूंक असर कर गयी तो कर गयी अन्यथा घर का एक सदस्य गिनती में अचानक कम हो जाता. वनवासियों का बिना किसी सहारे उनका जीवन शुरू होता और जीवन समाप्त होने तक उन्हें किसी भी सहारे का सहारा न मिलता.
दोनों ने मौन भाषा से मुखर भाषा तक आहिस्ता-आहिस्ता यात्रा की और कामचलाऊ हिंदी में आपस में बोलने-समझने लगे. सर्वाधिक महत्वपूर्ण था, उनके लिये पौष्टिक आहार की व्यवस्था, फिर स्वास्थ्य की जागरूकता और उसके बाद उन्हें आधुनिक शिक्षा के संसार से जोड़ना. सामान्यतया सभी मांसाहारी थे. जंगल से शिकार में जो मिलता उसे आग पर भून कर खा लेते थे. बारिश के दिनों में जंगल में घुसना मुश्किल हो जाता था इसलिए उनकी झोपड़ियों के आस-पास जो मिल जाता, वही उनका आहार बन जाता जैसे मेंढक, चूहा, सांप या कुत्ता. महुए की शराब का साथ तब भी था, आज भी है.
प्रभुदत्त ने उन्हें किसानी से जोड़ा और चावल तथा सब्जी उगाने और उसे उनके भोजन से जोड़ा. रोजगार मुहैया करने के लिए उन्हें बीड़ी-पत्ता तोड़ने के लिये और बांस की टुकनी और पंखा बनने के लिए प्रेरित किया. अपने घर में बच्चों को बुलाकर अक्षरज्ञान देंना आरम्भ किया. समय बीतता गया, वनवासियों में जागरूकता आने लगी. वे बिलासपुर आने-जाने लगे, सोच-विचार बदलने लगा. पहले बात करते समय भाग जाने वाले लोग अब बहस करने लगे. बच्चों ने पेंटिंग करना सीख लिया और बिलासपुर शहर में चित्र-वीथिका लगाकर अपनी कला का प्रदर्शन किया.
वनवासियों की आदतों में परिवर्तन आ रहा है. शिक्षा की ओर उनका रुझान बढ़ रहा है और आधुनिक युग की सोच और वेशभूषा का असर उन पर होता दिख रहा है. खेती की उपज बढ़ने से वे पौष्टिक आहार ले रहे हैं. चावल का 'पेज', भात-सब्जी और मांस का तालमेल उनके शारीरिक सौष्ठव में परिवर्तन ला रहा है.
प्रभुदत्त ने भी गाँव में एक झोपड़ी बना ली है. खुद अपना भोजन बनाते हैं, रात के समय, सब्जी और रोटी. एक पाव लौकी की सब्जी दो दिन चल जाती है. दिन में सत्तू खाते हैं या मौसमी फल जो वहां के जंगल में फलते हैं जैसे अमरुद, जामुन. आम, सीताफल, तेंदू, चार आदि. कभी-कभार मिल गई तो ब्रेड और बिना दूध की लाल चाय, पत्ती कम, वह भी दिन में एक बार.
रोज सुबह पक्षियों को दाना खिलाते हैं. जंगल की चिड़िया, मैना और मिट्ठू से उनकी पक्की दोस्ती हो गयी है. वे पक्षियों की भाषा समझने लग गए हैं, उनकी नाराज़गी हो या ख़ुशी, वे जान जाते हैं. कभी-कभार इन पक्षियों के बीच कोई कौवा घुस जाता है तो पक्षी शोर मचाकर प्रभुदत्त को आवाज़ देकर बुलाते हैं. जब प्रभुदत्त कौवा को भगा देते हैं तो वे पक्षी खुश होकर नाचने लगते हैं और दाना चुगने के बाद हर्षित होकर धन्यवाद देते हुए प्रभुदत्त से अपनी भाषा में आवाज़ देकर कहते हैं- 'मज़ा आ गया. अब जा रहे हैं.'
प्रभुदत्त खेड़ा की समाजसेवा को मान देते हुए छत्तीसगढ़ शासन ने उन्हें राज्योत्सव में राजकीय सम्मान और एक लाख रुपये की अनुग्रह राशि घोषित की. जब प्रभुदत्त को इस घोषणा की जानकारी मिली तो उन्होंने एक सहज मुस्कान बिखेरी और बिना किसी प्रतिक्रिया के अपने काम से लगे रहे. इस लेखक ने उन्हें बधाई दी तो वे बोले- 'किस बात की बधाई?'
'आपको मिले राज्य-सम्मान की बधाई.' मैंने कहा.
'मैं सम्मान लेने नहीं राजधानी गया ही नहीं. मैं किसी सम्मान या पुरस्कार के लिये काम नहीं करता.'
'सम्मान लेने नहीं गये, कोई बात नहीं. एक लाख रुपये तो ले लेना था, वनवासियों के काम आता.'
'वहां पैसे की ज़रुरत नहीं है, उन्हें हमारा साथ चाहिए, सरोकार चाहिए.' प्रभुदत्त ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
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