Skip to main content

किस्सा चंदू पंडित का : ब्राह्मण का शाप

किस्सा चंदू पंडित का : ब्राह्मण का शाप 

(१)

          मध्यप्रदेश के जिला सतना के पास एक गाँव है बेरहना, वहाँ पंडित जानकीशरण पाण्डेय के घर चौथे पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया- चन्द्रशेखर। पंडित जानकीशरण मंदिर के पुजारी थे, संस्कृत के श्लोक उनकी आजीविका के स्रोत थे। पिता के सौजन्य से चन्द्रशेखर को पूजापाठ में उपयोग आने वाले श्लोक कंठस्थ हो गए थे। पिता ने बारह वर्ष की उम्र में उसका विवाह करवा दिया। गौना नहीं हुआ था इसलिए चन्द्रशेखर की पत्नी अपने मायके में रहती थी। गाँव में जीवनयापन कठिन हो रहा था इसलिए पंडित जानकीशरण सपरिवार बिलासपुर आ गए और गोंडपारा के गोवर्धनलाल गुप्ता के द्वारा निर्मित शिव मंदिर के पुजारी हो गए।
          चन्द्रशेखर को अभिनय करने का बहुत शौक था। आइने के सामने खड़े होकर वह अपने चेहरे को विभिन्न मुद्राओं में निहारता और उसे लगता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब वह सिनेमा के रुपहले पर्दे पर दिलीपकुमार या देव आनंद की तरह अवतरित होगा और उसे देखकर दर्शक सीटियाँ बजाएँगे। वह मधुबाला और वैजयंतीमाला जैसी अभिनेत्रियों के साथ नायक की भूमिका में स्वयं को देखना चाहता था। उसे मालूम था कि उसका सपना बिलासपुर में नहीं बंबई में साकार होगा, उसके लिए संघर्ष करना होगा और भोले-भण्डारी की कृपा हो गई तो मधुबाला और वैजयंतीमाला उसकी बाँहों में झूलती हुई गाने गाएंगी।
          जब तक बंबई का कोई स्रोत हाथ में न हो, उसकी बंबई जाने की उसकी हिम्मत न हो, जेब में पैसे भी न थे। उस बीच गोलबाजार की रुई-गद्दा गली में रामलीला की एक मंडली आई, चन्द्रशेखर रामलीला के व्यवस्थापक चतुर्भुज मिश्रा से मिला और रामलीला में अभिनय करने का अवसर मांगा। व्यवस्थापक ने उसे घूरकर देखा और पूछा- 'पहले कभी काम किया है ?'
'नहीं, पहले कभी नहीं किया है लेकिन मैं बहुत मंजा हुआ कलाकार हूँ।' पंडित बोला।
'मंजे हुए कलाकार हो ? जब कभी काम नहीं किया तो कैसे मालूम ?'
'आप रामलीला में कोई भी 'पार्ट' मुझे देकर मेरा 'टेस्ट' कर लीजिए, आपको मालूम पड़ जाएगा।'
'कोई भी पार्ट ?'
'हाँ, दे कर देखिए।'
'ठीक है, एक रुपया रोज का दूंगा, मैं सोचूंगा एक पैकेट सीज़र सिगरेट नहीं पिया।'
'ऐसा क्यों सोचते हैं आप, एक दिन ऐसा आएगा जब मेरी कद्र करोगे।' पंडित बोला। इस प्रकार पंडित चन्द्रशेखर की अभिनय-यात्रा आरंभ हो गई और वह भरत के 'रोल' के लिए चुन लिया गया।
          रामलीला के कलाकार सुबह होते ही एक मील दूर स्थित अरपा नदी के तट पर चले जाते, नहा-धोकर वापस आते तब तक रसोइया भोजन तैयार कर लेता। चन्द्रशेखर सबको भोजन परोसता, उसके बाद खुद अपनी थाली लगाकर खाने बैठता। भोजन के पश्चात एक घंटा विश्राम-काल होता, उसके बाद सारे कलाकार 'रिहर्सल' के लिए एकत्रित हो जाते। चन्द्रशेखर के रिहर्सल का पहला दिन था। वह बेफिकर था। उस रात रामचरितमानस के उस दृश्य का मंचन होना था जिसमें राजकुमार भरत जब अपने नाना के घर से वापस लौटते हैं और उन्हें बताया जाता है कि राम को वनवास भेज दिया गया है और पिता का निधन हो गया है। इस समाचार को सुनकर वे दुखी हो जाते हैं और रोते हुए बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं।
          दिए गए संवाद चन्द्रशेखर ने वहीं बैठे-बैठे रट लिए। चतुर्भुज कक्का ने रिहर्सल शुरू करवाई, सब पात्र अपने-अपने संवाद बोलकर अभिनय कौशल दिखा रहे थे। जब चन्द्रशेखर की बारी आई, कक्का चीखे- 'चंदू पंडित, आओ और अपना संवाद बोलो।' चन्द्रशेखर ने सभी संवाद सही कहे और अभिनय का अच्छा नमूना प्रस्तुत किया लेकिन संवाद बोलने के पश्चात बेहोश होकर उसे सामने गिर पड़ना था, वह उससे न बने। उसे डर लग रहा था कि उस तरह गिरने से कहीं उसकी नाक या दाँत न टूट जाएँ ! संवाद के तीन 'रीटेक' हुए, सब सही रहा लेकिन चंदू पंडित खड़ा का खड़ा रह जाए, गिरने की हिम्मत न करे। अगले रीटेक में चतुर्भुज कक्का चुपचाप चंदू पंडित के पीछे खड़े हो गए और जैसे ही संवाद पूरा हुआ और भरत के मूर्छित होकर गिरने का प्रसंग आया, कक्का ने चंदू पंडित के घुटने के पीछे जोरदार लात लगाई, चंदू पंडित मुंह के बल गिर पड़ा।
          चंदू पंडित उठा, इधर-उधर देख कर हँसते हुए खड़ा हो गया और सीधे चतुर्भुज कक्का के पाँव पर लोटने लगा। कक्का बोले- 'वाह चंदू पंडित, तुम तो कमाल के कलाकार हो।'
'आपका आशीर्वाद है कक्का।'
'अब से अपने-आप गिर जाना, नहीं तो मुझे 'पब्लिक' के सामने तुम्हें लतियाना पड़ेगा।'
'मैं समझ गया कक्का।'
'अपनी आवाज थोड़ा तेज करो बचऊ, पीछे बैठी पब्लिक तक को साफ-साफ सुनाई पड़ना चाहिए।'
'जो आज्ञा।'
'इतनी तेज न कर देना जैसी रावण की होती है।'
'समझ गया।'
'आवाज़ में इतना दर्द होना चाहिए कि सुनने वाले को रुलाई आ जाए।'
'जी।'
'क्या जी ?'
'जी, करके बताऊंगा, आज मंच पर प्रहसन होने तो दीजिए। आप मेरी अदाकारी का लोहा मान लेंगे। जो है सो है।'
'गिरने से डरोगे तो नहीं ?'
'वह डर आपने दूर कर दिया कक्का।' चन्द्रशेखर बोला।
          रात को आठ बजे से दर्शकों का मंच के सामने आकर बैठना शुरू हो गया। बच्चे अपने साथ बोरा और चादर लेकर आए थे जिसे बिछाकर उनके परिवारजनों के लिए जगह आरक्षित कर ली गई। रंगीन पर्दे के पीछे हलचल चल रही थी लेकिन दर्शकों को कुछ दिख नहीं रहा था। बच्चे इधर-उधर झांक कर देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन एक झलक दिखती फिर पर्दे की ओट हो जाती। दर्शकों को मालूम था कि आज भरत-विलाप का खेला होगा क्योंकि कल रात को भगवान राम वन की ओर प्रस्थान कर गए थे। रानी कैकेई राम को जंगल जाते देख मुस्कुरा रही थी और दुष्ट मंथरा खुशी के मारे दोहरी हुई जा रही थी। ऐसा लगे कि स्टेज में चढ़कर कैकई और मंथरा दोनों को सोंटी से अच्छी धुनाई करे लेकिन कैसे करें ? बच्चे सोचते बहुत है लेकिन जैसा सोचते हैं, वैसा बेचारे कर नहीं पाते।
          इधर रात का नौ बज गया लेकिन हारमोनियम और तबला वाले मंच के सामने लगे तख्त पर विराजे नहीं। सबकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। हारमोनियम और तबला भी रखे-रखे अलसा रहे थे। छोटे बच्चों को नींद आने लगी। कुछ वहीं अपने घुटने सिकोड़ कर सो गए। अचानक एक धोती-कुर्ता-टोपीधारी, ललाट में रंगबिरंगा तिलक लगाए पंडितजी प्रगट हुए, ये चतुर्भुज कक्का थे जिन्हें सम्पूर्ण रामायण कंठस्थ थी। उनके पीछे तबला वादक भी अपनी धोती सम्हालते आ गए। दोनों अपने स्थान पर बैठ गए और अपने वाद्ययंत्र से खिलवाड़ करने लगे, चीं-चीं....ढप-ढुप। बहुत देर तक दोनों एक-दूसरे को देखकर सुर बैठाते रहे फिर मुस्कुराए और चतुर्भुज कक्का ने अलाप लेने के पहले हारमोनियम से सुर मिलाकर पब्लिक से जयकारा लगवाया- सियावर रामचंद्र की जय। पवनसुत हनुमान की जय। सीता मैया की जय। बम बम।
           कुछ देर बाद पर्दे में हलचल हुई। किसी ने रस्सी खींची और पर्दा खुलना शुरू हो गया। सामने सजावट किसी राजमहल जैसी थी, असल में वह रनिवास था। बीच में रखी एक कुर्सी को लाल रंग के मखमली कपड़े से ढँक दिया गया था ताकि वह सिंहासन जैसी दिखाई पड़े। एक आदमी रानी कैकेई की वेषभूषा धारण किए हुए मंच पर आया और सिंहासन पर आसीन हो गया। उसके पीछे दूसरा आदमी मंथरा का रूप धरे लाठी टेकते हुए आ गया। मंथरा के बाल सफ़ेद थे, कमर झुकी हुई थी, आँखों और बातों में कुटिलता झलक रही थी। दोनों के मध्य संवाद आरंभ हुआ : 'मंथरा, पता करके मुझे बता कि राजकुमार भरत कब आ रहे हैं ?' कैकेई ने पूछा।
'राजमाता, राजकुमार भरत राजमहल में प्रवेश कर चुके हैं। कुछ ही क्षणों में वे आपके समक्ष होंगे।' मंथरा ने कहा।
'ये क्षण इतने लंबे क्यों लगते हैं मंथरा ?'
'प्रतीक्षा लंबी लगती ही है महारानी।'
'यह कब समाप्त होगी ?'
'होने वाली है, राजकुमार आते ही होंगे।' मंथरा ने कहा।
          उसी समय चतुर्भुज कक्का ने अपने हारमोनियम को सम्हाला, जरा तन कर बैठ गए। तबलावादक को कुछ इशारा किया। तबलावादक ने तबले पर टेल्कम पावडर छिड़का और सतर्क होकर चतुर्भुज की ओर देखने लगा। चतुर्भुज कक्का ने एक लंबी तान लगाई और राग बिलावल थाट पर मधुर स्वर में गाने लगे-
'तात बात मैं सकल सँवारी, भै मंथरा सहाय बिचारी.
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ, भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ.'
'सुनतु भरतु भए बिबस बिषादा, जनु सहमेउ करि केहरि नादा.
तात तात हा तात पुकारी, परे भूमितल ब्याकुल भारी.'

          गीत-संगीत थम गया। मंच पर भरत का पदार्पण हुआ। कैकेयी भरत से बोली- 'आओ पुत्र, तुम भले आए। बहुत देर लगा दी पुत्र ?'
'क्या बात है माता ? सम्पूर्ण नगर में, राज महल में इतनी शांति क्यों है ? सब लोग चुप क्यों हैं ?' भरत ने माता कैकेई के चरणस्पर्श करते हुए प्रश्न किया।
'हे पुत्र, मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा ने मेरी बहुत सहायता की लेकिन विधाता ने बीच में जरा सा काम बिगाड़ दिया। तुम्हारे पिता राजा दशरथ देवलोक पधार गए।' कैकेई ने कहा।
भरत यह सुनते ही विषाद के मारे विवश हो गए, मानो सिंह की गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे 'तात ! तात ! हा तात !' पुकारते हुए अत्यंत व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े.
          भरत की भूमिका में चंदू पंडित ने ऐसा गज़ब का अभिनय किया कि दर्शक सिसकने लगे, उनके आँसू बहने लगे। चतुर्भुज कक्का प्रसन्न हो गए लेकिन चंदू पंडित की नाक में कस कर लग गया था। वह बेचारा दर्द के मारे बेहाल हो रहा था और चाहकर भी अपनी नाक को सहला नहीं पा रहा था क्योंकि भरत को मूर्छित जो
रहना था।
          चन्द्रशेखर का अभिनय बढ़िया रहा। उसकी रामलीला में धाक जाम गई। कारण यह था कि रामलीला के अन्य कलाकार अपना पेट भरने के लिए काम करते थे, वे कलाकार नहीं थे जबकि चन्द्रशेखर को अभिनय करना आता था, उसके द्वारा बोले गए संवादों की अदायगी दर्शकों को प्रभावित करती थी और साथ-साथ वह अच्छा गायक भी था। चतुर्भुज कक्का ने उसे हनुमान का रोल दिया, फिर विभीषण का, वह हर रोल में बढ़िया काम करता था, परिणामस्वरूप रामलीला देखने वालों की भीड़ बढ्ने लगी और चढ़ावे की थाली में चिल्हर पैसे अधिक आने लगे। इधर चतुर्भुज कक्का ने चंदू को सम्मान देने के हिसाब से सबको भोजन परोसने के दायित्व से मुक्त कर दिया और दूसरा व्यक्ति थाली सजाकर उसे भोजन परोसने लगा। चन्द्रशेखर को दो बातें समझ में आ गई; एक, उसके पैर रामलीला में जम गए हैं और दो, उसे अब बंबई की फिल्मनगरी में पैर जमाना है। 



(२)



          उसके दोस्त उसे उकसाते थे- 'पंडित, निकल जा बंबई। तेरा जन्म रामलीला में काम करने के लिए नहीं हुआ है। तू गाड़ी में बैठ और बंबई में पहुँच, फिलिम वाले तेरा रास्ता देख रहे हैं। मीनाकुमारी तेरे साथ जोड़ी बनाने के लिए तरस रही है।' यह सुनकर चन्द्रशेखर को गुदगुदी तो होती लेकिन वह उसे जाहिर न करता और उदास होकर जवाब देता- 'मत चढ़ाओ यार चने के झाड़ पर, बंबई में मेरे जैसे हज़ार भटकते हैं, जो है सो है।'  

'अरे नहीं, कैसी बात करता है तू ? दिलीपकुमार को देख, पूना के रेस्टोरेन्ट में सेंडविच बनाता था, बंदर जैसा गोल-गोल चेहरा, आज इंडिया भर में चमक रहा है। उसको तो एक्टिंग भी नहीं आती थी। देविकारानी ने उसे ठोक-पीट कर सिखाया तब एक्टर बना। तू तो पैदायशी कलाकार है और गायक भी है।' चन्द्रशेखर के दोस्त दुक्की ने उसको समझाया।
'तुम्हारी बात ठीक है लेकिन मैं दिलीपकुमार नहीं हूँ।'
'दिलीपकुमार कौन सा दिलीपकुमार था ? यूसुफ़ खान था। तेरा टेलेंट कोई देखेगा तब तो जानेगा कि तू कौन है।'
'जाते साथ तो कोई फिलिम में काम नहीं देगा ? वहाँ खाऊँगा क्या ?'
'सब बन जाएगा, तू हिम्मत तो कर।' दुक्की ने हौसला बढ़ाया। 
          इस बीच रामलीला बिलासपुर से कोरबा चली गई। चन्द्रशेखर भी साथ गया। उसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और महत्वाकांक्षा भी लेकिन हिम्मत काम नहीं कर रही थी। 
वह लौटकर बिलासपुर आया, एक दिन ताव खा गया और जेब बीस रुपए रखकर सुबह की मेल गाड़ी से बंबई के लिए 'विदाउट टिकट' रवाना हो गया।    
          बिलासपुर से लगभग 170 किलोमीटर दूर दुर्ग और राजनांदगांव के बीच टिकट-चेकर डिब्बे में यात्रियों की टिकट जांच रहा था लेकिन चन्द्रशेखर का ध्यान उस पर नहीं गया। वह ट्रेन के बाहर दौड़ती धरती और पेड़ों को देख रहा था। वह घर से दूर, बहुत दूर एक ऐसे सपने की गोद में बैठने जा रहा था जहां प्रसिद्धि थी, धरती और धन था।
तब ही एक आवाज आयी- 'टिकट !'
'टिकट नहीं ले पाया।' वह घबराते हुए बोला।
'कहाँ से बैठे हो ?'
'रायपुर से।'
'कहाँ जाना है ?'
'थोड़ी दूर तक जाना है।'
'थोड़ी दूर मतलब?'
'जहाँ तक आप जाओगे, मैं भी चला चलूँगा.'
'मैं नागपुर तक जाऊँगा.'
'मैं भी वहीँ तक चलूँगा.'
'पेनल्टी सहित चौंसठ रुपए हुआ, निकालो।'
'काहे की पेनाल्टी?'
'बिना टिकट सफ़र कर रहा है और पूछता है, काहे की पेनाल्टी?'
'गरीब ब्राह्मण हूँ सरकार, कहाँ से पैसा लाऊंगा?'
'तो फिर पुलिस को बुलवाना पड़ेगा।'
'हम तो सुने थे कि रेल्वे ने ब्राह्मणों के लिए 'फ्री' किया हुआ है?'
'तुम सुने होगे, हमने नहीं सुना है। दिमाग मत खाओ, पैसे निकालो।'
'सरकार गरीबों के लिए आरक्षण कब लाएगी?'
'सरकार से पूछो, मैं क्या बताऊँ?'
'मेरे लिये तो आप सरकार हो, आप 'फ्री' में ले जा सकते हो मुझे।'
'नहीं, बिलकुल नहीं।'
'एक काम करो सरकार, मेरी जेब में सिर्फ पाँच रुपया है, लीजिए और छुट्टी करिए।'
'बेवकूफ समझता है क्या? अभी बोल रहा था, 'टिकट नहीं ले पाया' तो क्या पाँच रुपए में नागपुर जा रहा था?'
'पैसा कम था इसीलिए तो टिकट नहीं ले पाया सरकार, जो है, सो है।'
'पैसा निकालते हो या पुलिस को बुलाऊँ?'
'बुलवा लीजिए लेकिन आपको एक गरीब ब्राह्मण को प्रताड़ित करने का पाप आपको लगेगा।'
'ऐसे पाप हम रोज करते हैं, हमारी ड्यूटी है।'
'करते होंगे लेकिन मैं कोई ऐसा-वैसा ब्राह्मण नहीं, स्पेशल ब्राह्मण हूँ।'
'स्पेशल ब्राह्मण? यह मैं पहली बार सुन रहा हूँ।'
'आपका स्पेशल ब्राह्मण से कभी पाला नहीं पड़ा इसलिए आप नहीं जानते।'
'क्या स्पेशल है तुम में?'
'आओ, बगल में बैठो तो बताऊँ।' चन्द्रशेखर ने ज़रा खिसक कर जगह बनाई और टी॰टी॰ई॰ को अपने बगल में बिठाया, उसका हाथ अपने हाथ में लिया, ध्यान से रेखाओं को देखा और दिलीपकुमाराना अंदाज़ में बोला- 'आप आदमी ईमानदार हो, रिश्वत नहीं लेते।'
'हाँ, यह बात सच है।'
'घरवाली आपको ताने देती है, कहती है- 'ईमानदारी को चाटो और अपने गले में लाकेट बनाकर टांग लो।'
'हाँ, कहती तो है।'
'फिर लेते क्यों नहीं ? लो, पाँच रुपया रखो, जो है, सो है।' चन्द्रशेखर ने टी॰टी॰ई॰ की ऊपरी जेब में पाँच का हरा नोट ठूंस दिया। टी॰टी॰ई॰ सकुचाया और बोला- 'मेरा धर्म क्यों भ्रष्ट कर रहे हो ?'
'मैं आपका धर्म भ्रष्ट नहीं कर रहा हूँ, गृहस्थ धर्म समझा रहा हूँ सरकार।' चन्द्रशेखर ने समझाया। टी॰टी॰ई॰ कुछ समझा, कुछ नहीं समझा और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया।
          नागपुर के बाद दूसरा टी॰टी॰ई॰आया, वह पाँच रुपया ले गया। भुसावल के बाद तीसरा आया, पाँच रुपया वह भी ले गया, अब चन्द्रशेखर के पास मात्र पाँच रुपया बचा। इगतपुरी स्टेशन आया, चन्द्रशेखर ने वहाँ एक दोना प्याज की भजिया और एक चाय लेकर भूख मिटाई। इस प्रकार जेब में बचे हुए रुपए लेकर वह महानगरी बंबई की ओर बढ़ चला।
          6 जून 1969 को विक्टोरिया टर्मिनस में भीड़ के साथ वह भी ट्रेन से उतर गया। बहुत देर तक प्लेटफार्म में 'किसी को खोजने' की मुखमुद्रा में इधर से उधर घूमता रहा। जब सब यात्री निकल गए, गेट पर तैनात टिकट-चेकर भी चले गए तो चन्द्रशेखर भी अपना सीना ताने स्टेशन के परिसर से निकल गया। बाहर अपार जन-समुद्र फैला हुआ था।
          उसे अपने पुराने दोस्त बाबूलाल से मिलना था जो दानाबंदर में दूध की गाड़ी चलाता था। वह नहीं मिला क्योंकि वह अपने गाँव गया हुआ था। पांजरापोल स्ट्रीट में बाबूलाल का एक दोस्त बद्रीप्रसाद मिला जिसने सद्भावनापूर्वक भूख से व्याकुल चन्द्रशेखर को एक होटल में पूड़ी और आलू-कुम्हड़े की सब्जी खिलवाई।चन्द्रशेखर ने उससे पूछा- 'बाबूलाल न जाने कब वापस लौटेगा, मैं कहाँ रहूँगा ?'
'मेरे साथ रहना, हम दोनों रात को दूकान बंद हो जाने के बाद फुटपाथ पर आराम से सोएँगे।' 
'कुछ काम भी दिलवा दे, भाई।'
'ठीक है, कोशिश करता हूँ।' बद्रीप्रसाद ने कहा और मेरीन ड्राइव में फल की एक दूकान में उसे तीन रुपए रोजी पर लगवा दिया। तीन रुपए में भला क्या होता ? ठीक से पेट भी नहीं भरता था लेकिन वह और क्या करता?


(३)


          कुछ दिनों बाद उसका साथी बाबूलाल गाँव से वापस आ गया। वह बाबूलाल की झोपड़ी में रहने लग गया। कुछ और काम की तलाश करने के साथ-साथ चन्द्रशेखर बंबई के सभी फिल्म स्टुडियो के चक्कर लगाता, गेट में घुसने के प्रयास करता और हर जगह दरबान की डांट खाता, फिर भी हौसला बनाए रखता। कार में आते-जाते कलाकार दिख जाते तो भी उसके दिल को तसल्ली हो जाती। बार-बार हाज़री बजाने से दरबान भी उसे पहचान गए क्योंकि कोई रोज आकर सामने खड़ा हो जाए तो दरबान क्या दरवाजा भी चेहरा पहचान लेता है। धीरे से दरवाजे के उस पार जाने का मौका मिलने लगा किन्तु अंदर न तो उसे कोई देखता, न भाव देता। सब अपने-अपने काम में मशगूल। कोई क्या जाने कि बिलासपुर से एक नवयुवक फिल्मों में नायक बनने के लिए आया है ?
          ढूंढते-खोजते चन्द्रशेखर को एक ट्रांसपोर्टर के यहाँ ट्रक के क्लीनर का काम मिल गया। भूखा पेट इन्सान से जो न करवा ले, चन्द्रशेखर मधुबाला की बाहों के बदले ट्रक के हिचकोलों में झूलने लगा। 
          एक दिन की बात है, ट्रक में गंधक के ड्रम लोड थे, उन्हें बन्दरगाह ले जाकर जहाज में चढ़ाने के लिए उतारना था। बन्दरगाह के बाहर ट्रकों की कतार लगी थी, एक के बाद एक ट्रक आगे बढ़ते जाते तब पीछे वाली ट्रक को थोड़ा और आगे खिसकने का मौका मिलता। अचानक ट्रक ड्राइवर का पेट गुड़गुड़ाया, वह नीचे उतरा और जगह खोज कर उकड़ू बैठ गया। 
          इस बीच उसके आगे खड़ा ट्रक थोड़ा आगे बढ़ा तो पीछे वाले ट्रक के ड्राइवर ने हार्न बजाना शुरू कर दिया। ड्राइवर लौटा नहीं था और हार्न की आवाज़ ने चन्द्रशेखर की नाक में दम कर दिया। वह चिढ़कर अपनी ट्रक से उतरकर पीछे वाली ट्रक के ड्राइवर के पास गया और बोला- 'ड्राइवर के पेट में दर्द हुआ है, पीछे तरफ गया है, जैसे ही आएगा, ट्रक बढ़ाएगा, तुम हल्ला क्यों मचा रहे हो ?'
'क्यों तुम्हारा डरैवर घर में नहीं करता क्या ?'
'क्या पता, किया कि नहीं किया ?'
'उसको अभी जाना था?'
'अभी लगी, तब गया।'
'तू गाड़ी आगे बढ़ा दे।'
'मैं ट्रक चलाना नहीं जानता।'
'ओए, कैसा कलीनर है तू, ट्रक सटार्ट करना नहीं जानता?'
'स्टार्ट हो जाएगी लेकिन कभी चलाया नहीं।'
'तो क्या तू जिंदगी भर कलीनर बने रहेगा ?'
'क्या मतलब ? मैं यहाँ हीरो बनने आया हूँ।'
'अबे, हीरो बाद में बनना, पहले डरैवर बन जा। गाड़ी में चाभी है कि नहीं ?'
'चाभी तो लटक रही है।'
'जा के चाभी को घुमा, अकसीलटर दबाना, गाड़ी आगे बढ़ जाएगी फिर बरेक लगा देना। की तेरे से इतना नहीं होगा, खोते ?' सरदारजी भड़के। चन्द्रशेखर ने तुरंत निर्णय लिया और ड्राइवर सीट पर जा बैठा, इग्निशन की चाभी घुमा दी। ट्रक का इंजन चालू हुआ, गाड़ी झटके से आगे बढ़ी और बढ़ गई। चन्द्रशेखर खुश हो गया। थोड़ा आगे बढ़ाकर उसे ट्रक रोकना था लेकिन ट्रक रुकी नहीं, सामने खड़ी ट्रक से जा भिड़ी। बहुत ज़ोर की आवाज़ हुई। टक्कर के कारण ट्रक के पीछे लदे गंधक के ड्रम उछलकर सड़क में लुढ़कने लगे। चन्द्रशेखर की जान सूख गई। वह तेजी से दरवाजा खोलकर बाहर उतरा और वहाँ से सरपट भागा, फिर उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 
          डेरे में पहुँचकर चन्द्रशेखर ने अपने मित्र बाबूलाल को ट्रक वाला किस्सा बताया तो उसने अपना माथा पीट लिया। वह सोच में पड़ गया कि इस 'महान' व्यक्ति को किस काम से लगाया जाए। उसने चन्द्रशेखर से पूछा- 'मेरे एक पहचान वाले को रसोईया की ज़रूरत है, करेगा क्या ?'
'यार, मैंने कभी खाना नहीं बनाया।'
'बात बनाना आता है न ? खाना बनाना भी आ जाएगा।'
'ठीक है, वहाँ लगवा दे।' चन्द्रशेखर बोला। चन्द्रशेखर को काम मिल गया। उसने मालकिन को समझाया कि वह गाँव से आया है इसलिए शहरी किस्म का खाना बनाना नहीं आता लेकिन सीख लेगा। मालकिन उसे पाक-विधियां बताती जिसे चन्द्रशेखर देखते-देखते सीख गया। वहाँ उसे तनख्वाह मिलती थी और 'फ्री' का भोजन, नास्ता और चाय भी। कभी-कभी मौका ताड़कर वह दूध की मलाई चट कर जाता और पूछताछ होने पर 'मुझे क्या मालूम ?' की मुखमुद्रा बना लेता।
          उस घर में एक दिन सत्यनारायण की कथा का आयोजन हुआ। एक पुरोहित आए, उन्होंने पूजा करवाई। पूजा के अन्त में उन्होंने एक मंत्र पढ़ा जिसे सुनकर चन्द्रशेखर उखड़ गया और बोला- 'मन्त्र गलत पढ़ रहे हो पंडित, कैसी पूजा करवा रहे हो ?'
'मन्त्र गलत है ? कैसे कह रहे हो तुम ? तुम जानते हो कि सही क्या है ?' पुरोहित रुष्ट हो गया। चन्द्रशेखर ने शुद्ध मन्त्र को सस्वर सुना दिया। पुरोहित शर्मिंदा हो गया और चुपचाप दक्षिणा लेकर निकल लिया।चन्द्रशेखर के मालिक-मालकिन बहुत प्रभावित हुए और पूछा- 'तुमको यह सब कैसे मालूम ?'
'मेरे पिता पुरोहित हैं। मैं बचपन से इसी वातावरण में पला हूँ।'
'पूजा-पाठ करवाना जानते हो ?'
'हाँ, जन्म से लेकर मरण तक के समस्त संस्कार करवा सकता हूँ।' 
'तो फिर बाहर से पुरोहित बुलवाने की क्या ज़रूरत है, इन्हीं से करवा लिया करो।' मालिक ने मालकिन से कहा। उस दिन के बाद चन्द्रशेखर के साथ बातचीत करने के उनके तरीके में बहुत बदलाव आ गया। उसका घर में सम्मान होने लगा। भोजन चन्द्रशेखर ही बनाता था लेकिन अब वह परोसता नहीं था, मालकिन उसे परोसती थी। वे दोनों खुश और चन्द्रशेखर भी। 
          एक दिन की बात है, मालिक और चन्द्रशेखर एक साथ भोजन करने बैठे। चन्द्रशेखर ने देखा कि भिन्डी की बासी सब्जी उसकी थाली में परोसी गई लेकिन मालिक को नहीं परोसी गई। उसे बहुत खराब लगा, उसने उस सब्जी का आधा हिस्सा मालिक की थाली में रख दिया। मालकिन का दिमाग सरक गया। उसने पूछा- 'पंडित, तुमने ऐसा क्यों किया ?'
'इनके भले के लिए किया।'
'क्या भला ?'
'मैं अगर ऐसा नहीं करता तो मालिक अगले जन्म में सुअर बनते।'
'क्या बकवास कर रहे हो ?'
'सही कह रहा हूँ।' चन्द्रशेखर ने कहा और गरुण पुराण का एक मन्त्र बताया और स्वयं के बचाव का यत्न किया लेकिन मालकिन अपने पति के सुअर बनने वाली बात से बहुत आहत हो गई और उसी दिन चन्द्रशेखर को घर के काम से मुक्त कर दिया। चन्द्रशेखर फिर सड़क पर आ गया।       
          चन्द्रशेखर के लिए फिल्मों में काम मिलना जितना मुश्किल था, उससे अधिक मुश्किल वहाँ टिक कर जीना था। उसने कई नौकरियाँ की लेकिन नौकरी करने के लिए जैसी मानसिकता की ज़रूरत होती है, वह उसके पास नहीं थी। अक्खड़ स्वभाव वाला इन्सान नौकरी के लायक नहीं होता, व्यापार के लायक भी नहीं होता, सच पूछिए तो किसी लायक नहीं होता। बातचीत की विनम्रता के साथ स्वभाव में सरलता का मनुष्य की सफलता में बहुत सहयोग होता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अक्खड़ व्यक्ति हमेशा असफल होता है, ऐसे व्यक्ति को सफलता के लिए स्वयं में अतिरिक्त गुण विकसित करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए बिलासपुर के पंडित सत्यदेव दुबे अक्खड़ स्वभाव वाले थे। फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने उनके बारे में लिखा है- 'पंडित सत्यदेव दुबे हिन्दी नाटकों के द्रोणाचार्य थे और दुर्वासा भी।' वे किसी हद तक सनकी, बेहद क्रोधी थे लेकिन प्रबल ज्ञानी थे। अपने ज्ञान, नवोन्मेषी कल्पना और लगन को सीढ़ी बनाकर वे नाट्यजगत के शिखर तक पहुंचे और हिन्दी-मराठी सिनेमा में स्वयं को स्थापित किया। 
           चन्द्रशेखर केवल भाग्य के भरोसे फिल्मों में काम करने पहुँच गया। भाग्य चमकता भी है लेकिन उसके लिए धैर्य रखना होता है। नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार ने फिल्म 'अमन' (1967) में 'एक्स्ट्रा' कलाकार की हैसियत से शवयात्रा की भीड़ में खड़े एक नवयुवक का रोल किया था। चन्द्रशेखर की लगातार दौड़धूप के परिणामस्वरूप उसे एक फिल्म में काम मिल गया। फिल्म निर्देशक धीरुभाई देसाई ने निर्माणाधीन फिल्म 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा' (1970) में एक अच्छा रोल देने का वादा किया लेकिन फिल्म की शूटिंग शुरू होने में तीन-चार माह की देर थी।  



(४)


          बंबई में खाली पेट में भोजन भरना बहुत बड़ी समस्या होती है। चन्द्रशेखर को समझ में आ गया कि वह नौकरी नहीं कर पाएगा। उसे पुरोहिती आती थी, वह सम्मान वाला काम था। उसने बंबई के मंदिर में अपना डेरा जमाया और वहाँ के महंत को पंडिताई का काम हासिल करने का माध्यम बनाया। पूजा कराने के लिए उसे एक फिल्म निर्माता के घर जाने का अवसर मिला, वे थे पन्नालाल माहेश्वरी जिन्होंने 'काजल' (1965) और 'नीलकमल' (1968) बनाई थी।
          चन्द्रशेखर उस सुबह भालिभांति दाढ़ी बनाकर, सज-धज कर पन्नालाल माहेश्वरी के घर पूजा कराने के लिए निकल पड़ा। उसके कदमों में उत्साह था, मन में बसी महत्वाकांक्षा पूरी होने का एक सूत्र पकड़ में आने वाला था। उसने कालबेल दबाई, गृहणी उसे अंदर ले गई। पूजन आरंभ हुआ और सम्पन्न हो गया। गृहणी ने दक्षिणा दी और आदर सहित प्रणाम किया। चन्द्रशेखर ने आशीष दिया- 'सौभाग्यवती भव।' 
अपनी पोथी और आसनी समेटकर झोले में रखने के बाद चन्द्रशेखर ने कहा- 'माते, आपसे एक निवेदन है।'
'जी, कहिए पंडितजी।' गृहणी ने कहा। 
'मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से यहाँ आया हूँ। फिल्मों में काम करने की कामना से यहाँ आया और पुरोहिती कर रहा हूँ। जो है सो है, आप मेरी सिफ़ारिश कर देंगी तो माहेश्वरी जी मुझे अपनी फिल्म में कोई न कोई रोल दे देंगे।'
'आप माहेश्वरी जी से बात करिए।'
'मैंने उन्हें कभी देखा नहीं, वे मुझे जानते नहीं, माते।'
'देखिये पंडित जी, वे मेरे घर के काम में दखल नहीं देते, मैं उनके काम में दखल नहीं देती।'
'मैं दखल देने के के लिए नहीं कह रहा हूँ, सिफ़ारिश करने के लिए कह रहा हूँ।'
'वे इसे दखल मानते हैं। बहुत गुस्सैल हैं, मेरी हिम्मत नहीं है उनसे कुछ बोलने की।'
'किसी दिन अच्छे-भले मूड में हों तो कह दीजिएगा, मैं आपका पुत्रवत हूँ माते।'
'फिल्म बनाने वाले का मूड कभी अच्छा नहीं होता, वे हर समय तनाव में रहते हैं। मैं झूठी बात करने वाली औरत नहीं हूँ। मुझे क्षमा करें पंडित जी।' गृहणी ने इतना कहकर वार्ता समाप्त की और हाथ जोड़ते हुए चन्द्रशेखर को विदा कर दिया।  
          चन्द्रशेखर जब से बंबई आया था, यही देखते-सुनते आ रहा था, उसे ऐसे वार्तालापों का अभ्यास हो चुका था। अब वह उस खबर का इंतज़ार कर रहा था जब 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा' की शूटिंग और उसकी अभिनय यात्रा आरंभ होगी।   
          अंततः चन्द्रशेखर को फिल्म 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा' में 'ब्रेक' मिलना तय हुआ। जब भी उसे समय मिलता, स्टुडियो जाता और फिल्म के बारे में पूछताछ कर लेता। अंततः फिल्म बनना शुरू हुई। मुख्य कलाकार थे- महिपाल, जयमाला और जीवन। एक दिन फिल्म के निर्देशक ने चन्द्रशेखर को अगली सुबह 9 बजे स्टुडियो पहुँचने के लिए कहा।चन्द्रशेखर ने पूछा- 'मुझे क्या रोल दे रहे हैं ?'
'सुबह बता देंगे।'
'संवाद क्या बोलना है ?'
'सुबह बता देंगे।' उत्तर मिला। 
          चन्द्रशेखर के कुछ साथियों ने साथ चलकर शूटिंग देखने की इच्छा जाहिर की तो वे भी साथ चल पड़े। चन्द्रशेखर की खुशी का ठिकाना न था। बिलासपुर से इतनी दूर वह आया, कुछ बनने, जिसकी शुरुआत आज होने वाली थी। वह खिन्न था कि उसे एक धार्मिक फिल्म में काम करना पड़ रहा था लेकिन उसे यह भी मालूम था कि भारत भूषण, निरूपाराय, जीवन जैसे अनेक कलाकार धार्मिक फिल्मों में काम करते-करते ऐतिहासिक और सामाजिक फिल्मों में अवसर पाने लगे और लोकप्रिय हो गए। नहीं मामा से काना मामा अच्छा।
          दोपहर दो बजे तक वह इधर से उधर भटकता रहा। कोई कुछ बता नहीं रहा था। किसी से कुछ पूछे तो कहते- 'बताते है।' अचानक निर्देशक ने उसे बुलाया, जब तक चन्द्रशेखर उनके पास पहुंचता, मेक-अप-मेन आ गया। 
निर्देशक 'चेयर' पर बैठा था, उसने मेक-अप-मेन से कहा- 'इसका बंदर का मेक-अप कर दो।' 
          चन्द्रशेखर का खून खौलने लगा। वह चीखा- 'तेरी मैया की....' और उसने एक ज़ोर का झापड़ निर्देशक के गाल पर लगाया। वह चेयर सहित जमीन पर लोटने लगा। हाहाकार मच गया। सब चन्द्रशेखर की ओर दौड़े, चन्द्रशेखर अपने रौद्ररूप में था, चीखा- 'खबरदार किसी ने मुझे हाथ लगाया। आज यहाँ खून की नदी बह जाएगी।' लोग ठिठक गए क्योंकि चन्द्रशेखर को उसके हट्टे-कट्टे-मुस्टंडे साथियों ने सुरक्षा के लिए घेर रखा था। हर तरफ आवाज उठने लगी- 'वाचमेन....गुरखा, दौड़ो ...इधर आओ...निकालो... इन बदमाशों को।' उधर चन्द्रशेखर चिल्ला रहा था- 'धार्मिक फिल्म बना रहा है, अपने आपको कमीना वी॰शांताराम समझता है। मुझे छः महीने से घुमा रहा है, कहता था, अच्छा रोल दूँगा और मेरा बंदर का मेक-अप करवा रहा है। अरे तू बंदर, तेरा बाप बंदर, तेरा मामा बंदर। आज तू इस दुखी ब्राह्मण का शाप सुन ले, जब तू मरेगा तो तेरी लाश अंतिम संस्कार के लिए तरस जाएगी और तेरी लाश पर बंदर नाचेंगे। सुन ले रे, जो मैं कह रहा हूँ, उसे सुन ले।'
          चन्द्रशेखर के साथी उसे स्टुडियो से सुरक्षित बाहर निकाल ले गए। इस घटना के चर्चे बंबई के सभी स्टुडियो में पहुँच गए, सभी दरवाजों में चन्द्रशेखर का प्रवेश निषिद्ध हो गया। अभिनय-संसार की एक प्रबल संभावना का असमय-पूर्व गर्भपात हो गया।


(५)

          चन्द्रशेखर अब पंडित चन्द्रशेखर शास्त्री जी महाराज हो गए हैं। अभिनय-संसार के व्यामोह से मुक्त होकर अब वे रामायण-भागवत की कथा, पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड करवाते हैं। प्रतिदिन सुबह के अखबार में शोक-संदेश का 'कालम' देखते हैं और 'उपयोगी' मृतक के घर शोक व्यक्त करते हुए अपनी पुरोहिती की 'ऑन डोर' मार्केटिंग करते हैं। शवयात्रा के बरास्ते गरुण पुराण होते हुए शांतिपूजन तक तेरह दिनों तक मृतक के परिवार को आर्थिक रूप से पस्त करने में व्यस्त रहते है। 

          अधिकतर बिलासपुर में रहते हैं, कभी-कभार अपने यजमानों के आमंत्रण पर मुंबई भी जाते हैं।आपको पंडित चन्द्रशेखर शास्त्रीजी महाराज से कोई कार्य हो तो लेखक के पास उनका मोबाइल नंबर है, नंबर बताने की मेरी फीस है- एक सौ एक रुपए। 


==========


Comments

  1. बेहद आनंदमयी और रसपूर्ण...

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

याद किया दिल ने

 याद किया दिल ने  ============= दिल की बात  किशोरावस्था में हम  'धर्मयुग' पढ़ते थे. सबसे पहले आबिद सुरती का कार्टून कोना 'ढब्बू जी', उसके बाद पूरा 'धर्मयुग'. उसी धर्मयुग में मैंने कभी कवियित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से चोरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उ...

किस्सा चमनलाल चड्ढा का : पाकिस्तान से आया हिन्दुस्तानी

किस्सा चमनलाल चड्ढा का : पाकिस्तान से आया हिन्दुस्तानी  (१)           नदियों के किनारे बस्तियाँ बसती हैं, बस्तियों में लोग बसते हैं और लोगों में मनुष्यता बसती है। नदी का जल हमें जीवन देता है और निरंतर प्रवाहवान बने रहने का सबक भी। बिलासपुर के बीच में बहती अरपा नदी के कुछ इस पार लोग बसे, कुछ उस पार। जीवनदायिनी है अरपा। बिलासपुर में अधिकतर लोग आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसे, कुछ दूरदराज़ से आए। गाँवों में जो जमीन से जुड़े थे वे जमीन से ही जुड़े रह गए लेकिन जो धनपति बन गए वे बिलासपुर आकर बस गए क्योंकि यहाँ व्यापार था, स्कूल-कालेज थे, सिनेमा घर थे, अस्पताल थे और ऐश्वर्य भी। गाँव का मजदूर गाँव में और गाँव का गौंटिया शहर में।           उन दिनों साल में एक फसल  हुआ करती थी,  धान की ।  चार महीने का काम था और आठ महीने का लंबा विश्राम। बड़े-बूढ़े तो आपस में बतियाकर समय काट लेते थे, युवकों के पास कोई काम न था। महिलाएं रसोई में भात-साग पका रही थी और लड़कियां अपने-आप पक रही थी, तेरह-चौदह की हुई, उनका ब्याह किया, वे भी कि...

दिल की बात

दिल की बात  किशोरावस्था में हम  'धर्मयुग' पढ़ते थे. सबसे पहले आबिद सुरती का कार्टून कोना 'ढब्बू जी', उसके बाद पूरा 'धर्मयुग'. उसी धर्मयुग में मैंने कभी कवियित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से चोरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उनसे कोई डर नहीं है लेकिन जो अ...