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किस्सा जगदीशनारायण का : कितना बदल गया इंसान



किस्सा जगदीशनारायण का : कितना बदल गया इंसान 

(१)

          जगदीशनारायण के पिता कृषक थे। विंध्यप्रदेश (अब मध्यप्रदेश) में नागौद के पास रौढ़ नामक गाँव में उनकी खेती थी। वे गेहूं से भरे बोरे को अपने कन्धों में लादकर सोलह मील दूर सतना की मंडी तक बेचने के लिए जाते थे। कृषक जीवन की असुविधाओं से त्रस्त होकर उनके पितामह में से किसी ने व्यापार अपना लिया होगा और उसके बाद परिवार में व्यापार की परंपरा चल निकली। जगदीशनारायण के पिता गल्लेलाल नागौद छोड़कर छत्तीसगढ़ के एक गाँव अकलतरा में आकर बस गए।
          जगदीशनारायण का जन्म अकलतरा में हुआ था। युवावस्था में ही प्लेग के प्रकोप से बचने के लिए अपना परिवार लेकर अकलतरा छोड़ना पड़ा और जगदीशनारायण अपना परिवार लेकर बिलासपुर-कटनी मार्ग में स्थित एक गाँव जैथारी आ गए। उनके तीन लड़के थे- राम प्रसाद, दरबारी लाल और तीसरे का नाम मालूम नहीं है। उनकी पत्नी पुनिया किसी असाध्य रोग का शिकार हो गईं जिसका इलाज उन दिनों मुमकिन न था। लोग जड़ी-बूटी या घरेलू दवाओं से उपचार करते थे, शेष भगवान भरोसे था। पुनिया की तबियत न संभली और अपने तीन छोटे बच्चों को छोड़कर इस संसार से विदा हो गई। पुनिया के पार्थिव शरीर के साथ जगदीश नारायण का वैवाहिक जीवन भी भस्मीभूत हो गया। उनका सबसे छोटा बच्चा उस समय मात्र तीन माह का था। पत्नी के इस तरह जाने के बाद तीनों बच्चों का भार जगदीशनारायण पर आ गया। अब वे ही बच्चों के बाप थे और माँ भी। इस बीच, बिन माँ का दुधमुंहा बच्चा भी एक दिन चल बसा। कहते हैं- 'मुसीबत जब आती है तो सब तरफ से आती है' यह लोकोक्ति कितनी सटीक है- इसे बाद में होने वाली घटनाएँ सिद्ध करेंगी।
            हुआ ये, कि पुनिया के पास कुछ नकद पूँजी थी जिसे वे गाँव के जरूरतमंद लोगों को उनके गहने अपने पास रख कर उधार दिया करती थी। इसी ब्याज की कमाई से उनका काम चलता था क्योंकि जगदीशनारायण की मिठाई दूकान से कुछ खास आमदनी न थी। जगदीशनारायण को ताश खेलने का बहुत शौक था जिसके कारण पुनिया परेशान रहती थी। एक रात, पुनिया जुए के फड़ में खुद पहुँच गयी और जगदीशनारायण को पकड़ कर घर ले आयी और खूब फटकार लगाई।
          मैं आपको यह बता रहा था कि पुनिया ने लोगों के गहने घर में एक संदूक में सँभाल कर रखे थे पर उसकी मृत्यु के बाद जब लोग उधार वापस करके अपने गहने छुड़ाने आये तो संदूक से किसी का कोई गहना न मिला, सब गायब। कुछ पता न चला, जगदीशनारायण अवाक् रह गए। 'दुबले को दो अषाढ़'; पत्नी गयी तो साथ छूट गया, घर में धन सम्पदा तो थी नहीं, ऊपर से दूसरों के गहने भी लापता हो गए। लोगों का तगादा शुरू हो गया, गहनों की कीमत बहुत अधिक थी, कैसे देते ? जगदीशनारायण ने अपनी दूकान और घर बेच कर हिसाब चुकता किया, सबको हाथ जोड़े और डबडबाई आँखों से जैथारी को छोड़ती ट्रेन में बैठ गए। पूरी रात ट्रेन में सफर करने के बाद जब सुबह हुई तो वे मनेन्द्रगढ़ रेल्वे स्टेशन में अपना सामान उतारते अपनी एक और संघर्ष यात्रा के लिए खुद को तैयार कर रहे थे। न जाने विधाता ने उनके भाग्य में क्या लिख रखा था ?

(२)

          मैं आपसे जिस जैथारी नामक गाँव का जिक्र कर रहा था- वहां जगदीशनारायण के पड़ोस में एक और परिवार रहता था- लप्पूलाल का। पड़ोस के नाते आपस में बहुत प्रेम था और एक दूसरे के घर आना जाना था। उनका एक बेटा और तीन बेटियां थी। उनकी सबसे छोटी बेटी सुंदरिया, पुनिया के कामकाज में हाथ बटाने के लिए अक्सर घर आया करती थी। लप्पूलाल आर्थिक रूप से विपन्न थे, किसी प्रकार गुजारा चलता था। उनकी वैद्यकीय प्रतिभा की ख्याति आसपास कई गाँव तक फैली थी। सांप और बिच्छू का जहर उतारने में उनको महारत हासिल थी। रात-बिरात कोई दुखियारा घर आया और अनुनय विनय की- 'दद्दा, बच्चे को सांप ने काट लिया है, चलो उसके प्राण बचा लो' तो लप्पूलाल चले उपचार करने, न रात की चिंता न बरसात की। आवागमन के साधन भी उन दिनों कुछ भी न थे, दो पैरों का सहारा था। दस पांच मील भी चलना पड़े तो भी कोई बात नहीं, अपना कर्तव्य समझ कर निकल पड़ते। सुन्दरिया की माँ चिल्लाती रहती- ‘इतनी रात है, क्यों अपनी जान जोखिम में डालते हो ?' पर वे अनसुनी कर देते, उन्हें अपनी तकलीफ से ज्यादा दूसरों की फिक्र रहती। रुपये पैसे की भी कोई इच्छा नहीं। कैसा युग था जब इंसान की कीमत थी और इंसानियत की भी, और अब ? अब, पैसा ही सब कुछ है। कितना बदल गया इंसान ?
          उन्हीं दिनों लप्पूलाल के घर में भी एक हृदयविदारक घटना हो गई। उनके युवा पुत्र बेटालाल की पत्नी हैजे के प्रकोप में चल बसी। गाँव में अंतिम संस्कार की खबर भेजी गयी पर कोई न आया। लोग शव के आसपास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए क्योंकि रोग संक्रमण का डर था। मजबूर ससुर लप्पूलाल और विकल पति बेटालाल दोनों ने मिलकर अर्थी बनाई और श्मशान की ओर ले चले। दो कंधे ही चार बन गए। रोते-बिलखते पिता-पुत्र किसी प्रकार शवदाह करके जब घर लौट रहे थे तो गाँव छोड़ने का मन बना चुके थे। कर्मकांड निपटा कर अपने बच्चों को लेकर एक रात वे सब भी जैथारी के स्टेशन में खडी ट्रेन में बैठ गए और मनेन्द्रगढ़ के लिए रवाना हो गए।
          जगदीशनारायण और लप्पूलाल, दोनों परिवारों में एक जैसा संकट आया, दोनों ने गाँव छोड़ा और संयोगवश मनेन्द्रगढ़ में ही आकर बस गए। किसी के दुःख को वही समझ पाता है जो वैसी ही परिस्थिति से स्वयं गुजरा हो। दोनों परिवार फटेहाल और लुटे-पिटे अपने अस्तित्व को सहेजने में एक दूसरे का साथ देने के लिए जैसे स्वाभाविक रूप से अन्योन्याश्रित बन गए। भला भविष्य को कौन बूझ पाया है ?

(३)

          जगदीशनारायण ने मनेन्द्रगढ़ में फिर से मिठाई की दूकान खोल ली। मध्यप्रांत में सरगुजा की कोरिया इस्टेट में स्थित इस गाँव की आबादी अधिक न थी। इस्टेट में राजा का शासन था। तब तक पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजों का साम्राज्य स्थापित हो चुका था। कोरिया जैसी सैकडों इस्टेट अपने राज्य से लगान एवं अन्य राजस्व की वसूली करके अपना खजाना बढ़ाते थे, ऐश-ओ-आराम से रहते थे और अपनी आय का कुछ हिस्सा अंग्रेज शासकों को प्रसन्न करने के लिए चढ़ावे में दे आया करते थे। कोरिया में जंगलों और खदानों की भरमार थी लेकिन सब ओर गरीबी ही गरीबी थी। मनेन्द्रगढ़ आसपास के गाँवों के लिए आपूर्ति स्थल था, ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए पैदल या बैलगाड़ी से आते, वस्तुविनिमय (सामान के बदले सामान) या नकद के माध्यम से अनाज, कपड़े और श्रृंगार की वस्तुएं खरीदते। दूर से आते इसलिए भूख लगती तो किसी हलवाई की दूकान में मीठी रसीली जलेबी, बेसन के लड्डू जैसी वस्तुएं खाकर शौक पूरा करते या पूड़ी-सब्जी खाकर पेट भर लेते।
          जगदीशनारायण की दूकान खरामा-खरामा चलती रही, किसी प्रकार गुजारा चलता था। घर में बिना माँ के दो बच्चे थे जिनकी देखरेख भगवान भरोसे थी। दूकान में पूड़ी-सब्जी खा लेते या बच्चे कभी जिद करते तो बाबा चांवल-दाल बनाते और सब मिल बैठकर खाते। इतनी तकलीफों के बावजूद भी वे दूसरे विवाह के लिए तैयार न होते थे। रिश्तेदार और परिचित बहुतेरे समझाते- 'अभी क्या उम्र है तुम्हारी जगदीशनारायण ? पूरी जिंदगी पड़ी है, छोटे-छोटे बच्चे बिना माँ के इधर-उधर भटकते हैं, ब्याह कर लो, बच्चों को माँ मिल जायेगी, तुम्हारा साथ बन जायेगा। कम से कम घर में रोज चूल्हा तो जलेगा।'
जगदीशनारायण टस से मस न होते, कहते- 'सौतेली माँ आएगी तो बच्चों के साथ अन्याय हो सकता है, ऐसा न होने दूंगा।'
          जगदीशनारायण और उनके पड़ोसी लप्पूलाल के जो सम्बन्ध जैथारी में स्थापित हुए थे, वे मनेन्द्रगढ़ में भी कायम रहे। जगदीशनारायण के यहाँ जब कभी मेहमान आते या तीज-त्यौहार होता तब लप्पूलाल की छोटी बेटी सुन्दरिया घर आ जाती और सारा काम संभाल लेती। गरीब परिवार में पली-बढ़ी इस तेरह वर्षीया लड़की में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने, उसका अनुकूलन करने की अद्भुत क्षमता थी। परंपरागत हस्तशिल्प में निपुण, भोजन बनाने में पारंगत और खिलाने-पिलाने में सदैव उत्साहित रहने वाली सुंदरिया को शादी-ब्याह में गाये जाने वाले पचासों गीत याद थे। बेसुरी थी लेकिन खूब गाती थी। सुन्दरिया से घर में बहुत मदद थी इसलिए वह जगदीशनारायण के परिवार की एक सदस्य की तरह बन गयी। जगदीशनारायण के किसी शुभचिंतक ने सुझाया- 'लप्पूलाल की बिटिया से ब्याह कर लो, उसका स्वभाव अच्छा है, कामकाज में तेज है' तो वे एकबारगी चुप रह गए। मौन को स्वीकृति समझ शुभचिंतक ने सुंदरिया के पिता लप्पूलाल से बात की लेकिन लप्पूलाल ने साफ इन्कार कर दिया और कहा- 'दुजहा (जिसका दूसरा विवाह हो रहा हो) को नहीं ब्याहूँगा अपनी बिटिया, हाँ, उनके बड़े लड़के रामप्रसाद को अपनी लड़की ब्याहने के लिए तैयार हूँ।'
          यह बात जब जगदीशनारायण तक पहुंची तो वे खुशी-खुशी तैयार हो गए। सुंदरिया का विवाह रामप्रसाद से हो गया जो उस समय पंद्रह वर्ष के थे।
          है न मजेदार वाक्या ! कन्या के विवाह की बात पिता के लिए प्रस्तावित की गयी और विवाह बेटे से तय हो गया, आपने ऐसा कभी सुना ?

(४)

          मनेन्द्रगढ़ (सरगुजा) के आसपास का क्षेत्र जंगलों से परिपूर्ण था। वहां एक वृक्ष 'खैर' की छाल को प्रोसेस करके कत्था बनाया जाता था, जिसका उपयोग पान बनाने में होता है। पान खाना सम्पूर्ण उत्तर भारत में अत्यंत लोकप्रिय रहा है। पान के लालित्यपूर्ण स्वाद के लिए कत्था एक अनिवार्य सामग्री होती है- इसी से होठों में लाली आती है। कत्था का उत्पादन भारत के कुछ विशिष्ट जंगलों में ही होता है। कोरिया के जंगलों में भी इसके वृक्ष प्रचुर मात्रा में पाए जाते थे। कोरिया इस्टेट के राजा निर्धारित राज्य शुल्क लेकर खैर की छाल निकालने का लायसेंस दिया करते थे। जगदीश नारायण के बड़े लड़के रामप्रसाद को उस वर्ष का ठेका मिल गया।
          मनेन्द्रगढ़ के ही एक प्रतिष्ठित सेठ को जब उस अनुमतिपत्र के बारे में भनक लगी तो संभावित लाभ को भाँपते हुए साझेदारी के लिए उन्होंने प्रस्ताव दिया, पूँजी लगाने का वायदा किया और बराबर के हिस्सेदार बन गए। रामप्रसाद ने अपना पूरा ध्यान इस काम में लगा दिया। सन 1935-36 में किये गए इस कार्य में भरपूर उत्पादन हुआ इसलिए अच्छे मुनाफे का अनुमान था। ठेके की अवधि पूरी होने पर सेठ जी ने हिसाब-किताब तैयार किया और घाटे का हिसाब रामप्रसाद के हाथ में थमा दिया जबकि रामप्रसाद लगभग एक लाख रुपये लाभ होने का अनुमान लगाए बैठे थे पर चूंकि हिसाब केवल सेठ के पास था इसलिए जो सेठ ने कहा, वो ठीक! पूरी मेहनत मटियामेट होने से उत्तेजित रामप्रसाद ने जब अपने पिता को प्रकरण बताया तो वे 'जैसी ईश्वर की इच्छा' कह कर चुप हो गए। जगदीशनारायण बेहद सहनशील व्यक्ति थे, व्यथा में चुप रहने की आदत ने उनका फिर साथ दिया।
          जगदीशनारायण की आर्थिक स्थिति और बिगड़ती गयी। यहाँ तक कि एक दिन जेब में बिलकुल पैसे न थे। पड़ोस की एक दुकान से उन्होंने एक कट्टा बीड़ी मंगवाई तो दुकानदार ने उधार देने से मना कर दिया। अपमान कहीं भीतर तक चुभ गया। उन्होंने दोनों बेटों को घर तथा दूकान का सामान समेटने के लिए कहा। बच्चों ने पूछा- 'दादू कहाँ जाओगे?'
'जहाँ प्रभु की इच्छा, अब इस गाँव में भी हमारा दाना-पानी नहीं रहा।' जगदीशनारायण बोले।
          वे सब अपना सामान लेकर स्टेशन आ गए ताकि बिलासपुर होते हुए कलकत्ता जा सकें। मिठाई बनाने का जरूरी सामान और अपनी गृहस्थी बांध कर वे सब सपरिवार स्टेशन के प्लेटफार्म में बैठे थे तब ही कोरिया इस्टेट के दीवान जगदीशनारायण को खोजते वहां पहुँच गए। राज्य के इतने बड़े अधिकारी को इस तरह सामने आया देख सब हड़बड़ा कर खड़े हो गए। जगदीशनारायण ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया- 'दीवान जी, आपने कैसे तकलीफ की ?'
'राजासाहेब को तुम्हारे साथ हुई नाइंसाफी का पता चल गया है। उन्हें आज ही खबर लगी कि तुम लोग मनेन्द्रगढ़ छोड़ कर जा रहे हो इसलिए उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है और कहा है कि गाँव छोड़कर जाने की जरुरत नहीं। अगले साल का ठेका फिर तुम्हें ही मिलेगा लेकिन अब किसी से साझेदारी न करना।'
          दीवान जी की बातें सुन कर जगदीशनारायण की आँखें सजल हो आयीं और उन्होंने भरे गले से कहा- 'मेहरबानी आपकी। राजासाहेब हुजूर को हमारा प्रणाम कहियेगा, हम पर उनकी बहुत कृपा रही है लेकिन माफ करिए, मैंने गाँव छोड़ दिया। मैं स्टेशन आ गया, अब वापस न जाऊंगा।'
दीवान ने आश्चर्य से उन लोगों को देखा और भारी कदमों से वापस चले गए। कुछ देर बाद ट्रेन आयी और जगदीशनारायण का भविष्य उसमें सवार हो गया। वाष्प इंजन का धुआँ रेल के डिब्बे में घुस रहा था, कोयले के बारीक कण बार-बार आँखों में प्रवेश कर रहे थे और जगदीशनारायण अपनी आखों को मलते हुए सोच रहे थे- 'जो किया, क्या सही किया ?'
          ट्रेन के बाहर घुप्प अँधेरा था, न कुछ दिखाई देता था, न कुछ समझ आता था। जगदीशनारायण की जिंदगी की तरह ट्रेन भी हवाओं का सीना चीरते हुए आगे बढती चली जा रही थी।

(५)

          12 मई 1937 की अल-सुबह ट्रेन बिलासपुर आकर रुकी। कलकत्ता जाने वाली मेल का समय शाम को था इसलिए जगदीशनारायण समय बिताने के इरादे से परिवार को प्लेटफार्म में ही छोड़ बस्ती में घूमने चले आये। स्टेशन से करीब पांच मील दूर गोलबाजार में उनके एक पूर्वपरिचित इस्माइलभाई पेटीवाले रहते थे, उनसे मुलाकात हो गयी। जगदीशनारायण ने जब कलकत्ता जाने के बारे में उन्हें बताया तो इस्माइलभाई ने कहा- 'इतनी दूर क्यों जा रहे हो ? कलकत्ता बहुत बड़ा शहर है, वहां मत जाओ, यहीं रुक जाओ। ये छोटी बस्ती है, भले लोग हैं, यहीं गुजर बसर हो जायेगी। वैसे काम क्या करोगे ?'
‘मिठाई बनाना जानते हैं, जिंदगी भर यही काम किया है।' जगदीशनारायण ने बताया।
इस्माइलभाई ने उन्हें सदरबाजार के प्रतिष्ठित धनिक समाजसेवी द्वारिकाप्रसाद दुबे का सूत्र बताया तो जगदीशनारायण हिम्मत करके उनके पास पहुँच गये और अपना इतिहास और वर्तमान बता कर उनसे सहयोग के लिए विनती की। द्वारिका बाबू ने पूछा- ‘जेब में कुछ हैं ?'
‘बाबू , एक रूपया दस आना है।' जगदीशनारायण ने झिझकते हुए बताया।
‘इतने कम में व्यापार कैसे शुरू करोगे ?' द्वारिका बाबू चौंके।
‘आपकी कृपा हो जाये तो धीरे से सब बन जाएगा। एक छोटी सी दुकान दिलवा दीजिये।'
‘देखो वह दुकान ठीक है, तुम्हारा काम चल जाएगा ?' द्वारिका बाबू ने सामने की ओर उंगली से इशारा करके पूछा।
‘चल जाएगा।' जगदीशनारायण ने कहा।
अगली सुबह दुकान प्रारंभ करने की तैयारी चालू हो गयी। उसी शाम को शुभ घ
ड़ी में जगदीशनारायण ने भट्ठी की पूजा की, नारियल फोड़ा और बिलासा केवटिन की बसाई बस्ती बिलासपुर में एक नया अध्याय लिखा जाने लग गया। 
          जगदीशनारायण के पड़ोस में सेठ बिसेसरलाल की गद्दी थी। प्रत्येक शाम वे तांगे में बैठ कर दो-तीन घंटे के लिए अपनी गद्दी में आते थे। बगल में खुली हलवाई की दुकान में जलने वाली भट्ठी से आने वाला धुआँ सेठजी को नागवार गुजरा, उन्होंने मुनीम को तलब किया और धुआँ बंद करवाने की हिदायत दी। मुनीम ने जगदीशनारायण से शिकायत की तो पास में खड़े रामप्रसाद भड़क गए और कहा- ‘क्या हम अपना धंधा बंद कर दें?' जगदीशनारायण ने बीच बचाव किया और कहा- ‘कल से धुआँ नहीं होगा।' उसके बाद धुआं बंद हो गया। सेठ बिसेसरलाल को कुछ दिनों बाद धुएं वाली बात की याद आई तो उन्होंने मुनीम से पूछताछ की तब मुनीम ने बताया- 'शाम होने के पहले ही भट्ठी बुझा दी जाती है ताकि आपको तकलीफ न हो। अब वहां आपके आने के बाद कोई सामान नहीं बनता।'
          आप, आज के माहौल में इस प्रकार की घटना को पढ़ कर तनिक विस्मित हो रहे होंगे लेकिन उस युग में आज जैसी बेअदबी नहीं थी, किसी की तकलीफ को समझना, बड़ों की बात को आदेश जैसा मानना- परम कर्तव्य माना जाता था।
          सेठ बिसेसरलाल ने प्रभावित होकर जगदीशनारायण को अपने पास बुलाया और उनके विगत की जानकारी ली। सब कुछ सुनकर उनके मन में मदद का भाव आया और उन्होंने नजदीक में ही गोलबाजार में बन रही नगरपालिका की नई दुकानों में से एक दुकान अपने प्रभाव का उपयोग कर जगदीशनारायण को दिलवा दी। कालांतर में वही दुकान 'पेन्ड्रावाला' के नाम से मशहूर हुई, जिसकी मिठाई, नमकीन और पूड़ी-साग की खुशबू सौ-पचास मील इस कदर फैली कि जगदीशनारायण का परिवार बिलासपुर में ही सुव्यवस्थित हो गया। दूकान चल पड़ी तो जगदीशनारायण के अच्छे दिन आ गये, कम से कम घर में खाने-पीने की सुविधा बन गयी
          पूरे गोलबाज़ार में एक ही हेंडपंप था, पड़ोस में, बिरजी हलवाई की दूकान के सामने जिससे सब लोग पानी लिया करते थे। एक दिन बिरजी हलवाई ने पानी ले जाने पर रोक लगा दी समस्या यह थी कि बिना पानी के दूकानदारी कैसे हो? जगदीशनारायण के पास इतनी गुंज़ाइश नहीं थी कि हेंडपंप खरीद कर अपनी दूकान में लगवा सकें। दूकानदारी ठप होने लगी जिसकी खबर जगदीशनारायण की बहू को मिली बहू ने चुपचाप एक पड़ोसी के माध्यम से पच्चीस रुपये ससुर को भिजवाये ताकि ससुर को मालूम न पड़े कि रुपया बहू का है। उन रुपयों से दूकान में खुद का नल लग गया और पानी के लिये दूसरे पर निर्भरता समाप्त हो गयी
          जगदीशनारायण की आँखें बड़ी और लाल रंग की थी, जब वे ग्राहक से नास्ता करने के बाद कड़क आवाज़ में पूछते- 'क्या-क्या खाया ?' तो ग्राहक डर के मारे झूठ नहीं बोल पाता था, वैसे, उस युग में झूठ बोलने वाले बहुत कम थे लेकिन थे।
          समय की मार ने उन्हें कठोर बना दिया था लेकिन उनके पास ऐसा दिल भी था जो दूसरों के लिए धड़कता था। उनकी पत्नी उनकी युवावस्था में ही उन्हें छोड़कर सदा के लिये चली गई, वे एकाकी जीवन के अभ्यस्त हो गए और स्वयं को भगवान राम के चरणों में अर्पित कर दिया तुलसीदास का ग्रन्थ 'रामचरित मानस' उन्हें कंठस्थ था आसपास के क्षेत्रों के परिचित लोग उनके पास आते और अपनी पारिवारिक-आर्थिक समस्याओं पर उनका मार्गदर्शन लेते। जगदीशनारायण उन्हें रामचरित मानस की किसी चौपाई या दोहे को सुनाकर उनकी समस्या का त्वरित समाधान कर देते
          एक सुबह जगदीशनारायण दूकान की गद्दी पर बैठे गुनगुना रहे थे- 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इंसान. सूरज न बदला, चाँद न बदला, न बदला रे आसमान, कितना बदल गया इंसान...', उसी समय समीप के एक गाँव से उनके एक परिचित आये, आपस में जय गोपाल हुई. कुशल-क्षेम के पश्चात् जगदीशनारायण ने पूछा- 'क्या बात है, कुछ चिंतित से दिख रहे हैं?'
'बिटिया का ब्याह तय हो गया है, दस दिन बाद का मुहूर्त है' वे बोले
'यह तो ख़ुशी की बात है, परेशानी क्या है?'
'दादू, पैसा कम पड़ रहा है पंद्रह सौ रुपये की व्यवस्था हो गयी है पर उतने में काम नहीं चलेगाऔर लगेगा.'
'कितना लगेगा?'
'पंद्रह सौ और हो जाता तो बिटिया का ब्याह अच्छे से निपट जाता'
'चिंता मत करो, सब हो जाएगा। ऊपर वाला सबके काज करवाता है.'
'भगवान को हाथ जोड़कर घर से निकला हूँ, आपके पास आया हूँ, मेरी सहायता कर दीजिये'
'अपने फिकर करने से कुछ नहीं होता. वो है न ऊपर वाला, भरोसा रखो, वो कुछ करेगा बैठो नास्ता कर लो, दिन भर में अपना बाज़ार का काम-काज निपटा लो, शाम को छः बजे यहीं आना.' जगदीशनारायण ने उनकी हिम्मत बंधाई
          शाम के समय जगदीशनारायण अपने मित्रों से दूकान के बाहर कुर्सी पर बैठे बातचीत कर रहे थे, उसी समय सुबह वाले सज्जन आकर वहां खड़े हो गए जगदीशनारायण उन्हें दूकान के भीतर ले गए, उस समय वहां कोई ग्राहक न था अपने कुर्ते की जेब से एक लाल रंग की थैली निकाली और उन्हें सौंपते हुए बोले- 'लो, ये दो हज़ार हैं, फ़िज़ूल ख़र्च मत करना, जो देना हो लड़की को देना ताकि भविष्य में अड़चन के समय उसके काम आए'
'दादू, आपने संकट के समय में मेरी मदद की, आपका पैसा मैं एक साल के भीतर वापस कर दूंगा' उनके रूंधे गले से शब्द निकले
'वापस करने की ज़रुरत नहीं, यह मेरी तरफ से कन्यादान समझकर रख लो, बिटिया को मेरा आशीर्वाद देना' जगदीशनारायण ने कहा
          बात पुरानी हो गयी इस घटना के बाद जगदीशनारायण संसार छोड़ कर चले गए उनकी मृत्यु के पंद्रह वर्ष बाद जगदीशनारायण के बड़े बेटे रामप्रसाद के पास एक नवयुवक आया और उसने दो हज़ार रूपए दिये। रामप्रसाद ने पूछा- 'ये किस बात का?'
'मेरे पिता मृत्युशैय्या पर पड़े हैं उन्होंने इसे भेजा है कि जगदीशनारायण को दे आओ, मेरी बहन के विवाह में उन्होंने मदद की थी' युवक बोला
'पिताजी को गुजरे तो एक अरसा बीत गया मैं इसे कैसे लूं? आप रुपये वापस ले जाओ' रामप्रसाद बोले
'इसे आप ही रख लीजिए, मेरे पिता जी को मुक्ति मिल जायेगी वे बेहोशी में इसी रुपये को वापस करने की बात बार-बार बोल रहे हैं, अगर आप नहीं लेंगे तो उनके प्राण अटके हुए हैं, नहीं छूटेंगे'
'लेकिन जिनको देना था, वे तो नहीं रहे, फिर अपने पिता को क्या बताओगे?'
'मैं उनको बोल दूंगा कि जगदीशनारायण मिले थे, उनको रुपया वापस कर आया हूँ शायद बेहोशी में उन्हें यह बात सुनाई पड़ जाये और उनके प्राण शांति से निकल जाएँ' युवक ने रोते हुए कहा
रामप्रसाद ने उसका मन रखने के लिये रुपये ले लिये



(६)


          शाम के वक्त दूकान में ग्राहक कम आते थे इसलिए जगदीशनारायण की बैठक दूकान के बाहर लगती थीलकड़ी की कुर्सियां बिछ जाती जिसमें उनके मित्रगण आकर बैठते, दीन-दुनिया की चर्चा होती, चाय के दौर चलते साहित्यकार प्यारेलाल गुप्त, द्वारिकाप्रसाद तिवारी 'विप्र', वैद्य सिद्धनाथ, बालमुकुन्द गुप्ता मास्टरसाहब और चौधरीराम उनकी बैठक के नियमित साथी थे
          इनमें से गुप्ता मास्टर काफी बुजुर्ग थे, शरीर से शिथिल थे. बोलते कम थे और सुनते अधिक थे लम्बी नाक और बड़े-बड़े कान वाले मास्टरसाहब खद्दर का कुरता-धोती पहनते थे और सिर पर सफ़ेद टोपी लगाते थेउनकी शिकायत रहती थी कि उन्हें जो चाय मिलती है वह ठंडी रहती है
          उस दिन ऐसा हुआ, जगदीशनारायण के सब दोस्त आ पहुंचे, गप-शप चल रही थी चार-पांच कप चाय बनाकर लाने का आदेश हुआ उस समय जगदीशनारायण का मंझला पोता गद्दी पर बैठा था. वह गद्दी से उठा और बोला- 'आज आप लोगों की चाय मैं बनाता हूँ'
'ठीक है, तुम बनाओ.' जगदीशनारायण बोले उसने कोयले वाली भट्टी पर चाय का गंज चढ़ाया और एक खाली कप की डंडी को चिमटे से पकड़कर भट्टी की आंच दिखा कर मस्त गरम कर दिया और उस कप में चाय छानकर मास्टर साहब को दे दी और शेष सामान्य कप अन्य को दे दिये
          मास्टर साहब ने कप को उँगलियों से पकड़ा तो उन्हें ज़रा गरम सा लगा लेकिन जैसे ही कप को उन्होंने अपने होंठो से लगाकर चाय सुड़की, वे चीख उठे- 'अरे बाप रे...'. उनके हाथ का संतुलन बिगड़ गया, थोड़ी सी चाय उनके कुरते पर छलक कर गिर गई जगदीशनारायण ने पूछा- 'क्या हुआ मास्टर साहब?'
'आज चाय बहुत ही गरम है' मास्टर साहब मुंह से हवा छोड़ते हुए बोले उस गरम चाय का रहस्य आज तक कोई और नहीं जान पाया
          जगदीशनारायण की दूकान 'पेंड्रा वाला' में सभी वस्तुएँ देशी घी से बनाई जाती थी, मिठाई, नमकीन और पूड़ी सब्जी। पूड़ी सब्जी की लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि बिलासपुर के आसपास सौ-पचास मील दूर बैठे किसी व्यक्ति को अगर पूड़ी सब्जी की याद आ गई तो वह अगले दिन बिलासपुर जाने के लिए कोई न कोई बहाना अवश्य खोजता जैसे, 'कचहरी में पेशी है', 'कलेक्टर आफिस जाना है', 'आर॰टी॰ओ॰ का काम है', 'डाक्टर को दिखाना है', 'खरीदी करना है', 'बैंक में काम है' आदि कुछ भी काम 'खोजा' जाएगा और उसे बिलासपुर जाने वाली अगली ट्रेन या बस में बैठकर रवाना होना ही है। बिलासपुर पहुँच कर खोजा गया काम बाद में होगा, पहले जगदीशनारायण की दूकान में पूड़ी सब्जी का आस्वादन होगा क्योंकि घर से निकलने का असली मकसद पहले पूरा होना चाहिए
          स्थानीय निवासियों को इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी, घर से पैदल निकले, गोलबाजार पहुंचे और सीधे 'पेंड्रावाला' में घुस जाते और आदेश देते- 'आधा पाव पूरी देना।' पलाश के पत्तों से बने दोने में आधा पाव में तीन फूली हुई खरी पूरियाँ परोसी जाती और साथ में आलू की छिलके वाली रसीली सब्जी। बस, साथ में आचार-चटनी कुछ नहीं। मर्जी हो तो आधा पाव दही मँगवा लो या आधा पाव रबड़ी और फिर परमानंद।

(७)
          अब जगदीश नारायण की दूकान में काम करने वाले दो श्रमिक के बारे में कुछ ज़रूरी बातें जानिए। छेदी और कंधई बिलासपुर में बहने वाली अरपा नदी के किनारे बसे मोहल्ले पचरीघाट में रहते थे। छेदी अविवाहित था और कंधई विवाहित। कंधई की पहली शादी से बच्चे नहीं हुए तो उसने पहली पत्नी की सहमति से दूसरी औरत को घर लाकर रख लिया और बाप बनने का सतत प्रयास किया लेकिन वह अंततः असफल रहा।
छेदी और कंधई की झोपड़ी अलग-अलग किन्तु अगल-बगल थी। दोनों भाइयों के बीच अज्ञात कारण से बातचीत बंद थी लेकिन वे दोनों एक ही दूकान में काम करते थे। छेदी तुनकमिज़ाज था जबकि कंधई शांत लेकिन दोनों का झगड़ा दूकान में भी जारी रहता। बात-बात में दोनों झगड़ते, एक-दूसरे के दोष खोजते और किसी दिन बात बढ़ जाती तो छेदी गुस्से में यह कहते हुए दूकान के बाहर निकल जाता- 'मैं अब काम नहीं करूंगा।' दो-तीन दिन बीतने के बाद सिर झुकाए फिर आ जाता और अपने काम से लग जाता। पुरानी कहावत है- 'न धोबी के आन परौहन, न गदहा के आन गुसाईं' अर्थात धोबी के काम केवल गधा आता है और गधे को धोबी के अलावा कोई नहीं अपनाता।
          कंधई अधिक तनख्वाह पाता था क्योंकि वह 'उस्ताद' था। वह मिठाई, नमकीन, जलेबी, खोवे की जलेबी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन, रबड़ी, कलाकंद, मैसूर पाक, बालूशाही का अच्छा कारीगर था और फटाफट जलेबी बनाने और पूड़ियाँ तलने में माहिर था।
          छेदी अकुशल श्रमिक था, उसका काम कारखाने के बर्तन मांजना, दूध उबालना, आटा सानना और सब्जी बनाना था। छेदी के हाथ की बनी आलू की सब्जी का अनुपम स्वाद उन्हें आज भी याद होगा जिन्होंने उस समय इसका स्वाद लिया होगा। अधिकतर लोग तो इस संसार से विदा हो चुके होंगे, वे भी 'ऊपर' आलू की रसीली सब्जी को अवश्य याद करते होंगे।
          अब आप यह जानिए कि छेदी उस स्वादिष्ट सब्जी को कैसे बनाता था?
          आलू किसी भी सब्ज़ी के साथ घुल-मिल जाता है। गृहिणी को किसी सब्जी की मात्रा बढ़ानी हो और 'बेसिक' सब्जी कम हो तो आलू मदद के लिए सदैव तैयार रहते हैं। आलू को जिस तरह से भी पकाओ, उसका स्वाद लाजवाब रहता है।
          आलू की रसीली सब्जी बनाना एकदम आसान है। आम तौर पर इसे उबालकर बनाया जाता है लेकिन छेदी न तो उबालता था और न ही छीलता था, वरन कच्चे आलू को अच्छी तरह धोकर, उस के छोटे टुकड़े बनाता था। जलती भट्ठी पर रखे बड़े गंज में ज़रूरत के हिसाब से देशी घी डालता, गरम घी में जीरा, उसके बाद खलबट्टे में कूटकर तैयार किया गया हरी मिर्च और अदरक का कचूमर। एक मिनट बाद कटा हुआ आलू बर्तन में पहुँच जाता और उस पर स्वादानुसार नमक, हल्दी, लाल मिर्च, पिसी धनिया, गरम मसाला डालने के बाद गंज को पानी से भर कर, ढँक कर धीमी आंच में पकने के लिए छोड़ दिया जाता। आलू पकने के बाद भट्ठी से उतार कर छेदी तैयार सब्जी को लकड़ी की दाबी से कुचरता जिससे आलू का रस ज़रा गाढ़ा हो जाता। उसके ऊपर हरी धनिया के बारीक टुकड़े डालकर मिलाता और सब्जी तैयार।
          उन दिनों सब्जी में टमाटर और प्याज डालने का चलन नहीं था, उत्तर और मध्य भारत में यह बहुत बाद में पंजाब की पाक-शैली के प्रवेश के पश्चात सब्जी बनाने की विधियों में शामिल हुआ। बनाना एकदम आसान लेकिन स्वाद में अपूर्व। कई लोग पूड़ी कम खाते, सब्जी अधिक। जगदीशनारायण की दूकान में सब्जी चाहे जितनी खाओ, उसका पैसा नहीं लगता था, कुछ चतुर ग्राहक इस सुविधा का भरपूर लाभ उठाते थे।

(८)

         किसी रात, सोते समय जगदीशनारायण को आवाज सुनाई पड़ी- 'दादू, दादू।'
'कौन है?' जगदीश नारायण ने सोते से उठकर पूछा।
'हम हैं, शिवनायक सिंह, गौरेला वाले।'
'आओ शिवनायक सिंह। क्या बात है? इतनी रात को?' 
'हाँ दादू, ट्रेन छह घंटा लेट हो गई, हम लोग भूखे है, क्या करें?'
'चलो दूकान चलते हैं।' जगदीशनारायण ने मच्छरदानी से बाहर निकलते हुए कहा।
जगदीशनारायण ने अपने पोते को जगाया और चल पड़े। दूकान के दरवाजे खोलकर बल्व जलाया, उन सब को बेंच पर बिठाया और जगदीशनारायण खुद आटा गूँथने लगे। पोते को कहा- 'गंज में सब्जी बची है उसे भट्ठी पर गरम करने के लिए रख दो और दूसरी भट्ठी पर घी की कड़ाही चढ़ाओ।'
कुछ देर में गरम पूड़ियाँ उतरने लगी। नाती ने सबको परोसकर भरपेट खिलाया। हाथ धोने के बाद शिवनायक सिंह ने पूछा- 'दादू, कितना पैसा हुआ ?'
'काहे का पैसा ? पैसा तब देना पड़ता है जब दूकानदारी का समय ग्राहक आता है, अभी हमारी दूकान बंद है। हम तो इसलिए यहाँ आए कि रात को आप लोग भूखे कैसे सो पाओगे?' 
          जगदीशनारायण ने अपने कंधे में गमछा डालते हुए कहा और अपने पोते के साथ गहराती रात में घर की ओर वापस चल पड़े।
          सन 1959 में जगदीशनारायण को गले में केन्सर हो गया। उन्हें इलाज के लिए बम्बई (मुम्बई) के टाटा मेमोरियल केन्सर हास्पिटल ले जाया गया जहाँ उनकी रेडियोथेरेपी की गयी। वहां से लौटकर उन्होंने व्यापार से निवृत्ति ले ली और घर में कैद हो गए. बब्बाजी के केन्सर की तकलीफ बढती गयी, उन्हें फिर बम्बई ले जाया गया लेकिन हालत न सुधरी और वापस घर लौट आये। तब बिलासपुर के ही एक नामी वैद्य उनके जीवन की पारी सम्हालने के लिए आगे आए क्योकि उनका दावा था कि वे 'अर्बुद' (केन्सर) का निदान जानते थे। आयुर्वेदिक औषधियां देने के साथ ही साथ उन्होंने एक अजीब प्रयोग भी किया- केन्सरग्रस्त गले पर उन्होंने एक छिद्र किया तथा प्रतिदिन उसमें एक जोंक (एक कीड़ा) डालते। उनका मानना था कि जोंक मवाद को चूस लेगी जिससे केन्सर के कीटाणु समाप्त हो जाएँगे लेकिन वह सब कष्ट भुगतते मनुष्य के लिए और अधिक यातनादायक सिद्ध हुआ। वह प्रयोग मृत्यु का सामना करते व्यक्ति व परिवारजनों के लिए झूठी दिलासा थी, उपचार के नाम पर ठगी थी। जगदीशनारायण की पीड़ा और बढ़ गई, आवाज गुम हो गई, भोजन बंद हो गया, उनका जीवन समाप्ति की ओर था। पीड़ा उनके चेहरे में झलकती थी पर वे कभी कुछ कहते न थे। 
          आखिर किस पाप की सजा उन्हें मिली? जिस व्यक्ति ने मात्र तीस वर्ष की आयु में विधुर होने के पश्चात सन्यासियों की तरह जीवन बिताया, आर्थिक रूप से समर्थ होने के बाद उन्होंने परिचितों-अपरिचितों की जितनी मदद की, उन पैसों से वे अपार धन-संपदा एकत्रित कर सकते थे परन्तु वैसा न कर एक दयालु मनुष्य की तरह रहे। वे निश्चयतः साधु पुरुष थे। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि ईश्वर पर गहरी आस्था रखने वाले मनुष्य पर ईश्वर ने कैसा व्यवहार निश्चित किया?
          1 फरवरी 1962 की सुबह 61 वर्ष की आयु में जगदीशनारायण की जीवन यात्रा पूर्ण हो गई।

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