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कहानी मोहल्ला गोंडपारा की : मोहल्ला गोंडपारा

किस्सा  मोहल्ला गोंडपारा का 

(१)

          बिलासपुर का गोंडपारा किसी ज़माने में गोंड लोगों की बस्ती रहा होगा, अब गोंड प्रजाति का यहाँ कोई नहीं रहता बल्कि जो लोग रहते हैं, वे सब किसी न किसी कोण से विलक्षण हैं। जो इस मोहल्ले मे पैदा हुए, वे इस भूमि में जन्म लेने मात्र से अज़ब-अनोखे बन जाते हैं। यदि किसी का जन्म यहाँ न हो पाया हो लेकिन वह कहीं से आकर गोंडपारा में बस गया हो तो भी उस भूमि के प्रभाव से परमज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसी मोहल्ले में लल्लू काका रहते हैं जो गालियों के चलते-फिरते शब्दकोश हैं और साँप पकड़ने के विशेषज्ञ भी। शहर का नामी जेबकतरा और आतंक के पर्याय तीन 'दादा' इसी क्षेत्र की पैदाइश हैं। इस मोहल्ले के पुरुष सींकिया होते हुए भी सीना तान कर चलने की आदी हैं क्योंकि ताकत बदन में हो न हो, गुस्सा दिमाग पर हर समय हावी रहता है। कौन कब क्या कर जाए, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कहते हैं कि पानी का असर है।
          सन 1960 के आसपास के काल में मोहल्ला गोंडपारा में दो भाई थे, गुलब्बा और मंगल, दोनों का पहलवानी शरीर था और दोनों दिमाग से पैदल। कब किसी को थुर दें, कब किसको संसार के पार भेज दें, ये सब उनके लिए मामूली काम था। पूरा शहर उनसे काँपता था, उनको अपनी ओर आता देख लोग इधर-उधर हो जाते थे। लोगों को पुलिस से उतना डर न था जितना इन बाहुबलियों से था। उन्हीं दिनों सिटी कोतवाली में एक नया दरोगा आया, वाखड़े। जब कोई नया दारोगा आता है तो वह 'एरिया' के गुंडे-उचक्कों की पता-साजी करता है, नशा करने व बेचने वालों का सर्वेक्षण करता है, जुए के फड़ को चिन्हांकित करता है, सत्तासीन दल के नेताओं का पता लगाता है, उसके बाद अपनी मजबूती और ज़रूरत से उनका गुणा-भाग करके थाने की कुर्सी में बैठता है। यहाँ जिस दरोगा का ज़िक्र हो रहा है, वह बड़ी-बड़ी मूछों वाला, देखने में दुबला-पतला लेकिन मजबूत कलेजे वाला पुलिस अफसर था। ये तो जगजाहिर है कि अपराधियों और पुलिसबल की संख्या में घनघोर अंतर रहता है। शहर के सीधे-सादे लोग तो पुलिस की वर्दी देखकर ही भय खाते हैं लेकिन बदमाश तो पुलिस से अधिक बदमाश होते हैं इसलिए उनको साधने के लिए दरोगा को अपना रौद्र रूप दिखाना पड़ता है, उसी तरह, जिस तरह फिल्म 'जंजीर' में नायक अमिताभ बच्चन ने खलनायक प्राण को दिखाया था। याद है आपको यह डायलाग ? 'जब तक बैठने को न कहा जाये शराफत से खड़े रहो ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं।"
          तो हुआ ये, कि वाखड़े दरोगा ने एक दिन गस्त के दौरान अरपा नदी के पुल के ऊपर बनी मुंडेर पर दो लोगों को जुआ खेलते देखा। चांदनी रात थी, दरोगा ने करीब पहुँचने पर देखा कि मंगल एक अन्य आदमी के साथ ताश-पत्ती खेल रहा था, चिल्हर पैसा दांव में लगा हुआ था। वाखड़े बहुत दिनों से मंगल को धरने की तलाश में थे।उन्हें अपना वर्चस्व स्थापित करने का सुअवसर मिल गया। दरोगा ने पुलिस-भाषा में दोनों को ललकारा, दोनों मुंडेरी से नीचे कूदे, दोनों ने मिलकर दरोगा साहब को अपने हाथों से उठाया और सूखी नदी में फेंक दिया। वाखड़े दरोगा तीस-पैंतीस फुट नीचे गिरे, 'मल्टीपल फ्रेक्चर' हो गया।
          बिलासपुर जैसी छोटी बस्ती में उनका इलाज नहीं हो सकता था क्योंकि उन दिनों हमारे यहाँ एक जिला अस्पताल था और दूसरा मिशन अस्पताल था। अस्पताल के डाक्टर कंपाउंडर जैसे थे और कंपाउंडर डाक्टर माने जाते थे। अस्पतालों में 'स्पेशलिस्ट' नामक व्यक्ति के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था, उनके अवतरित होने में देर थी इसलिए इलाज़ के लिए दरोगाजी नागपुर भेजे गए। वहाँ छः महीने तक अस्पताल में बिस्तर पर पड़े अपनी हड्डियाँ जुड़वाते रहे और मन ही मन मंगल के परिवारजनों को अपने ढंग से याद करते रहे। 
          ऐसा न समझें कि सब गुंडे-मवाली हैं। देश भर में अपनी आभा बिखेरने वाले ई॰ राघवेंद्र राव, जो ब्रिटिश काल में मध्यप्रांत के गवर्नर थे, इसी मोहल्ले में रहते थे। देश-विदेश में प्रख्यात नाट्यकर्मी सत्यदेव दुबे इसी भूमि की देन हैं। इसी मोहल्ले के डा॰ श्रीधर मिश्र, अशोक राव और मूलचंद खंडेलवाल अविभाजित मध्यप्रदेश के मंत्री पद पर आसीन रहे हैं।
          बिलासपुर के गोलबाजार और सदरबाजार के बीच में एक सड़क दो दिशाओं में मुड़ती है, एक गोंडपारा जिसे राघवेंद्रनगर और दूसरी मारवाड़ी लाइन खपरगंज जिसे लाजपतरायनगर नाम दिया गया। मोहल्ला मारवाड़ी लाइन खपरगंज में खपरैल से आच्छादित एक स्कूल था, प्राथमिक शाला जिसमें हिन्दी और उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती थी। नज़दीक में देवकीनन्दन पुत्री शाला थी। इन स्कूलों के पास बस्ती के दो सर्वाधिक प्रतिष्ठित परिवार रहते थे, एक- गुरुमुखराय बख्शीराम जाजोदिया और दूसरी तरफ- बच्छराज अमोलकचंद बजाज। इनकी हवेलियाँ और उनमें रहने वाले लोग बिलासपुर की शान थे। इन दो परिवारों की बसाहट के कारण मुसलमानों की बहुतायत वाला मोहल्ला खपरगंज, मारवाड़ी लाइन कहा जाने लग गया।
          मारवाड़ी लाइन में घुसने के पहले कोने में एक छोटी सी दूकान थी, जहां बिकने के लिए कुछ नहीं दिखता था लेकिन एक विचित्र बुद्धिशाली व्यक्ति अपनी अक्ल बेचता था, नाम था बिसेसरलाल शर्मा। सुर्ख श्याम रंग वाले इस प्रौढ़ व्यक्ति के पास गज़ब की जुगाड़ू बुद्धि थी। झक्क सफ़ेद चुन्नट वाला कुर्ता और धोती धारण करने वाले इस इंसान के चक्कर में जो फंस गया, समझ लीजिए, वह निपट गया। इस वाक्पटु चतुर इंसान ने अपनी प्रतिभा को यदि सही दिशा दी होती तो वे किसी ऐसे मक़ाम पर होते जिनकी बातें बताने में लेखक को संकोच न होता।
          ऐसी ही एक विलक्षण प्रतिभा गोलबाजार के पीछे हरदेवलाल मंदिर के पास विराजित हुआ करती थी कोटेश्वरप्रसाद दुबे, जिन्हें लोग राजाबाबू वकील के नाम से जानते थे। उनका हिन्दी और अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार था। वाणी ओजपूर्ण, जबर्दस्त याददास्त, कानून और रामचरित मानस के मर्मज्ञ राजाबाबू 'स्पाइल्ड जीनियस' थे। वे हिन्दी के स्वनामधन्य कवि भवानी प्रसाद मिश्र के दामाद और प्रसिद्ध नाट्यकर्मी सत्यदेव दुबे के बड़े भाई थे। अभिमानी स्वभाव और व्यसनों के प्रभाव से एक अद्भुत प्रतिभा बिलासपुर की स्मृतियों में निरर्थक विलीन हो गई। उनके छोटे भाई सत्यदेव दुबे प्रतिभा में उनसे आगे थे, कुछ समय तक बिलासपुर के एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने के पश्चात वे बंबई चले गए जहां उन्होंने भारतवर्ष की नाटक संस्कृति को समृद्ध किया और स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया, फिल्में बनाई, फिल्मों में अभिनय किया, संवाद लिखे और अनेक नामी कलाकारों को अभिनय का प्रशिक्षण भी दिया।

(२)

          बिलासपुर में सन 1936 में जन्मे छोटी कद-काठी के घुँघराले बालों वाले सत्यदेव दुबे को गोंडपारा से गोलबाजार की सड़कों पर खाकी हाफ़पेंट में खुसी हुई सफ़ेद कमीज पहने पैदल घूमते देखकर कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता था कि इस इंसान की खोपड़ी में क्या भरा हुआ है ! इतनी बड़ी बस्ती में केवल दो लोग उनसे बात करते थे, पालेश्वर शर्मा और अशोक राव, शेष लोग न उनसे बात कर पाते, न वे किसी से बात करते। सत्यदेव दुबे अद्भुत पढ़ाका थे, वे पुस्तकों के शब्दों के पीछे की भाषा समझने वाले अपूर्व पाठक थे।
          बिलासपुर की गलियों में घूमते-फिरते वे बंबई चले गए, बस्ती के लोगों ने समझा- 'एक्टर बनने गया है।' सत्यदेव दुबे ने बंबई में न केवल स्वयं को स्थापित किया वरन बिलासपुर का नाम भी फिल्म और नाटक की दुनिया में प्रकाशित कर दिया।
          प्रसिद्ध अभिनेता (स्व॰) अमरीशपुरी अपनी आत्मकथा 'जीवन का रंगमंच' में सत्यदेव दुबे को इस तरह याद करते हैं : '(सत्यदेव) दुबे साहब ने मुझे शिल्प सिखाया। वे अद्भुत शिल्पी हैं। रंगमंच पर उनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नवीनता एवं गहराई इतनी विविधता लिए हुए होती है कि मैं शब्दों में इसे व्यक्त नहीं कर सकता। समय बीतने के साथ-साथ उनका विकास होता रहा, किसी भी बिन्दु पर ह्रास की स्थिति नहीं आई। वे अभी भी नाटक लिख रहे हैं जो मेरे मतानुसार श्रेष्ठ नाटकों में से है और जब रंगमंच पर अभिनय की बात आती है तो जिस प्रकार की रचना और पुनर्रचना वे करते हैं और जिस प्रकार के अर्थ वे नाटकों को प्रदान करते हैं, वह उल्लेखनीय है और मैं अपने कलाकार होने का समस्त श्रेय भी उन्हीं को देता हूँ। केवल वही मुझसे मंच पर उत्तम कार्य करवा पाए।'
          अमरीशपुरी ने लिखा है- 'दुबे साहब की आश्चर्यजनक प्रतिभा ही केवल उनकी सर्वोत्तम विशेषता नहीं है अपितु उनमें दूसरों में भी इस प्रतिभा का संचार कर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त करने की अनुपम योग्यता भी है। वे चिंगारी को सुलगाना जानते हैं और उन्होंने अपने विचारों से अनेक लेखकों को बेहतर लेखक, निर्देशकों को बेहतर निर्देशक और अनेक कलाकारों को बेहतर कलाकार बनाया है। उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि दूसरे की ग्रहण प्रतिभा कितनी है। मुझे लगता है कि यदि दुबे साहब ने मुझे न देखा और न धमकाया होता तो मैं अपनी उत्तम प्रस्तुतियाँ दिए बिना ही जीवन व्यतीत कर इस संसार से चला गया होता। अप्रशिक्षित प्रतिभा जंगल के उन सुंदर और शानदार फूलों के समान होती है जो किसी के द्वारा बिना देखे, सूंघे और प्रशंसा के सूख जाते हैं। हमारे चारों ओर कितनी प्रतिभा बिखरी हुई है और हम उसके अस्तित्व को जानते तक नहीं। दुबे साहब शायद एकमात्र ऐसे अध्यापक हैं जिन्होंने सर्वाधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया है। पूरी तरह से अनगढ़, नई प्रतिभाओं को लिया एवं थियेटर गतिविधियों पर अनगिनत कक्षाओं, कार्यशालाओं, शिविरों और सम्मेलनों का आयोजन किया।'
          पद्मविभूषण से सम्मानित सत्यदेव दुबे ने धर्मवीर भारती के नाटक 'अंधा युग', गिरीश कर्नाड के नाटक 'ययाति' और 'हयवदन', बादल सरकार के 'एवं इंद्रजीत' और 'पगला घोड़ा', मोहन राकेश के 'आधे अधूरे' एवं विजय तेंदुलकर के 'खामोश अदालत जारी है' और 'सखाराम बाइंडर' जैसे नाटकों ने सत्यदेव दुबे को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने हिन्दी और मराठी में एक फिल्म- 'शांतता कोर्ट चालू आहे' और एक लघु फिल्म बनाई- 'अपरिचय का विंध्याचल'। सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की टीवी सीरियल 'भारत एक खोज' में चाणक्य और फिल्म 'निशांत' में पुजारी की भूमिका निभाई। उनका निधन 25 दिसम्बर 2011 को मुंबई में हुआ। वे बिलासपुर के भाल पर चन्दन का टीका थे। 

(३)

          इसी मोहल्ले से सटा हुआ है गोलबाजार। ऐसा माना जा सकता है कि गोलबाजार, गोंडपारा वालों का 'माल' है। पूरे दिन आना-जाना अनवरत चलते रहता है जैसे एक दूसरे के बिना जीना संभव न हो। आम आदमी को दिन भर में कई बार गोलबाजार आना पड़ता है जैसे, सुबह पांडे महाराज के यहाँ नास्ता करने, दिन में 'पेंड्रावाला' की पूड़ी-सब्जी खाने, शाम होने के पहले 'मौसा जी' का समोसा खाने, शाम के कुछ बाद होरीलाल की चाट खाने आदि। यह जानना बेहद मुश्किल है कि वे लोग घर में क्या और कब खाते होंगे !
          सन 1935 के आसपास की बात है, उत्तरप्रदेश के मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आजीविका की तलाश में बिलासपुर आ गए। गोलबाजार में 'कल्लामल बृजलाल' के बृजलाल उनके साढ़ू थे जिनका मिठाई बेचने का व्यापार था। बृजलाल के पुत्र चिरौंजीलाल को मौसाजी कहते थे इसलिए चिरौंजीलाल 'मौसाजी' के नाम से पुकारे जाने लगे। वे चाट बनाने के विशेषज्ञ थे। शाम के वक्त सड़क के एक किनारे में अपना खोमचा जमाते थे और रात को नौ बजे तक अपना माल बेचकर गोंडपारा में स्थित दर्जी मंदिर के बगल वाले अपने घर चले जाते।
          चिरौंजीलाल के चार लड़के थे, छेदीलाल, दशरथलाल, मूलचंद और लक्ष्मीप्रसाद। छेदीलाल जब बड़े हुए तो उन्होंने 'इंद्रपुरी' और दशरथलाल ने गोलबाजार के अंदर 'मौसा जी मथुरा वाले' नामक हलवाई की दूकानें शुरू की। इन दूकानों के खुलने के बाद चिरौंजीलाल ने चाट की दूकान लगाना बंद कर दिया और 'रिटायरमेंट' ले लिया। शहर में 'इंद्रपुरी' की लस्सी और 'मौसा जी मथुरा वाले' का दही-खटाई वाला समोसा बेहद लोकप्रिय था। 'मौसा जी मथुरा वाले' में मूलचंद अपने बड़े भाई के साथ दूकान में बैठते थे और कारखाने मे मिठाई-नमकीन बनाने का काम सीखते थे। मूलचंद ने म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ाई भी की थी लेकिन आठवीं कक्षा में उनके मास्टर ने उनकी ऐसी पिटाई की कि उनका स्कूल जाने से जी उचट गया और वे अपनी दूकान में ही व्यस्त हो गए। इस बीच गोलबाजार की एक दूकान श्यामलाल ने बेची जिसे मूलचंद के लिए खरीद लिया गया और वहाँ 'नीलकमल' नामक आधुनिक शैली की हलवाई-दूकान खुली।
          मूलचंद खंडेलवाल साहसी और दूरदर्शी युवक थे। उन पर हर समय कुछ नया करने का जुनून हावी रहता था। उनकी बातचीत के लहज़े में बनारस का असर था, कहने का मतलब यह है कि उनका कोई भी वाक्य अपशब्दों के बिना पूरा नहीं होता था। माँ-बहन वाली गाली का उच्चारण वे शास्त्रीय संगीत की शैली में करते थे, अर्थात आरंभ के तीन शब्द 'द्रुत' में और शेष दो शब्द 'विलंबित' में।
          मूलचंद का झुकाव भारतीय जनसंघ की ओर था। एक बार वे बाज़ार वार्ड से जनसंघ की टिकट पर चुनाव लड़े और अपने पड़ोसी हलवाई 'कोहिनूर' वाले नत्थूलाल केशरवानी को परास्त करके नगरपालिका के सदस्य बने। यहीं से उन्हें राजनीति का चस्का लग गया और वे 'नीलकमल' को कम और राजनीति को अधिक समय देने लगे। नीलकमल राजनीतिक चर्चा का अड्डा बन गया और जनसंघ के बड़े नेताओं से उनकी जान-पहचान विकसित होती गई। अटलबिहारी बाजपेयी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे राष्ट्रीय और राज्य स्तर की हस्तियाँ मूलचंद के आदर्श कालोनी स्थित घर में मेहमान हुआ करते थे। मूलचंद और उनकी पत्नी देवकी उन सबका स्वागत-सत्कार अत्यंत आत्मीयता से करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनता पार्टी के पदाधिकारियों को नीलकमल में रसमलाई, दही-खटाई वाली आलू भजिया और चाय निःशुल्क उपलब्ध थी।
          मूलचंद अत्यंत सावधानी से अपने 'होने' को स्थापित कर रहे थे, परिणामस्वरूप उन्हें सन 1985 के मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए बिलासपुर शहर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी बनने का अवसर मिल गया। मूलचंद चुनाव हार गए लेकिन इसी पराजय से उनकी विजय पताका को हवा मिलने लगी।
यद्यपि मूलचंद एक बड़ी राजनीतिक गफलत कर चुके थे, आपातकाल के दौरान जब मूलचंद को मालूम हुआ कि जेलयात्रा का उनका भी मुहूर्त निकल चुका है तो वे सफ़ेद टोपी पहनकर गाजे-बाजे के साथ कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। यह समझना बेहद कठिन है कि वह कौन सा चमत्कार रहा होगा कि उस भयंकर भूल के बावजूद उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया। यह सच है कि जेल की सजा भुगत कर आए अन्य नेता उनसे बहुत खखुवाए हुए थे। मूलचंद चुनाव हार गए तो भन्नाए हुए 'मीसाबंदी' मूलचंद के चयन पर उंगली उठाने लगे और मूलचंद अपने बचाव की कोई नई तरकीब खोजने में लग गए।
          आम तौर पर चुनाव जीतने के बाद नेतागण अपने चुनाव क्षेत्र को भूल जाते हैं। केवल चुनाव लड़ने के समय 'डोर-टू-डोर' जाते है और जीतने या हारने के बाद उन्हें मतदाता के घर की 'लोकेशन' अगले चुनाव तक के लिए याद रखने की जरूरत नहीं रहती।
          मूलचंद ने हारने के बाद मतदाताओं के घर जाने का निर्णय लिया और घर-घर जाकर धन्यवाद दिया। यह बात सबको प्रभावित कर गई और जिसने उन्हें वोट नहीं दिया था, उसे भी मूलचंद का हारना अखर गया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि वे शहर के लिए अवतार जैसे हो गए और गली-गली में उनके नाम का डंका बजने लगा। उनके आलोचकों की घिग्घी बंध गई। पाँच साल बीत गए, सन 1990 में पुनः विधानसभा चुनाव घोषित हुए और मूलचंद को फिर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया गया।
          इस बार बिलासपुर का मतदाता मूलचंद को जिताने के लिए उतारू था और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर किला फतह किया। संयोग से उस चुनाव के पश्चात प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और मूलचंद को पहली बार विधायक बनने के बावजूद बी॰आर॰यादव जैसे दिग्गज को हराने के पुरस्कार स्वरूप मंत्रिमंडल में जगह मिली, वह भी मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य का नागरिक आपूर्ति मंत्री !
          क्या कोई कल्पना कर सकता था कि एक अल्पशिक्षित हलवाई अपने दृढ़संकल्प और दूरदृष्टि से ऐसी ऊंचाई तक पहुँचेगा ? मूलचंद खंडेलवाल बिलासपुर शहर की वह हस्ती बने जिसने यह साबित किया कि उसका 'बेकग्राउंड' कुछ भी हो, यदि मनुष्य में लगन हो और वह सही दिशा में प्रयत्न करे तो सब संभव है।

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