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किस्सा टेटकूदास का : बिच्छू का दंश

किस्सा टेटकूदास का : बिच्छू का दंश 

(१)

          बिलासपुर से दस कोस दूर एक गाँव है, जरौंधा। कम आबादी वाले इस गांव में गुजरबसर के लिए खेती-किसानी, बैलगाड़ी के चक्के बनाने वाले दो बढ़ई, एक लोहार, एक वैद्य, एक पंडित, एक नाई, चार चरवाहे, एक किरानी और इक्कीस परिवार थे। अधिकतर ग्रामवासी छत्तीसगढ़ी मूल के थे, कुछ-एक बाहरी भी, सभी जातियों के मिश्रण से बना यह गाँव आपसी प्रेमभाव की मिसाल था। हर घर एक-दूसरे का मददगार था। किसी ने किसी के लिए कुछ किया तो पैसे का लेन-देन नहीं होता था, अनाज का लेन-देन होता था।
          इसी गाँव में मटकूदास रहता था, तालाब के किनारे उसने एक झोपड़ी बनाई थी, एक कमरे का घर जिसमें उसकी घरवाली और तीन बच्चे रहते थे। मटकूदास खेतों में मजदूरी करता था, उसकी घरवाली घर का काम करती, बड़ा लड़का टेटकू दास आवारागर्दी करता था और छोटी दोनों लड़कियां दिन भर रोने का काम करती थी। छत्तीसगढ़ में साल में एक फ़सल होती है, धान की, जिसमें मुश्किल से तीस दिन काम मिलता था। तीस दिन की मज़दूरी में पाँच आदमी का पेट भरना संभव न था इसलिए दिवाली के बाद मटकूदास पैसा कमाने कलकत्ता चला जाता। उसकी घरवाली रुक्मनी अपने पति की अनुपस्थिति का छः-सात महीने घरवास भुगतती और अपने बेटे टेटकूदास को डांट-डपट कर घर से भगाती और कुछ कमाकर लाने के लिए कहती। टेटकू गलत संगत में पड़ गया था। पीपल के पेड़ के नीचे अपने जुआरी दोस्तों के साथ बीड़ी पीते बैठा रहता और यदि दो-चार आना जीत जाता तो माँ के हाथ में रखकर बोलता- 'ले रख, कमा कर लाया हूँ।' कभी हार जाता तो दोस्तों का खेल बिगाड़कर हल्ला मचाता- 'तुम लोग बेईमान हो, मैं नहीं खेलता' और भाग खड़ा होता। उसकी बदमाशी की खबर मटकूदास को थी, वह टेटकू को लेकर बहुत फिक्रमंद था लेकिन करता क्या ? गाँव में कोई रोजगार भी न था।
          एक दिन की बात है, बच्चे घर के बाहर थे, मटकूदास ने रुक्मनी से कहा- 'आठ दिन बाद कलकत्ता जाना है, कपड़ा-लत्ता की गठरी बना देना।'
'मत जाओ कलकत्ता, पास में बिलासपुर है, वहाँ जाकर कोई काम खोजो, मिल जाएगा। कलकता जाते हो तो वहीं के बन कर रह जाते हो।' रुक्मनी ने कहा।
'कलकत्ता में मज़दूरी ज्यादा मिलती है, बिलासपुर में उतना पैसा कौन देगा ?'
'कम देगा और क्या ? लेकिन तुम बीच में घर आ जाया करोगे तो अच्छा लगेगा।'
'मैं यहाँ नहीं रहता तो क्या तुमको अच्छा नहीं लगता ?'
'क्यों तुमको वहाँ मेरे बिना वहाँ अच्छा लगता है ?'
'नहीं लगता लेकिन क्या करूँ, टेटकू कहीं काम करता तो दो झन कमाने वाले हो जाते लेकिन तुम्हारा लड़का तो एक नंबर का बदमाश है।'
'मेरा लड़का ? मैं क्या किसी और से ब्याहकर टेटकू को पैदा की थी ?'
'अरे नहीं रुक्मनी, वैसा मत बोल। तेरे लाड़-प्यार ने उसको बिगाड़ा है।'
'उसको क्यों दोष देते हो ? तुम भी तो बिगड़े हुए हो।'
'मैं, मैं बिगड़ा हुआ हूँ ?'
'बहुत बिगड़े हुए हो।'
'ऐसा ?'  मटकूदास ने प्यार से रुक्मनी को देखा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया। रुक्मनी कद में ठिगनी थी, नीचे झुककर बुचक गई और मटकूदास से अलग होकर बोली- 'मैं कह रही थी न, तुम बहुत बिगड़े हुए हो।' 
          रात को टेटकू घर आया। माँ ने उसे भात और रमकेरिया की साग परोसी। दो-चार कौर खाने के बाद टेटकू ने माँ से पूछा- 'बाबू कलकत्ता जाने वाला था, कब जाएगा ?'
'आठ दिन बाद, बुधवार को।' माँ बोली।
'मैं भी जाऊँ क्या, बाबू के साथ ?'
'पूछ ले।'
'मैंने पूछा था, मना कर दिया।'
'क्यों?'
'वहाँ बहुत तकलीफ है, न रहने का ठिकाना, न खाने का ठिकाना।'
'फिर ?'
'बोल रहा था, बिलासपुर पास में है।'
'तो, चले जा।'
'चले जाता माँ लेकिन मुझे ब्याह करना है।'
'ब्याह करना है ? कमाई न धमाई और ब्याह करना है। कौन पालेगा तेरी घरवाली को ?'
'ब्याह कर दे माँ, मैं बिलासपुर जाऊंगा, कमाने।'
'किससे ब्याह करेगा ?'
'सुरसती से, वो राजी है।'
'सुरसती, दयाल की लड़की ? पर वो लोग तो सतनामी है, हम पनिका हैं, कैसे ब्याह होगा ?'
'तुम बाबू को मना लो, सब हो जाएगा।'
'बाबू नहीं मानेगा।'
'बात तो कर माँ।' 
'पहले बोलता है, कलकत्ता जाऊंगा, फिर बोलता है ब्याह करूंगा, उसके बाद बोलता है बिलासपुर जाऊंगा, मेरे को तेरी बात समझ में नहीं आती। जब तेरे को कमाने के लिए बाहर जाना है तो ब्याह क्यों कर रहा है, उसको कहाँ रखेगा ?'
'अपने साथ बिलासपुर ले जाऊंगा।'
'अभी नौकरी नहीं लगी, बिलासपुर ले जाएगा ?'
'मैं क्या करूँ ? ब्याह करना जरूरी है।'
'क्यों, क्या हो गया ?'
'सुरसती हमल से है।' टेटकू बोला। रुक्मणी सन्नाटे में आ गई। बात रुक गई। चुप्पी छा गई। टेटकू खाता रहा, रुक्मणी उसे घूरती रही। एक बार और भात परोसा, साग दिया और धीरे से पूछा- 'कितने दिन का है ?'
'तीन माह का।'
'आने दे तेरे बाबू को, बात करती हूँ। बहुत गुस्साएगा, मैं जानती हूँ।'
'मना लेना माँ, मेरा उससे ब्याह करा दे, मैं बदल जाऊंगा माँ। मैं भी कमाऊँगा और घर चलाऊँगा।' टेटकू माँ से गिड़गिड़ाया।
          खाना खाकर टेटकू रफूचक्कर हो गया क्योंकि उसके बाबू के घर पहुँचने का समय हो गया था। वह जानता था कि माँ ने यदि उसके सामने बात की तो बाबू तगड़ी पिटाई करेगा। खाना खाने के बाद मार खाना अच्छी बात नहीं होती। टेटकू को यह अंदाज़ नहीं था कि बात इतनी बढ़ जाएगी लेकिन अब बढ़ चुकी थी। थोड़ी देर के मज़े की सज़ा भारी पड़ रही थी, गलती हो तो गई लेकिन अब कैसा करे ?
          मटकूदास घर आया, हाथ-पैर धोकर भोजन करने बैठा। रुक्मनी ने उसकी थाली लगाई, भोजन परोसा और भयभीत होकर उसे ताकती रही। मटकूदास घर की खबर से बेखबर भात खा रहा था। खाते-खाते बोला- 'आठ दिन और खा लेता हूँ तेरे हाथ का बना खाना फिर कलकत्ते में बिना स्वाद वाला खाना निगलना पड़ेगा।'
'वहाँ तो मछली-भात मिलता है न ?' रुक्मनी ने पूछा।
'मिलता तो है लेकिन सरसों तेल की गंध से मुझे मितलाई आती है।'
'फिर कैसा करते हो ?'
'क्या करते हैं, दस-पंद्रह दिन में आदत पड़ जाती है।'
'मेरे बिना तुमको वहाँ कैसा लगता है ?'
'अच्छा लगता है।'
'एँ, अच्छा लगता है ?'
'हाँ, वहाँ आज़ादी रहती है, जब मर्ज़ी आओ-जाओ, कोई टोकने वाला नहीं रहता।'
'मैं टोकती हूँ क्या ? तुम तो अपनी मर्ज़ी से चलने वाले हो, दूसरे का कहा मानते हो कभी ?'
'तेरा कहा तो मानता हूँ।'
'मेरा कहा मानते हो ? मानोगे मेरा कहा ?
'बोल के देख, बस, कलकत्ता जाने को मना मत करना।'
'ठीक है, कलकत्ता जाने को मना नहीं करूंगी।'
'बोल।'
'टेटकू का ब्याह कर दो, दयाल की लड़की सुरसती से।' रुक्मनी ने कहा। मटकूदास का कौर मुंह में रह गया, उसने घूर कर रुक्मनी को देखा। उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गई। भात निगलकर बोला- 'क्या कह रही हो ?'
'हाँ, कलकत्ता जाने के पहले उन दोनों का ब्याह कर दो।'
'ब्याह कर दो, तुम्हारे सड़कछाप लड़के का ब्याह कर दो। लोफ़रई करता है, एक पैसा कमाता नहीं है, एक को और घर में लाकर मेरे सिर पर बैठा दे तू।'
'बोल रहा है कि ब्याह करने के बाद कमाने जाएगा बिलासपुर, कोई नौकरी खोजेगा।'
'पर सतनामी के घर की लड़की कैसे लाएँगे ?'
'अब लाना पड़ेगा।'
'क्यों, ऐसी क्या बात है ?'
'लड़की हमल से है, तीसरा महीना चल रहा है।' रुक्मनी ने धीरे से कहा। मटकूदास माथा पकड़कर बैठ गया। रुक्मनी ने और भात परोसने का प्रयास किया, मटकूदास ने लेने से मना कर दिया और हाथ धोने के लिए उठ खड़ा हुआ। वह चिंतित होकर बिस्तर पर लेट गया और टेटकू के घर आने का इंतज़ार करने लगा।
          टेटकू घबराया हुआ था। जवानी के जोश में होश खो बैठा, अब मुसीबत सामने खड़ी थी। वह सुरसती को दिल से प्यार करता था, गाँव छोड़ कर भाग सकता था लेकिन सुरसती के साथ धोखा हो जाता। सुरसती उस बात को कितने दिन छिपा पाती ? सवाल यह था कि बाबू राजी होगा या नहीं, सुरसती का बाप मानेगा या नहीं ?
          पूरा गाँव सो गया। पगडंडी सो गई। गाँव की झोपड़ियाँ सो गई। पीपल का पेड़ सो गया। सुरसती सो गई होगी। दाई सो गई होगी। बाबू सो गया होगा। दबे पाँव वह अपनी झोपड़ी के पास पहुंचा। दरवाजे को धक्का दिया, खुल गया। दाई ने सांकल खुली छोड़ दी थी ताकि वह चुपचाप आकर सो सके। बिना किसी आहट के वह चादर ओढ़कर सो गया।
          उस रात टेटकू ने सपना देखा। उसका बाप उसे डंडे से पीट रहा है। वह बाप से पूछता है- 'क्यों मार रहे हो ?'
'तूने खाना क्यों नहीं खाया।' बाप ने पूछा
'खाया तो।'
'कब खाया ?'
'तीन महीने पहले खाया।'
'सच बोलना।'
'बाबू, मैं सच बोल रहा हूँ।'
'कैसे मानूँ तेरी बात, तूने मुझे बताया ?'
'दाई को बताया था।'
'मुझे क्यों नहीं बताया ?'
'तुमसे ड़र लगता है।'
'मुझसे क्यों डरता है ?'
'क्योंकि तुम डरावने हो।'
'मैंने तुझे कब मारा ?'
'कभी नहीं मारा।'
'तो फिर ?'
'आज मारोगे।'
'अरे नहीं, मैं क्यों मारूँगा ?'
'सच बाबू ?'
'सच।' टेटकू आपने बाबू से लिपट गया। अचानक उसे लगा, जैसे उसका बाप बरगद का बूढ़ा पेड़ बन गया है। उस पेड़ की जटाओं ने टेटकू को सब तरफ से लपेट लिया है। जकड़न बढ़ती जा रही है। सांस डूबती जा रही है। दूर से सुरसती रोती हुई टेटकू को बुला रही है। टेटकू उसके पास जाना चाहता है लेकिन जटाएँ और कसते जा रही हैं। अचानक सुरसती चुप हो गई। वह न जाने कहाँ गुम हो गई। वह सुरसती को पुकार रहा है- 'सुरसती...मेरी सुरसती।'
          टेटकू की माँ ने उसे झिंझोड़ कर जगाया- 'क्या हुआ ? क्यों बड़बड़ा रहा है ?'
'दाई, सुरसती को बचा ले दाई।' टेटकू रो रहा था।
'सो जा, अभी सो जा। सुबह सब ठीक हो जाएगा।' रुक्मणी बोली। रात और गहरी हो गई। रात बेहोश हो चुकी थी।
          मटकूदास बड़ी सुबह नहा-धोकर घर से निकल गया और सीधे सुरसती के पिता दयाल के घर पहुँच गया। दयाल उसे देखकर चौंक गया, उसे बिठाया और पूछा- 'कैसे आए मटकू भैया ?'
'तुम्हारी सुरसती को अपने घर की बहू बनाने के लिए।'
'क्या बोल रहे हो ? सुरसती, तुम्हारी बहू ?'
'हाँ, मेरा लड़का टेटकू उससे ब्याह करना चाहता है।'
'तुम तो बहुत अच्छी खबर लेकर आए लेकिन यह संबंध नहीं हो सकता।'
'क्यों ? टेटकू में कोई खराबी है क्या ?'
'नहीं, वह बात नहीं। तुम ऊंची जात के हो, हम लोग अछूत हैं, कैसे बनेगा ?'
'जब मुझे जम रहा है तो तुमको क्या परेशानी है ?'
'फिर ठीक है, मुझे मंजूर है।'
'ब्याह एक-दो दिन में करना है। मुझे मजदूरी के लिए बुधवार को कलकत्ता के लिए निकलना है।' मटकूदास ने कहा। दयाल मान गया। तीसरे दिन ब्याह हो गया। गाँव के लोग दस किस्म की चर्चा करते रहे लेकिन किसी को असल बात की भनक नहीं लगी। सुरसती टेटकू के घर आ गई। अगले दिन मटकूदास रुक्मणी और बच्चों के साथ सिनेमा देखने बिलासपुर चला गया। रात को बिलासपुर की एक धर्मशाला में ठहर गया। मटकूदास के वापस आते तक वह झोपड़ी टेटकू और सुरसती के संग धड़कती रही, नृत्यमग्न रही।

(२)

          मटकूदास कलकता गया, चार महीने वहाँ रहा। सुबह की मेल से बिलासपुर उतरा और दोपहर के समय घर पहुँच गया। उस दिन रुक्मनी बेहद खुश थी। भरी ठंड में पति से दूर रहने का दुख विरहिणी ही जानती है लेकिन गरीबी जो न करवा ले, वह कम है। मटकूदास कलकत्ते से सबके लिए कपड़े लेकर आया, अपनी बहू सुरसती के लिए भी। रुक्मनी को पति के आने का मालूम ही न था, वह अचानक आ गया। उसके आने के पहले ही सब खा चुके थे और चौका साफ हो चुका था।
          जब तक मटकूदास नहाकर आया तब तक रुक्मनी ने उसके लिए खाना बनाया और उसे परोस दिया। आज उसकी पसंद का साग बना था, आलू-भाटा-पताल का खूब तीखा साग और साथ में गरम-गरम भात। भोजन के बाद मटकूदास ने पूछा- 'टेटकू नहीं दिख रहा है, कहाँ गया ?'
'घरवाली को लेकर अपनी ससुराल गया है, रात को आएगा।' रुक्मनी ने बताया। मटकूदास मन ही मन खुश हुआ, बहुत खुश हुआ।
          रात को जब टेटकू घर वापस आया तो मटकूदास ने उससे पूछा- 'गया था बिलासपुर, काम मिला ?'
'नहीं जा पाया।' टेटकू ने जवाब दिया।
'नहीं जा पाया...क्यों नहीं जा पाया ?'
'घर में तुम नहीं थे तो दाई को कौन देखता ?'
'दाई का नाम बीच में क्यों ला रहा है ? साफ-साफ बोल न कि घर में पड़ा रहा।'
'सुरसती की देखरेख भी करनी थी।'
'अब सुरसती को बीच में ले आया ?' मटकूदास भड़का। टेटकू चुप रह गया।
'तूने कहा दाई को था कि ब्याह करवा दो तो नौकरी करने जाऊंगा, यह बात सच है या नहीं ?' मटकूदास ने पूछा।
'सच है।'
'फिर क्यों नहीं गया ?'
'नहीं गया।'
'वही पूछ रहा हूँ, क्यों नहीं गया ?'
'सोचा कि तुम आ जाओगे तब जाऊंगा।' टेटकू ने सफाई दी। मटकूदास गुस्से से भभक गया- 'मैं परदेस गया, मेहनत-मजदूरी करने, अपना पसीना बहाया। एक टाइम खाना खाकर जिंदा रहा, पैसा बचाकर लाया और तू घर में गुलछर्रे उड़ा रहा था ?' वह झटके से उठा और उसने टेटकू को पीटना शुरू किया। रुक्मनी ने बीच-बचाव किया लेकिन जब तक मटकूदास का मन नहीं भरा, उसने तब तक पीटा। सुरसती रोती हुई एक कोने में दुबकी खड़ी रही।
          उस रात घर में खाना नहीं बना, सब भूखे रहे। किसी ने किसी कोई बात नहीं की। सब सो रहे थे, टेटकू जग रहा था, उठा और चुपचाप घर से निकल गया और रात के सन्नाटे में पैदल चल पड़ा। रास्ते के पेड़ टेटकू से पूछ रहे थे- 'कहाँ जा रहा है ?'

(३)

          रात भर पैदल चलते-चलते न जाने कितना रास्ता कट गया। एक चबूतरा दिखा, उस पर सो गया। सुबह नींद खुली, कोई गाँव था। शाम को ससुराल से लौटते समय सास ने उसके हाथ में दो रुपये का लाल रंग का नोट रखा था, वही जेब में था। एक बस आती दिखी, वह मुंगेली से लौट रही थी और बिलासपुर जा रही थी, उसमें बैठ गया। छः आने की टिकट लगी। डेढ़ घंटे में बिलासपुर का बसस्टेंड आ गया। उसने चारों ओर नज़र घुमाई, बहुत सी बसें खड़ी थी। कुछ में कम्बाइन्ड ट्रांसपोर्ट लिखा था तो कुछ में सुदर्शन ट्रांसपोर्ट। कंडक्टर सवारी को बुलाने के लिए हल्ला मचा रहे थे। वह बसस्टेंड से बायीं सड़क पर चल पड़ा, पाँच मिनट में एक गोल आकार का बाज़ार आ गया। यह वही बेरोजगार मजबूरों को रोजगार देने वाला बाज़ार था, गोलबाजार।
          दिन का दस बज चुका था, चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। गोलबाजार में सब कुछ बिक रहा था। एक तरफ बहुत सी सायकल बेचने की दूकानें थी तो दूसरी तरफ हलवाइयों की कतार। गोलबाज़ार के अंदर सब्जियों की दूकान जिसमें हरी-ताज़ी सब्ज़ियों के भरे टोकरे आ रहे थे। दो-तीन मनिहारी की दूकानें थी और एक हलवाई की भी। टेटकू सकुचाते हुए उस दूकान में घुस गया और गद्दी पर बैठे मालिक से पूछा- 'कुछ काम मिलेगा क्या ?' 
          टेटकू को काम मिल गया, भट्ठीघर में बर्तनों की साफ सफाई और मुख्य कारीगर के द्वारा बताए काम को करना। तनख्वाह तीस रुपए प्रति माह, खाना-पीना मुफ्त। ड्यूटी सुबह 6 से रात 11 बजे तक। ज़िंदगी भर आराम फरमाने वाले टेटकू को यह काम बहुत भारी पड़ा। सत्रह घंटे की ड्यूटी, वह भी भट्ठीघर में ? घर से भागकर न आया होता तो घर वापस चला जाता। रात को दूकान के बाहर बने चबूतरे में सोना पड़ता था। शक्कर के दो खाली बोरे मिले थे, एक को बिछा लो और दूसरे को ओढ़ लो। सोते साथ मच्छरों की फ़ौज का हमला होता, काटते या कान के पास भन्न-भन्न करते। वे भी दुखी हो जाते रहे होंगे क्योंकि इतनी लंबी ड्यूटी देने वाले इंसान की थकावट उनके प्रयासों पर पानी फेर दे देती। ड्यूटी के बीच में एक घंटे की छुट्टी मिलती। एक मील दूर पर अरपा नदी की रेत पर बैठकर 'दिशा-मैदान' करता, नदी में धोता, मुखारी करता, नहाता और वापस दूकान आ जाता। आठ-दस दिन बहुत बुरे बीते, फिर आदत पड़ गई। टेटकू को समझ में आने लग गया कि कलकत्ते से वापस आने पर उसके बाबू ने उसे क्यों पीटा था !
          टेटकू को भट्ठी में उठती लपट से बहुत परेशानी थी। लपट में उसे सुरसती का सुंदर मुखड़ा नज़र आता था। सुरसती को ऐसी अवस्था में छोड़ कर बिना बताए भाग आना उसे बहुत अखर रहा था लेकिन उस रात जिस तरह बाबू ने सुरसती के सामने पिटाई की, वह अपमान सहन नहीं हुआ। बाबू को मारना था तो बाहर ले जाकर मारना था, अगले दिन मार लेता लेकिन बाप है, बाप को सब माफ है, कुछ कह नहीं सकते। पैदा किया है, बड़ा किया है, भात खिलाता है तो बिना कारण मार भी सकता है। खैर, इस बार तो उसने मारा, ठीक मारा, मेरी गलती थी लेकिन क्या करे सुरसती से एक पल दूर होने का मन ही न करे। मुझे लगता था, उसके सामने बैठा रहूँ, उसे देखता रहूँ, बालों से खेलता रहूँ और उसकी धड़कन सुनता रहूँ। बाबू ने ऐसी धुनाई की कि सब गुड़-गोबर हो गया और अब यहाँ भट्ठी की आंच के सामने बैठा सुरसती को याद करता हूँ, अपना खून और जी जला रहा हूँ। 
          एक दिन की बात है, नदी से लौटते समय रास्ते में किसी ने उसे आवाज़ दी- 'टेटकू, ओ टेटकू।' वह चौंका कि बिलासपुर में उसे किसने पुकारा ? रामबिलास उसकी ओर दौड़ते चला आ रहा था। वह उसका बचपन का साथी था। दोनों एक दूसरे के गले लग गए।
'कहाँ है रे तू ?' राम बिलास ने पूछा।
'मैं यहीं हूँ, बिलासपुर में।' टेटकू ने बताया।
'किसी को तेरा कुछ पता नहीं, तू बिना बताए घर से चला गया। सब परेशान हैं।'
'तो क्या सबको जता-बता कर आता ? यहाँ काम खोजने आया था, मिल गया।'
'गाँव में तो कुछ और हल्ला है।'
'क्या है ?'
'तेरे बाप ने मारा इसलिए तू हर छोड़कर भाग गया।'
'दोनों बात ठीक है लेकिन घर से भागा नहीं, नौकरी करने यहाँ आया।'
'क्या काम करता है ?'
'बहुत बड़ी होटल में काम करता हूँ।'
'अरे वाह, क्या करता है वहाँ ?'
'बढ़िया ठाठ है, थोड़ा-बहुत काम करना पड़ता है और खाने-पीने का बहुत आराम है।'
'मुझे भी लगवा दे न ?'
'ठीक है, मालिक से बात कर लेता हूँ फिर बताऊंगा। नौकरी बड़ी मुश्किल से मिलती है यहाँ। अच्छा, मेरे घर की तरफ गया था क्या ?'
'हाँ, गया था। तीन दिन पहले तेरा लड़का हुआ है।'
'सच में ?'
'हाँ, सच में।'
'चल तेरे को चाय पिलाता हूँ।'
'बस, चाय !'
'मेरे पास ज्यादा पैसा नहीं है, आठ आना जेब में है। तनख्वाह नहीं मिली है।'
'क्यों नहीं लिया ?'
'जब घर जाऊंगा, तब लूँगा।'
'घर कब जाएगा ?'
'अब जाऊंगा, लड़के की छठी में।' टेटकू खुश होकर बोला- 'लेकिन मेरे बारे में घर में मत बताना, तुझको मेरी कसम।'
'क्यों ?'
'अब कमाई करके जब घर जाऊंगा तब सबको मेरे बारे में मालूम पड़ना चाहिए।'
'ठीक है, नहीं बताऊंगा लेकिन मेरा काम मत भूलना।'  रामबिलास ने चाय पीते-पीते बोला।
'किसी दिन मालिक खुश दिखेगा, उस दिन बात करूंगा।' टेटकू ने कहा, फिर से दोनों गले लगे और अपने-अपने रास्ते चल पड़े। खुशी के मारे टेटकू लहरा रहा था, उसे घर याद आ रहा था, सुरसती की याद आ रही थी और किसी बच्चे का अंजाना चेहरा हँसता हुआ दिखाई पड़ रहा था।
          टेटकू 'सुसमय' ताड़कर मालिक के सामने अपना सिर खुजलाते खड़ा हो गया। मालिक ने पूछा- 'क्या बात है ?'
'घर जाऊंगा।' टेटकू ने बताया।
'तो जाओ।'
'तनख्वाह चाहिए।'
'कितने दिन का काम हो गया ?'
'ढाई महीना।'
'कितना पैसा चाहिए ?'
'जितना निकलता हो, दे दीजिए।'
'क्यों, काम नहीं करना है क्या ?'
'छठी के बाद लौट आऊँगा।'
'किसकी छठी है ?'
'मेरे लड़के की, चार दिन पहले हुआ है।'
'ऐसा क्या ? पर अभी तो तू खुद लड़का है।'
'गाँव तरफ जल्दी ब्याह हो जाता है मालिक, बच्चा भी जल्दी हो जाता है।'
'कब है छठी ?'
'परसों।'
'ठीक है, ये दो महीने की तनख्वाह साठ रुपए रख ले, बाकी हिसाब लौट कर होगा।'
'हौ।'
'पैसा सम्हाल कर रखना और ये पाँच रुपए और ले, मेरी तरफ से तेरे लड़के के लिए कपड़ा खरीद लेना।' मालिक ने कहा। टेटकू ने मालिक के पैर छुए, बाजार से लड़के के लिए कपड़ा खरीदा और अपने गाँव के लिए निकल पड़ा। बस में बैठ गया। आधा घंटा बीत गया, बस छूटने का नाम न ले, वह बार-बार ड्राइवर की सीट की ओर देखे, खाली सीट भरे तो बस आगे बढ़े। ड्राइवर न जाने कहाँ चला गया। उसने बाहर झांककर देखा लेकिन बेकार गया क्योंकि वह ड्राइवर को पहचानता ही नहीं था। कुछ देर बाद बस भर गई, कंडक्टर ने मुंह से सीटी बजाई और बस में चढ़ गया। अचानक ड्राइवर चढ़ गया, बस का इंजन चालू हो गया, हार्न बजा, बस हिली और धीरे-धीरे आगे सरकने लगी। टेटकू सोच रहा था कि उसको ड्राइवरी सीखनी चाहिए, ड्राइवर बन जाएगा तो बस को इस तरह बेमतलब लेट नहीं होने देगा और तेजी से भगाएगा लेकिन इस बस का ड्राइवर तो एकदम बेहूदा है, रास्ते में किसी ने भी हाथ दिखाया तो बस रोक देता है। पता नहीं, कैसा चलाता है ? अचानक बस रुकी, ड्राइवर ने कंडक्टर को कुछ कहा और नीचे उतर गया। कुछ यात्री भी उतरे। धीरे-धीरे सब उतर गए। बस का एक टायर-ट्यूब पंक्चर हो गया था और ड्राइवर कंडक्टर दोनों मिलकर चक्के को निकालने में भिड़े हुए थे।
          किसी प्रकार चलते-घिसटते बस उस मुख्य सड़क तक पहुँच गई जहां से जरौंधा जाने का पैदल मार्ग शुरू होता था। टेटकू उसी राह से वापस अपने घर जा रहा था जहां से एक रात वह नाराज होकर निकला था। उस काली रात और इस सुहानी सुबह में ढाई माह की दूरी है, आलस्य और परिश्रम का अंतर है, कुछ न करने के बदले कुछ कर-गुजरने का साहस है। उस रात कदम थके हुए थे, आज तरोताज़ा हैं।
          कितने दिन बीत गए थे दाई के हाथ का बना साग-भात खाए, आज खाऊँगा, जी भर कर खाऊँगा लेकिन खाने के पहले तालाब में नहाऊँगा। इस मौसम में तालाब के चारों तरफ कमल के फूल खिले होंगे, उनका गुच्छा बनाकर चुपके से सुरसती को दूँगा। सुरसती बिस्तर पर लेटी होगी या फिर अपनी गोद में बच्चे को सुला रही होगी लेकिन मैं तो जाते साथ बच्चे को जगा दूँगा, उसे गोद में ले लूँगा, उसको खूब सारा प्यार करूंगा। अरे, देखो, हड़बड़ी में सुरसती के लिए पायल खरीदना भूल गया। वह मुझसे बच्चे के बदले इनाम मांगेगी तो क्या दूँगा ? कोई न कोई बहाना सोचना पड़ेगा। सुरसती सीधी है, बहाने को सच ही मानेगी। हाँ, याद आया, बोल दूँगा- 'तुम्हारे नाप की पायल नहीं थी, सुनार को नाप दे आया हूँ, अगली बार ले आऊँगा।'
          गाँव नज़दीक आने लगा, एक जानी-पहचानी सुगंध टेटकू के दिमाग में छाने लगी। यह वही सुगंध जिसे वह बिलासपुर में भूल चुका था। मिट्टी की सुगंध, हरियाली का रंग, सूर्य की चमक, धूल की धमक और अपनेपन का आभास सब उसे घेर कर चारों ओर नाचने लगे। लो, यह गाँव आ गया, वही गाँव, उसका अपना गाँव। गाँव का जो व्यक्ति टेटकू को देखता, देखता रह जाता। सब आश्चर्यचकित।
'टेटकू आ गया !'
'तुम तो बता रहे थे कि टेटकू ने आत्महत्या कर ली !'
'अरे नहीं, देखो, टेटकू ज़िन्दा है !'
'कहाँ गया था ?'
'क्या जाने कहाँ गया था ?'
'किससे पूछें ?'
'उसी से पूछेंगे।'
'कौन पूछेगा ?'
'सब पूछेंगे।'
'क्या पूछेंगे ?'
'यही, कि क्या तुम क्यों ज़िन्दा हो ?'
'और ?'
'इतने दिन कैसे ज़िन्दा रहे।'
'और ?'
'ज़िन्दा कैसे रहा जाता है ?'
'और ?'
'हाँ, यह भी पूछेंगे कि अकेले होकर जीने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है ?'
'अरे, अभी टेटकू को घर तो पहुँचने दो....' समवेत स्वर उठा

(४)

          घर पहुँचकर टेटकू ने आवाज़ लगाई- 'दाई ओ।'
'कौन ?' घर के अंदर से रुक्मनी का स्वर दौड़ते हुए बाहर आया।
'मैं, टेटकू।'
'मेरा टेटकू।' रुक्मनी रोने लगी। 'कहाँ गया था तू ? बिना बताए ?'
'मैं कमाने गया था दाई, बिलासपुर।'
'मेरा बेटा, आ जा, देख, तेरा लड़का हुआ है।' रुक्मनी उसका हाथ पकड़कर झोपड़ी के अंदर ले गई, खुशी-खुशी टेटकू अंदर गया, छोटा सा बच्चा टुकुर-टुकुर देख रहा था, सुरसती समझ गई कि कौन आया है। वह पीठ फेर कर लेट गई और सुबकने लगी। रुक्मनी बोली- 'तेरा बाबू खेत गया है, मैं उसे बताती हूँ और बुलाकर लाती हूँ।' वह दौड़ती हुई खेत की ओर चली गई। घर में ढाई लोग रह गए। टेटकू, सुरसती और बेटकू।
'सुरसती, नाराज है रे ?' टेटकू ने पूछा।
'बात मत करो।' सुरसती भड़की। उसकी मुद्रा यथावत रही।
'बात मत करो ? क्यों मत करो ?'
'मैंने कहा न, बात मत करो।'
'नाराज हो ?'
'नहीं, बहुत खुश हूँ।'
'मैं उस दिन बहुत गुस्से में था इसलिए तुझे बताए बिना चला गया। गलती हो गई, देख, मैं आ गया। कितना सुंदर बच्चा है ये !' टेटकू की बात सुनकर सुरसती ने करवट बदली और मुस्कुराते हुए बच्चे को देखने लगी। टेटकू समझ गया कि बात बन गई, उसने धीरे से सुरसती को सहारा देकर उठाया और गले लगा लिया। दोनों रो रहे थे, बेटकू अब भी टुकुर-टुकुर देख रहा था। 
          थोड़ी देर में रुक्मनी लौट आई, बोली- 'तेरा बाबू साँझ के समय खेत से लौटेगा।' टेटकू ने रुक्मनी के हाथ में तनख्वाह में मिले रुपए रख दिया और उसके पैर छूकर बोला- 'दाई, ये मेरी पहली कमाई है, तेरी है।' रुक्मनी के हाथ सुन्न पड़ गए, गला भर आया और आँखें विस्मय से खुली रह गई। उसने जीवन में किसी ने इतने रुपए नहीं दिए थे। उसने दस रुपए टेटकू को वापस किए और धीरे से कहा- 'सुरसती को दे देना।'
          शाम को मटकूदास खेत से वापस लौटा तब टेटकू घर में नहीं था। रुक्मनी ने मटकूदास को बताया कि टेटकू को बिलासपुर में नौकरी मिल गई है और उसने दो महीने की पगार उसे लाकर दी है। मटकूदास ने पूरी बात चुपचाप सुनी और चुप रहा। सब सुनकर वह खुश भी था और दुखी भी। खुश इसलिए कि टेटकू किसी काम से लग गया, उसकी आवारागर्दी बंद हुई और दुखी इसलिए कि टेटकू को काम से लगाने के लिए उसे उस पर हाथ उठाना पड़ा। अगले दिन छठी होनी थी, दोनों ने उस पर चर्चा की और खाना खाने के बाद मटकूदास सो गया। टेटकू रात को देर से लौटा। उस रात पिता-पुत्र का वार्तालाप न हो सका। अगले दिन भी चुप्पी बनी रही, दोनों एक-दूसरे से बात करने से बचते रहे।
          छठी के कार्यक्रम में सुरसती के मायके वाले आए और बिरादरी और पड़ोस के आठ-दस लोग भी बुलाए गए। किसी ने बच्चे को कपड़े दिए तो किसी ने पैसे। रुक्मनी ने मेहमानों को खिलाने के लिए भात-साग-चटनी बनाया और साथ में चाँवल-दूध की मीठी खीर भी। खुशी के दो कारण बन गए थे, घर में नया मेहमान आया और टेटकू की नौकरी लग गई। जब मेहमान चले गए, सब बैठे-बैठे सुस्ता रहे थे, मटकूदास ने बात शुरू की- 'कहाँ काम मिला ?'
'एक होटल है बाबू, बिलासपुर में, पेंड्रावाला। टेटकू धीरे से बोला।
'ये कैसा नाम है ?'
'वहाँ सब लोग ऐसा ही कुछ कहते हैं।'
'क्या काम करना पड़ता है ?'
'साफ-सफाई करता हूँ, बर्तन-कड़ाही माँजता हूँ।'
'तू कर लेता है ?'
'कुछ दिन तक हाथ-पैर में बहुत दर्द हुआ, अब आदत पड़ गई।'
'मैं भी कलकत्ता जाता हूँ तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है।'
'हाँ बाबू, मेहनत नहीं करेंगे तो इतना पैसा कौन देगा ?'
'ठीक बात है। तू छुट्टी लेकर आया है ?'
'हाँ, कल वापस जाऊंगा।' टेटकू बोला। सुरसती ने घूरकर टेटकू को देखा। टेटकू सिर ऊपर करके छप्पर की तरफ देखने लगा।
'एक-दो दिन और रुक जा, फिर चले जाना।'
'मेरी जगह कोई दूसरा आ गया तो नौकरी हाथ से निकल जाएगी।'
'निकल जाएगी तो दूसरी नौकरी खोज लेना। तू घबरा मत, कुछ नहीं होगा।'
'ठीक है बाबू।'
'टेटकू, मैंने तुझको बहुत मारा, तू नाराज़ है रे ?'
'नाराज था बाबू लेकिन अब नहीं हूँ। आपने ठीक किया, मैं कमाने लायक हो गया। जिस दिन मुझे पगार मिली उस दिन मुझे समझ आया कि मेहनत का इनाम कितनी खुशी देता है।'
'तो क्या सोचा ?'
'नौकरी पर जाऊंगा। काम सीख जाऊंगा तो तनख्वाह भी बढ़ जाएगी।'
'फिर अपना ध्यान रखना, वहाँ कोई गलत संगत मत बना लेना।'
'हौ।' टेटकू ने आपने पिता को आश्वस्त किया। उधर सुरसती के आंसू बह रहे थे। 
          जब बाबू सो गया तब टेटकू ने सुरसती को दस रुपए अपनी जेब से निकालकर दिया। सुरसती बोली- 'मुझे क्यों दे रहे हो ? मैं क्या करूंगी ?
'इसे रख लो, परसों सुबह मैं बिलासपुर जाऊंगा, दो-तीन माह बाद आऊँगा, शायद पैसे का कुछ काम पड़े।' टेटकू ने समझाया।'
'तुम फिर जा रहे हो ?'
'जाना पड़ेगा, बाबू भी तो जाता है कलकत्ता।'
'तुम यहीं कोई काम क्यों नहीं करते ?'
'यहाँ गाँव में खेती के अलावा और क्या काम है ? बोवाई के समय छुट्टी लेकर आ जाऊंगा तब एक महीना तुम्हारे पास रहूँगा।'
'सच बोल रहे हो, झूठ तो नहीं।'
'सच बोल रहा हूँ।'
'पर इतने सारे रुपए मत दो। एक काम करो, पाँच रुपए मुझे दे दो, बाकी पाँच तुम रखो। बिलासपुर जाने का बस-किराया लगेगा और वहाँ कुछ खाने का मन करेगा तो पैसा जेब में होना चाहिए।'
'मुझे खाने के लिए वहाँ मिलता है।'
'रख लो न, गोलगप्पे खा लेना, सनीमा देख लेना और कभी-कभी दूध पी लिया करो, ताकत बनी रहती है।'
'ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।' टेटकू ने हँसते हुए कहा।
          चार दिन पलक झपकते बीत गए। सुबह-सुबह टेटकू भारत के असंख्य मजबूरों की तरह नौकरी पर फिर निकल गया। नौकरी, जो इस कदर निर्मम है कि इसे न तो परिवार का महत्व समझ आता है और न अकेले जीने का दर्द। बेहूदी नौकरी।

(५) 

          दूकान भी वही थी, मालिक वही था लेकिन इस बार की नौकरी में टेटकू पहले की तरह दुखी नहीं था क्योंकि वह भगोड़ा नहीं बल्कि जगजाहिर नौकरी पर था। पूरा गाँव जान गया था कि टेटकू मटरगश्ती करने वाला आवारा छोकरा नहीं है, बिलासपुर की होटल में काम करने वाला टेटकूदास मानिकपुरी है।
          उस्तादी एक विशिष्टता है जिसका अर्थ है होशियारी। उस्ताद का मतलब है, जो अपने कार्य में निपुण हो। उस्ताद शब्द का प्रयोग अनेक क्षेत्रों में होता है, खास तौर से संगीत में, पहलवानी में, दादागिरी में। हलवाई की दूकान में जिस व्यक्ति को मीठा और नमकीन बनाने में महारत होती है, उसे भी उस्ताद कहते हैं। इसका काम होता है, होटल में बनने वाले सामान का तालमेल बैठाना, कच्चा माल खराब न हो इसका ध्यान रखना, भट्ठी की आंच पर नज़र रखना, समय पर माल तैयार होने के बाद उसे खूबसूरती से सजाकर काउंटर पर भेजना, ग्राहक की ज़रूरत और उसके स्वाद का आकलन करना, निर्माण के दौरान सामान की गुणवत्ता का ख्याल रखना, कारखाने में हो रहे नुकसान को कम करना, मातहतों से काम लेना और मालिक तथा अन्य कामगारों के मध्य पुल का काम करना।
          होटल में उस्ताद का जलवा मालिक से अधिक होता है। इसके दो कारण होते हैं, पहला, सभी कामगार उसके 'डायरेक्ट कंट्रोल' में रहते हैं और दूसरा, होटल के चलने या न चलने का पूरा दारोमदार उस्ताद के हुनर पर रहता है। उस्ताद बढ़िया तो माल बढ़िया बनता है, माल अच्छा तो ग्राहक खुश रहते हैं, ग्राहक खुश तो दूकान चलती है, दूकान चलती है तो मालिक की तिजोरी भरती है, मालिक मालदार होता है तो उसकी बीवी गहनों से लदी रहती है, गहने पहन कर बीवी अपने पति से खुश रहती है, बीवी खुश रहती है तो मालिक के घर में शांति रहती है। समझने की बात यह है कि मालिक के घर में शांति का सूत्र इसी उस्ताद के हाथ में है।
          टेटकू की नज़र इस बार अपने उस्ताद की उस्तादी पर थी। उसे समझ में आ गया था कि झाड़ू-बर्तन करता रह गया तो ज़िंदगी भर वही करता रहेगा और तनख्वाह कभी नहीं बढ़ेगी जबकि उस्ताद की तनख्वाह उससे सात गुनी अधिक थी। उसने निर्णय लिया कि वह उस्ताद को पटाएगा और उसकी शागिर्दी करेगा।
          एक दिन की बात है कि उस्ताद रसगुल्ला की गोली करते समय गाना गुनगुना रहा था- 'सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, हमें डर है हम खो न जायें कहीं...।' टेटकू ने हिम्मत बटोरते हुए कहा- 'गुरु जी, बहुत बढ़िया गाते हो।'
'अच्छा लगा? 'मधुमती' पिक्चर का गाना है।'
'मुझे भी गाना सिखा दो गुरु जी।'
'का करेगा गाना सीख के, फिलिम में काम करेगा? सीखना है तो मिठाई बनाना सीख, नमकीन बनाना सीख तो जिंदगी भर काम आएगा।'
'मुझे कौन सिखायेगा गुरु जी?'
'सीखेगा? मैं सिखाऊँगा।' कल्लू उस्ताद ने पूछा। टेटकू बर्तन माँजना छोडकर अपने हाथ धोया, उचक कर खड़ा हुआ और झुककर उस्ताद के पाँव पकड़ लिये। टेटकू उसके पैर को पकड़ कर वहीं बैठ गया, छोड़े न। उस्ताद बोला- 'पैर तो छोड़।'
'नहीं छोडूंगा। पहले हाँ करो कि मेरे को कारीगरी सिखाओगे।'
'अच्छा चल, सिखाऊँगा लेकिन मेरी एक शर्त है, मानेगा?'
'कौन सी शर्त?'
'जो मैं कहूँगा, मानना पड़ेगा.'
'क्या कहोगे?'
'सवाल करता है। सीधे-सीधे हाँ बोल।'
'मानूँगा।' टेटकू डरते-डरते बोला।
'जा, मेरे लिए एक बंगला पान बनवा कर लाना, थोड़ी सी तम्बाखू अलग से लेकर आना।'
'जी, गुरु जी।' टेटकू ने उस्ताद के पैर छोड़े और पान लेने के लिए तेजी से निकल गया।
          टेटकू को सफाई और बर्तन साफ करने के साथ-साथ अब उस्ताद के पास बैठकर काम करने के मौके मिलने लगे। शुरुआत तो हमेशा छोटी होती है लेकिन करते-करते मनुष्य काम सीख लेता है बशर्ते वह सीखना चाहे। टेटकू को शौक था इसलिए वह उस्ताद के पीछे लगा रहता और धीरे-धीरे काम की बारीकी समझने लगा।
          पीतल के बड़े गंज में 15 सेर दूध उबलने के लिये चढ़ा हुआ था। एक तरफ उस्ताद और टेटकू समोसा भर रहे थे लेकिन उस्ताद की नज़र दूध पर थी ताकि दूध न उफने। जब दूध उबलने लगा तो उसने टेटकू से कहा- 'जल्दी कर, दूध उतार, संभाल कर।'
टेटकू उठा, दोनों हाथ में छोटे-छोटे कपड़े लेकर गंज को भट्ठी से उतारने लगा। अचानक संतुलन बिगड़ा और दूध का गंज हाथ से छूट गया। उबलता हुआ दूध टेटकू के पैरों से होता हुआ जमीन में फैल गया। टेटकू के मुंह से चीख निकली, उस्ताद उठकर टेटकू की ओर दौड़ा। चीख सुनकर मालिक कारखाने में आया, उसने देखा कि दूध छलकने से टेटकू के पैरों में जलन हो रही थी। जले हुए हिस्से में तुरंत 'बरनाल' का पीला लेप करवा दिया गया। मालिक ने उस्ताद को डांटा- 'नये लड़के को दूध उतारने के लिए किसने बोला, देखो बेचारा जल गया?'
'मैंने बोला।' उस्ताद ने कहा।
'क्यों?'
'चार महीना हो गया काम करते, अभी नया है क्या?'
'तो क्या पुराना हो गया?'
'गबरू जवान है, कब काम सीखेगा?'
'लेकिन यह ठीक हुआ क्या?'
'ठीक हुआ। भट्ठी के काम में जलेगा नहीं तो काम कैसे सीखेगा सेठ जी?'
'क्यों रे, भट्ठी में ऐसे काम करते हैं?' मालिक ने टेटकू से पूछा।
टेटकू चुप। 'सावधानी से काम किया करो।' मालिक ने डपटकर कहा और बड़बड़ाते हुए वापस चला गया।
          टेटकू के पैर में जलन हो रही थी। उसने उस्ताद से कहा- 'बहुत जल रहा है।'
'बच गया रे टेटकू, तेरे पैर में दूध का झाग गिरा, दूध जमीन में गिरा। अगर पैर में दूध गिरता तो समझ में आता कि जलना क्या होता है?'
'बच गया मैं.'
'हूँ...क्यों रे, तेरा हाथ जला है क्या? चल समोसा भर।' उस्ताद ने उसे डांटते हुए कहा।
          समोसा भरते हुए उस्ताद टेटकू को समझा रहा था- 'क्यों, सायकल चलाना सीखा था तो गिरा था या नहीं? गिरा होगा। जब गिरा होगा तब सायकल का बेलेन्स समझ में आया होगा, वैसे ही ये है। यहाँ तो रोज का काम है, उबलता हुआ दूध, खौलता हुआ शीरा, और गरम घी, ज़रा सा ध्यान बंटा, पकड़ कमजोर हुई  तो वही होगा जो आज हुआ। आज जल गया, अच्छा हुआ, अब ज़िंदगी भर इसे याद रखेगा और भट्ठी में सावधानी से काम करेगा।जवान आदमी, पंद्रह सेर दूध नहीं उठा पाया, घंटा कारीगरी सीखेगा। मालिक से मुझे ज़बरन का डांट खिलवा दिया।'
'माफ़ करना गुरु जी।'
'दूध उतारते समय क्या घरवाली की याद आ रही थी?'
'नहीं गुरु जी, लेकिन अभी याद आ रही है।'
'घर जायेगा?'
'नहीं जाऊंगा। घर जाऊंगा तो मेरी इस हालत को देखकर मुझे यहाँ कोई नहीं आने देगा, मैं वहीं अटक जाऊंगा।'
'अब दुखी मत हो, आज रात को लक्ष्मी टाकीज़ में सेकेंड शो चलेंगे, मैं तुझे 'मधुमती' पिक्चर दिखाऊँगा। वैजयंती माला को देखेगा तो तबीयत मस्त हो जाएगी।'
'पर मेरे पास टिकट के पैसे नहीं है।'
'मैं टिकट कटाऊंगा न रे पगले।' उस्ताद बोला। इस प्रस्ताव को सुनकर टेटकू अपने पैर की जलन को भूल गया और सुरसती के बदले वैजयंती माला की यादों में खो गया। समोसा भरने की गति और तेज हो गयी।
          सेकेण्ड शो रात को एक बजे छूटा। गुरु-चेला टाकीज़ से पैदल वापस लौट रहे थे। फिल्म की चर्चा चल रही थी।
'कैसी लगी पिक्चर?' उस्ताद ने पूछा।
'मज़ा आ गया।'
'क्या अच्छा लगा?'
'गाने एक से एक थे गुरु जी।'
'सबसे अच्छा कौन सा लगा?'
'दैया रे दैया, चढ़ गयो पापी बिछुआ।'
'कैसे? '
'हमारे गाँव में एक लड़का है, बहुत अच्छे छत्तीसगढ़ी गीत गाता है. वो एक गाना गाया करता था- 'चाबिस रे चाबिस, मोला बिछुआ ह चाबिस, दाई ओ।'
'क्या मतलब?'
'काट दिया रे काट दिया, मुझे बिच्छू ने काट दिया, ओ मां।'
'तेरे को कभी बिच्छू ने काटा?'
'वैजयंतीमाला वाले बिच्छू ने काटा था।'
'कब रे?'
'गुरु जी, मैं आपको आज बता रहा हूँ, मैं अपने ब्याह के पहले ही बाप बन गया था।'
'आंय, ब्याह के पहले कोई कैसे बाप बनेगा?'
'जब मेरा ब्याह हुआ तब सुरसती के पेट में बेटकू आ चुका था।'
'कैसे?'
'वही, एक दिन सुरसती को देखकर बिच्छू चढ़ गया था।' टेटकू ने हंसते हुए बताया।
          उस्ताद मोहल्ला तेलीपारा में एक कमरे की खोली लेकर रहता था। बात करते-करते उसका घर आ गया। उस्ताद ने दरवाजा खटखटाया, उसकी घरवाली ने खोला। साथ में एक अनजान को देखकर बोली- 'कौन है ये?'
'मेरा चेला है, साथ में काम करता है।'
'तो?'
'आज हम लोगों को कारखाने में काम निपटाते बहुत देर हो गई तो मैं इससे बोला, चल मेरे घर में सो जाना।'
'एक कमरे का घर है, ले आए एक और आदमी को यहाँ सुलाने के लिए, समझ नहीं आता तुम्हारी अकल को क्या हो गया है!'
'एक कोने में जमीन पर पड़ा रहेगा।'
'मैं नहीं मानती। उसको दरी और चादर दे दो, घर के बाहर सो जाएगा।' उस्ताद की घरवाली ने अंतिम फैसला सुनाया। टेटकू को दरी और चादर दे दिया गया। वह घर के बाहर चबूतरे पर सोने का प्रयास करता रहा। बहुत देर तक उसके दिमाग में वैजयंतीमाला की अदाएं तैरती रही फिर वैजयंतीमाला और सुरसती का चेहरा 'मिक्स' होकर गड्ड-मड्ड होने लगा और उसकी आँखें बोझिल हो गई। अचानक चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी और नींद ने आ घेरा। टेटकू को रात भर मच्छर काटते रहे और बिछुआ भी।

(६)

          हलवाइयों के बीच यह धारणा है कि कसाई का कुत्ता और होटल का नौकर एक जगह नहीं टिकता (यह कहावत अब कार्पोरेट सेक्टर और पत्रकार जगत में भी चलने लगी है), वह दस जगह मुंह मारता है।
वे सभी कारोबार जो श्रमिकों पर निर्भर हैं, वे श्रमिकों के बल पर ही चलते हैं। कोई भी इकाई हो, यदि के उसके पास काम करने वाले या अच्छा काम करने वाले नहीं हैं तो व्यापार का भसकना तय है। मालिक-श्रमिक सम्बन्ध सदैव मधुर नहीं रहते क्योंकि काम लेने और काम करने की मात्रा में हमेशा अंतर रहता है लेकिन जब यह अंतर बढ़ जाता है तो खटास आने लगती है। उसके बाद दोनों अलग-अलग ढंग से एक-दूसरे से अलग होने के बहाने खोजने लगते हैं जो झटपट मिल जाते हैं और मिल कर काम करने वाले दो लोग अलग हो जाते हैं।
          होटलों में यदाकदा ही कोई टिकता है, आयाराम-गयाराम होते रहता है। उस्ताद बदलते रहे लेकिन टेटकू टिका रहा। कुछ वर्षों की मेहनत के बाद वह स्वयं उस्ताद के 'लेवल' में पहुँच गया और उस्ताद बन गया। इस बीच उसने सुरसती को भी बिलासपुर बुलवा लिया, बेटकू की एक बहन भी आ गई लेकिन मां-बाप गाँव में ही थे। उसकी तनख्वाह बढ़ गई लेकिन वह नौकरी करते हुए अपनी ज़िन्दगी बसर नहीं करना चाहता था। वह इस तलाश में था कि छोटी-मोटी ही सही, एक दूकान खोल ली जाए।
          गोलबाज़ार से लगा हुआ है शनीचरी पड़ाव, जहाँ ग्रामीणों की ज़रुरत के सामान की अनेक दूकानें हैं। जहां बहुत सी आरा मशीनें भी हैं, वहीँ पर बेजा कब्ज़ा पर बनी हुई एक झोपड़ीनुमा दूकान किराये पर मिल रही थी। दूकान मालिक से किराया तय हो गया लेकिन उसने एक विचित्र शर्त डाल दी, दूकान देने के लिये उसने ऐसे व्यक्ति की 'गेरेंटी' मांगी जिसे वह जानता हो। केवल एक व्यक्ति था जिसे 'वह' जानता था और टेटकू भी, वह था 'पेंड्रावाला' का मालिक। टेटकू को समझ में न आये कि वह यह बात मालिक से कैसे कहे? उसकी हिम्मत न हो और देर हो जाने पर दूकान हाथ से निकल जाने का डर अलग से था।
          एक दिन उसने एक कप चाय बनाई और मालिक के सामने जा खड़ा हुआ। मालिक ने उसे देखा और पूछा- 'चाय लाया, लेकिन मैंने तो नहीं मंगाया।'
'स्पेशल चाय बनाया हूँ, आपके लिए।' टेटकू बोला.
'क्या बात है? कुछ चाहिए क्या? चाय पीते हुए मालिक ने पूछा।
'आपकी गेरेंटी चाहिए।'
'क्या ले रहे हो?'
'एक दूकान किराये पर ले रहा हूँ, छोटी सी चाय-भजिया की दूकान खोलूँगा। आप बोलोगे तब दूकान मिलेगी।'
'अरे वाह, धंधा शुरू कर रहा है। अच्छा सोचा है। जिसकी दूकान है उसे यहीं बुलवा ले, मैं बोल दूंगा। अब समझ में आया स्पेशल चाय का मतलब।' मालिक ने हंसते हुए कहा. टेटकू ने झुककर मालिक के पैर छुए।
          टेटकू की दूकान खुल गई, साल भर में भरपूर चलने लगी। हर दिवाली के दूसरे दिन टेटकू अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपने पुराने मालिक के पैर छूने आता है, साथ में मिठाई लाता है। मालिक को मालूम है कि टेटकू ज़रूर आएगा इसलिए वह उसके बच्चों के नाप के कपड़े पहले से मंगवाकर रखता है।
          टेटकू अब किसी मालिक का नौकर नहीं रहा, खुद मालिक बन गया है लेकिन वह अपने मालिक को आज भी अपना मालिक ही मानता है।

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