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किस्सा बजरंग केडिया का : अखबार से लिपटा आम

किस्सा बजरंग केडिया का : अखबार से लिपटा आम

(१)


          बड़े शहरों में बातें बतंगड़ नहीं बनती लेकिन छोटी बस्तियों की बातों के पंख होते हैं। सबसे बड़ी वजह होती है, आपसी सरोकार, उसके बाद होती हैं कई छोटी-मोटी बतकहियाँ। छोटी बस्ती का हर व्यक्ति अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ अच्छी तरह से बंद रखता है, यहाँ तक कि रोशनदान भी लेकिन वही व्यक्ति दूसरे के दरवाजे, खिड़कियों और रोशनदान की दरारों से झांक कर अंदर के हाल-चाल को जानने और उसे प्रसारित करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है। पुराने जमाने में 'यू ट्यूब' नहीं था इसलिए पुरुषों की बहुत सी जिज्ञासाएँ बड़ी मुश्किल और जुगाड़ से शांत होती थी। ऐसा न समझें कि 'यू ट्यूब' में उपलब्ध अनावृत्त चित्र देखना ही एक मात्र उत्सुकता रही होगी वरन यह जानकारी भी आवश्यक थी कि किसके घर में क्या चल रहा है, क्या हो रहा है ? कुछ नहीं हो रहा है तो क्यों नहीं हो रहा है ?
          पुराने समय में परिवारों में बहुत पूछताछ हुआ करती थी। कहाँ जा रहे हो ? क्यों जा रहे हो ? कब आओगे ? वर्तमान समय में ऐसे सवाल दम तोड़ चुके हैं, किसी से कुछ पूछना मना है क्योंकि परिवारों में भी अब लोकतन्त्र की आहट हो चुकी है जो 'पूछे जाने' को अपना अपमान समझती है। 'कहीं भी जाएँ', 'कुछ भी करें', तुमसे मतलब ? पुरानी रवायत जितनी गलत थी, उतनी नई शैली भी गलत है लेकिन हमारी दुनिया आज तक भगवान बुद्ध के मध्यमार्ग को अपनाने या समझने में असफल रही है। हम सदा से अति के शिकार रहे हैं और शायद हमेशा रहेंगे।
          तो अपनी बात छोटी बस्तियों से शुरू हुई थी इसलिए इस कथा को जब आप पढ़ें तो किसी कम आबादी वाली छोटी सी बस्ती की कल्पना करें। उस दृश्य को अपने जेहन में लाएँ जैसा माहौल देश की आज़ादी के आसपास के समय में रहा होगा। उस समय 'इलेक्ट्रिसिटी' नहीं थी, स्कूल-कालेज नहीं थे, अस्पताल नहीं थे, आधुनिकता लिए हुए मकान नहीं थे, घरों में नल नहीं थे, दूकानों में शटर नहीं थे। पुरुष धोती-कुर्ता पहनते थे, महिलाएं घूँघट काढ़ कर भोजन बनाती-परसती थी, बच्चे निक्कर पहनकर धूल भरी सड़कों में खेलते थे। सब को एक-दूसरे से सरोकार था, सबके सुख और दुख सबके थे।
          बिलासपुर से नजदीक ही एक छोटी सी बस्ती है, अकलतरा, आपको वहाँ ले चलता हूँ जहां के रहवासी उन दिनों के अभाव में भी मस्ती से जीते थे और हर रात को सोते समय अभाव से मुक्त होने के सुंदर-सलोने सपने देखते थे। अगली सुबह नीम की मुखारी करते हुए वे सपनों को याद करते और उन मीठी यादों को कुल्ले की कड़ुआहट साथ पानी में बहा देते।
          जड़ों से उखाड़कर नई जमीन में किसी पौधे को लगाकर पुनर्जीवित करना बेहद कठिन होता है, केवल धान का पौधा ही ऐसा है जो उखड़ने के बाद फिर रोपे जाने के बाद पनपता है लेकिन बाकी उखड़ते ही अधमरे हो जाते हैं या मुर्झा कर प्राणविहीन हो जाते हैं। प्राण केवल उनके बचते हैं जिनकी जिजीविषा-शक्ति अत्यंत प्रबल रहती है।
          पूरी दुनिया के लोग भटकते हैं, कोई रोजगार-व्यापार के लिए, कोई नौकरी के लिए, कोई आसरे के लिए, कोई पढ़ने के लिए, कोई कुछ जानने के लिए, कोई घूमने के लिए तो कोई अपना मुंह छुपाने के लिए। अपने घर को छोड़कर दूसरी दुनिया में जाने का निर्णय लेने वाले या तो अपने हालात से मजबूर होते हैं या वे दुस्साहसी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि जिसने अपना घर-परिवार छोड़ा, किसी नई जगह में जाकर बस गया, वह एक-न-एक दिन खुद को साबित कर देता है। आप तो जानते हैं कि गर्म-रेतीले रेगिस्तान में भटकता इंसान पानी और छांह की तलाश में अनवरत चलते रहता है क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं होता।

(२)

          इस कहानी को भारत के उस रेगिस्तानी इलाके से शुरू करते हैं जिसे अब रंगीला राजस्थान कहते हैं।
अतिप्राचीनकाल में राजस्थान वैसा बीहड़ मरुस्थल नहीं था, जैसा आज है. वहां सरस्वती और दृषदवती जैसी जलवती नदियाँ बहती थी लेकिन ऋतु-परिवर्तन के कारण भौगोलिक परिस्थितियाँ बदली और वहां की हरियाली थार मरुभूमि में परिवर्तित हो गई। राज्य के पूर्वी भाग को छोड़कर पूरा प्रदेश बूंद-बूंद पानी के लिए तरसता था। पानी नहीं था इसलिए कृषि भी कम होती थी। इन इलाकों में कम पानी से होने वाली उपजें हुआ करती थी जैसे ज्वार, बाजरा, काकड़ी, मिर्च, सांगरी आदि। लोगों के पास रोजगार नहीं थे इसलिए हरेक घर में फुर्सत का साम्राज्य था, शतरंज की चाल थी, गप-शप थी, बहसबाजी थी, कभी-कभी लट्ठ भी चल जाते थे।
          बीसवी शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेजों ने भारत में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे और कलकत्ता को उन्होंने अपना 'गेट-वे' बनाया। जिन बड़े घरानों का नाम आज सम्पूर्ण भारत में उजागर है जैसे बिरला, डालमिया, मोदी, बांगड़, जालान आदि, वे राजस्थान से कलकत्ता पहुंचे लोग हैं जो अंग्रेजों को मजदूर मुहय्या कराने या दलाली जैसा छोटा-मोटा काम किया करते थे। इनको अपने काम की देखरेख के लिए आदमी चाहिए थे, बंगालियों का काम उन्हें पसंद नहीं था क्योंकि वह घड़ी देखकर काम करने वाला समुदाय था जबकि उन्हें दिन-रात काम करने वाले कर्मठ लोग चाहिए थे। व्यापार का हिसाब-किताब रखने के लिए विश्वसनीय मुनीम भी चाहिए थे इसलिए वे 'देश' के परिचित लोगों को कलकत्ता बुलाकर बसाने और काम सिखाने लगे। धीरे-धीरे कलकत्ता 'मिनी राजस्थान' हो गया।
          घर में किसी का कहना न मानने वाले महाआलसी युवक कलकत्ता पहुँच कर परम आज्ञाकारी बन गए, दिन-रात गरीबी और बदहाली में जीने वाले लोग अपने घर मनीआर्डर भेजने लगे। सूखा कंठ लिए पानी के प्यासे मनुष्यों के गले हुबली नदी के मीठे पानी से तर हो गए, हफ्ते में एक बार नहाने वाले प्रतिदिन स्नान करने लगे। रोजगार और पानी की उपलब्धि ने उन्हें जीने का नया सलीका सिखाया, नई भाषा सिखाई, नए खान-पान से जोड़ा और सबके बीच रह कर काम करना सिखाया। रूखे-सूखे राजस्थान से आया पीली पगड़ी वाला इंसान जब कलकत्ता में रोज-रोज की बरसात देखता तो अपना काम छोड़कर पानी की बरसती बूंदों को निहारता और मन में सोचता- 'क्यों यह बेशकीमती पानी सड़क पर बरसकर नालियों में निरर्थक बह जाता है ?'
          राजस्थान के अलग-अलग इलाकों के लोग कलकत्ता आए। पुराने राजस्थान और हरयाणा से अधिकांश बनिया जाति के लोग आए जो सेठों की गद्दी में दिन भर काम करते और रात को उसी गद्दी पर सो जाते। उसी गद्दी के पीछे संडास थे, नहानी-घर थे, रसोई थी। वही छोटी सी दुनिया उनकी दुनिया बन गई। कुछ मारवाड़ क्षेत्र से आए, उनमें जो ब्राह्मण थे वे पूजा-पाठ कराने लगे, कुछ रसोइया बन गए। वहीं से नाई आए और दर्जी भी। राजस्थान में मुस्लिम परिवार भी बहुत बड़ी संख्या में थे जो आम तौर पर कारीगरी के काम में सिद्धहस्त थे, वे भी आए। कलकत्ता का भद्रजन इन लोगों को न चाहते हुए भी पसंद करता था क्योंकि बंगाली बुद्धिजीवी था, श्रमजीवी नहीं। राजस्थान और बिहार से आए लोग भले ही मैले-कुचैले कपड़े पहनते थे लेकिन वे बेहद परिश्रमी थे, उनके काम के लोग थे।
          राजस्थान से आए इन लोगों को कलकत्ते में 'मारवाड़ी' कहा जाता था। इन मारवाड़ियों ने अपने परिश्रम, दृढ़संकल्प और बुद्धि-चातुर्य से बहुत कम समय में अपनी उपस्थिति पूरे भारत में दर्ज़ कर दी और देश की आज़ादी के आस-पास चांदी के सिक्के उनकी तिजोरियों में भरने लगे। ये सिक्के यूं ही नहीं आ गए, इसके लिए वे भूखे रहे, जमीन पर सोए, परिवार से दूर रहे, इधर-उधर भटकते रहे, बीमार पड़े और कुछ बेचारे असमय मर-खप गए लेकिन हार नहीं मानी और आगे बढ़ते रहे।

(३)

          राजस्थान में झुन्झुनूं से कुछ दूर एक छोटा से गाँव केड में शाम के समय सिर में साफा बांधे दो बुजुर्ग रस्सी से बुनी चारपाइयों पर आमने-सामने बैठे हुक्का पी रहे थे। गर्मी के दिन थे, हवा अपने साथ रेत उड़ाकर ला रही थी। वे अपनी आँखों को सहलाते हुए उड़ती धूल को गुस्से में देख रहे थे। बुजुर्गों के पास आँखें थी लेकिन धूल की आँखें नहीं थी इसलिए वह इन बुजुर्गों की असुविधा पर गौर नहीं कर पाती और बार-बार आकर उन्हें छूते हुए निकल जाती। कुछ देर बाद हवा शांत हुई और उन दोनों में बातचीत का सिलसिला चल पड़ा।
'आज क्या खाए ?'
'बाजरे की रोटी और प्याज।'
'रोज-रोज वही खाना, ऊब गए भाया।'
'तो और क्या खाओगे ?'
'जो मिलेगा, वही खाएँगे।'
'और क्या हाल-चाल है ?'
'रामलाल के यहाँ चिट्ठी आई है कलकत्ता से, वहाँ बहुत सारे गोरे समंदर-पार से आ रहे हैं।'
'ये गोरे क्यों आ रहे हैं ?'
'अपना व्यापार करने के लिए, कुछ माल अपने देश से लाएँगे, कुछ यहाँ से ले जाएंगे।'
'हमारे यहाँ क्या है जो ले जाएंगे ?'
'कुछ होगा तब तो यहाँ आए हैं।'
'कलकत्ते का क्या हाल लिखा है चिट्ठी में ?'
'बड़ा शहर है, वहाँ व्यापार अच्छा चल रहा है। पानी जहाज से माल आता है और जाता है।'
'रामबिलास का छोरा वहीं है न ?'
'हाँ, वहीं एक सेठ के पास जम गया है। रहने-खाने का बढ़िया इंतजाम है, हर महीने घर में पैसा भेजता है।'
'हमारा रघुनाथ भी चला जाता तो अच्छा रहता। दिन भर इधर से उधर बागता-फिरता है, साल-दो साल में उसका गौना होगा, घरवाली आएगी, उसके पहले काम से लग जाता।'
'क्या बोलते हो ? उतनी दूर, परदेश में अपने छोरे को भेजोगे ?'
'यहाँ तो कुछ है नहीं, वहाँ अगर उसका काम जम गया तो कम से कम उसका परिवार चल जाएगा और बाद में अपने भाइयों को भी वहीं बुला लेगा।'
'ठीक है, रामबिलास से बात करता हूँ, वह कलकत्ते चिट्ठी लिखेगा तो उससे पूछ लेगा।'
'ठीक है।'
          हुक्के की आंच कम हो गई थी इसलिए उसे फूंका, बुझती आंच को जगाया और फिर दोनों बुजुर्ग किसी और चर्चा में लग गए।
          कुछ दिन बीते, कलकत्ता से बुलावा आ गया। रघुनाथ को जब खबर मिली तो वह घर से इतनी दूर जाने के नाम से घबराया लेकिन बाप के समझाने-बुझाने पर मान गया लेकिन उसकी माँ न मानी। उसका रो-रो कर बुरा हाल हो गया, उसने खाना-पीना छोड़ दिया। माँ बोली- 'जैसा रूखा-सूखा हमारे भाग्य में है, खा लेंगे। एक लड़का है, उसको अपने पास ही रखूंगी। एक बार घर से दूर निकल गया तो सदा के लिए परदेश का हो जाएगा। बहू जब आएगी तो वह भी वहीं चली जाएगी, मैं रघु को न जाने दूँगी।'
          एक दिन रोती-कलपती माँ को छोड़कर रघुनाथ अपने घर से निकल पड़ा क्योंकि केड के इस छोरे को किसी नई दुनिया में जाकर अपनी ज़ोर आजमाइश करनी थी। राजस्थान की हज़ारों माँओं ने इस तरह आंसू बहाए लेकिन वे आंसू रेगिस्तान की गर्म रेत में टपके और सूख गए। हर युग में मनुष्य ने जीवन का संघर्ष निर्ममता से किया है।

(४)

          रघुनाथ जैसे हजारों कलकत्ता पहुंचे जिनके पास न तो शैक्षिक योग्यता थी, न किसी कार्य में दक्षता लेकिन वे सब वहाँ मेहनतकश इंसान बना दिए गए। उनसे हर किस्म का काम लिया गया, कभी यह, कभी वह, उनके लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं था। असल बात थी कि जिसने उन्हें कलकत्ता बुलाया है उस सेठ के धनोत्पादन में वह व्यक्ति कितना मददगार है। सच पूछिए तो बंधुवा मजदूरी थी, चौबीस घंटे की नौकरी, जिसमें कुछ समय आँख मूँदने के लिए भी मिल जाया करता था। यह जरूरी नहीं था कि कोई मुनीम है तो मुनीमी ही करेगा, उसे सुपरवाइजरी या हमाली करनी पड़ सकती थी और जरूरत पड़ने पर सेठानी की मालिश भी। जो प्रवासी शहरी माहौल में खुद को नहीं ढाल पाते थे उन्हें बाहरी काम में लगा दिया जाता था, जैसे उन्हें माल-खरीदी के लिए बाहर भेज दिया जाता था या आसपास के गाँव में दूकान खोलकर गद्दी में बैठा देते थे। केड गाँव से कलकत्ते गए रघुनाथ, जिसका पूरा नाम रघुनाथ राय था, को शहर से दूर उड़ीसा में महानदी के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में भेज दिया गया ताकि वहाँ से ग्रामीण और जंगली इलाकों की वनोपज़ और खाद्यान्न इकट्ठा करके कलकत्ता 'इम्पोर्ट' किया जाए और उसके बदले में नमक और नारियल की खपत वहां की जाए।
          उस समय रेललाइन बंबई से कलकत्ता की बिछ गई थी लेकिन अंदरूनी हिस्सों में आवागमन का साधन केवल बैलगाड़ी थी। उड़ीसा राज्य में महानदी का उपयोग नाव के जरिए माल को लाने-भेजने के लिए किया जाता था। महानदी गहरी थी और उसका विस्तार छतीसगढ़ तक फैला हुआ था। रघुनाथ महानदी के पास एक झोपड़ी में रहते, वहीं कुछ बनाकर खा लेते और रात को मच्छरों की 'सिंफनी' सुनते-सुनते सो जाते ताकि सुबह के समय आने वाले मल्लाह से माल की 'डिलवरी' लें और 'डिलवरी' दें।
          दिन बीतते गए, घर से बाहर निकला रघुनाथ बाहर का ही रह गया। रघुनाथ के लड़के बच्चे हुए, बड़े होकर वे भी अपने देश वापस नहीं गए। फर्क इतना हुआ कि रघुनाथ को नौकरी करते-करते व्यापार करने के गुर समझ में आ गए और अपने लड़कों को व्यापार करवा दिया। रघुनाथ उड़ीसा की महानदी से खिसकते हुए छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी में 'शिफ्ट' हो गए। वे बंबई-कलकत्ता रेल लाइन पर स्थित बिलासपुर के समीप अकलतरा बस्ती में पहुँच गए। बड़े लड़के रामेश्वर ने अकलतरा में धंधा करना शुरू कर दिया और छोटे मदनलाल अकलतरा से दस कोस दूर जोंधरा में बस गए और कृषि करने लगे। मदनलाल के घर में सन 1939 में एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम बजरंगलाल रखा गया।

(५)

          बजरंग अपनी छः बहनों के बीच अकेला भाई बनकर मदनलाल और जड़िया बाई के घर में जन्मा। जोंधरा गाँव में स्कूल न था इसलिए बजरंग को पढ़ने के लिए अकलतरा भेज दिया गया जहां मदनलाल के बड़े भाई रामेश्वर रहते थे। किसी और के घर रहना कष्टदायक होता है, भले ही वह ताऊ का घर हो, दूसरे का घर आखिर दूसरे का होता है। यद्यपि ताऊ बजरंग का बहुत ध्यान रखते थे लेकिन ताई के द्वारा उनके खुद के बच्चों की देखरेख और बजरंग के साथ होने वाले व्यवहार में बहुत अंतर हो जाया करता था।
          बजरंग सांवला था। भारत में काले रंग के बच्चे, स्त्री हो या पुरुष, पसंद नहीं किए जाते क्योंकि त्वचा के रंग का प्रभाव भारतीय समाज में बहुत गहरा है। गोरा रंग तुरंत असर करता है, आकर्षण उत्पन्न करता है, वहीं पर काला रंग विकर्षण। भारत के हिन्दू समाज में भगवान कृष्ण ने सांवलों को बहुत सहारा दिया है लेकिन वह सहारा 'खुद को तसल्ली' देने जैसा है। बजरंग को उसके बचपन में शायद ही किसी ने प्यार से गोद में उठाया होगा, सिर्फ इसलिए कि वह मोटा और काला था, शायद वह गोद में उठाने लायक नहीं जन्मा था। उसकी माँ ने अकलतरा जाने के पहले उसे सिखाया था- 'बेटा, जो मिले खा लो, जहां जगह मिले सो जाओ और जैसा हो उसे मंजूर कर लो।'
          किसी जमाने में अकलतरा बड़ी व्यापारिक मंडी थी, धनाड्य लोगों की बस्ती थी। आम तौर पर व्यापारी धन-केन्द्रित होते है, व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं लेकिन अकलतरा की तासीर कुछ अलग थी, बड़े आदमियों के घरों में साहित्य, संगीत और नाट्य प्रेमी युवा पैदा हो गए थे जिन्होंने पढ़ने का शौक पूरा करने के लिए एक छोटे से कमरे में सार्वजनिक लाइब्रेरी खोल रखी थी। बजरंग को बचपन से ही पत्रिकाओं को पढ़ने का शौक था इसलिए वह रोज लायब्रेरी में जाता और वहाँ का शुल्क न पटा न पाने के बदले रोज लाइब्रेरी की झाड़ू-बुहारी करता। कुछ समय बाद वह लायब्रेरियन वाला काम करने लगा।
          लाइब्रेरी में 'चंदा मामा', 'नन्दन', 'चम्पक', 'बालभारती' और 'पराग' आती थी जो बजरंग को घंटों तक अपने से उलझाए रखती। खास तौर से  'चंदा मामा' के नए अंक के आने का उसे बेसब्री से इंतज़ार रहता। 'चंदा मामा' की सचित्र कहानियाँ और उन कहानियों में छुपे संदेश उसके मस्तिष्क में दिन-रात छाए रहते। बजरंग अपने भविष्य को नहीं जानता था लेकिन वह अपने वर्तमान को अध्ययन से जोड़कर उसके मज़े ले रहा था। थोड़ा बड़े होने पर बजरंग ने उपन्यासों को पढ़ना शुरू किया और उनमें इस कदर खो गया जैसे वह लाइब्रेरी उसी के लिए खोली गई हो।
          मनुष्य का गर्भाधान जितना अनियोजित होता है उतना ही उसका जीवन भी। जैविक क्रिया से उत्पन्न मनुष्य यद्यपि अन्य जीवों की तरह ही जन्म लेता है लेकिन अन्य जीवों की तुलना में इसके जीवित बचे रहने की संभावना अधिक होती है क्योंकि यह बुद्धिमान और सामाजिक प्राणियों के बीच रहता है। परिवार में पालन-पोषण होता है और शिक्षा-दीक्षा होती है इसलिए वयस्क होने तक उस पर जो 'व्यय' किया जाता है, वह 'कर्ज़' की तरह उस पर चढ़ा रहता है जिसे समय आने पर उसे ब्याज सहित अदा करना होता है। साहूकार और बैंक चक्रवृद्धि-ब्याज की दर से कर्ज़ का ब्याज लेते हैं लेकिन परिवार में 'दुश्चक्रवृद्धि' की दर से ब्याज लगता है, अर्थात लेनदेन का कोई हिसाब नहीं, चाहे जितना पटाओ वह बढ़ते ही रहता है। जो लोग उऋण होना चाहते हैं वे जीवन भर मूलधन और ब्याज पटाते रहते हैं लेकिन फिर भी उन पर कर्ज़ नहीं उतरता, वहीं पर जो 'डिफाल्ट' कर जाते हैं उनका कर्ज़ 'राईट ऑफ़' कर दिया जाता है और वे सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। 
          अजीब दुनिया है ये !
          बचपन में बजरंग की नत्थू से खूब जमती थी। दोनों साथ पढ़ते थे, साथ घूमते थे और साथ खेलते थे। नत्थू वहाँ के प्रतिष्ठित लिखमानिया परिवार का लड़का था जिसके पास कैरमबोर्ड, साँप-सीढ़ी, टेनिस, हाकी, फुटबाल आदि खेल का बहुत सारा सामान था। अभाव में जी रहे बजरंग के लिए नत्थू का साथ किसी वरदान से कम नहीं था। यह दोस्ती सातवी कक्षा तक ही चली, क्योंकि अकलतरा में उससे आगे की शिक्षा नहीं थी, बजरंग आगे की पढ़ाई के लिए अकलतरा से बिलासपुर आ गया। उसने म्युनिसिपल स्कूल में आठवी कक्षा में प्रवेश ले लिया, गोंडपारा में एक कमरा किराये से ले लिया जिसमें चार-पाँच लड़के मिलजुल कर रहते। घर के सामने भागीरथी भोजनालय में खाना खा लेता और खाली समय में बिलासपुर शहर के मज़े लेता। उसके घर के पास सदरबाज़ार था जहां उसका एक सहपाठी रहता था, इंदर सोंथालिया, जिससे उसकी पक्की दोस्ती हो गई। अकलतरा के नत्थू की कमी इंदर ने पूरी कर दी।
          म्युनिसिपल स्कूल बिलासपुर का नामी स्कूल था, भगवती प्रसाद पांडे वहाँ के हेडमास्टर थे, एक से बढ़कर एक शिक्षक थे वहाँ। दुबले-पतले-पोपले, धोती-कुर्ता-टोपीधारी भगवती प्रसाद पांडे बहुत कड़क इंसान थे। स्कूल के छात्र उनकी लपलपाती बेंत से बहुत डरते थे, शिक्षक भी भयभीत रहते थे, यहाँ तक की स्कूल की दीवारें भी उनको देखकर थर्राती थी। मिडिल और हाई स्कूल में कुल मिलकर डेढ़ हज़ार विद्यार्थी पढ़ते थे लेकिन स्कूल में चूँ से चाँ नहीं होती थी। स्कूल के मैदान से लगा हुआ था, शनीचरी पड़ाव, जहां शनिवार के दिन बाज़ार भरता था। बाजार भरने के अलावा वहाँ प्रदर्शनी 'मीना बाज़ार' लगती थी, सर्कस भी लगता था।
          बजरंग जब आठवी कक्षा में था, उन्हीं दिनों वहाँ एक सर्कस आया, सर्कस का नाम था 'ग्रेट जेमिनी सर्कस'। देखते-ही-देखते चार दिन में तम्बू तन गया, कनात लग गई, लाइट फिट हो गई और बड़े-बड़े रंगीन पोस्टर लग गए जिसमें शेर, हाथी, बंदर, ऊंट और घोड़े के चित्र बने हुए थे। एक अन्य पोस्टर में कम कपड़े पहनी हुई करतब दिखाती लड़कियों के चित्र बने हुए थे जिसमें एक जोकर को उन्हें ध्यान से देखते हुए दर्शाया गया था। बजरंग और इंदर स्कूल से छूटकर सीधे सर्कस के पंडाल के नजदीक खड़े हो जाते, रोज की 'प्रोग्रेस' देखते और लड़कियों के आकर्षक पोस्टर को गहराई तक झाँकने की कोशिश में लगे रहते। जिस दिन सर्कस का उदघाटन था, पूरे शहर में चर्चा थी क्योंकि उसी दिन सर्कस वालों ने हाथी, ऊंट और घोड़ों के साथ सभी कलाकारों का जुलूस बैंड-बाजे के साथ निकाला था। शाम होते-होते सर्कस देखने और सर्कस देखने वालों की भीड़ को देखने वाले पंडाल के सामने जमा होने लगे।
          बजरंग और इंदर भी उसी भीड़ में थे, उनके पास टिकट खरीदने के पैसे न थे इसलिए एक कोने में खड़े होकर भीतर घुसने के जुगाड़ में लगे हुए थे।
          गेट में दो मोटे-तगड़े आदमी तैनात थे जो भीतर जाने वालों की टिकट जांच कर रहे थे और 'शो' चालू होने के आधा घंटे बाद तक खड़े रहे। उन दोनों के हटते ही बजरंग और इंदर सावधानी से प्रवेश द्वार की ओर बढ़े और धीरे से परदा हटा कर अंदर घुसे। इतने में एक व्यक्ति की दहाड़ने जैसी आवाज़ आई- 'कौन है ?' दोनों उल्टे पैर सरपट भागे, उनकी कई घंटों की कठिन तपस्या व्यर्थ हो गई। गोलबाजार तक दौड़ते आए और एक चबूतरे में बैठकर सुस्ताने लगे। दिल की धड़कन तनिक थमी तो सर्कस देखने के अन्य विकल्पों पर उन दोनों के मध्य चर्चा हुई :
'अब कैसा करें ?' बजरंग ने पूछा।
'कैसा करें ? सामने दो मुस्टंडे खड़े रहते हैं, उनकी नज़र से बचना मुश्किल है।' इंदर ने कहा।
'फिर?'
'दूकान से पैसा चुरा सकता हूँ लेकिन दो टिकट का एक रुपया लगेगा, बहुत होता है। बापू से कभी मार नहीं खाया, अगर पकड़ा गया तो पिट जाऊंगा।'
'चोरी की बात मत सोच, कोई उपाय सोच।'
'किसी प्रकार अंदर घुस जाऊँ, फिर काम बन जाएगा।'
'पर घुसेगा कैसे ?'
'एक उपाय है।'
'क्या ?'
'कल सुबह जल्दी तैयार हो जाना, मैं साढ़े नौ बजे आऊँगा।'
'क्या करेगा ?'
'सुबह बताऊंगा।' इंदर ने वार्तालाप पूरा किया।
          अगली सुबह स्कूल की तैयारी से बस्ता लेकर दोनों निकले। स्कूल 11 बजे लगता था, उनके पास डेढ़ घंटे का समय था, वे सधे कदमों से सर्कस के प्रवेश-द्वार तक पहुँच गए। द्वार खुला था, सावधानीपूर्वक अंदर घुसे और चल पड़े। अंदर बहुत गर्मी थी। कुछ आदमी और लड़कियां अभ्यास कर रहे थे। एक लड़की की नज़र इन पर पड़ी, वह इनकी ओर इशारा करती हुई चीखी- 'ई...ई...ई।' उनके साथ अभ्यास कर रहे आदमियों ने इन्हें देखा और इनकी ओर दौड़ पड़े। नेपाली जैसा दिख रहे उस आदमी ने उनका हाथ पकड़ कर पूछा- 'कैसे घुसा ?'
'मालिक साहब से मिलना है।' इंदर ने साहस बटोरते हुए कहा।
'क्या करेगा ?'
'मिलना है, काम है।'
'मालिक नई रहता, मेनेजर है।'
'ठीक है, मेनेजर से मिलवाओ।' इंदर ने कहा। वह आदमी दोनों को लेकर मैनेजर के पास ले गया। मैनेजर मद्रासी था, हिन्दी नहीं जानता था। उसने इशारे से पूछा जिसका अर्थ था- 'क्यों आया?'
'हम दोनों कलाकार है, एक्टर, आपके सर्कस में काम करेंगे। इंदर ने कहा। मैनेजर को कुछ समझ में नहीं आया। नेपाली ने दुभाषिए का काम संभाला।
'यहाँ एक्टर का काम नहीं है, करतब दिखाना पड़ता है।' मैनेजर ने कहा।
'कैसा करतब ?'
'कभी सर्कस नहीं देखा क्या ?'
'नहीं।'
'तो देखो।'
'पर हमारे पास पैसा नहीं है।' बजरंग बोला।
'पैसा नहीं है ? अच्छा रुको।' मैनेजर ने कहा और कुछ खोजने लगा। उसने दो पर्चियाँ बनाई और देते हुए बोला- 'ये फ्री पास है, सेकेंड शो में आ जाना। कल सुबह आकर मुझे बताना कि वैसा कर लोगे या नहीं।'
'ठीक है, हम लोग चलते है।' इंदर ने नमस्ते करते हुए कहा।
          उस दिन स्कूल की पढ़ाई में उनका मन नहीं लगा, स्कूल का ब्लेक-बोर्ड उन्हें सर्कस का तम्बू लग रहा था और शिक्षक जोकर। रात को सेकेंड शो में वे दोनों ठाठ से अंदर गए और शान से सर्कस देख रहे थे। सर्कस के करतब दिखाना उनके बूते का नहीं था लेकिन अपना काम निकालने का गुर वे कम उम्र में ही सीख गए थे।

(६)

          बजरंग की पढ़ाई का सिलसिला अधिक नहीं चल सका, परिवार की जिम्मेदारियों ने उसे अकलतरा वापस बुला लिया। अकलतरा में पिता और ताऊ की एक राइस मिल थी, आपसे बटवारे में आधा बजरंग के पिता मदनलाल को मिला। बजरंग के पिता मदन लाल बहुत सीधे-सादे मनुष्य थे, दुनियादारी के तौर-तरीकों से नावाकिफ। बजरंग ने पढ़ाई छोड़ कर परिवार के रथ की लगाम अपने हाथों में ली लेकिन रथ के घोड़े गायब थे। राइस मिल थी लेकिन पूंजी नहीं थी जैसे, किसी के पास खेत हों किन्तु पानी न हो।
          संयुक्त परिवार में चल रही परिपाटी से बाहर निकलना बेहद कठिन होता है. परिवार के प्रत्येक सदस्य की क्रिया-प्रतिक्रिया को परम्परा और पारिवारिक मूल्यों की कसौटी पर कसा जाता है। परिवार की परंपरा और मूल्य पर बहस नहीं की जा सकती, भले ही वे आधुनिक जीवन के लिए अनुपयुक्त क्यों न हों। परिवार का प्रमुख निर्णय लेने का अधिकार अपने हाथ में रखता है और पूरे परिवार का भविष्य उसकी सोच पर निर्भर रहता है। 
          व्यापारियों के घर में विरासत के रूप में आम तौर पर पुश्तैनी व्यापार मिलता है, जो सम्पूर्ण परिवार के भरण-पोषण का स्रोत होता है। जन्म और मृत्यु पर होने वाला खर्च अधिक नहीं होता लेकिन विवाह संस्कार का खर्च कमर-तोड़ होता है। परंपरा से चले आ रहे वैवाहिक तौर-तरीके दहेज और दिखावे की गिरफ्त में सभी इस तरह जकड़े हुए हैं कि कोई चाह कर भी उससे बाहर नहीं निकल सकता। 
          बजरंग के सामने आस्तित्व का संकट था। वह अपने परिवार को आर्थिक रूप से सम्पन्न देखना चाहता था। उसे तीन बहनों का विवाह करना था लेकिन आर्थिक परेशानियों के चलते वह पहल नहीं कर रहा था। एक दिन उसकी माँ ने पूछा- 'बहनें ब्याहने लायक हो गई हैं, उनका ख्याल है या नहीं ?'
'है माँ लेकिन पैसा नहीं है।'
'पैसा नहीं है ? तो आ जाएगा।'
'कहाँ से आ जाएगा ? साहूकार से उधार लेकर राइस मिल चला रहा हूँ। सारी कमाई ब्याज और घर-खर्च में निकल जाती है, ब्याह के वास्ते पैसा कहाँ से आएगा ?'
'बेटा, पैसा आ जाएगा। मारवाड़ी की गाड़ी कभी नहीं रुकती। तू लड़का खोज, सब ठीक हो जाएगा।' माँ ने कहा।
          इस तरह बहनों के विवाह होते गए और बजरंग पर कर्ज़ चढ़ता गया, मिल से होने वाली कमाई और खर्च के बीच संतुलन गड़बड़ा गया और उसकी साख पर बट्टा लगने लगा लेकिन उसने अपना मानसिक संतुलन बनाए रखा। 
          इस बीच सोलह वर्ष के बजरंग का विवाह समीपस्थ गाँव नैला की कमला से हो गया। विवाह के बाद आर्थिक दशा बिगड़ती गई और बजरंग को उड़ीसा जाकर एक खदान में नौकरी करनी पड़ी। नौकरी रास न आई, फिर बिलासपुर की याद आई और बिलासपुर में बारह साल में बारह साझेदारी की, बारह किस्म के धंधे किए लेकिन बारह रुपए भी बैंक के बचत खाते में जमा न हुए। इस बीच तीन बच्चे हो गए, किराए का एक छोटा घर विद्यानगर में ले लिया और गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह घिसटती रही।    
          मनुष्य को यदि धन कमाना है तो धन में ध्यानस्थ होना पड़ेगा, उसे कमाई के अलावा कुछ और नहीं सूझना चाहिए। इश्क़ में आशिक़ की दीवानगी की तरह, सोते-जागते एक ही धुन होनी चाहिए, पैसा कमाने की। जिन्होंने भी दौलत कमाई है, उनकी लाटरी नहीं निकली। उन्होंने सही दिशा में प्रयत्न किए, दूरदृष्टि का उपयोग किया, अनथक परिश्रम किया, फ़िजूलखर्ची से बचकर रहे और परम स्वार्थी बने
          बजरंग ने अनथक परिश्रम किया, धनोपार्जन के सारे प्रयास किए। रंगीन बुश्शर्ट पहने और सफ़ेद धोती का एक छोर अपने कंधे में डाले श्यामवर्णी बजरंग की तोंद बढ़ते जा रही थी लेकिन जेब खाली थी। गोलबाजार के हरदेवलाल मंदिर के पास एक छोटी सी दूकान की गद्दी में बैठे बजरंग के बचपन का पाठक लेखक बनने के लिए ज़ोर लगा रहा था लेकिन बजरंगलाल और लेखन ? 

(७)


          बजरंग को जितना पढ़ने का शौक था उतना नाटक देखने और शास्त्रीय संगीत सुनने का था। चाहे जितनी व्यस्तता हो, व्यापार से समय निकाल कर नाटक और संगीत के कार्यक्रमों में वह पहुँच जाता और उसकी समीक्षात्मक रिपोर्ट बनाकर बिलासपुर से प्रकाशित होने वाले इकलौते दैनिक अखबार 'बिलासपुर टाइम्स' में छपने के लिए दे आता। अखबार के मालिक और संपादक द्वारिका प्रसाद चौबे उसकी बनाई रिपोर्ट को अवश्य छापते। बजरंग की लेखन शैली से प्रभावित होकर एक दिन उन्होंने कहा- 'बजरंग, क्या तुम प्रतिदिन समय निकाल कर 'प्रेस' में आ सकते हो ?'
'क्यों, मेरा क्या काम है ?' बजरंग ने प्रश्न किया।
'मैं चाहता हूँ कि तुम हमारे 'पेपर' में व्यापार और साहित्य वाला 'पेज' लिखो।' 
'ठीक है, मैं अपनी दूकान से समय निकाल कर आ जाया करूंगा।' बजरंग ने स्वीकृति दी। 
          जिस साझेदारी में बजरंग का व्यापार था, उसमें बैंक का काम उसी के जिम्मे था, अर्थात बैंक में पैसा जमा करना और उसका 'ड्राफ्ट' बनवाना। पैसा जमा करने और ड्राफ्ट बनने के बीच चार-पाँच  घंटे का समय लग जाता था, बजरंग उस बीच प्रेस आ जाता और 'आर्टिकल' तैयार करता। पार्टनर समझता था कि बजरंग बैंक में होगा लेकिन वह तो  'बिलासपुर टाइम्स' के सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस में अपने जीवन की नई इबारत लिखने में लगा हुआ था। यह सिलसिला करीब चार साल चला। बजरंग के लेखों की चर्चा शहर में होने लगी, 'बिलासपुर टाइम्स' की प्रसार संख्या व्यापारियों और साहित्यप्रेमियों के बीच बढ़ने लगी। बजरंग अब व्यापारी के साथ ही साथ पत्रकार भी हो गया और धोती-बुश्शर्ट के बदले फुलपेंट में शर्ट 'इन' करके पहनने लगा।  
          'बिलासपुर टाइम्स' के चौबे जी साम्यवादी सोच वाले व्यक्ति थे लेकिन शहर की राजनीति में साम्यवादी जनाधार नहीं के बराबर था इसलिए उनके अखबार में कांग्रेस के समर्थन और जनता पार्टी के विरोध में खबरें छपा करती थी। शहर में राजनीति और पत्रकारिता का माहौल कांग्रेस के पक्ष में था इसलिए उसके तोड़ के लिए अकलतरा से ही बिलासपुर आकर बस गए श्यामलाल अग्रवाल ने एक नया दैनिक अखबार निकालने का निर्णय लिया जिसका नाम रखा गया- 'लोक स्वर'। श्यामलाल अग्रवाल ने अपने पुराने परिचित बजरंग को 'लोकस्वर' से जोड़ लिया और 16 अगस्त 1979 की सुबह 'लोकस्वर' के अंतिम पृष्ठ के नीचे वाले कालम में प्रकाशित हुआ, 'प्रधान संपादक- बजरंग केडिया।' 'बिलासपुर टाइम्स' सांध्य दैनिक था जबकि 'लोकस्वर' शहर का प्रथम प्रातःकालीन अखबार। 
          'बिलासपुर टाइम्स' में चार वर्ष की निःशुल्क सेवा और 'लोकस्वर' में पाँच वर्ष तक की 'शून्य-लाभ' साझेदारी के बाद बजरंग केडिया के अखबार-प्रबंधन और पत्रकारिता की ख्याति न केवल शहर में बल्कि नागपुर स्थित 'दैनिक नवभारत' के प्रधान कार्यालय तक पहुँच गई। 'दैनिक नवभारत' का 'मेनेजमेंट' बिलासपुर संस्करण शुरू करना चाहता था। बजरंग केडिया और श्यामलाल अग्रवाल की 'लोकस्वर' साझेदारी डगमगा रही थी, उसी समय बिलासपुर के विधायक श्री बिसाहूराम यादव ने 'दैनिक नवभारत' के प्रबंधन को बजरंग केडिया का नाम सुझाया। बिसाहूराम यादव विधायक होने के पूर्व लंबे समय तक 'दैनिक नवभारत' के बिलासपुर प्रतिनिधि थे। चूंकि वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे इसलिए वे नवभारत समूह से अलग हो गए। उनकी सलाह का वहाँ बहुत वजन था इसलिए बजरंग केडिया को बातचीत के लिए नागपुर बुलाया गया। 
          बजरंग अपने बालसखा इंदर सोंथलिया के साथ नागपुर पहुंचे। 'दैनिक नवभारत' के मालिक श्री रामगोपाल माहेश्वरी और उनके पुत्र प्रकाश माहेश्वरी ने बजरंग केडिया का साक्षात्कार लिया। 
'अपने बारे में बताइये।' प्रकाश माहेश्वरी ने प्रश्न किया। 
'मूल रूप से मैं व्यापारी हूँ, तेल का व्यापार करता हूँ। अकलतरा में एक राइस मिल थी, उस जगह पर कई गोदाम बना दिए हैं जिन्हें 'फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया' को किराए पर दिया है, जोंधरा में पैतृक कृषि भूमि है।' 
'पत्रकारिता ?'
'पढ़ने-लिखने का शौक बचपन से था, संयोग से 'बिलासपुर टाइम्स' और 'लोकस्वर' से जुड़ा और नौ साल से पत्रकारिता कर रहा हूँ।'
'परिवार ?'
'दो लड़के, दो लड़कियां, सबका ब्याह हो चुका, अब पारिवारिक ज़िम्मेदारी से मुक्त हूँ।'
'जब आपके पास इतना सब है तो आप नौकरी क्यों करेंगे ?' यह प्रश्न समूह के प्रमुख रामगोपाल माहेश्वरी ने किया। 
'मैं नौकरी नहीं, पत्रकारिता करूंगा। मैंने नौ साल तक इसे किया है, मुझे यह काम अच्छा लगा, बहुत अच्छा लगा।' बजरंग ने उत्तर दिया। 
'पर यह तो बहुत मेहनत वाला काम है ?'
'मेहनत से कौन डरता है जी ! बचपन से मेहनत कर रहा हूँ। आप तो जानते हैं कि व्यापार में साहबों की खुशामद करनी पड़ती है, तेजी-मंदी का तनाव सहना पड़ता है, मैं इनसे छुटकारा पाना चाहता हूँ।'
'यह सब अखबार चलाने वाले को भी करना पड़ता है।'
'अखबार वाले को खुशामद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ अपना काम कहना पड़ता है। सच तो यह है कि साहब लोग हमारी खुशामद करते हैं।'
'फिर क्या सोचा ?'
'सब सोच कर आपके पास आया हूँ, पत्रकारिता करूंगा।' बजरंग केडिया ने भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहा।
          बजरंग केडिया को 'दैनिक नवभारत' का प्रबंध संपादक नियुक्त कर दिया गया और बिलासपुर में संस्करण शुरू करने की योजना को तेजी से पूरा करने के निर्देश दिए गए। 13 अगस्त 1984 को उन्होंने 'लोकस्वर' छोड़ा और 26 सितंबर 1984 को 'दैनिक नवभारत' का बिलासपुर संस्करण आरंभ हो गया, मात्र 43 दिनों में ! 
          'नवभारत' के बिलासपुर संस्करण के प्रकाशन की शुरुआत 20,000 प्रतियों से शुरू हुई जो बिलासपुर शहर के अतिरिक्त रायगढ़, अम्बिकापुर, जांजगीर, कोरबा, सरगुजा और ओड़ीशा के राऊरकेला तक पाठकों को पहुंचाया जाता था। दस वर्ष के अंदर 'नवभारत' की प्रसार संख्या 69,000 पहुँच गई। पूरे क्षेत्र में 'नवभारत' पढ़ना पाठकों की आदत में शुमार जैसा हो गया था। 'नवभारत' के प्रतिस्पर्धी अखबार, सब मिल कर भी इस प्रसार संख्या का 15% भी नहीं छू पाते थे। बजरंग केडिया की 'टीम' ने उनके नेतृत्व में सफलता और लोकप्रियता के अविश्वसनीय प्रतिमान स्थापित किए। 
          एक बार 'नवभारत' में शहर के एक कुख्यात अपराधी की कारगुजारियों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट छपी। अपने खिलाफ रिपोर्ट पढ़कर वह व्यक्ति क्रोधित होकर नवभारत-कार्यालय पहुंचा और बजरंग केडिया से भिड़ गया। 
'मेरे खिलाफ छापने का मतलब समझते हो तुम ?'
'आपके खिलाफ ? क्या छप गया ?' अन्जान बनते हुए बजरंग ने कहा। 
'तुमको नहीं मालूम ?'
'मैंने नहीं देखा।'
'तो, मँगवा कर पढ़ो।' उसने कहा। बजरंग केडिया ने अखबार मंगवाया, उसे बैठने के लिए कहा, उसके लिए पानी मंगवाया और उस समाचार को बड़े ध्यान से पढ़ने लगे। समाचार पढ़ने के बाद उससे कहा- 'इसमें जो लिखा हुआ है, क्या वह गलत है ?'
'सरासर झूठ है।' 
'तो आप सच लिखकर दे दीजिए, हम आपका छाप देंगे, हमारी आपसे कोई दुश्मनी तो है नहीं।' बजरंग केडिया ने उसे समझाया, गरम चाय पिलाया और प्रेमपूर्वक वापस भेज दिया। अपराधी ने अपनी सफाई में कुछ भी लिखकर नहीं दिया और उस आदतन अपराधी के खिलाफ अखबार में छपा समाचार निर्विवादित रहा। 
          मदनलाल के घर जन्मे कृष्णवर्णी बजरंग का नाम उसके जीवन में कई बार बदला; किशोरावस्था में बजरंग, राइस मिल चलाते समय बजरंग सेठ, नौकरी करते समय बी॰एल॰केडिया, मालधक्का में तेल और अनाज बेचते समय बजरंग लाल, पत्रकारिता की शुरुआत में बजरंग जी और 'नवभारत' में प्रबंध संपादक बनने के उपरांत केडिया जी। पत्रकारिता में मिले इस अवसर ने बजरंग के जीवन में वह सब दे दिया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बजरंग उन दिनों बिलासपुर के उन हस्तियों में से था जिससे संबंध बनाए रखने की ज़रूरत सबको महसूस होती थी। राजनीति के महारथी 'कैसे हैं, केडिया जी ?' कहते हुए हाज़िरी बजाने आया करते थे, अफसर फोन लगाकर हाल-चाल पूछा करते थे, उद्योगपति और व्यापारी उसके सतत संपर्क में रहते और सामान्यजन यद्यपि उनके आमने-सामने नहीं पड़ता था लेकिन 'नवभारत वाले केडिया जी' को अखबार के माध्यम से खूब पहचानता था। 
          धन, पद, बल और यश यथोचित दिशा में प्रयत्न करने से उचित समय आने पर हासिल हो जाते हैं लेकिन इसकी संभाल बहुत कठिन है। बजरंग के जीवन में  ऐसा समय आ गया जिसमें वह हर दृष्टि से समर्थ हो गया लेकिन उसने इन उपलब्धियों को अपने दिमाग में चढ़ने नहीं दिया। एक विनीत व्यापारी जैसा स्वभाव सदा बनाए रखा क्योंकि वह पत्रकारिता को अपना शौक, अखबार चलाने को व्यापार और स्वयं को 'नवभारत' का वेतनभोगी नौकर मानता था। 

(८)


          सन 1999 में बजरंग की उम्र 60 वर्ष की होने वाली थी, सेवानिवृत्ति का समय नजदीक था इसलिए उसके दिमाग में सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन की फिक्र होने लगी। उसी समय 'रीडर्स डाइजेस्ट' में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था- 'Budget your life' जिसमें सेवानिवृत्ति के बाद वाले समय के बहुत से महत्वपूर्ण सूत्र थे। उनमें से एक सूत्र था- 'वह समय आ रहा है जब तुम आगंतुकों के आने की राह देखोगे' और दूसरा- 'वह समय आ रहा है जब फोन की घंटी बजेगी तो तुम खुश होगे।' 
          बजरंग के पास चार विकल्प थे। पहला विकल्प था, सक्रिय राजनीति में प्रवेश। यद्यपि बजरंग को कांग्रेस की ओर से आम चुनाव में टिकट देने का खुला प्रस्ताव था लेकिन पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण राजनीति की खामियों और उसकी अल्पायु से वह परिचित था इसलिए उस दलदल से पर्याप्त दूरी बनाकर रखी। दूसरा विकल्प था, कोई व्यापार करने या उद्योग लगाने का। यह कार्य 'पुनः मूषको भव' हो जाता इसलिए वह सिरे से ख़ारिज़ हो गया। तीसरा विकल्प था, किसी अन्य अखबार से जुड़ना। यह ठीक समझ में आया बशर्ते कोई सम्मानजनक प्रस्ताव मिले। चौथा विकल्प था, अपने पैतृक कार्य कृषि से जुड़ना। बजरंग ने तीसरे और चौथे विकल्प को अपने भविष्य के लिए खुला रखा। 
          इस बीच बजरंग को सन 1988 में बिलासपुर-कोटा मार्ग पर पच्चीसवें किलोमीटर पर स्थित भरारी गाँव में 5 एकड़ बंजर जमीन सस्ते में मिल गई। जमीन की कीमत बढ़ेगी, इस आशा में बजरंग ने बचत का पैसा वहाँ 'इन्वेस्ट' कर दिया। इस बीच आसपास की और ज़मीनें जुड़ती गई और सन 1994 में वह 43 एकड़ का बड़ा भूखंड हो गया। 
          धीरे-धीरे सन 1999 भी आ गया लेकिन 'नवभारत' ने बजरंग को नहीं छोड़ा, सन 2000, 2001 और 2002 भी निकल गया लेकिन बजरंग और 'नवभारत' की युगलबंदी चलती रही। 16 अगस्त 2003 को 19 साल की निर्बाध सेवा के पश्चात बजरंग को सेवानिवृत्ति मिली। 'नवभारत' के बाद 'जनसत्ता' (रायपुर संस्करण) के संपादक का कार्यभार मिल गया लेकिन रायपुर-बिलासपुर 'अप-डाउन' के लायक उम्र न थी इसलिए उसे छोड़ दिया। 
          बिलासपुर के 100 किलोमीटर की त्रिज्या में अमरूद और आम की फसल के लिए बहुत अनुकूल जलवायु है। हमारी पुरानी पीढ़ी आम के पौधे लगाती थी जिसके मीठे आम उनकी अगली पीढ़ी अपने बुजुर्गों को याद करती हुई चूसती थी। आधुनिक कृषि अनुसंधानों ने पौधा लगाने और फल होने के बीच का समय कम कर दिया था और आम के मीठे फल मात्र चौथे वर्ष में पेड़ की डालों में आने लगे। बिलासपुर के कृषि वैज्ञानिक (अब स्वर्गीय) डा॰ रामलाल कश्यप के आम के वृक्षों पर किए गए अनुसंधान को राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश और दिल्ली राज्यों में अभूतपूर्व सफलता मिली और वे भारतवर्ष में आम की आधुनिक खेती के 'रोल माडल' बन गए। डा॰ कश्यप ने बजरंग केडिया को भरारी की जमीन में आम के पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया लेकिन वह बंजर जमीन थी, कृषियोग्य नहीं थी इसलिए बजरंग हिचकिचा रहे थे। डा॰ रामलाल कश्यप ने समझाया कि लाल मिट्टी में आम की फसल निश्चयतः अच्छी होगी, वे विशेषज्ञ थे इसलिए उनकी बात मानकर बजरंग तैयार हो गए। डा॰ रामलाल कश्यप ने शर्त रखी- 'जैसा मैं कहूँ, बिलकुल वैसा करना और मुझसे बहस नहीं करना।' बजरंग ने शर्त मंजूर कर ली और 12 एकड़ में आम के पौधे आधुनिक विधि से रोप दिए गए। यह बिलासपुर शहर के आसपास के क्षेत्र का प्रथम आधुनिक व्यक्तिगत आम्रकुंज था। 
          पौधों की सिंचाई के लिए 'ड्रिप इरीगेशन सिस्टम' लगाया गया ताकि आसानी से जरूरी मात्रा में पौधों को पानी पहुंचाया जा सके। खाद के खर्च को कम करने के लिए शुरुआत में 9 विशालकाय टंकियों में दस हजार आस्ट्रेलियन केचुए पाले गए जो अब करोड़ों की संख्या में तैयार हो गए हैं। इन टंकियों में केचुओं के आहार के लिए हर माह 6 ट्रेक्टर गोबर, बाग का कचरा और सूखी पत्तियों को डाला जाता है। केचुओं द्वारा उत्सर्जित मल का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है जिससे रासायनिक खाद में होने वाला व्यय कम हो गया। आँधी-तूफान की गति तेज को अवरोधित करने के लिए बाग की सीमा में चारों ओर नीलगिरी और बांस के पेड़ लगाए गए हैं। यदि वायु गति 70 किलोमीटर प्रति घंटा हो तो ये पेड़ उसकी गति को 35-40 किलोमीटर प्रति घंटा तक कर देते हैं जिससे आँधी-तूफान से फलों को होने वाला नुकसान कम हो जाता है। खेत का जलस्तर को बनाए रखने के लिए पौन एकड़ में एक डबरी (तालाब) बनाई गई जिसमें बारिश का पानी बहकर आता और भरता है और साल भर सुरक्षित रहता है। बंदरों के उत्पात से मुक्ति पाने के लिए बजरंग ने पाँच खूंखार डाबरमेन कुत्ते पाल रखे हैं जो शुद्ध शाकाहारी हैं लेकिन इतनी तेज आवाज़ में भौकते हैं बंदरों का झुंड उनके बाग से दूर-दूर ही रहता है। आसपास के गाँव बेरोजगारी से परेशान थे, अब, लगभग 150 ग्रामीणों को बजरंग केडिया के बाग में प्रतिदिन काम मिलता है।  
          पेड़-पौधों को उर्वरक और पानी देने के अलावा उन्हें 'म्यूजिक सिस्टम' के माध्यम से शास्त्रीय संगीत भी सुनाया जाता है ताकि उनका समुचित विकास हो सके। उनके बाग में 1400 विभिन्न प्रजातियों के आम के वृक्ष हैं जिनमें से 'हापुस' का स्वाद और मीठापन अपूर्व है। उनके बाग का 'लंगड़ा' आम मई माह की शुरुआत में तैयार होकर बनारस पहुँच जाता है जबकि बनारस में उसकी फसल जून के आखिर में आकर शेष भारत में जाती है। इनके अलावा दशेरी, बंबईय्या, आम्रपाली आदि अनेक मनभावन आमों की भरपूर फसल होती है। आम के वृक्षों के अतिरिक्त चीकू के 110, अमरूद के 450, मुनगा के 500, नारियल के 62, काजू के 90, आंवला के 140 पेड़ हैं। उस परिसर में 550 नीम, 400 बांस और 700 नीलगिरी के वृक्ष भी अपनी हरियाली बिखेर रहे हैं।    
          बजरंग केडिया उस संघर्षशील मनुष्य का नाम है जिसने अपनी छुपी प्रतिभा का सकारात्मक उपयोग किया और अभाव से प्रभाव तक की यात्रा में बिना थके चलता रहा. 

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