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किस्सा कल्लू कारीगर का : लिव-इन-रिलेशनशिप

 किस्सा कल्लू कारीगर का : लिव-इन-रिलेशनशिप


(१)

          उत्तरप्रदेश के किसी शहर से बिलासपुर आया कल्लू। असली नाम मालूम नहीं, जाति मालूम नहीं, जन्मस्थान मालूम नहीं, केवल नाम मालूम है, वह भी असली है कि नहीं, मालूम नहीं। उसके शरीर का रंग सुर्ख काला था, संभवतः इसीलिए उसका नाम कल्लू पड़ गया होगा। सिर में बाल रहे होंगे लेकिन उन्हें किसी ने कभी देखा नहीं क्योंकि ना जाने क्यों, वह हर पंद्रह दिन की आड़ में अपना सिर घुटवा लेता। उसकी खोपड़ी हर समय चमचमाती रहती क्योंकि वह प्रतिदिन उसमें ढेर सारा सरसों का तेल चुपड़ लेता था। जब भी बात करता तो हंस कर बात करता, उसके काले-कलूटे चेहरे पर मोती की तरह दमकते दाँत बेहद आकर्षक लगते थे। अनुमान है कि उसने जब बिलासपुर की धरती पर कदम रखे होंगे, वह बीस-एक वर्ष का रहा होगा। मिठाई बनाने का कारीगर था, 'पेंड्रावाला' में काम पूछने आया, वहाँ के मालिक रूपनारायण ने उसे काम में रख लिया, पाँच सौ रुपया महीने की पगार पर, जो उस समय के हिसाब से बहुत अधिक थी। उसकी कारीगरी गजब की थी। केशरिया पेड़ा हो दूध की केशरिया कलाकंद, बालूशाही हो या गुलाबजामुन, जलेबी हो या मलाई पूरी, ऐसा स्वादिष्ट बनाता था कि जिसने चख लिया, समझ लो लहट गया।
          गोलबाजार में मिठाई की बहुत सी दूकानें थे, आसपास, कुछ लोग उसे मिठाई लाइन भी कहते थे। सब के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा थी, सब एक दूसरे से जलते थे। दूसरी दूकान में घुस रहा ग्राहक सीने में बरछी की तरह घुसता था। इसके कारण पुराने 'नौकरों' को बरगलाना, या फोड़ना, अधिक तनख्वाह के लालच देकर अपनी दूकान में रख लेना सामान्य बात थी। इस बात पर हलवाइयों में आपसी कहा-सुनी हो जाती थी, यहाँ तक कि दुश्मनी जैसी हो जाती थी। होशियार हलवाइयों ने इसका एक और तोड़ खोजा कि किसी चलती दूकान के अच्छे कारीगर को शहर छोड़कर चले जाने के दो-चार हजार रुपए उसके जेब में ठूंस दिये जाते और उसे शहर से बाहर भगा दिया जाता था। चालू भाषा में कहें तो अत्यंत 'असहिष्णु' माहौल था।
          अब ऐसा भी नहीं था कि लट्ठ चलते रहे हों लेकिन सबके सीने में ईर्ष्या की आग सुलगती रहती थी। ऊपरी तौर पर बड़ा प्रेमभाव था, एक-दूसरे के यहाँ आना-जाना था लेकिन आना-जाना इसलिए था कि मुसकुराते हुए जासूसी कर ली जाए कि 'क्या हो रहा है ?', 'कौन काम कर रहा है ?', 'कितने ग्राहक आ रहे हैं ?' आदि। गोलबाजार में तीन सगे भाइयों की दूकानें थी, छेदीलाल खंडेलवाल की 'इंद्रपुरी', दशरथलाल की 'मौसा जी मथुरा वाले' और मूलचंद की 'नीलकमल'। तीनों दूकाने आसपास थी, तीनों भाइयों में घनघोर शीतयुद्ध था, यद्यपि खुला युद्ध नहीं होता था। कई बार नौकरों की 'आवाजाही' के प्रकरण भी उनमें कड़ुवाहट बढ़ाने में सहायक होते थे। इधर 'पेंड्रावाला' में कल्लू उस्ताद के आगमन से ग्राहक बढ़े तो 'नीलकमल' के मालिक मूलचंद के दिन का चैन गड़बड़ा गया। इस बीच 'नीलकमल' के मालिक ने 'मौसा जी मथुरा वाले' के कारीगर विश्वनाथ पटेरिया को फोड़ लिया, बात बिगड़ गई लेकिन दशरथलाल सीधे-सादे व्यक्ति थे, छोटे भाई के उत्पात को चुपचाप सह गए। अब 'पेंड्रावाला' और 'नीलकमल' में वर्चस्व की कुश्ती शुरू हुई और गोलबाजार की मिठाई दूकानें शहर के आकर्षण का केन्द्र बन गई। दूकान की सजावट, मिठाई की सजावट और हलवाइयों के चेहरे की सजावट दिनोंदिन बढ़ती गई, ग्राहकों के मजे हो गए। मिठाई सस्ती हो गई, गुणवत्ता बेहतर हो गई, कलकत्ते से नई डिज़ाइनों के मिठाई के डिब्बे आ गए, ग्राहकों को इनामी कूपन के ज़रिए इनाम-अकराम बंटने लगे। शहर भर के लोग अपनी जेबों में नोट भरकर गोलबाजार के इन हलवाइयों की दूकानों में उमड़ पड़े।
          वैसे तो सब दूकानों के ग्राहक अलग-अलग थे, विवाद से बचने के लिए सबने अपने 'स्पेशलाइजेशन' कर लिए थे, जैसे 'पेंड्रावाला' में देशी घी से बनने वाली मिठाई, नमकीन और पूरी-सब्जी, 'नीलकमल' और 'मौसा जी मथुरा वाले' में खट्टी-मीठी चटनी वाला नास्ता तथा चाय-काफी, गयाप्रसाद पांडे के यहाँ आलूबड़ा, प्याजी-बड़ा, जलेबी और चालू चाय, 'बृजवासी' के यहाँ दही और गरम-गरम मलाईदार दूध आदि। फिर भी, इन सब दूकानों में एक चीज 'कामन' थी, वह थी मिठाई जो आपसी प्रतिस्पर्धा की बड़ी वजह बनी रहती। 
          'पेंड्रावाला' और 'नीलकमल' के मध्य प्रतिस्पर्धा की वजह को समझना आवश्यक है। दोनों दूकाने आसपास थी। 'पेंड्रावाला' के मालिक रूपनारायण और 'नीलकमल' के मालिक मूलचंद खंडेलवाल के बीच गहरी दोस्ती थी। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे और उनके आपस में पतंग और डोर जैसे अन्योन्याश्रित संबंध थे। दोनों आक्रामक स्वभाव के थे, बातें करने में उस्ताद थे, एक सुर में गाते थे, एक ढंग से सोचते थे जबकि रूपनाराय खाँटी कांग्रेसी थे और मूलचंद घोर जनसंघी! मूलचंद ने जब नगरपालिका का पार्षद वाला चुनाव लड़ा तो रूपनाराय ने अपने दोस्त को जिताने के लिए अस्थाई तौर पर जनसंघी बनना जरूरी समझा और मूलचंद को जिताने के लिए जी-जान से भिड़ गए। स्टेट बैंक से एक-एक के नये नोटों की गड्डियों का इंतजाम किया और बाज़ार वार्ड के झोपड़ीवासियों का दिल खरीद लिया। मूलचंद के चुनाव जीतने के बाद रूपनाराय पुनः जनसंघियों को गरियाने लगे। वे दोनों अपशब्दों के प्रयोग करने में इस कदर प्रवीण थे कि उनका कोई भी दिन, कोई भी वार्ता या कोई भी वाक्य बिना गाली के पूरा नहीं होता था। वे किसी के भी लिए 'भो' और 'मा' शब्द से आरंभ होने वाले अपशब्दों का उच्चारण करके ही तृप्ति का अनुभव करते थे।
          सोचने की बात यह है कि जब इतनी गहरी दोस्ती थी तो इतना 'कांपिटीशन' क्यों होता था ? होता यह था कि चार-छः महीने में वे दोनों किसी ना किसी बात पर लड़ लेते थे, बातचीत बंद हो जाती, आना-जाना बंद हो जाता, और पीठ पीछे भयंकरतम गाली-गलौच का दौर शुरू हो जाता। उसके बाद दोनों एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देने का संकल्प अपने मन में पारित करते और जड़ से मिटा देने का मानसिक प्रयास आरंभ कर देते। आखिर नुकसान पहुंचाते तो भी क्या? तो, व्यापार को 'डेमेज' करने की कोशिश करते लेकिन उनकी कोशिशों से उन दोनों का व्यापार और बढ़ जाता था और गोलबाजार के अन्य हलवाइयों का व्यापार कमजोर पड़ जाता था।
            ये झगड़ा बहुत अधिक नहीं चलता था लेकिन जब तक चलता था तब तक इस दोनों के 'कामन' मित्रों के 'अच्छे दिन' आ जाते थे।

(नमूना वार्तालाप : दृश्य स्थान : 'पेंड्रावाला') :

रूपनारायण - 'आओ शुक्लाजी, क्या हाल है ?'
शुक्लाजी - 'बढ़िया है, क्या तुम्हारा मूलचंद से झगड़ा हो गया है ?'
रूपनारायण - 'तुमको कैसे मालूम ?'
शुक्ला जी - 'कल गया था उसके पास, बहुत ऊटपटाँग बोल रहा था तुम्हारे बारे में।'
रूपनारायण - 'ऐसा क्या ?'
रूपनारायण ने स्टाफ को आवाज दी- 'अबे छोटू इधर आ, शुक्लाजी के लिए बढ़िया चाय बना कर ला, अदरक डाल देना। शुक्लाजी, समोसा खाओगे क्या? गरम है।'
शुक्लाजी - 'अभी इच्छा तो नहीं है पर 'पेंड्रावाला' का समोसा खाए बिना रहा भी नहीं जाता।'
रूपनारायण - 'ला रे, अच्छे से प्लेट साफ करके दो समोसा ले कर आ। हाँ, तो मुल्लू क्या कह रहा था ?'
शुक्लाजी - 'तुम्हारे समोसे की बुराई कर रहा था। कह रहा था कि वह धोती-कुर्ता पहनने वाला हलवाई क्या जाने कि समोसा कैसे बनता है।'
रूपनारायण - 'ऐसा बोला क्या ? अच्छा, तुम बताओ शुक्लाजी अभी जो समोसा खा रहे हो वह कैसा है ?'
शुक्लाजी - 'बहुत बढ़िया है, वाह।'
रूपनारायण - 'सादा खा रहे हो, या दही-खटाई वाला ?'
शुक्लाजी - 'ये तो सादा है और बहुत बढ़िया स्वाद है।'
रूपनारायण - 'नीलकमल में सादा समोसा नहीं मिलता, क्यों नहीं मिलता ?'
शुक्लाजी - 'क्यों नहीं मिलता ?'
रूपनारायण - 'क्योंकि वहाँ समोसे में कोई स्वाद नहीं रहता, दही-खटाई-नमक-मिर्ची डालकर समोसे का 'डिफ़ेक्ट' छुपाता है और हमारे समोसे की बुराई करता है, भो.....।'
शुक्लाजी - 'सच कह रहे हो, तुम्हारा समोसा शहर ऊपर है, कोई छू नहीं सकता।'
रूपनारायण - 'अबकी बार जब जाना तो उससे बोलना कि रूपनारायण बोला है कि समोसा बनाना सीखना है तो वह कुछ दिन मेरी दूकान में आकर नौकरी करके सीख ले, मैं सिखा दूँगा।'
शुक्लाजी - 'तो, चलूँ रूपनारायण। समोसा और चाय में मज़ा आ गया। चलता हूँ।'

(नमूना वार्तालाप : दृश्य स्थान : 'नीलकमल') :

इंदरलाल - 'नमस्कार मूलचंद।'
मूलचंद - 'आओ इन्दर, बैठो, कैसे हो ?'
इंदरलाल - 'मैं अच्छा हूँ। क्या बात है, आजकल रूपनारायण तुम्हारे साथ नहीं दिखता ?'
मूलचंद - 'किस आदमी का नाम ले लिया सुबह-सुबह! थर्ड क्लास आदमी है, दोस्ती करने लायक नहीं है।'
इंदरलाल - 'तुम्हारा पुराना यार है, ऐसा क्यों कहते हो ?'
मूलचंद - 'उसके दिल में मैल है, जलता है मुझसे।'
इंदरलाल - 'अरे नहीं, मैं कल गया था, तुम्हारी तारीफ कर रहा था।'
मूलचंद - 'मेरी तारीफ, रूपनारायण कर रहां था ? हो नहीं सकता। वह तो सबको अपने पास बैठा कर फ्री में चाय-नास्ता कराता है और मुझे गाली बकता है।'
इंदरलाल - 'तुम लोगों की गाली भी कोई गाली है ! ये तो तुम दोनों के बात करने का लहज़ा है यार।'
मूलचंद - 'छोड़ो उसको, कुछ खाओगे क्या ? रसमलाई मंगवाऊँ ?'
इंदरलाल - 'रहने दो, अभी मेरा पेट खराब चल रहा है।'
मूलचंद - ' खा ले यार, ये नीलकमल की रसमलाई है, मेडिसिन है। पेंड्रावाला जैसा घटिया माल मेरे यहाँ नहीं बनता।'
इंदरलाल - 'खिलाओ, तुम्हारी बात कौन टाल सकता है। जिसको बिलासपुर शहर में रहना है उसे मूलचंद की बात तो मानना पड़ेगा।'
मूलचंद - 'कहाँ मर गए सब लोग ? कौन है यहाँ ? ला, इन्दर भैया के लिए एक प्लेट ठंडी रसमलाई ला, रबड़ी ज्यादा डालना।'
रसमलाई खाने के बाद इंदरलाल ने कहा- 'यार, मूलचंद, तुम्हारी रसमलाई का कोई जवाब नहीं। चलो, फिर किसी दिन फुर्सत से आऊँगा। यार, तुम रूपनारायण से दोस्ती कर लो।'
मूलचंद - 'दुबारा ऐसा बोलोगे तो रसमलाई नहीं खिलाऊंगा।'
इंदरलाल - 'तुम दोनों सदे-बदे हो, मुझे मत सिखाओ। अभी झगड़ा है, कल दोस्त बन जाओगे और सब दोस्तों को गरियाओगे। मैं चलता हूँ, बाद में आऊँगा।'

(२)

          इस लेखक के साथ परेशानी यह है कि लिखते-लिखते बहक जाता है। इस कथा में कल्लू की कहानी बतानी थी, वही कल्लू नामक कारीगर की, लेकिन कहानी है कि भटक कर रूपनारायण और मूलचंद की दोस्ती-यारी की तरफ चली गई। दरअसल, कल्लू की कहानी में जो 'ट्विस्ट' आने वाला है उसमें इन दोनों दोस्तों के झगड़े का बड़ा योगदान है। 'ट्विस्ट' के बारे में बाद में चर्चा होगी, अभी यह जानिए कि कल्लू ने 'पेंड्रावाला' में बहुत मेहनत और लगन से काम किया। दूकानदारी दोगुनी हो गई। वह अच्छा कारीगर होने के साथ-साथ कुशल प्रबन्धक भी था और अपने मातहतों से डट कर काम लेता था। मूलचंद ने उसे बरगलाने के कई प्रयास किए लेकिन कल्लू टस से मस नहीं हुआ। कल्लू अपने मालिक का अहसान मानता था कि उसने बिलासपुर में आश्रय और रोजगार दिया। रूपनारायण कल्लू का बहुत ध्यान रखते थे और रुपये-पैसे से संतुष्ट रखते थे। कल्लू का नाम अब 'कल्लू उस्ताद' हो गया था।
          सन १९९३ में अमेरिका में एक अंग्रेजी फिल्म बनी थी, नाम था- Indecent Proposal. इस फिल्म में डेविड नामक पात्र की कहानी थी जो कुशल आर्किटेक्ट है और उसकी पत्नी डायना रीयल इस्टेट एजेन्ट है। अमेरिका में आयी मंदी की वजह से डेविड आर्थिक संकट में फंस जाता और लिया हुआ कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता है। एक रात जान गेज़ नामक एक धनाड्य व्यक्ति ने डेविड और डायना को डिनर पर आमंत्रित किया। धनपति डायना पर मोहित हो जाता है और डायना के साथ एक रात बिताने के लिए सहमत होने पर एक मिलियन डालर देने का 'प्रपोज़ल' देता है। डेविड अर्थसंकट से घिरा हुआ था, अब धर्मसंकट में फंस गया डायना से उसका प्यार और नैतिकता डेविड को इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से रोक रहे थे जबकि एक मिलियन डालर की राशि उसके आर्थिक संकट को दूर कर सकती थी। डेविड को धर्मसंकट से उबारने में डायना पहल करती है, जान गेज़ के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है और डेविड के 'बैंक बेलेन्स' में एक मिलियन डालर बढ़ाने का उपकार कर देती है। फिल्म Indecent Proposal का यह कथानक कल्लू उस्ताद की भविष्य की घटना से कुछ-कुछ जुड़ता हुआ सा लगता है
            इस फिल्म की चर्चा इसलिए निकली क्योंकि इसके कथानक में अनेक विरोधाभासी मनस्थितियाँ हैं। कर्ज़ तले दबा हुआ एक कसमसाता हुआ इंसान है और अनायास उसके समक्ष एक मिलियन डालर जैसी बड़ी राशि मिलने की लालच, जिसके एवज़ में पश्चिमी सोच के हिसाब से एक रात की रतिक्रिया कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। दूसरी तरफ उसकी प्यारी पत्नी का अपने आर्थिक लाभ के लिए उच्चस्तरीय वेश्यावृत्ति जैसा उपयोग जिसके लिए पति स्वयं को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहा था। संभवतः उस प्रस्ताव की रकम कम होने पर इंकार करना आसान होता लेकिन लेकिन उतनी बड़ी राशि को ठुकराना पति के लिए कठिन हो गया। धन के समक्ष प्यार और नैतिकता का प्रभाव कमजोर पड़ गया !
          वैसा ही कल्लू उस्ताद के साथ हुआ। जब मूलचंद ने कल्लू को एक दूकान का मालिक बनने का लालच दिया तो वह पिघल कर मूलचंद की मुट्ठी में समा गया और वह 'पेंड्रावाला' की नौकरी छोडकर एक छोटी सी चाय दूकान का मालिक बन गया।
          अब आप समझ ही गए होंगे कि इस घटना से रूपनारायण और मूलचंद के बीच तनातनी और अधिक बढ़ गई होगी। वे दोनों दोस्ती और झगड़ा, दिल लगा कर किया करते थे। फर्क सिर्फ इतना होता था कि दोस्ती के दौरान वे दूकान में कम बैठते थे और तनातनी के समय अधिक क्योंकि बोल-चाल बंद होने के कारण दोनों का साथ घूमना-फिरना और 'अन्य गतिविधियां' कम हो जाती थी।
          तो कल्लू मिठाई बनाने वाले कारीगर से चाय वाला बन गया, एक तरह से उसकी कला का अवमूल्यन हो गया लेकिन परिश्रम का अधिमूल्यन हो गया। नौकर से मालिक बन गया। जब जेब में गर्मी बढ़ी तो वह दिमाग में चढ़ने लगी। उसका दिन का समय दूकान में कट जाता लेकिन रात अकेले नहीं कटती थी। अचानक कल्लू की मुलाक़ात एक युवती से हो गई जिसे कल्लू ने अपने घर में 'रख' लिया। 'रख लिया' को आप समझ गए ? इसे पुराने जमाने में 'रखैल रखना' कहते थे, छत्तीसगढ़ में 'चूड़ी पहनाना' कहते हैं और आधुनिक परिभाषा में 'लिव-इन-रिलेशनशिप', अर्थात विवाहमुक्त किन्तु आनंदयुक्त जीवन। जेब की गर्मी ने कल्लू पर अपना असर और बढ़ाया तो उसके कई दोस्त-यार बन गए और पीना-पिलाना शुरू हो गया। 'पीना-पिलाना' को समझ गए आप ? देसी ठर्रा चढ़ाना, छत्तीसगढ़ में ऐसे व्यक्ति को 'दरुहा' कहते हैं और आधुनिक परिभाषा में 'सोशल ड्रिंकर', अर्थात टुन्न किन्तु मदमस्त जीवन।
          रूपनारायण और मूलचंद हमेशा की तरह पुनः दोस्त बन गए और उनकी जुगलबंदी चलने लगी। उनकी इस पुनःनवीनीकृत मित्रता का शिकार कल्लू बना। मूलचंद ने एक दिन अचानक कल्लू को दूकान खाली करने के लिए कह दिया। मूलचंद की यह छोटी सी दूकान नीलकमल और मालिकराम मेलाराम की दुकान के बीच में बनाई गई थी। वहाँ पाँच फुट की एक गली थी जिसका पब्लिक के आने-जाने के लिए निरर्थक सा उपयोग होता था। जनसंघ शासित नगरपालिका थी इसलिए मूलचंद ने अपने प्रभाव का उपयोग करके गली को बिना किसी अवरोध के छोटी-छोटी दूकानों में परिवर्तित कर लिया। वैसे भी, हमारे शहर की नगरपालिका (अब नगरनिगम) दरवाजे में खड़ी ग्राहक अगोरती वेश्या की तरह है जिसे केवल पैसे से मतलब है। यह तो अच्छा हुआ कि शाहजहाँ ने ताजमहल बिलासपुर में नहीं बनवाया अन्यथा वह भी किसी प्रभावपति को निगम ने उसे भी 'एलाट' कर दिया होता। यहाँ आप यह अर्थ न निकालिएगा कि निगम के अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि भ्रष्ट या बेईमान हैं, वे तो ऐसी गन्दी कमाई को हाथ नहीं लगाते। 'सिस्टम' यह है कि आपको निगम के स्वामित्ववाली कोई जगह या दूकान या भवन चाहिए तो आपस में 'रेट' तय कर लीजिए। कुल कीमत का आधा निगम के ख़जाने में जमा हो जाएगा, आपको पक्की रसीद मिलेगी, शेष आधा सम्बंधित अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि के बाल-बच्चों को पूर्वनिर्धारित मात्रा में निछावर के रूप में वितरित कर दिया जाता है।
          'पंद्रह दिन में दूकान खाली करो' की नोटिस से भयभीत कल्लू गोलबाजार में इधर-उधर भटकते हुए कोई दूकान खोजने लगा। छितानी-मितानी धर्मशाला वाली गली में उसे एक दूकान किराए में मिल गई, वह जरा बड़ी भी थी, कल्लू वहाँ 'शिफ्ट' हो गया। कुछ ही दिनों में उसका धंधा वहां भी चमक गया। उसकी चाय और आलू की भजिया की खुशबू दूर-दूर तक फैलने लगी। सुबह से रात तक ग्राहकों का मजमा लगा रहता और कल्लू की चांदी कटने लगी। शाम के समय उसकी रखैल दूकान में आती और बड़े नोट समेटकर अपने ब्लाउज़ के अन्दर सम्हाल कर रख लेती और कल्लू उसे मुस्कुराता देखता रहता।

(३)

          इस दुनिया का भी अजीब हाल है, जरा सा सुख घर आता है तो दुख दरवाजा खटखटाने लगता है। कल्लू भी तो इसी दुनिया का आदमी था, भला वह कैसे बचता ?
          जब धंधा या नौकरी अच्छी चल रही हो तो इन्सान को 'फील-गुड' होने लगता है। घर में प्रेम-व्यवहार हो तो और भी अच्छा लगता है लेकिन शांत जल में कोई-न-कोई कंकड़ टपक ही जाता है और उसकी लहरों में हाहाकार मच जाता है। यह समझना बड़ा मुश्किल है कि जीवन में मधुरता कैसे बनी रहे ? अच्छा करो तो बुरा वापस आता है और अगर बुरा करो तो बुरा वापस आना ही है। इसका एक अर्थ यह निकलता है कि अच्छाई 'वन वे ट्रेफिक' है, जैसे गुलाब के पौधे की कलम इस उम्मीद से जमीन में खोंसो कि एक दिन इसमें गुलाब के खुशबूदार फूल होंगे, रोज खाद-पानी दिया, वह बढ़ा और जंगली काँटेदार पौधा निकल गया, गुलाब का फूल कभी उगा ही नहीं। हर मनुष्य से यह भूल होती है, उसी प्रकार कल्लू से भी हुई। उसकी प्राणप्यारी एक दिन घर का सारा गहना-गुरिया और धन-दौलत लेकर लापता हो गई। कल्लू बेसहारा हो गया, बाजार की देनदारी चढ़ गई, वह कर्जदार हो गया और उसका धंधा बैठ गया। कल्लू को अब केवल 'लालपरी' का सहारा था, वह उसी में डूब गया पर ऐसा कितने दिन चलता ?
          कल्लू ने एक बार व्यापार कर लिया तो वह नौकरी करने लायक न बचा। उसने शादी-ब्याह में काम करना शुरू किया और साल-दो-साल में शहर की सभी बड़े घरों की शादियों के काम उसे मिलने लगे। कुछ समय बाद उसने खुद काम करना बंद कर दिया और अपने मातहतों से काम करवाने लगा. बताने का अर्थ यह है कि वह 'वर्कर' से 'डायरेक्टर' बन गया, इस कारण काम बिगड़ने लगा तो उसका नाम भी बिगड़ने लगा। बाजार में नए प्रतिस्पर्धी आ गए, कल्लू के बुरे दिन फिर लौट आए। उसका शरीर और मनोबल टूटने लगा, अत्यधिक शराबखोरी ने अपना असर दिखाया और कल्लू असमय इस दुनिया से चला गया।
          श्मशान में उसी कल्लू का शरीर आग की लपटों से घिरा हुआ था जो केशरिया पेड़ा हो या दूध की केशरिया कलाकंद, बालूशाही हो या गुलाबजामुन, जलेबी हो या मलाई पूरी, ऐसा स्वादिष्ट बनाता था कि जिसने चख लिया, समझ लो फँस गया।

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