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किस्सा महेश चौकसे का : पक्का व्यापारी

किस्सा महेश चौकसे का : पक्का व्यापारी 

(१)

          बिलासपुर का मोहल्ला तारबाहर 'रेलवे एरिया' और 'टाउन एरिया' की सीमा है। सौ साल पहले यह हिस्सा कंटीले तार से घेरा गया था क्योंकि तार के घेरे के उस पार एकदम सन्नाटा था, जंगली जानवरों का डर था और चर्चा यह भी थी कि वहाँ रात में जिन्न विचरते हैं इसलिए बस्ती के लोग उस पार नहीं जाया करते थे। वैसे, जंगली जानवर और जिन्न भी इन्सानों के डर से इस पार नहीं आते थे।
          इस बस्ती में दो लोगों का विकट आतंक था, मोना खान और बिशुन मोंगरे का। उनके डर का आलम यह था कि शहर के लोग अंधेरा होने के बाद तारबाहर की सड़क से आना-जाना बंद कर देते थे। जिन्न और भूत-प्रेत के संकट से सबको बचाने वाला हनुमान-चालीसा भी इन उपद्रवियों पर असर नहीं करता था। कोई भरोसा नहीं था कि ये दो बदमाश किसके पेट में छुरा घुसेड़कर निकाल लें और लूटपाट करके भाग जाएँ।
          अपने देश में आबादी इस तरह बढ़ रही है कि जिस जगह पर सन्नाटा पसरा होता है, वह भी धीरे-धीरे आबाद हो जाती है। तारबाहर के अन्न उत्पादक खेत अब शिशु-उत्पादक घरों में तब्दील हो गए हैं। जिस जगह जाने से लोग डरते थे वहाँ अब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च बन गए और बाजार सज गए हैं। रेलवे कालोनी से लगे इस भू-क्षेत्र में गरीब और मज़बूर लोगों ने अपने लिये छोटे-छोटे घर बनाए और वे कालान्तर में फैलते गए। चूंकि इस मोहल्ले में मुस्लिम परिवार अधिक संख्या में बसे हैं इसलिए उनके घरों के आस-पास मुर्गे-मुर्गियाँ दौड़-भाग करते रहती थी। किशोर-वय के मनचले किसी बीमार और कमजोर मुर्गे को सड़क से निकलते साइकल सवार के सामने अचानक छोड़ देते और फड़फड़ाता हुआ मुर्गा यदि उसकी सायकल से कुचल गया तो समझ लीजिए कि मुर्गा फेकने वालों के लिए एक मुर्गा फंस गया। आसपास में छुपे वे बदमाश बाहर निकलकर भीड़ लगा लेते, साइकल सवार से झगड़ा करते और दो रुपए के मुर्गे के दस रुपए वसूल करने के बाद ही उसको वहाँ से जाने की इजाज़त देते। मुर्गे के असल मालिक को दो रुपए मिल जाते, बाकी आठ रुपए शोहदों में बंट जाता और फिर उसका मुर्ग-मुसल्लम और दारू वाली पार्टी होती। ये चतुर बदमाश यदि फिजूलखर्च न होते तो वे इतनी चील-बुद्धि के थे कि आज वे अंबानी-अदानी की हैसियत के बराबर होते!
          फिर भी, मोहल्ला तारबाहर में एक चतुर खिलाड़ी लड़कपन की उम्र में आया, रहने नहीं, दूकान चलाने, वह भी राशन की। नाम था मुंशीराम, मुंशीराम उपवेजा। सीएमडी कालेज में पढ़ता, पढ़ता क्या था, नेतागिरी करता था। बातें करने और बातें बनाने में बेमिसाल। इलेक्शन जीतना हो या परीक्षा देना हो, वह सफलता के लिए किये गए हर उपाय को जायज़ मानता था। उसने तारबाहर के आतंकी मोना खान को अपना सहयोगी बनाया। मोना खान लोगों को धमकाने का काम करता था और मुंशीराम मुस्कुराकर भरमाने का। राशन की दूकान और मनमोहक भाषण के भरोसे उसकी तरक्की होती गई और एक दिन वह बिलासपुर की नगरपालिका का 'डिप्टी मेयर' बन गया। यह 'तारबाहर इफेक्ट' था। हमारे देश के गणतन्त्र में बाल्मीकि को महर्षि बाल्मीकि में 'शिफ्ट' करने के प्रयोग निरन्तर जारी हैं ! 
          मुंशीराम ने अपनी योग्यता का चौतरफा उपयोग किया और अब उस पर माँ लक्ष्मी की 'किरपा' बरस रही है. वह बिलासपुर की सबसे शानदार टाकीज़, एक 'थ्री-स्टार' नुमा होटल और अनेक जमीन-ज़ायदाद का मालिक है। आर्थिक वैभव ने मुंशीराम के प्रतिष्ठा स्वाभाविक रूप से बढ़ा दी और अब वह एक अत्यंत सम्माननीय नागरिक के रूप में जाना जाता है।
          आप यह न समझिएगा कि लेखक आपको मुंशीराम की कथा बताने वाला है, उसका ज़िक्र तो तारबाहर की पुण्यभूमि की बात निकली इसलिए आ गया; दरअसल, आपको उस व्यक्ति के बारे में बताना है जो इस कथा-लेखक के साथ दसवीं कक्षा तक साथ में पढ़ा और अपनी घरेलू परेशानियों के चलते पढ़ाई छोड़कर तारबाहर चौक की एक पान की दूकान में बैठ गया। 
          चेहरे पर चेचक के गहरे दाग लिए, दसवी कक्षा में मेरे साथ पढ़ रहे महेश के पिता रामदयाल चौकसे सात भाई थे और मध्यप्रदेश के जिला सिवनी के सहजपुरी गाँव में रहते थे। कृषक थे, कमाई में दम न था, परिवार का खर्च मुश्किल से चलता था। रामदयाल का विवाह करना था, जिनके बच्चे ज्यादा होते हैं वे बच्चों के ब्याह करने के हड़बड़ी में रहते हैं ताकि उनके सामने सबकी गृहस्थी बस जाए और गंगा नहाएँ। मध्यप्रदेश के ही जिला मंडला के ककईया गाँव की एक खूबसूरत लड़की का पता चला तो रामदयाल की अम्मा ने लड़की को देखे बिना संबंध तय कर दिया और श्यामाबाई बहू बनकर घर आ गई।
          रामदयाल के मामा बिलासपुर में ठेकेदारी का काम करते थे, उन्होंने रामदयाल को बिलासपुर बुला लिया और प्रताप टाकीज़ में सायकल स्टेंड का ठेका दिलवा दिया। कुछ दिनों बाद रेल्वे स्टेशन के स्टेंड का ठेका मिला। मोहल्ला टिकरापारा में रहते-रहते चार लड़कों और एक लड़की से घर भरपूर हो गया लेकिन कमाई का साधन ठीक-ठाक नहीं बन पाया और परिवार के दिन बड़े कष्ट में बीत रहे थे। उनके घर में नागिनबाई नाम की महिला झाड़ू-पोछा का काम करती थी। उसे रेल्वे में कार्यरत मृत पति के एवज़ में पचीस वर्गफुट का एक भूखंड तारबाहर की सीमा में पान की दूकान खोलने के लिए मिला जिसे उसने अपने मालिक रामदयाल को चलाने के लिए दे दिया। सुनसान इलाका था इसलिए धंधा कम था, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना जब असंभव हो गया तो रामदयाल ने अपने बेटे महेश की पढ़ाई छुड़वा दी और वह अपने पिता के साथ पान की दूकान में बैठने लगा।
          पान की दूकान में दो बातें ज़रूर होती हैं, एक उधारी का चलन और दूसरा ग्राहक की पहचान। उधारी वाली बात तो आसानी से समझ में आ जाती है अर्थात ग्राहक ने कहा- 'लिख लेना' याने उधारी हो गई। उधार लेकर वापस करने वाले बहुत कम होते हैं, अधिकतर ग्राहक उधार बढ़ाकर अंतर्ध्यान हो जाते हैं। ऐसे ग्राहक कहीं रास्ते में सपड़ा गए तो ताव से कहेंगे- 'कहीं भागे जा रहे हैं क्या ?' मजबूर दूकानदार उसे भगोड़ा भी नहीं कह पाता क्योंकि ऐसा कहने से पैसा वापस मिलने की उम्मीद का आखिरी धागा भी टूट जाता है। जिसके व्यापार में ऐसे ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है, उसका बंटाधार होना तय है। बेईमान सर्वत्र व्याप्त हैं, जरा सी असावधानी हुई और दुर्घटना घटी। रामदयाल बहुत सीधे आदमी थे, किसी को मना करना नहीं जानते थे इसलिए उधारी-छाप ग्राहकों ने उनकी दशा को दुर्दशा में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
          पान दूकान की दूसरी खासियत होती है, ग्राहक की पहचान। इस अर्थ यह है कि पान खाने वाला यह उम्मीद करता है कि पान वाला उसे देखते ही समझ जाए कि उसके पान में क्या-क्या और कितना डालना है ? इस बात को ग्राहक अपने सम्मान से जोड़कर देखता है और मनचाहा पान तैयार हो जाने पर प्रसन्नता की अनुभूति करता है। सिगरेट पीनेवाला सिर्फ इतना कहेगा- 'सिगरेट देना।' अब यह पान वाले का परम कर्तव्य है कि वह ग्राहक की पसंद का 'ब्रांड' मुहैया करे। इन छोटी-छोटी बातों की सावधानी रखने से पान की दूकानें चलती हैं या असावधान होने पर बैठ जाती हैं।
          पान दूकानों के आसपास रोचकता और बेहूदगी का मिलाजुला माहौल रहता है। रोचक इस तरह कि देश-विदेश की समस्त घटनाओं का 'आँखों देखा' विवरण अनवरत उपलब्ध रहता है। इन घटनाओं के भीतर की अदृश्य बातें भी यहाँ दृश्यमान हो जाती हैं। गपोड़ी और आत्ममुग्ध लोग दिन भर आते रहते हैं, उनके चेहरे बदलते रहेंगे, मुद्दे बदल जाएंगे, बहस छिड़ जाएगी, निर्णय सुना दिए जाएंगे। पुरानी भीड़ छंट जाएगी, नयी लग जाएगी।
          आती-जाती लड़कियों पर नयनों के बाण चलेंगे, वाक्प्रहार होंगे, रोमांटिक गाने गुनगुनाए जाएगे और फिर वीभत्स ठहाके। पान खाने वाले पान चबाएंगे, रस-पान करेंगे और वहीं 'पिच-पिच' करते हुए चित्रकारी का हुनर दिखाएंगे। सिगरेट पीने वाले आसमां की ओर देखते हुए कश खीचेंगे, थोड़ा सा धुआँ अपने सीने में रखेंगे और बाकी जनता-जनार्दन को अर्पित कर देंगे ताकि सिगरेट न पीनेवाले उस धुएँ की गंध का निःशुल्क आनंद ले सकें।     
           बिलासपुर में संतोष-भुवन होटल के पास एक 'बरऊ पान वाला' था, जायसवाल। वह अपने ग्राहकों का स्वागत सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए करता था इसलिए उसका आदर-भाव स्वीकार करने के लिए सुबह से लेकर रात तक उसकी दूकान में भीड़ लगी रहती थी। घर में तो हमारी दो कौड़ी की इज्ज़त नहीं है, शहर में कोई तो है जो इज्ज़त देता है और प्यार से पान भी खिलाता है! इसी प्रकार गोलबाजार में भरतसिंह ठाकुर की पान दूकान खूब चलती थी। वे दो भाई थे, भरत और शत्रुघन। बड़े भाई भरत के रहते दूकान में भीड़ लगी रहती क्योंकि वह ग्राहकों की बात में शामिल होते थे, ठहाका मार कर हँसते थे और रोचक अपशब्दों का प्रयोग भी किया करते थे लेकिन शत्रुघन के सामने ग्राहक कम हो जाते थे क्योंकि वे धीर-गंभीर स्वभाव के थे, ग्राहक उनसे बिदकते थे।
          गोलबाजार में सुरेश शुक्ला की पान दूकान हुआ करती थी जिसका नाम था- 'बेगम पसंद पान की दूकान' जहां महिलाओं की पसंद का ख्याल करते हुए मीठे स्वाद वाला पान बना कर उसके ऊपर चांदी का वर्क लपेटा जाता था जिसे विवाहित पुरुष अपने घर ले जाकर पत्नी को प्यार से खिलाते थे, फिर दोनों मिलकर खिलखिलाते थे।

(२)

          तारबाहर चूंकि शहर से बाहर था इसलिए वहाँ ग्राहकों की आवक-जावक कम थी। रेल्वे में काम करने वाले पान के शौकीन नहीं थे, हाँ, सिगरेट पीने वाले कुछ ज़रूर थे। पास में ही सीएमडी कालेज था, कुछ छात्र जिनका पढ़ाई में दिल नहीं लगता था वे घूमते-मँडराते वहाँ आते इसलिए कुछ देर चहल-पहल बनी रहती, उसके बाद वही सन्नाटा।
          महेश ने जब पढ़ाई छोड़ कर अपनी दूकान में बैठना शुरू किया तो उसने ग्राहक बढ़ाने के कुछ उपाय किए और पान दूकान को 'जनरल स्टोर' का रूप दे दिया। उसकी दूकान का सबसे बड़ा आकर्षण था, विदेशी सामान जिसे उस जमाने में 'स्मगल्ड गूड्स' कहा जाता था, आसानी से मिलने लगा और शहर के ग्राहक वहाँ मजबूरन टपकने लगे। महेश ने वहाँ रेल्वे के अफसरों से जान-पहचान बढ़ाई और बगल में चाय दूकान खोलने के लिए 100 वर्गफीट जमीन का अपने नाम से आबंटन करवा लिया। पान के साथ चाय की दूकान भी चलने लगी, गरम-गरम समोसा और आलूबड़ा भी बनने लगा।
          महेश पक्का व्यापारी निकला। पक्का व्यापारी उसे कहते हैं जो एकाग्रचित्त होकर व्यापार करता है। ऐसे व्यक्ति को अपने व्यापार के अलावा अन्य किसी गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं होता। कोई जिए या मरे, कोई आये या जाए, कोई हँसे या रोये, व्यापारी को अपने व्यापार से मतलब रहता है।
          बिलासपुर के ही गोलबाजार में किराना के बड़े व्यापारी थे मालिकराम। खुलने से लेकर बंद होने तक दूकान में जम कर बैठते थे, 24 में से 12 घंटे तक उनके फोन का 'रिसीवर' उनके कान से चिपका रहता था ताकि देश-दिसावर के ताजा भाव-ताव उन्हें मालूम होते रहें। उनको यदि कहीं फोन लगाना होता तो रात के बारह बजे के बाद ट्रंक-काल लगाते क्योंकि उस समय आधा चार्ज लगता था। रात को कई बार जागते, फोन पर बात करते और फिर फोन की अगली घंटी आने तक झपकी ले लेते। उनके लिए बचपन में पढ़ी एक कविता सटीक बैठती है- 'हरे रंग का है यह तोता, जाने कब जगता कब सोता।'
          जिस दिन मालिकराम की बड़ी लड़की की शादी थी, वे शाम को सात बजे तक दूकानदारी करते बैठे रहे, अगली सुबह नौ बजे दूकान खोल कर बैठ गए। ऐसे व्यक्ति को कहते हैं, एकाग्रचित्त व्यापारी। महेश को भी मालिकराम वाला संक्रामक रोग लग गया था।
          इसके अलावा महेश में और भी कुछ ऐसे गुण थे जो मालिकराम में भी नहीं थे। महेश ने अच्छे व्यवहार को अपनी सफलता की सीढ़ी बनाया। गम खाना और कम खाना, ये दोनों गुण उसने आजीवन निभाए। परिचितों और ग्राहकों से बातचीत में मिठास रहती ही थी, अपने 'स्टाफ' से भी वह मीठी भाषा में बात करता। जैसे किसी की 'ड्यूटी' सुबह छः बजे है और वह साढ़े आठ बजे आया तो महेश खड़े होकर उसका स्वागत करता और हाथ जोड़कर उससे कहता- 'आइये पिताजी, आप आ गए ! मैं तो सोच रहा था कि आज आप शायद नहीं आएंगे।'
'देर हो गई सेठ जी।'
'चलो कोई बात नहीं, अब काम से लगो।' महेश कहता। महेश जानता था कि व्यापार का आधार 'स्टाफ' होता है इसलिए उसे संभालकर रखना बहुत ज़रूरी है। संतोष नायक नामक एक उड़िया बालक महेश की चाय दूकान में 10/- प्रति माह के वेतन पर काम से लगा और उसने पचास वर्षों तक काम किया। सन 2005 में जब उसकी मृत्यु हुई तब उसका वेतन 12000/- प्रति माह चल रहा था।
          खैर, अपन आगे बढ़ गए, वापस चलते हैं। महेश की पान के साथ चाय की दूकान भी चलने लगी लेकिन गृहस्थी का बोझ फिर भी नहीं सम्हल रहा था। उन्हीं दिनों 'चड्डा कृषि फार्म' के मालिक चमनलाल चड्डा महेश से मिलने उसकी दूकान पहुंचे। उन्होंने गन्ने का रस निकालने की मशीन लगाने का सुझाव दिया और वहाँ एक बोर्ड लग गया 'मधुशाला', जहां गन्ने का मीठा-ठंडा रस मिलने लगा। गन्ने के रस ने महेश की ज़िंदगी में रस घोल दिया, उसके परिवार के अच्छे दिन शुरू हो गए।
          महेश के साथ उसके सब भाई भी मिलकर काम करते थे, पिता रामदयाल की दूकान में सक्रियता कम हो गई और वे घर के कामकाज में व्यस्त रहने लगे। टिकरापारा गुजरातियों का मोहल्ला है। गुजराती परिवार उन्मुक्त स्वभाव के होते हैं। खाने-पीने का शौक और आपसी मेल-जोल उनके स्वभाव में होता है। महेश का परिवार गुजराती नहीं था, फिर भी उसका घर मोहल्लेवालों के आवागमन से भरपूर रहता। आसपास के घरों से बहुत प्रेमव्यवहार था, रोज के रोज ढोकला, थेपला, दहीबड़ा और सब्जियों का आदानप्रदान चलते रहता। रात को बारह बजे तक गप-शप और हंसी-ठट्ठा होता, कैरम की भिड़ंत होती, ताश-पत्ती का फड़ जमता और बीच-बीच में नास्ता-चाय के दौर भी।
          महेश की माँ जितनी खूबसूरत थी उतनी ही व्यवहारकुशल भी। घर में उन्हीं का दबदबा था, सब उनसे डरते थे और पतिदेव उनके सामने सहमे-सहमे रहते थे। लड़के भी उनकी बात अनसुनी कर देते थे इसलिए रामदयाल ने 'चुप रहो और मुस्कुराओ' की नीति अपना ली थी। क्या करोगे ? सीधे आदमी को अपनी घरवाली और घरवालों, सबसे डर कर रहने का अभ्यास हो जाता है !
          एक दिन खाना खाते समय रामदयाल ने श्यामाबाई से कहा- 'महेश शादी लायक हो गया है, कोई लड़की देखो।'
'महेश के लिए लड़की ? मेरी देखी हुई है।' श्यामाबाई ने कहा।
'कौन ?'
'जबलपुर के पास कालादेही है न ? वहाँ लड़की अच्छी है, अपने घर लायक है।'
'तुम कहाँ देखी उसको ?'
'मंडला में, एक शादी में आई थी, वहीं।'
'रिश्तेदार कैसे हैं ?'
'क्या करना रिश्तेदार से, लड़की अच्छी है तो सब ठीक है।'
'वे लोग अपने घर में लड़की देंगे ?'
'क्यों नहीं देंगे ? किस बात की कमी है जो हमें मना करेंगे ?'
'तो फिर बात चलाओ।'
'ठीक है, आपने मायके खबर करती हूँ, वे लोग सिलसिला चलाएंगे। लड़केवाले हैं, हम थोड़े ही बात शुरू करेंगे ! रिश्ता तो उधर से ही आना चाहिए।'
'जैसा तुम ठीक समझो, अगले मुहूर्त में काम हो जाए तो अच्छा है।' रामदयाल ने धीरे से कहा।
          बातचीत का सिलसिला चला, बात बन गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा तक नहीं, घरवालों ने बात पक्की कर दी महेश का विवाह 7 मार्च 1976 को मालती से हो गया। महेश का पहला विवाह तो व्यापार के साथ हो चुका था, अब एक और आ गयी, उसकी दूसरी पत्नी।

(३)

          शुरुआती दौर में सब भाई एक ही दूकान में साथ-साथ रहते थे, फिर सबकी शहर की अलग-अलग जगहों पर रसवंती की दूकानें खुल गई। सभी दूकानों के लिए चड्डा कृषि फार्म से गन्ना आता था। जब मांग बढ़ गई तो गन्ने का भाव बढ़ गया जिससे रसवंती की दूकानों को होने वाला फायदा कम हो गया। चूंकि चड्डा कृषि फार्म की 'मोनोपली' थी इसलिए गन्ने को बिना छांटे लेना पड़ता था, मोटा, पतला, सूखा सब एक साथ तौला जाता था याने सब धान बाईस पसेरी।
          उसी समय रामदयाल को मंडला जाने का मौका पड़ा। उस क्षेत्र में गन्ने की भरपूर फसल होती थी, वहाँ भाव कम थे, 'क्वालिटी' बेहतर थी। प्रयोग के तौर पर वहाँ से एक ट्रक गन्ना बिलासपुर भेजा गया। यहाँ आकर भाड़ा सहित वह चड्डा कृषि फार्म के भाव से बीस रुपए क्विंटल सस्ता पड़ा। महेश और उसके भाइयों की दूकानों में बाहर का गन्ना खपने लगा। फिर बाप-बेटों के बीच सलाह-मशविरा हुआ जिसमें तय किया गया कि बिलासपुर में चड्डा कृषि फार्म के वर्चस्व को तोड़ा जाए और शहर के सभी गन्नारस की दूकानों को गन्ना की आपूर्ति चौकसे परिवार करे। रामदयाल मंडला और आसपास के क्षेत्रों में घूम-घूमकर गन्ना खरीदकर बिलासपुर भेजते और उनके पुत्र गन्नारस के साथ-साथ गन्ना बेचने वाले 'स्टाकिस्ट' बन गए।
          माल की बिक्री बढ़ाने की नई जुगत सोची गई जिसके अंतर्गत गोलबाजार में स्थित छितानी-मितानी धर्मशाला में शहर के समस्त गन्नारस विक्रेताओं को बुलाकर 'बिलासपुर गन्नारस विक्रेता संघ' का गठन किया गया जिसमें ज़ोर-शोर से चड्डा कृषि फार्म की मनमानी पर चर्चा हुई तथा उसका बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया। बैठक में महेश के छोटे भाई दिनेश को अध्यक्ष बनाया गया। जब दूकानदारों ने अध्यक्ष से पूछा- 'वहाँ से नहीं लेंगे तो गन्ना कहाँ से मिलेगा ?' तब अध्यक्ष ने कहा- 'हम देंगे और चड्डा कृषि फार्म से पंद्रह रुपये प्रति क्विंटल सस्ता देंगे।' जिस चमनलाल ने चौकसे परिवार के चमन को गुलज़ार किया, उसी चमनलाल के गन्ने के व्यापार को चौकसे परिवार ने हिलाकर रख दिया। खैर, प्यार और व्यापार में सब वाजिब है।
          महेश की चाय दूकान ने रेल्वे से और जमीन जुगाड़ कर ली, उसमें 'महेश स्वीट्स' खुल गई। कुछ वर्षों के बाद 'रसोई' खुली, फिर 'होटल श्यामा', उसके बाद बुधवारी में 'महेश स्वीट्स एंड रेस्टोरेंट' और हाल ही में 'रसोई इन'। यह प्रगति रातों-रात नहीं हुई, इसके पीछे महेश और उसके भाइयों का अनवरत परिश्रम का फल है। पान बेचने वाला महेश आज बिलासपुर की एक हस्ती है और अपनी मेहनत से समृद्धि की ओर बढ़ने वाले अजेय व्यक्ति के रूप में स्थापित है। इतनी सफलता के बाद भी महेश का कमाया पैसा उसकी जेब में है, सिर में नहीं चढ़ा। आज भी जब उसकी दूकान का कर्मचारी देर से आता है तो महेश उससे कहता है- 'आइये पिताजी, आप आ गए ! मैं तो सोच रहा था कि शायद आप नहीं आएंगे।'

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