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किस्सा कन्हैया का : कन्हैया की राधा

किस्सा कन्हैया का : कन्हैया की राधा

(१)

          बिलासपुर का तेलीपारा, रेलवे स्टेशन और बस्ती को जोड़ने वाली सड़क के दोनों ओर बसा हुआ मोहल्ला जिसमें सब्जियों के लहलहाते खेत हैं। वर्षा ऋतु में धान के पौधे भी लगाए जाते हैं। किसी जमाने में तेली जाति की आबादी रही होगी, अब काछियों का वर्चस्व है। उनके खेत साल भर फसल देते हैं, सांस लेने की फुर्सत नहीं। भूमिस्वामी बीज, गोबर खाद और मजदूरों की व्यवस्था करते हैं, फसल अपने-आप हो जाती है। जगह-जगह कुएं खुदे हुए हैं, चाहे जितना पानी ले लो। चार हाथ खोदो तो बिलासपुर की मिट्टी से पानी का स्रोत दिखने लगता है। बारिश भी भरपूर होती है।
          केजूराम यादव इन्हीं काछी बाड़ियों में मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। पाँच बच्चे थे, कन्हैया सबसे बड़ा, ग्यारहवें में लग गया था। चौथी पास करने के बाद उसके पिता ने उसको म्युनिसिपल स्कूल में भर्ती करवा दिया ताकि वह पढ़-लिख ले लेकिन नियति को कुछ और सूझा, खेत में काम करते समय केजूराम को जहरीले साँप ने काट दिया। बैगा की झाड-फूँक के बावजूद जहर न उतरा और केजूराम अपनी घरवाली और छोटे-छोटे बच्चों को रोता-बिलखता छोड़ कर चला गया। कन्हैया को मिडिल स्कूल जाते तीन माह हुए थे, पढ़ाई छूट गई। 'रोज कमाना-रोज खाना' वाले परिवार में चटनी-भात के लाले पड़ने लगे। कन्हैया बच्चा था, खेतों में काम करने लायक न था इसलिए उसकी माँ ने आसपास के दो घरों में बर्तन माँजने का काम पकड़ लिया लेकिन मेहनताना इतना कम मिलता था कि घर में एक समय ही चूल्हा जलता और रात के समय बच्चे भूख से रोते-कलपते सो जाते। 
          कन्हैया काम खोज रहा था, उसका कद कम था इसलिए वह और भी छोटा लगता था इसलिए जहां काम मांगने जाता उसे एक ही जवाब मिलता- 'अभी बच्चा है, तू क्या काम करेगा ?' यह सवाल उसकी परेशानी और भूख दोनों बढ़ा देते।
          एक दिन की बात है, कन्हैया ने देखा, उसकी झोपड़ी के बाहर एक साँप लहराते हुए तेजी से चला जा रहा था। वह बिजली की तेजी से साँप की ओर लपका और उसे दबोच लिया। कन्हैया गुस्से में था, उसे साँपों से नफ़रत हो गई थी। 'ज़रूर इसी ने बाबू को डसा होगा, इसको नहीं छोड़ूंगा।' 
साँप काफी मोटा था लेकिन छोटा था। कन्हैया की मुट्ठी में फँसकर साँप फड़फड़ा रहा था, पूंछ से वार कर रहा था लेकिन पकड़ मजबूत थी, साँप का बच निकलना मुश्किल था। कन्हैया के दिल में कुछ आया। उसने साँप के फन को अपने चेहरे के सामने लाकर उससे पूछा- 'तुमने मेरे बाबू को क्यों डसा ?'
'मैंने ? मैंने तुम्हारे बाबू को कब डसा ?' साँप ने कन्हैया की आँखों में आंखे डालकर पूछा।
'महीना भर हो गया।'
'पर मैं तो इस तरफ पहली बार आया।'
'तो तुम्हारा कोई भाई-बंधु आया होगा।'
'हो सकता है, पर वह मैं नहीं हूँ।'
'पर हो तो साँप न, किसी न किसी को काटोगे ?'
'किसने कह दिया कि हम काटते हैं ?'
'सब जानते हैं, तुम्हारा स्वभाव है।'
'गलत, सब गलत। जब तक हमारी जान को खतरा न हो, हम लोग हमला नहीं करते, भाग जाते हैं। हम तो किसी हल्की सी आवाज या कंपन से जान जाते हैं कि कोई आ रहा है और सर्र से छुप जाते हैं। हमें मालूम है कि मनुष्य दुष्ट होते हैं, हमें देखते ही मारेंगे। हमको भी तो अपनी जान बचानी है।'
'फिर उसने मेरे बाबू को क्यों काटा ?'
'हो सकता है कि तुम्हारे बाबू ने उस पर हमला किया हो !'
'ये तो मुझे नहीं मालूम लेकिन तुमको पता है कि मेरे बाबू मर गए, हम अनाथ और बेसहारे हो गए, मैं तुमको नहीं छोड़ूंगा।'
'उस दिन क्या हुआ, कौन जाने ! पर तुमको पता है कि खेतों में रहने वाले सभी साँप विषैले नहीं होते।'
'साँप तो सब जहरीले होते हैं, मैं जानता हूँ।'
'तुम्हारी जानकारी गलत है।'
'फिर मेरा बाबू क्यों मरा ?'
'डर से मर गया होगा।'
'डर से ?'
'हाँ, अधिकतर लोग हमारे दाँत गड़ाते ही सदमे में मर जाते हैं।'
'तुम मुझे मत बहकाओ, मैं तुम्हें छोडने वाला नहीं।'
'अब जब मेरी गलती नहीं है तो तुम मुझे क्यों मार रहे हो ?'
'मुझे सारे साँपों से चिढ़ हो गई है, मैं सबसे बदला लूँगा।'
'तुम इन्सानों में यह बहुत बड़ा दोष है कि गलती किसी और की होती है और सज़ा किसी और को देते हो।' सांप ने कन्हैया को डांटते हुए कहा। 
'चलो होगा, पर एक बात बताओ, तुम बोल कैसे रहे हो, वह भी हमारी भाषा में ?' कन्हैया ने विस्मित होते हुए पूछा।
'हम सब समझते हैं, तुम्हारा दुख भी मुझे समझ में आ रहा है।' सांप ने बताया।
'मेरा दुख, तुम्हें समझ में आ रहा है? मैं नहीं मानता।'
'मत मानो लेकिन मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्कूल छूट गया, घर में खाने-पीने की तंगी है।'
'अरे वाह, तुम तो सब जानते हो। अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ ?'
'पढ़ाई बन्द मत करो, पढ़ो, तब तो सभ्य बनोगे।'
'अरे, वाह !'
'हाँ, हमारी कोई स्कूल नहीं, कभी कुछ सीखने का मन होता है तो चुपचाप किसी स्कूल में घुस जाता हूँ और सब सुनते रहता हूँ।'
'अब तक क्या सीखे ?'
'यही कि सदा सच बोलना चाहिए, बड़ों का आदर करना चाहिए, सब प्राणियों से प्रेम करना चाहिए।'
'कुछ समझ में आया ?'
'आया लेकिन ये सब हमारे काम का नहीं है, सभ्य होना तुम मनुष्यों की समस्या है। हम असभ्य ही ठीक हैं।'
'कुछ सीख लो, क्या नुकसान है !'
'मैंने कहा न, हमारी दुनिया अलग है। अब तुम मुझे छोड़ दो।' साँप ने विनयपूर्वक कहा। 
कन्हैया साँप से नाराज था लेकिन उसकी बातों ने उसका गुस्सा ठंडा कर दिया। उसने अपनी मुट्ठी खोली लेकिन वह खुल नहीं रही थी, जैसे उसकी उंगलियाँ जकड़ गई हों।
अचानक कन्हैया की आँखें खुली, उसने अपनी खाट की लकड़ी को मजबूती से जकड़ा हुआ था। उठकर उसने अपनी मुट्ठी खोली और बहुत देर तक अपनी गदेलियों को घूरकर देखता रहा। 
          कन्हैया की माँ मेहनती थी लेकिन काम पर जाने में बच्चों को घर में छोड़ कर जाने की समस्या थी। कन्हैया सबको सम्हालता और माँ के घर आ जाने के बाद काम की तलाश में निकल जाता। एक दिन, रास्ते में उसे पिता के पुराने दोस्त मिल गए, सुकालू काका, जो मिट्टी के बर्तन बनाते थे। कन्हैया ने उनसे अपनी परेशानी बताई तो वे उसको अपने साथ अपने घर ले गए। कन्हैया उनकी चाक घुमाता और सुकालू अपनी दक्ष उंगलियों से बर्तन गढ़ता। सीखने की गरज़ से कन्हैया ने भी हाथ आज़माए लेकिन बात नहीं बनी। मिट्टी के बर्तन गढ़ना हो या कोई भी दूसरा काम, सीखते-सीखते हाथ जमता है। सुकालू उसका हौसला बढ़ाता, शाम को घर वापस जाते समय उसे चार आने भी देता।
          तेलीपारा से लगा हुआ था कुम्हारपारा, जहां कुम्हारों की बस्ती थी। खुली जमीन में छोटे-छोटे कच्चे बने हुए दो या तीन कमरे वाले घर, जिनमें उनका रहना था और भंडार भी। मिट्टी के बर्तन बनाने का काम बाज़ार की मांग का अनुमान लगाकर बहुत पहले से शुरू करना पड़ता है। गर्मी के मौसम के लिए मटका और सुराही, पोला के त्यौहार के लिए बच्चों के खिलौने, दिवाली के लिए दिए और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ आदि बनाने का काम तीन-चार महीने पहले शुरू करना पड़ता है। हलवाई दूकानों में खपने वाले दही जमाने वाला कुंडा, रसगुल्ला 'पेक' करने के लिए छोटी मटकियाँ और छोटे सकोरे खाली समय में बनाकर रख लिए जाते हैं जो धीरे-धीरे साल भर बिकते रहते हैं। इन्हें तैयार करने में परिश्रम, कलाकारी और धैर्य की ज़रूरत होती है। यह बेहद थकाऊ और मगज़मारी वाला काम है। चिकनी मिट्टी को खोजना, फिर उसे खोदना, छानना, भिगाना, सानना, उसके बाद उसे मनचाहा रूप देना, सुखाना, आग में पकाना, भंडार में सुरक्षित रखना और टूट-फूट से बचाना- ये सब मेहनत ग्राहक को नहीं दिखती। बेचने जाओ तो मिट्टी का सामान औने-पौने दाम में बिकता है। ग्राहक इतना मोलभाव करते हैं कि दिमाग खराब हो जाता है। मुश्किल यह है कि बाप-दादों से यही काम सीखा है, कुछ और जानते नहीं, क्या करें?

(२)

          बिलासपुर की गर्मी को गर्मी कहना उचित नहीं, प्रचंड गर्मी कहना चाहिए। यहाँ वर्ष भर में केवल दो मौसम होते हैं, एक गर्मी और दूसरा बहुत गर्मी। ऐसे ही 'बहुत गर्मी' वाली धूप में काम करते समय कन्हैया बेहोश होकर जमीन में पसर गया। सुकालू घबरा गया। उसने फटाफट मिट्टी से सना अपना हाथ धोया, कन्हैया को गोद में उठाकर घर के अंदर ले गया और उसके चेहरे और सिर पर एक लोटा पानी डाल दिया। सुकालू की घरवाली ने कच्चा आम पीसा और कन्हैया के तलवे में लेप लगा दिया। थोड़ी देर बाद कन्हैया होश में आ गया, उसे पानी पिलाया और पास में बैठकर पंखा झलने लगे। सुकालू को समझ में आ गया कि इतनी कम उम्र में इतनी अधिक मेहनत का काम कन्हैया के लिए ठीक नहीं, इसलिए उससे कहा- 'तू इस काम को नहीं कर पाएगा। किसी हलवाई की दूकान में काम खोज ले, वहाँ ठीक रहेगा।'
'मैं कई जगह गया था, मुझे किसी ने काम पर नहीं लगाया।' कन्हैया ने कहा। 
'मेरा काम बहुत मेहनत वाला है, तेरे से नहीं बनेगा।' 
'फिर मैं क्या करूं ?'
'कल सुबह मेरे पास आना, मैं तुझे एक हलवाई के यहाँ ले चलूँगा. वहाँ सकोरा देने जाना है मुझे. मेरी जान-पहचान है, मैं तेरे लिए बात करूंगा. सुकालू ने समझाया।
कन्हैया अगली सुबह सुकालू काका के साथ गोलबाज़ार की ओर चल पड़ा।
बाँस से बने विशालकाय टोकरे को सुकालू ने एक हलवाई की दूकान के सामने अपने सिर से उतारा जिसमें वह मिट्टी के सकोरे भर कर लाया था। गमछे से अपना चेहरे का पसीना पोछा और गद्दी पर बैठे बुजुर्ग से कहा- 'सेठ जी, सकोरे ले आया। तीन सौ दस हैं।'
'तीन सौ दस ? दस ज़्यादा क्यों ?' दूकान मालिक ने पूछा। 
'टूट-फूट वाली चीज है, रखते-उतारते टूट जाए तो मेरी गिनती गलत नहीं निकलनी चाहिए, आप गिनवा लो।'
'गिनने की ज़रूरत नहीं है, जाओ, अंदर धीरे से जमाकर रख दो।'
सकोरा रखने के बाद सुकालू बोला- 'दो, सेठ जी, छह रुपिया।'
'अरे, भाव बढ़ा दिया क्या ? पिछले बार एक रूपिया बारह आने सैकड़ा दिया था ?'
'क्या करें सेठ जी, चाउर (चावल) मंहगा हो गया। कोयला मंहगा हो गया। मंहगाई इतनी बढ़ रही है कि पेट भरना मुश्किल हो गया।'
'चाँवल क्या भाव मिल रहा है ? तुम लोग तो मोटा चाँवल खाते हो, वह तो सस्ता होगा ?'
'काहे का सस्ता ? एक रुपए का डेढ़ सेर मिल रहा है।'
'अरे, बहुत भाव बढ़ गया है। चलो ठीक है, पूरा छः रूपिया ले लो लेकिन अब भाव मत बढ़ाना सुकालू राम।'
'जी, सेठ जी।'
'ये साथ में तुम्हारा लड़का है क्या ? बड़ा सुंदर है।'
'नहीं, मेरे साथी का बड़ा लड़का है, इसका बाप मर गया, चार छोटे भाई-बहन भी हैं।'
'कैसे मर गया ?'
'नाग देवता ने काट दिया।' 
'ये तो बहुत बुरा हुआ, राम-राम।'
'सेठ जी, इसे अपने यहाँ काम में रख लेते तो बड़ी कृपा होती।' 
'ये बहुत छोटा है, हमारे यहाँ क्या काम कर पाएगा ?'
'ग्राहक को सामान लगा देगा, जूठा उठा देगा।'
'ठीक है, रखे लेते हैं, आठ आना रोज देंगे, बन जाएगा ?'
'बहुत अच्छा हो जाएगा मालिक।' सुकालू ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।
'तो, कल सुबह सात बजे भेज देना।' बुजुर्ग जगदीश नारायण ने कहा और एक दोना भरकर जलेबी कन्हैया को दी और कहा- 'घर ले जाओ, सब कोई खाना।' कन्हैया रोने लगा।
घर पहुँच कर कन्हैया अपनी माँ से लिपट गया और नौकरी मिल जाने की खबर दी। भूखे बच्चे जलेबी पर टूट पड़े, दो मिनट में खत्म हो गई। जलेबी से पेट कहाँ भरता है, मुंह मीठा हो जाता है, तनिक तसल्ली हो जाती है। पेट भरने के लिए हाड़-तोड़ परिश्रम करना पड़ता है लेकिन पेट तो तब भी नहीं भरता। कन्हैया के घर में कमाने वाले एक से दो हो गए, अब शायद दोनों समय रसोई का चूल्हा जले। 
          अगली सुबह कन्हैया दूकान पहुंच गया, वह चौंक गया क्योंकि गद्दी पर उसका एक सहपाठी विराजमान था। वह घबराया क्योंकि हलवाई की दूकान में नौकरी की खबर इस सहपाठी के जरिए स्कूल तक पहुँच जाएगी। भले ही उसने स्कूल जाना छोड़ दिया है पर जब दूसरे लड़कों को मालूम पड़ेगा तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। 'बताओ, जूठा उठाने की नौकरी करता है, कोई दूसरा काम नहीं मिला क्या?'
थोड़ी शर्म भी आ रही थी। जिसके साथ बैठकर क्लास में पढ़ता था, उसका नौकर बन गया। पहले बराबरी का दर्जा था लेकिन अब मालिक-नौकर का हो गया। कन्हैया के दिल में आया कि उल्टे पैर घर लौट जाए लेकिन भूख ने कुछ समझाया और वह अपनी आँखें झुकाए काम से लग गया। उसने पूरी दूकान में झाड़ू लगाई और गीले कपड़े से 'बेन्च' पोछकर साफ की। इतनी देर में बड़े मालिक आ गए जो उसके सहपाठी के दादाजी थे। उनके आते ही सहपाठी गद्दी से नीचे उतर गया और उसमें बड़े मालिक बैठ गए।
          देशी घी की गरम जलेबी और समोसा तैयार होकर परात में आ गए, इधर ग्राहकों की भीड़ भी आ गई। सहपाठी तराजू से तौल कर जलेबी दोने में रखता, दूसरे दोने में समोसा रखता और कन्हैया दौड़कर अंदर ग्राहक को देता जाता। ग्राहक अंदर बेन्च पर बैठकर नास्ते करते और गद्दी में पैसे चुकाकर चले जाते। कन्हैया को काम आसान लगा और खुशी-खुशी करता रहा लेकिन उसकी नाक में घुस रही जलेबी और समोसा की प्यारी खुशबू उसे परेशान भी कर रही थी। जब अधिक बेचैनी होती तो वह थोड़ा पानी पी लेता तो उस खुशबू से उसका ध्यान हट जाता। कन्हैया ने देखा कि उसका सहपाठी भी बीच-बीच में ग्राहकों को समान ले जाकर दे आता और जूठे दोने उठाता तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। मालिक के घर का लड़का भी यह सब काम कर रहा है !
नौ बजे के बाद ग्राहकों की भीड़ कम होने लगी, उसने गौर किया कि बड़े मालिक कुछ गुनगुना रहे हैं और अपनी एक मुट्ठी बंद करके दूसरी हाथ की उँगलियों से थाप दे रहे हैं। चुपके से उनके पीछे खड़ा होकर उसने सुना कि वे एक गाना गा रहे थे- 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।'
सहपाठी ने जलेबी और समोसा एक दोने में निकाला, अंदर जाकर कन्हैया को इशारा करके बुलाया, उसे दे दिया और कहा- 'ले, नास्ता कर ले। मैं अब घर जा रहा हूँ।'
खाते-खाते कन्हैया सोच रहा था- 'किस स्वादिष्ट दुनिया में आ गया मैं !' 

(३)

          कन्हैया नौकरी कर सकता या पढ़ाई। नौकरी के कारण वह पाँचवी कक्षा तक ही पढ़ पाया और ललचाई आँखों से सड़क पर बस्ता टाँगे स्कूल जाते बच्चों को देखता रह जाता। दिन बीतते रहे, दिन महीनों में, महीने सालों में। एक दिन कन्हैया की माँ ने उससे कहा- 'अक्ती के दिन तेरा ब्याह है कन्हैया।'
'मेरा ब्याह? कन्हैया ने पूछा। 
'हाँ, तेरा ब्याह। मालिक से छुट्टी ले लेना।'
'ठीक है, कब है अक्ती?'
'दो दिन बाद।'
'ब्याह में क्या होता है?'
'दुल्हा और दुल्हन की शादी।'
'मैं दुल्हा बनूँगा?'
'हाँ।'
'और दुल्हन?'
'आएगी तब देख लेना।'
'जब आएगी तो यहीं अपने घर में रहेगी?'
'नहीं, अभी ब्याह के बाद अपने घर वापस चली जाएगी।'
'फिर?'
'दो साल बाद आएगी।'
'क्यों?'
'तू अभी छोटा है, चौदह साल का तो है।'
'उसको रोक लेना, मैं उसके साथ खेलूँगा।'
'नहीं, अभी नहीं खेल सकता। जब दो साल बाद में यहाँ रहने आएगी तब खेलना उसके साथ।' कन्हैया की माँ ने उसे डांटते हुए कहा, माँ के चेहरे पर थोड़ी मुस्कुराहट आई और उसके बाद अपने दिवंगत पति की याद आई और सहसा उसकी आँखों से आँसू बह निकले। 
          गरीब के घर की शादी गरीबी से होती है। जान-पहचान में अच्छी लड़की दिखी तो कन्हैया का सादगी से ब्याह हो गया। जिस दिन बहू घर आई, कन्हैया ने उसे देखने की बहुत कोशिश की लेकिन ठीक से देख नहीं पाया क्योंकि उसने अपना घूँघट नहीं हटाया। वह गुस्साया हुआ अपनी माँ के पास गया और बोला- 'ब्याह मोर होए है कि तोर।' (ब्याह मेरा हुआ या तेरा?)
'तोर होए हे, काबर?'(तेरा हुआ है, क्यों?)
'घरवाली मोर हवै अऊ मैं ओला देखे नई पायों।' (मेरी घरवाली है और मैं उसको नहीं देख पा रहा हूँ।) कन्हैया भन्ना कर बोला। माँ ने हँसते हुए बहू को अपने पास बुलाया और उससे बोली- 'जा, अपन दुल्हा लंग थोड़कुन गोठिया ले ओ, नई तो वो हर रिसा जाही।' (जा, अपने पति से बात कर ले अन्यथा वह नाराज हो जाएगा।) दुल्हन सकुचाते हुए कन्हैया के पास गई और बगल में बैठ गई। माँ झाड़ू लेकर सफाई के बहाने झोपड़ी के बाहर चली गई। कन्हैया ने उसके घूँघट को झटके से उठाया और उससे पूछा- 'तेरा नाम राधा है न? मेरा कन्हैया है।'
'मालूम है।' उसने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया।
'पढ़ने जाती है?'
'नहीं।' 
'क्यों नहीं जाती?'
'बाबू नहीं जाने देता।'
'बाबू से बोलना कि तुझे स्कूल में भरती कराएगा। पढ़-लिख ले, यहाँ आएगी तो चूल्हे-चक्की से लग जाएगी।'
'हौ।' 
'क्या हौ?'
'बोलूँगी और स्कूल जाकर पढ़ूँगी।'
'तू बहुत सुंदर है रे राधा।' कन्हैया उसके गाल छूकर मुसकुराते हुए बोला। वह सकुचाते हुए थोड़ी दूर हट गई। कन्हैया उसके पास खिसका तो वह और हट गई। कन्हैया और पास खिसका लेकिन राधा के हटने की जगह बची नहीं थी इसलिए वह पलंग से उठी और दौड़ते हुए झोपड़ी के बाहर निकल गई।
सूरज डूबते समय बहू विदा हो गई, राधा चली गई लेकिन उसके पैरों की पायल के घुंघरुओं ने जो मीठी आवाज बिखेरी वह कन्हैया के कानों में रच-बस गई और उस रात उसे नींद नहीं आई। केवल उस रात क्यों, हर रात को वही मीठी आवाज उसके कानों में गुनगुन-गुनगुन करती रही और उसकी याद दिलाती रही। 
          कन्हैया की राधा अपने मायके वापस चली गई और कन्हैया का दिल भी ले गई। कितनी अनोखी है यह दुनिया जिसमें एक छोटी सी मुलाक़ात एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ देती है! जुड़ना बहुआयामी होता है। बच्चे के जन्म देते ही माँ उससे जुड़ जाती है। कुछ देर बाद शिशु भी अपनी माँ से जुड़ जाता है क्योंकि उसकी पहली खुशनुमा मुलाक़ात माँ से होती है, उसके सामीप्य और उष्ण दुग्ध-धार से होती है। धीरे-धीरे अन्य मुलाकातें बढ़ती जाती हैं और नए रिश्ते पनपते जाते हैं। शुरुआती संबंध मानवीय आधार पर बनते और बढ़ते हैं लेकिन बचपन बीत जाने के बाद ये संबंध आपसी रुचियों और व्यवहार की जमीन पर विकसित होते हैं। किशोरावस्था में सम्बन्ध की नई इबारतें संवेदनाओं की कलम से लिखी जाती है, उन दिनों हमउम्र दोस्त बनते हैं, समलिंगी और विपरीतलिंगी धागे बुने जाते हैं। कमजोर धागे रास्ते में टूटते जाते है, वहीं पर कुछ अपनी मजबूती बनाए रखते हैं और इस तरह धागे-धागे एक दूसरे से गुंथकर मजबूत किसी रिश्ते का नाम दे देते हैं। सबसे अधिक मिठास वाला रिश्ता होता है, किसी वयस्क स्त्री और पुरुष का मानसिक और शारीरिक रूप से जुड़ना। शारीरिक जुड़ाव भले ही टिकाऊ न हो लेकिन सम्बन्धों को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है, वहीं पर मानसिक जुड़ाव ताउम्र बना रहता है। मानसिक जुड़ाव एक-दूसरे की समान रुचियों, संतुलित वार्तालाप और दुख-सुख में साथ देने के ज़रिए धीरे-धीरे बढ़ता है, रिश्ते का नाम चाहे जो हो। इन रिश्तों में सबसे शीर्ष पर है पति-पत्नी का रिश्ता जो खटमिट्ठा तो होता है लेकिन बिना 'प्रिजर्वेटिव' के सालों-साल चलता है।
          नेपोलियन हिल लिखते हैं -'लंबे समय तक साथ रहने के बाद पति और पत्नी के चेहरे एक जैसे हो जाते हैं। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति भीड़ में अलग-अलग खड़े होने पर भी उन्हें उनके चेहरे की साम्यता के आधार पर खोज सकता है।' 
          चेहरे की यह साम्यता दोनों के शारीरिक संपर्क से नहीं, उनकी मानसिक अंतःक्रिया से बनती है।

(४)

          मेरे साथ यही गड़बड़ी है कि जैसे ही मौका मिला, मैं अपना ज्ञान बघारने लगता हूँ और मूल कहानी भटक जाती है। कन्हैया का किस्सा अटक गया जबकि मुझे यह बताना था कि राधा के मायके जाने के बाद कन्हैया का मन भी भटक गया। वह दूकान में काम करता तो उसे हर समय राधा की याद आती, उसके बदन की मोहक खुशबू जैसे हर समय उसके आसपास मौजूद रहती। हँसता-मुस्कुराता कन्हैया गंभीर हो गया, मुस्कुराहट राधा की याद में खो गई। मेरे लिए यह बताना मुश्किल है कि वह शारीरिक आकर्षण था या मानसिक लेकिन कोई अज़ब मनस्थिति थी जिसको शब्दों में कैसे बताया जा सकता है ?
          शादी हो जाने के बाद जब कन्हैया 'ड्यूटी' पर आया तो उसके सहपाठी ने पूछा- 'हो गया तेरा ब्याह?'
'हो गया।' कन्हैया ने शर्माते हुए बताया। 
'शर्मा क्यों रहा है?'
'हें हें हें...'
'कैसी है भाभी?'
'सुंदर है।'
'बात किया उससे?'
'ऐसे ही, थोड़ा सा।'
'अच्छा। ये बता, आज सुबह तू नहाया नहीं क्या? 
'कैसे मालूम पड़ा?'
'तेरे मुंह और हाथ पैर में हल्दी का रंग चढ़ा हुआ है। अरे, तूने पैर की उँगलियों में महावर भी लगवाया था?'
'मैं बहुत मना किया था लेकिन नाउन मानी नहीं, जबरन लगा दिया उसने।'
'उसको डांटना था।'
'जब ब्याह होता है तो दूल्हे की नहीं चलती। जो औरतों के मन आता है, वो कर लेती हैं।'
'चल कोई बात नहीं, पर मुझको मिठाई नहीं खिलाया।'
'तुम्हारी मिठाई की दूकान है, जितना चाहो खा लो।'
'ठीक है लेकिन तेरे ब्याह की मिठाई का स्वाद अलग होगा।'
'गरीबों के यहाँ मिठाई नहीं बनती, बताशे से काम चलाना पड़ता है। बताशे का क्या स्वाद? बस, मीठा-मीठा लगता है।' 
'ससुराल में भी मिठाई नहीं मिली?'
'वो लोग भी गरीब हैं।'
'अरे!'
'हाँ।'
'तो तू खुश है न?'
'कल तक खुश था, आज नहीं।'
'क्यों?'
'राधा कल अपने मायके वापस चली गई। अम्मा बोल रही थी कि दो साल बाद वापस आएगी।' कन्हैया का गला भर आया। 
'फिर कैसा करेगा? तेरा उससे मिलने का मन नहीं हो रहा है?'
'जिस दिन मन होगा, चला जाऊंगा। अरपा नदी के उस पार चिंगराजपारा में उसका घर है, किसी दिन ज़रूर जाऊंगा।'
'तेरी अम्मा गुस्सा नहीं करेगी क्या?'
'उसको कैसे मालूम पड़ेगा?'
'ससुराल वालों ने बता दिया तो?'
'वो मैं बना लूँगा।' उसके चेहरे पर किसी भावी योजना का आत्मविश्वास झलक रहा था।
          ब्याह के चौथे दिन कन्हैया अरपा नदी पार करके अचानक अपनी ससुराल जा पहुंचा। राधा घर के बाहर झाड़ू लगा रही थी। झाड़ू करते-करते उसे लगा, जैसे कोई खड़ा है। सिर उठाकर उसने देखा तो सामने कन्हैया खड़ा था, कृष्ण-कन्हैया की मुद्रा में। राधा का जी धक से हो गया, दिल की धड़कन रुक सी गई और फिर धक-धक चलने लगी। झाड़ू को एक किनारे फेंक कर दौड़ती हुई वह कन्हैया के पास आई, उसका हाथ पकड़ा और घर के अंदर ले गई। बोरा बिछाकर उस पर कन्हैया को बैठाया और पूछा- 'तुम कैसे हो?'
'ठीक हूँ।' कन्हैया की आवाज़ में धीमापन था।
'आज काम पर नहीं गए?'
'गया था, अभी छुट्टी लेकर तुमसे मिलने आया?'
'मुझे भी तुम्हारी याद आ रही थी।'
'सच में।'
'हूँ। मैं सोच रही थी कि न जाने तुम कब मिलोगे। अच्छा हुआ, आ गए।'
'दाई (माँ) कहाँ है?'
'वह काम करने गई है।'
'और बाबू (पिता)?'
'वह गाय चराने गया है।'
'ठीक है, अब मैं जाता हूँ, मुझे देर हो रही है।'
'थोड़ी देर और बैठो, पानी पी लो। बासी (भात) खाओगे क्या?'
'खा लूँगा।' कन्हैया बोला। राधा चूल्हे के पास गई, मिट्टी के बर्तन में बासी भात और नमक ले कर आई और बोली- 'ले खा ले।'
कन्हैया भात खा रहा था और खाते-खाते राधा को लगातार देखते जा रहा था। राधा ने जब उसे घूरते देखा तो पूछी- 'ऐसा क्यों देख रहे हो?'
'तुमको देखना अच्छा लगता है।'
'हट।'
'सच।'
'तू कितना अच्छा है।' 
'तू भी।' कन्हैया ने कहा। इतनी देर में बासी खत्म हो गया। वह उठ खड़ा हुआ और बोला- 'अब मैं चलता हूँ, फिर आऊँगा।'
'ठीक है, आना पर अब खाली हाथ नहीं आना।' राधा बोली। 
'क्या लाना है?'
'मेरे लिए हरे और लाल रंग की चूड़ियाँ लाना, मुझे बहुत अच्छी लगती है।' 
'ज़रूर लाऊँगा लेकिन मुझे तुम्हारी कलाई का नाप नहीं मालूम!' कन्हैया ने सवाल किया तो राधा ने अपनी कलाई आगे बढ़ाई और कहा- 'लो, नाप लो।'
कन्हैया ने उसे अपने अंगूठे और उँगलियों से नापा, एक- दूसरे के स्पर्श से दोनों कंपकपा गए। 
          दोनों का मिलना-जुलना चुपके-चुपके चलता रहा। कन्हैया और राधा बड़े होते रहे लेकिन ब्याह का वह मतलब नहीं जानते थे जिसे वयस्क जान जाते हैं। कन्हैया दूकान के काम में बहकने लगा। बताए गये काम को भूलने लगा और कभी-कभी काम करते-करते खो सा जाता था। एक दिन उसके सहपाठी ने उससे पूछा- 'भौजाई कैसी है? मिला था क्या उससे?'
'हाँ, मिलते रहता हूँ।' कन्हैया ने उत्तर दिया। 
'जब मिलता है तो क्या करता है?'
'खूब बातें करता हूँ। तुमको क्या बताऊँ, वह बहुत मीठा बोलती है, गुड़ जैसी मिठास है उसकी बोली में।' 
'तेरी माँ को मालूम है, तू उससे मिलता है?'
'अभी तक किसी को मालूम नहीं है, न मेरे घर में, न उसके घर में।'
'किसी दिन पकड़ा गया तो?'
'तो क्या होगा? वह मेरी ब्याहता है।'
'पर तुझे दो साल तक मिलना-जुलना मना है न?'
'क्यों मना है? तुमको कुछ मालूम है क्या?'
'मुझे क्या मालूम?'
'फिर?'
'लेकिन कोई तो बात है। मेरे बड़े भाई का ब्याह हुआ है, भाभी हमारे घर में रहती है। उनको कोई मनाही नहीं है।'
'सच में?'
'हाँ।'
'तो मुझे क्यों नहीं मिलने देते?'
'तू अभी बच्चा है, शायद इसलिए।'
'मैं बड़ा कब होऊंगा?'
'जिस दिन भौजाई तेरे घर में आ जाएगी, समझ लेना कि तू बड़ा हो गया है।'
'फिर बहुत मज़ा आएगा।'
'अच्छा ये बता कि तेरे घर में तेरे लिए कोई अलग से कमरा है?'
'झोपड़ी में कमरा होता है क्या? एक तरफ चूल्हा है जिसमें माँ खाना बनाती है और उसके बगल में सामान रखती है। रात को जमीन पर चादर बिछा कर हम सो जाते हैं।'
'अरे, फिर कैसा होगा?'
'कैसा होगा?'
'मेरे बड़े भैया अलग कमरे में भाभी के साथ सोते हैं।'
'अलग कमरे में क्यों सोते हैं?'
'मुझे क्या पता? पर कोई बात ज़रूर है।' सहपाठी ने कहा। कन्हैया भी सोच में पड़ गया। उसे याद आया कि जब भी वह राधा को छूता है तो उसे सिहरन सी होती है, इस बात का कोई न कोई संबंध अलग कमरे से जरूर है। 
          किशोरावस्था जिज्ञासु वय है। वह भावी जीवन के प्रत्येक व्यावहारिक पहलू को समझना चाहता है। कुछ समझ में आता है तो कुछ समझ में नहीं आता और कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जिन्हें समझने के लिए उसे उचित समय की प्रतीक्षा करनी होती है। विपरीतलिंगी संबंध मनुष्य के जन्म से बनने शुरू हो जाते हैं जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ विभिन्न रिश्तों में विकसित होते हैं, जैसे माँ-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी। लंबे समय तक साथ रहने और चलने वाले रिश्तों को सावधानी से चलने वाले लोग जीवन भर निभा ले जाते हैं। मनुष्य जीवन का एक आश्चर्य यह भी है कि जीवन भर साथ निभाने वाले भी एक-दूसरे को ठीक से समझ नहीं पाते, बहुत कुछ अबूझा रह जाता है, खास तौर से पति-पत्नी का रिश्ता। यह रिश्ता शरीर से होते हुए मन और मन से होते हुए आत्मा से जुड़ता है। इस जुड़ाव के लिए दोनों का शरीर किसी पुल की तरह काम करता है जो दो छोरों को मिलाता है और मन से आत्मा तक की यात्रा सम्पन्न करवाता है। 
          हाँ, तो मैं आपको कन्हैया और राधा के विरह की बातें बता रहा था। हुआ यह कि एक दिन कन्हैया सपड़ा गया। उसकी सास अचानक आ पहुंची। कन्हैया को देखकर वह नाराज़ नहीं हुई बल्कि खुशी से उसको अपने गले से लगा लिया। बोली- 'कब आए?'
'थोड़ी देर हुई।' कन्हैया सहमते हुए बोला। 
'तुम्हारी माँ कैसी है?'
'अच्छी है।'
'और भाई-बहन?'
'ठीक हैं लेकिन छोटे भाई का हाल बुरा है।' 
'क्या हुआ?'
'ठीक से स्कूल नहीं जाता। बाहर दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा खेलते रहता है। दाई उसको कुछ नहीं बोलती लेकिन मैं उसको समझता हूँ कि 'पढ़-लिख ले रे, नहीं तो मेरे जैसा जूठा उठाने का काम करेगा' पर वह मानता नहीं है।' 
'किस क्लास में पढ़ता है?'
'तीसरी कक्षा में।'
'अभी बच्चा है, बड़ा होगा तो समझ जाएगा लेकिन पढ़ेगा तो कमाएगा कब?'
'जब उसकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तब बढ़िया नौकरी करेगा, कहीं सरकारी विभाग में चपरासी बन जाएगा।' 
'घर का खर्चा कैसे चलेगा, तू तो अकेला है कमाने वाला।'
'माँ भी तो कमाती है।'
'पर जब राधा तेरे घर जाएगी तो कैसा करोगे?'
'राधा कब घर जाएगी?'
'अभी देर है।'
'उसको जल्दी भेजो, मुझे उसके साथ खेलना है।' कन्हैया ने कहा। उसकी सास को हंसी आ गई और बोली- 'ठीक है मैं तेरी माँ से बात करती हूँ।' 
          कन्हैया को उम्मीद थी कि राधा की माँ उसकी माँ से बात करेगी लेकिन कई माह बीत गए, गाड़ी आगे न बढ़ी. उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी लेकिन किसी से कहने की हिम्मत न हो. एक दिन वह नहा-धोकर काम पर जाने के लिए घर से निकल रहा था कि माँ ने उसे आवाज़ दी- 'सुन कन्हैया.'
'क्या है?' 
'मैं अकेले इतने बच्चों की देखरेख नहीं कर पाती, मजदूरी के लिए भी घर छोड़कर जाना पड़ता है. सोचती हूँ कि राधा को ले आऊँ तो मदद हो जाएगी.'
'अभी तो एक साल की देरी है न?' कन्हैया ने नखरा बताया.
'है तो लेकिन आज मैं राधा के घर जाकर बात करूंगी और वे लोग राजी हो गए तो विदा करवा कर ले आउंगी.'
'वो लोग राजी हैं.'
'तुझको कैसे मालूम?'
'राधा की माँ से मेरी बात हुई थी.'
'तू वहां गया था?'
'हाँ, गया था.'
'मुझसे बिना पूछे, बिना बताये?'
'तो क्या हुआ?' कन्हैया ने तैश में कहा. कन्हैया की माँ गुस्से में कन्हैया की ओर बढ़ी और उसके गाल में एक तमाचा जड़ा. कन्हैया सकपका गया. असावधानीवश उसके मुंह से वह निकल गया जो उसे छुपा कर रखना था. वह सर झुका कर खड़ा रह गया. माँ ने पूछा- 'कब गया था?' कन्हैया चुप. इसके बाद माँ ने ताबड़तोड़ कई सवाल पूछे लेकिन कन्हैया ने एकदम चुप्पी साध ली और चुपचाप घर से बाहर हो गया और काम के लिए दूकान की ओर निकल पड़ा. रास्ते भर उसे अपनी गलती पर अफ़सोस होता रहा और उसे समझ आ गया कि राधा का घर आना अब मुश्किल है. 
          पूरा दिन वह उदास रहा, किसी प्रकार दिन कटा, रात आई. छुट्टी मिलने पर वह डरते हुए घर में घुसा तो उसने देखा कि माँ और राधा चूल्हे के पास बैठी हुई खाना पका रही है. माँ मुस्कुरा रही है और राधा भाप उगलते भात को पसा रही है. 

(५)

          कन्हैया अब सत्तर वर्ष का हो गया है. बाल-बच्चेदार हो गया है. नाना-दादा भी बन गया है लेकिन उसकी मेहनत और मुस्कराहट अब भी कायम है. यदि आप कन्हैया से मिलना चाहें तो वह आपको बिलासपुर की भारत माता स्कूल के सामने मिल जाएगा, वह वहां स्कूली बच्चों के लिए 'खाई-खजाना' बेचता हुआ मिल जाएगा. 
          एक निवेदन है आपसे कि इस कहानी के बारे में कन्हैया को मत बताइएगा अन्यथा वह मुझ पर नाराज़ हो जाएगा और मुझे उलाहना देगा कि उसकी 'प्राइवेट' बातें मैंने क्यों 'पब्लिक' कर दी. 
          अब तो आप समझ गये होंगे कि उसका सहपाठी मैं ही हूँ....

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