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किस्सा रामप्रसाद अवस्थी का : पहलवानी दांव

किस्सा रामप्रसाद अवस्थी का : पहलवानी दांव 


(१)          

          बादलों का उमड़ना, घुमड़ना और बरसना वैसा ही है जैसा सब दूर होता है लेकिन बिलासपुर की बरसात में गर्माहट, ठंडक और नमी का मिश्रण कुछ खास है। शहर पूरा का पूरा कोलतार की सड़कों से पट गया है इसलिए गाँव की जमीन से उठती महक तो नहीं है परंतु बरसता पानी जब धूल को अपनी बाहों में समेटता है तो किसी जानी-पहचानी महक की हल्की सी याद ज़ेहन में बरबस आ जाती है। ऐसा लगता है कि यहाँ की धरती अतृप्त है लेकिन जो धरती काली सड़कों के नीचे दब गई हो उसकी प्यास को कैसे समझा जाए ? केवल धरती नहीं, यहाँ के रहने वाले लोग भी मुखौटों के पीछे छिपे हुए हैं, असली चेहरा दिखता नहीं। गाँव में भी इस तरह के लोग थे लेकिन वे जैसे थे, वैसे दिखते थे; यहाँ तो जो जैसा है वैसा नहीं, कुछ और-सा लगता है, जो दिखने में क्रूर है वह अंदर से नरम-दिल है और जो सज्जन दिख रहा है, वह दिल में कलुष छिपाए बैठा है। कुछ भी कहो, गाँव की बात ही कुछ और थी। वहाँ का खुलापन जब याद आता है तो यहाँ कसमसाहट महसूस होती है लेकिन हालात ऐसे बन गए कि अपना गाँव छोड़कर इस अनजाने शहर में आना पड़ा। उत्तरप्रदेश के जिला बांदा के एक छोटे से गाँव अर्जुनाह का कृषक-पुत्र रामप्रसाद अवस्थी घर से बेघर होकर एक ऐसी अंजान बस्ती में आ पहुंचा जहां उसका अपना कोई न था लेकिन बिलासपुर जैसी बस्ती में एक ठिकाना तो बन गया।
          रामप्रसाद की गाँव में दस बीघा जमीन थी। गेहूं और चना की भरपूर पैदावार होती थी। घर लायक सब्जी भी हो जाती थी। बैल थे, एक गाय थी और रखवाली के लिए देसी कुत्ता भी था। घर में तेल पिलाई हुई लाठियाँ थी, बंदूक थी और एक तमंचा भी। ऐसा नहीं है कि केवल रामप्रसाद के घर में हथियार रहे हों, घर-घर में रहते हैं। अपना घर बचाना हो या जमीन, ताकत चाहिए, धमकी देने का माद्दा होना चाहिए और मौका पड़े तो शस्त्रों को काम पर भी लगाना चाहिए। लड़ने-भिड़ने के लिए तो बहाना चाहिए होता है, वहाँ तो जरा सी बात बिगड़ी कि बात बिगड़ जाती है। यहाँ तक कि शादी-ब्याह भी लड़ते-भिड़ते हुए निपटते हैं। एक बार की बात है, बड़ी बहन का विवाह था। बाइस कोस दूर से बारात आई थी, डेढ़ सौ लोग थे बारात में। लड़के वाले बात-बात में नखरा बता रहे थे। रामप्रसाद के दद्दा बहुत सहते रहे, कारण, बिटिया के ब्याह में कोई अनिष्ट न हो लेकिन लड़के के बाप का मुंह फैलता गया। दद्दा ने अपनी छः फुटी लाठी हवा में लहराई और चीखे- 'अब चुप्पे-चाप निकल लो, नहीं तो खोपड़िया खोल देंगे। पांव पूजा है, मूड़ नहीं।' उनका रौद्र रूप देखकर पूरी बारात सन्नाटे में आ गई और फिर विदाई तक सब एकदम चुप रहे।
          अर्जुनाह में एक प्राथमिक शाला थी। गाँव के कुछ बच्चे वहाँ पढ़ने जाते थे। दद्दा कहते थे- 'रामपरसाद, इस्कूल में तुम्हारा नाम लिखवाया है, जाते क्यों नहीं ?' रामप्रसाद चुप, क्या जवाब दे ? स्कूल जाना मतलब दुनिया का सबसे बेकार काम। गुरुजी पढ़ाते हैं लेकिन कुछ समझ में नहीं आता, रटने को कहते हैं पर याद नहीं होता। रोज के रोज छड़ी से पिटाई होती है, सब लड़कों के सामने इज्ज़त खराब होती है। दद्दा को क्या बताएं ? दद्दा बड़बड़ाते- 'हम तो पढ़ नहीं पाए, गाँव में इस्कूल होता तो हम ज़रूर पढ़ते। तुमको भेज रहे हैं तो तुम्हारा रंग-ढंग समझ में नहीं आता। अरे, पढ़-लिख लो, आदमी बन जाओगे, बचुवा।' दद्दा समझाते और चिल्लाते भी लेकिन बचुवा के पल्ले यह नहीं पड़ता कि भला पढ़ने-लिखने से कोई आदमी कैसे बन जाता होगा ? अभी हम लड़के हैं, हैं कि नहीं ? जब बड़े होंगे, छाती चौड़ी हो जाएगी, दाढ़ी-मूंछ उग आएगी तो खुद ही आदमी बन जाएंगे, बिन-फोकट स्कूल भेजने के लिए पीछे लगे रहते हैं।
          दिन भर गाँव में इधर से उधर भटकना, तालाब के तीर बैठकर ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंक कर गोल-गोल लहरों को निहारना, साथी इकट्ठा हुए तो 'चल कबड्डी आर-पार, मेरा मूंछा लाल-लाल' का घंटों दौर चलता, लुकाछिपी और रामरस खेलते। सारदा पहलवान कहते- 'रामपरसाद, मर्द की पहचान उसके गठीले बदन से होती है। रोज कसरत करो, दंड-बैठक करो और ब्रह्मचर्य साधो।'
'ये ब्रह्मचर्य क्या होता है गुरु ?' रामप्रसाद ने पूछा।
'तुम नहीं नहीं समझोगे, बच्चे हो। बड़े हो जाओगे तो सब समझाएँगे।'
'आपने कहा कि ब्रह्मचर्य साधो लेकिन उसको कैसे साधें, जब समझेंगे तब तो साधेंगे ?'
'कहा न, बाद में बताएँगे, अभी एक काम करो, अपनी चड्डी के अंदर लंगोट बांधा करो, समझे ?'
          रामप्रसाद के दद्दा बहुत चिंतित थे. देश आज़ाद हुए दस साल बीत गए, गाँव की दशा में कोई बदलाव नहीं आया। फसल का कोई ठिकाना न था, अक्सर बरसात रूठ जाती तो फसल प्यासी सूख जाती या कभी बेमौसम बारिश खड़ी फसल को बर्बाद कर देती। जमीन तो केवल जोतने, बीज बोने और देखरेख करने की हो गई है, मनुष्य के जीवन की तरह, परिणाम सदैव अनिश्चित। खेती न हुई, जुआ हो गया जिसमें दांव अक्सर उलटा पड़ जाता है. किसान की ज़िन्दगी में सुख कहाँ ? अजीब बात है, दूसरों का पेट भरने वाला किसान खुद भूखा सोता है ! जवाहरलाल कहते हैं कि खेतों के लिए सिंचाई के साधन बनाएंगे, खेती की नई तकनीक लाएंगे, देश की तरक्की होगी, कोई भी भूखे पेट नहीं सोएगा। न जाने, कब वो दिन आएंगे ?
गाँव के छोकरे बिगड़ रहे हैं. स्कूल जाने के नाम से थर-थर कांपते हैं. मास्टर भी दुष्ट हैं, लड़कों को पढ़ाते कम हैं, मारते अधिक हैं। छोटे बच्चे हैं, गाँव के हैं, अनपढ़ माँ-बाप की संतान हैं, पैदा होते ही विद्वान तो हो नहीं जाएंगे पर इस बात को न मास्टर समझते और न लड़के। लड़के घर से निकलते हैं स्कूल जाने के लिए, रास्ते में अटक जाते हैं. न जाने कहाँ भटकते हैं। लफंगई करते हैं, पहलवानी कर रहे हैं, कमाई-धमाई की तरफ कोई ध्यान नहीं है। घर का काम बताओ तो उनको नानी याद आती है. ससुरे, न घर के न घाट के। घर में खाने वाले बढ़ते जा रहे हैं, कैसे बसर होगा ? सुना है, भिलाई में लोहा कारखाना बन रहा है, लड़का वहां काम पा जाता तो उसका भविष्य बन जाता लेकिन बहुत दूर है छत्तीसगढ़। वहां तो आदिवासी रहते हैं, जादू-टोना होता है, कोई वहां मरने जाएगा क्या ? ये नेहरू जी को क्या सूझा, जो उधर बनवाया, इधर अपने यूपी में बनवाते तो हम लोगों को नज़दीक पड़ता।
          अम्मा को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था. घर की झाड़ू-बुहारी, कपड़े धोने और चौका-बासन में दिन कब बीत जाता, उसे मालूम न पड़ता। कभी फुर्सत पाती तो रामप्रसाद को समझाती- 'बचुवा, ब्राह्मणों के कुल में तुम्हारा जनम हुआ है, पढ़ो, पढ़ने से बुद्धि आती है, पढ़ोगे तब तो कुछ बनोगे।'
'अम्मा, कुछ भी बोलो, पढ़ने भर को न बोलो, हमसे न होगा. स्कूल जाओ तो मास्टर पीटता है। हम तो पहलवान बनेंगे। जरा ताकत आ जाने दो फिर बताएंगे उस मास्टरवा को.' रामप्रसाद ने निर्णय सुनाया।
'गुरूजी को भला ऐसा कहते हैं ? वो तुम्हारे अच्छे के लिए तुमको मारते हैं।'
'रहने दो, हमें अच्छा नहीं बनना, हम ऐसे ही ठीक हैं' रामप्रसाद ने वहां से भागते हुए कहा। अम्मा ने भगवान राम को हाथ जोड़कर याद किया और मन ही मन प्रार्थना की- 'भगवान, हमारे बचुवा को तनिक बुद्धि दो।'
          रामप्रसाद पंद्रह साल का हो गया, सारदा गुरु की संगत में बदन हृष्ट-पुष्ट हो गया, चेहरा दमकने लगा, इस सबका एक और असर हुआ कि उसका दिमाग चढ़ने लगा। जब देखो तब किसी को भी ललकारने की घटना सुनाई पड़ने लगी। धन, पद, यश और बल के साथ यही बहुत बड़ी मुसीबत है कि ये सीमाबद्ध नहीं रहते।
           इधर‬ रामप्रसाद की उम्र बढ़ रही थी, उधर भाई-बहनों की संख्या बढ़ गई। रामप्रसाद की छोटी बहन चौदह साल की हो गई थी, घर का काम करती, सिलाई-कढ़ाई करती। लड़कियों की पढ़ाई का तो रिवाज ही न था। दो छोटे भाई भी थे, वे भी रामप्रसाद की तरह आगे बढ़ रहे थे। रामप्रसाद अपने दद्दा के साथ खेत जाता, उनके काम में हाथ बँटाता लेकिन कुश्ती लड़ना उसकी प्राथमिकता थी। रोज अखाड़े जाना, कुश्ती के दांव-पेंच सीखना, दंड-बैठक करना उसकी दैनंदिनी का अनिवार्य अंग था। साल में एक बार नागपंचमी के अवसर पर कुश्ती प्रतियोगिता होती तो वह दम-खम से भाग लेता और मुक़ाबला जीतने की कोशिश करता। गाँव की सड़क पर जब वह ज़रा लहरा कर, सीना तान कर चलता तो देखने वालों की नज़र उस पर टिक जाती। लड़कियां भी दरवाजे की आड़ से उसे देखकर मोहित होती, रास्ता चलते हौले से मुस्कुराती लेकिन वह सारदा गुरु की शिक्षा को ध्यान रखते हुए इन सब चक्करों से दूर रहता। एक दिन सारदा गुरु ने उससे पूछा- 'रामपरसाद, क्या सोचा है ?'
'किस बारे में गुरु ?'
'शादी-ब्याह के बारे में।'
'दद्दा तो पीछे पड़े हैं लेकिन हमने मना कर दिया।'
'क्यों, क्यों मना किया ?'
'ब्याह कर लेंगे तो ब्रह्मचर्य का क्या होगा ?'
'तो क्या आजीवन ब्रह्मचारी रहोगे ?'
'क्या पता लेकिन आप तो जानते हैं कि हमारा ब्याह हो चुका है।'
'ब्याह हो चुका है ? कब, किससे ?'
'अखाड़े की मिट्टी से।' रामप्रसाद ने हँसते हुए कहा। सारदा गुरु ने उसकी पीठ पर ज़ोर की धौल जमाई और कहा- 'पगलौट कहीं का।'
          सारदा गुरु नामी पहलवान थे, स्वयं भी गृहस्थ थे, गृहस्थाश्रम के महत्व को समझते थे इसलिए उनको लगा कि उनका चेला भी अपनी गृहस्थी बसाए। लंगोट बांधने की सलाह उन्होंने ही दी थी इसलिए खुलवाने का दायित्व भी उन पर था। रामप्रसाद सोलह साल का हो गया था, शादी लायक उमर हो चुकी थी। गाँव में उसकी उमर के दूसरे लड़के कब के ब्याहे जा चुके थे, कुछ तो बाल-बच्चे वाले हो गए थे लेकिन उनका चेला अभी ब्रह्मचर्य का झूला झूल रहा था। शरीर बनाना, कुश्ती लड़ना तो शौक है लेकिन गृहस्थी बसाना भी ज़रूरी है उसे समझना चाहिए। रामप्रसाद ने पहलवानी में अच्छा शरीर बनाया किन्तु यदि अर्जित शक्ति विसर्जित न हुई तो या तो मनुष्य साधु बनेगा या उत्पाती। साधु बनने के कोई लक्षण तो हैं नहीं, यह लड़का आगे चलकर गाँव के लिए कहीं कोई समस्या न बन जाए ! सारदा गुरु ने मन ही मन निर्णय लिया कि वे रामप्रसाद को ब्याह करने के लिए समझाएँगे, उसके बाद उसके दद्दा से बात करेंगे क्योंकि उनकी नज़र में रामप्रसाद के लायक एक अच्छी लड़की उनकी रिश्तेदारी में थी।
          इसके बाद रामप्रसाद की ज़िंदगी में एक जबर्दस्त मोड़ आया। आप बखूबी अनुमान लगा सकते हैं कि कौन सा मोड़ आया होगा, हो सकता है कि रामप्रसाद को किसी लड़की से प्यार हो गया हो। जहां तक प्यार करने का सवाल है, उस जमाने में दोतरफा प्रेम असंभव था, आम तौर पर एकतरफा होता था। दोतरफा प्रेम बहुत 'रिस्की' था। एक तो होता नहीं था, अगर हो जाए तो एकांत की समस्या रहती थी, यदि एकांत मिल जाए तो नज़दीकी नहीं बनती थी क्योंकि सात फेरे पूरे किए बिना लड़की अपना बदन छूने की अनुमति नहीं देती थी; यदि नज़दीकी बन जाए तो अंतरंगता नहीं हो पाती थी क्योंकि गर्भाधान का खतरा मंडराता था, यदि कदाचित अंतरंगता बन जाए और संयोगवश गर्भाधान हो जाए तो गर्भपात का कोई उपाय न था, बदनामी का डर अलग। वैसे भी, उस युग में 'प्रेम' को विवाह में परिवर्तित करना असंभव था क्योंकि दोनों के बाप सूचना प्राप्त होते ही एक दूसरे के शत्रु हो जाते थे, उनके बीच लट्ठ चल जाते थे, खून की नदियां बह जाती थी। इसी कारण वैसी परिस्थिति उत्पन्न ही न हो, उसी में सबकी भलाई थी इसलिए तात्कालीन युवा बेचारे बहुत लालायित होने के बावजूद मन मसोस कर रह जाते थे। फिर भी, मान लो, दोनों संयम न रख पाए और लड़की गर्भवती हो गई तो वह किसी कुएं में कूदकर अपने प्राण दे देती, उसके उपरांत कथानक से लड़की विलुप्त हो जाती और लड़के के शुभ-विवाह का मार्ग प्रशस्त हो जाता।
          आप एक अन्य अनुमान भी लगा सकते हैं कि रामप्रसाद ने अपने गुरु की बात मान ली होगी, धूमधाम से उसका विवाह हो गया होगा और रामप्रसाद ने अपनी नव-विवाहिता पत्नी को किसी अन्य कमरे में जाकर सोने का आदेश सुना दिया होगा ताकि उसका ब्रह्मचर्य अक्षुण्ण बना रहे ! पाठक अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन ये जो ज़िंदगी है न, यह पूर्वानुमानों पर नहीं चलती, विचित्र मोड़ लेने की आदी है। रामप्रसाद की जिंदगी ने कैसा मोड़ लिया, यह मैं आपको बाद में बताऊंगा, अभी आपको मैं अपने छत्तीसगढ़ में स्थित शहर बिलासपुर के बारे में कुछ बताऊंगा।


(२)

          ऐसा सुना है कि घिर्रऊ और बरउआ बिलासपुर के वे पुराने लोग हैं जिन्होंने बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में हलवाई की दूकान खोली थी। उन दिनों वहाँ दूध, मलाई, जलेबी, लड्डू, बालूशाही, मैसूर पाक, सूजी का हलवा, पेठा; नमकीन सलोनी, सेव आदि बनते-बिकते थे। चाय-काफी, समोसा, आलूबड़ा, भजिया का चलन बहुत बाद में शुरू हुआ, संभवतः सन 1930 के बाद। बिलासपुर के शहर बनने की शुरुआत गोलबाजार के निर्माण से हुई जिसे सन 1936 से 1938 के मध्य गोलाकार शैली में बनवाया गया। झोपड़ी छाप हलवाई की दूकानें खत्म हो गई और गोलबाजार में बड़े आकार की दूकानें खुली। सबसे पहले आए, बिरजी हलवाई, कल्लामल बृजलाल। इस दूकान ने धूम मचा दी। दूकान इस कदर चलती थी कि एक किवदंती प्रचलित हो गई- 'बिरजी सेठ के यहाँ रात को तांगे में बैठकर मिठाई खरीदने के लिए एक जिन्न आता है और ढेर सारे रुपए दे जाता है।' हो सकता है कि जिन्न आता रहा हो लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उसके पास हलवाई को देने के लिए जार्ज पंचम के चांदी से निर्मित सिक्के कैसे आते रहे होंगे ?
          उसके बाद उत्तरप्रदेश के दो परिवार बिलासपुर आए, रघुनंदनप्रसाद पांडे और गयाप्रसाद पांडे, फिर मनेन्द्रगढ़ से जगदीशनारायण अग्रवाल आए, मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आए. स्थानीय शिवप्रसाद केशरवानी, श्यामलाल अग्रवाल, रणछोड़भाई मेहता ने भी दूकानें खोली। गोलबाजार एक अघोषित 'मिठाई लाइन' बन गई जो पूरे बस्ती के आगमन और आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गया। घरों में नाश्ता बनाने का रिवाज़ नहीं था इसलिए पुरुष सुबह होते ही घर से बाहर निकलते और इन हलवाइयों की दूकानों में घुस जाते और अपना मनपसन्द नास्ता करते। औरतों का घर से बाहर निकलने का रिवाज़ नहीं था इसलिए न तो उन्हें नास्ता नसीब होता और न ही उन्हें पुरुषों की इस चोट्टाई की खबर होती। 
         
(३)

           आपको रामप्रसाद की ज़िंदगी में आए 'टर्निंग-पाइंट' के बारे में बताना है इसलिए अब हम पुनः यूपी के जिला बांदा के ग्राम अर्जुनाह की सीमा में प्रवेश करते हैं। रामप्रसाद अपने काम से काम रखता था, प्रतिदिन व्यायाम करता, खेत में दद्दा की मदद करता। एक दिन वह अपने घर भोजन के लिए आया तो उसकी छोटी बहन रो रही थी।उसने पूछा- ‘क्या हुआ, क्यों रो रही है ?’
‘भैया, मुझे बिसेसर बहुत परेशान करता है.’ बहन ने बताया।
‘कौन ? बिसेसर ठाकुर ?’
‘हां, आज तालाब नहाने गई थी तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।’
‘उसकी ये हिम्मत ?’
‘मैं उसको बोली, भैया को बताऊंगी तेरी ये हरकत।’
‘तो ?’
‘बोला- ‘तेरा भाई मेरा क्या बिगाड़ लेगा।’
‘ऐसा बोला ?’
‘हां लेकिन तुम उससे मत उलझना भैया, उनका पूरा परिवार लड़ाकू है, सब के सब गुन्डे हैं।’
‘ठीक है, उसको मैं देख लूंगा, अब से तुम उधर मत जाना।’ रामप्रसाद ने उसे शांत स्वर में समझाया लेकिन अंदर ही अंदर वह गुस्से से उबल रहा था. इस बीच उसकी बहन घर के अन्दर किसी काम से गई, रामप्रसाद ने लाठी निकाली और सीधे सारदा गुरु के घर पहुंचा. गुरु ने पूरी बात सुनी और बोले- ‘चल, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ.’ दोनों बिसेसर के घर पहुंचे और उसे ललकारा. बिसेसर ने उन दोनों को खिड़की से झांककर देखा और कुछ देर बाद अपने भाइयों के साथ लाठियों से लैस बाहर निकला और एक दूसरे पर लट्ठ चल पड़े. लाठियां चलाने में सब सिद्धहस्त थे. वार होते रहे, बचाव भी हुए, तब ही एक घातक वार सारदा गुरु के सिर पर पड़ा, उसका सिर फ़ट गया और वह जमीन पर चिल्लाते हुए लोटने लगा. रामप्रसाद अकेला पड़ गया, उसे समझ में आ गया कि अब उसका बचना मुश्किल है. उसके सामने करो या मारो की स्थिति आ गई. उसने झपट्टा मारकर बिसेसर की गर्दन दबोच ली और जब तक उसके भाई देख पाते तब तक बिसेसर टें बोल गया. बिसेसर के भाइयों का ध्यान जमीन पर पड़े निष्प्राण बिसेसर पर गया और रामप्रसाद मौका ताड़कर वहां से सरपट भागा. बस अड्डे पर खड़ी एक बस में बैठ गया, बस चल पड़ी. उसकी सांस बहुत तेज चल रही थी लेकिन बस धीमी चल रही थी. कन्डक्टर ने उससे पूछा- ‘कहां जाना है ?’
‘ये बस कहां जा रही है ? उसने पूछा.
‘बांदा.’
‘वहीं जाना है.’ रामप्रसाद ने अपनी सांस को संयत करते हुए कहा.
          बांदा के बस अड्डे के पास ही रेलवे स्टेशन था। रामप्रसाद तेज कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ा, सामने एक ट्रेन थी, मानिकपुर जा रही थी, टिकट लेकर बैठ गया। पैसेंजर थी, हर स्टेशन पर रुकती और रामप्रसाद की धड़कन बढ़ जाती। वह सतर्क निगाह से सब ओर देख रहा था कि कहीं पकड़ा न जाए। राम-राम करते मानिकपुर आया। वहाँ उसे कटनी की ओर जानेवाली गाड़ी दिखी, टिकट खरीदी और उसमें बैठ गया। उसने सुना था कटनी के आगे जबलपुर है, बड़ा शहर है, वहाँ पहुँच जाऊंगा तो वहाँ कौन खोज पाएगा। ले-दे कर कटनी आया। पूछ-ताछ करने पर मालूम पड़ा कि जबलपुर की गाड़ी सात घंटे बाद है, उतनी देर तक कटनी स्टेशन में रुके रहने से पकड़े जाने का खतरा था। सामने वाले प्लेटफार्म पर एक गाड़ी का इंजिन सीटी बजाकर जाने की सूचना दे रहा था। रामप्रसाद दौड़कर उसमें चढ़ गया, टिकट लेने का समय न था।
          थर्ड क्लास के डिब्बे में उसने बैठने की जगह बनाई, यात्रियों से पूछने पर मालूम पड़ा, ट्रेन बिलासपुर जा रही है। बिलासपुर का उसने नाम बहुत सुना था लेकिन उसे इस तरह भगोड़ा बनकर जाना पड़ेगा, ऐसा उसने सपने में भी नहीं सोचा था। धीरे-धीरे रात घिरने लगी, डिब्बे में धीमी रोशनी थी, वह सहज भाव से बैठा रहा लेकिन नज़र उसकी अब पीछा करने वालों पर कम, टिकट-चेकर पर अधिक थी। शहडोल स्टेशन से ट्रेन छूटने के बाद मुसीबत काला कोट पहने चढ़ गई, रामप्रसाद ने जैसे ही उसे देखा, उसके दिल की धड़कन बढ़ गई। वह उठा और टीसी की विपरीत दिशा वाले संडास में घुस गया और चुपचाप उस बदबू में घंटे भर बैठा रहा। बाहर निकलकर उसने नज़र घुमाई, आफत जा चुकी थी लेकिन उसकी सीट पर कोई और बैठ गया था। उसे गुस्सा बहुत आया, उसका गाँव होता तो उठाकर बाहर फेंक देता लेकिन इस परिस्थिति में चुप रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न था, समझा-बुझा कर उसने थोड़ी जगह बनाई और बैठे-बैठे सो गया।
          सुबह एक झटके से उसकी नींद खुली, सब लोग डिब्बे से उतर रहे थे, बिलासपुर आ गया था। बाहर पानी बरस रहा था, हवा तेज चल रही थी, बौछार से उसके कपड़े भीग गए। भागकर वह शेड के नीचे पहुंचा और बारिश रुकने का इंतज़ार करते बहुत देर तक भाप छोडते इंजिन को देखता रहा जो रात भर की यात्रा के बाद सुस्ताता खड़ा था और गहरी सांस ले रहा था।

(४)

          बैठे-बैठे एक घंटा बीत गया लेकिन बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह सोच रहा था- 'बरसात की ऐसी झड़ी तो हमारी तरफ नहीं होती। पानी आता है तो थोड़ी देर बरस कर निकल जाता है। हमारे यहाँ गेहूं और चना की खेती में पानी कम लगता है, सुना है, चांवल की फसल को बहुत पानी लगता है। मुझसे तो चावल खाया नहीं जाता, खा लो तो पेट में दर्द उठने लगता है। अपने यहाँ की रोटी और सब्जी का स्वाद अलग है। अम्मा जब हाथ से थाप कर गरम-गरम रोटी सेंक कर देती है तो उसकी मिठास का क्या कहना?'
          अम्मा की रोटी की याद आते ही उसे भूख ने आ घेरा। उसने कल सुबह से कुछ खाया नहीं था। कुर्ते की जेब में पैसे खोजे, डेढ़ रुपए निकले। दो आलूबड़ा लिया और एक कप चाय, पेट में अन्न गया तो दिमाग आगे बढ़ा। उसके दिमाग में सवाल उठा- 'अब क्या ?'
          नई जगह, न जान न पहचान, एक घबराहट से पिंड छूटा तो दूसरी शुरू हो गई। कुछ देर बाद बारिश रुकी, रामप्रसाद स्टेशन के बाहर निकला। बाहर तांगे की लाइन लगी थी, उनके घोड़े बीच-बीच में हिनहिना रहे थे और तांगेवाले आवाज लगा रहे थे- 'बस्ती चलो बस्ती, आठ आने...' रामप्रसाद एक तांगे के पास पहुंचा और उससे पूछा- 'बस्ती जाने का आठ आना? कितनी दूर है जो आठ आने बोल रहे हो?'
'पाँच मील है यहाँ से गोलबाजार।'
'फिर भी जादा है, चार आने में ले चलो।'
'चलो, छै आने देना, बैठो बोहनी का टाइम है।'
'ये बोहनी क्या होती है ?'
'सुबह-सुबह के पहले ग्राहक से जो पैसा मिलता है उसे बोहनी कहते हैं।'
'तो मैं पहला ग्राहक हूँ।'
'हौ, बैठो, जल्दी बैठो तब तक मैं और सवारी लेकर आता हूँ।' तांगे वाले ने कहा।
          तांगे वाले का घोड़ा दुबला-पतला था, मुंह में फंसे लोहे को चबा रहा था और बार-बार अपना सिर ऊपर-नीचे कर रहा था। बीच-बीच में बदन पर बैठी मक्खी को अपनी पूंछ से उड़ा रहा था लेकिन जिद्दी मक्खी उड़ती और फिर आकर बैठ जाती। घोडा बेचैन था लेकिन पूंछ हिलाने के अलावा कोई दूसरा उपाय उसके पास न था।
          दस मिनट के अंदर पाँच सवारियां और आ गई, 'खसक के बैठो भैया, थोड़ा आगे-पीछे हो जाओ मालिक, चल, आगे बढ़, बढ़ मेरे राजा...' कहते हुए तांगेवाले ने घोड़े के पुट्ठे में चाबुक चलाया, घोडा हिनहिनाते हुए आगे बढ़ा और सरपट दौड़ने लगा। तांगेवाला अपनी चाबुक की छड़ी को तांगे के चक्कों में अड़ाता और खड़-खड़-खड़ की आवाज़ निकालकर आधुनिक 'हार्न' जैसा अपने वाहन के आगमन का संकेत दे रहा था।
          ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होता हुआ तांगा पौन घंटे में एक जगह आकर रुक गया। सवारियां उतरने लगी। रामप्रसाद ने तांगेवाले की ओर देखा, तांगेवाले ने कहा- 'अब उतरो भैया, गोलबाजार आ गया, निकालो छै आना।' घोड़े के ऊपर बैठी मक्खी भी उड़ते-बैठते गोलबाजार आ गई। घोड़े ने उससे कुछ नहीं मांगा, मक्खी ने भी कुछ नहीं दिया और इतना लंबा सफर संपन्न हो गया। पशु और जीव-जन्तु के मध्य कोई व्यापार नहीं होता, यह इंसान ही ऐसा है जो बिना पैसा लिए कुछ नहीं करता !
          कुछ दूर पैदल चलने के बाद हलवाई की एक दूकान पर रामप्रसाद का ध्यान गया। गद्दी पर धोती-कुर्ता-टोपी धारण किए हुए एक बुजुर्ग बैठे थे जिन्हे देखकर उसे अपनापन जैसा लगा। वे गयाप्रसाद पाण्डेय थे। उसने उनको हाथ जोड़े और पूछा- 'आपके यहाँ कुछ काम मिलेगा ?'
'क्या काम जानते हो ?' दूकान मालिक ने पूछा।
'जीवन में पहली बार काम मांग रहा हूँ, घर में खेती है।'
'कौन जात हो ?'
'ब्राह्मण, अवस्थी।'
'यहाँ तो जूठा उठाने का काम है, ब्राह्मण से जूठा कैसे उठवाएंगे ?'
'सही बात है लेकिन सब समय एक जैसा कहाँ होता है ! आप जो कहेंगे, करूंगा, सब करूंगा।'
'घर कहाँ है ?'
'यूपी, जिला बांदा।'
'कौन गाँव ?'
'अर्जुनाह।'
'अरे, हम भी वहीं के हैं, बवेरु के।'
'हाँ !'
'हाँ, यहाँ कैसे आ गए ?'
'आपको क्या बताएं, हमारा दिमाग बिगड़ गया, बाप से लड़कर चले आए।'
'ठीक है, देस से आए हो तो फिर रहो लेकिन किसी से न कहना कि ब्राह्मण हो, अपना नाम भर बताना, समझे। कोई जान जाएगा तो हमें दोष देगा कि ब्राह्मण से जूठा उठवा रहे हो। तीस रुपिया महीना मिलेगा, यहीं खाना खा लेना और रात को चबूतरे पर सो जाना।' गयाप्रसाद बोले।
'जी, बहुत कृपा आपकी।'
'सामान कहाँ है तुम्हारा ?'
'जो पहना हूँ, वही सामान है।' रामप्रसाद ने बताया।
इस प्रकार रामप्रसाद को बिलासपुर में एक ठिकाना मिल गया।
          गयाप्रसाद पान्डे महराज की होटल में सुबह छः बजे से रात दस बजे तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। अल-सुबह जलेबी की तई भट्ठी पर चढ़ती तो रात तक अनवरत जलेबी बनती रहती जिसे खाने के लिए पूरे होटल में पसरी गंदगी और बदबू को दुर्लक्ष्य कर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती। उनके पास एक जलेबी बनाने वाला एक कारीगर था जिसे पहलवान उस्ताद कहते थे और वह मोहल्ला चांटीडीह में रहता था। तेज आंच वाली भट्ठी में बैठकर सुबह से लेकर रात तक जलेबी बनाना बेहद कठिन काम होता है लेकिन वह निर्विकार भाव से बदन के पसीने को गमछे से पोछता हुआ अपने काम को इतनी लगन से करता जैसे कोई भक्त मंदिर में कीर्तन करता है।
          जलेबी के साथ स्वादवृद्धि के लिए दो नमकीन भी थे। एक- आलू और प्याज को भूंज कर बनाए गए मसाले के ऊपर बेसन लपेट कर तला गया ‘आलूबड़ा' और दूसरा- पिछली रात बच गए नमकीन को मसल कर, उसमें बेसन और मिर्च मसाला मिला कर तेज लहसुन की छौंक से तैयार किया गया 'प्याज बड़ा'। जलेबी के साथ इन दोनों का 'काम्बिनेशन' इस कदर जायकेदार होता था कि मजा आ जाता। नाश्ते की ये तीनों वस्तुएं जब तैयार होती तो इनकी खुशबू इतनी फैलती कि सड़क चलता इन्सान सम्मोहित सा होटल में खिंचा चला आता। एक बड़ी केतली भर कर चाय बनती जिसे चालू चाय कहा जाता था क्योंकि उसमें पानी की मात्रा अधिक होती थी और बाजार में प्रचलित कीमत से सस्ती थी, परंतु उसका स्वाद लाजवाब था। आसपास के मोहल्ले का आदमी यदि पान्डे महराज की होटल में किसी वजह से किसी दिन न जाए पाए तो उसे रात में बुरे-बुरे सपने दिखाई देते थे।     
          काम लग जाने से रामप्रसाद को तनिक धीरज बंध गया लेकिन वह जिस माहौल से आया था वह काम करने नहीं, काम लेने वाला था। घर का ऐश-आराम, गाँव में मान-सम्मान, दोस्ती-यारी, घूमना-फिरना, खाना-पीना और रुआब, सब कुछ सहसा हाथ से फिसल गया। सीना तान कर चलने वाला रामप्रसाद आँखें छुपा कर जीने के लिए मजबूर हो गया। पहचान छुपाने के लिए उसने अपना सिर घुटा लिया, मुछमुंडा हो गया और अपना लिबास भी बदल लिया। गाँव में उसका पहरावा धोती-कुर्ता था, यहाँ उसने हाफ़पेंट और कमीज सिलवाई, लंबी कमीज, जिसके अंदर अक्सर उसका हाफ़पेंट छुप जाता था और ऐसा लगता था जैसे वह केवल कमीज पहने हुए है। रोटी-सब्जी खाने वाला मनुष्य अरुचिकर चावल का भात और चटनी खाने लगा। ज़िंदगी ने ऐसी पलटी मारी कि उसके नाम से अवस्थी हट गया, केवल रामप्रसाद रह गया।
          उस समय नास्ते की दूकानों में ग्राहक अंदर लगी बेन्च में बैठते, हाथ में दोना पकड़कर खाते और वहीं जमीन पर दोना फेंककर हाथ से टेड़ कर पानी निकालने वाले नल के पास जाते, अपना हाथ धोते, गद्दी पर विराजमान मालिक को बताते कि 'उसने क्या-क्या खाया।' दूकानदार मनगणित से पैसा जोड़ते और भुगतान ले लेते। इस तरीके से परस्पर विश्वास के आधार पर ग्राहक और दूकानदार के मध्य लेनदेन चलता था लेकिन कुछ चतुर-सुजान ग्राहक भी होते हैं जो भरोसे की दीवार में छेद करते हैं। ऐसे लोग कम सामान बताकर घपला करते, पैसे देते समय गंभीर चेहरा बनाते और दूकान से बाहर निकलकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते। रामप्रसाद ने कुछ ग्राहकों की इस चालाकी को ताड़ लिया और पांडे महाराज को शिकायत पेश की। रास्ता यह निकला कि ग्राहक जितना सामान लेंगे, उसका हिसाब जोड़कर रामप्रसाद आवाज लगाकर पैसे बताएगा। इस प्रकार एक नया चलन शुरू हुआ, रामप्रसाद काम करते जाता और जैसे ही ग्राहक मुंह पोछते हुए गद्दी के पास पहुंचता, वह ज़ोर से आवाज लगाता- 'लेना पैसे लेना, आठ आना।' या, इसी तरह जितना भी भुगतान ग्राहक का देय होता। यह आवाज सड़क तक जाती और सड़क पर आने-जाने वाले लोग इस आवाज को सुनकर ठिठक जाते, उन्हें नास्ता करने का बरबस स्मरण हो आता और इस प्रकार पांडे महाराज की दूकान में भीड़ और अधिक बढ़ने लगी।
          पुरानी कहावत है- 'रांड रंडापा काट ले, रंडुवे काटन दें' अर्थात विधवा अपना जीवन पवित्रता से व्यतीत कर सकती है लेकिन विधुर उसके पीछे पड़े रहते हैं। इस बीच चतुर-सुजान ग्राहकों ने भी अपना दिमाग लगाया और रामप्रसाद के कुरते की जेब में चवन्नी-अठन्नी टपकाने लगे, रामप्रसाद की जेब में पहले से ही चिल्हर रहती थी, जब और जुड़ने की आवाज़ उसके कानों में प्रविष्ट होती तो ग्राहक के 'बिल' में 'आटोमेटिक' कमी हो जाती। लोग अपने मित्र के साथ आते, पेट भर कर नास्ता-चाय लेते और रामप्रसाद आवाज़ लगाता- 'लेना पैसे लेना, चार आना।' कुछ समय तक ऐसा चला फिर भेद खुल गया, नौकरी चली गई। बगल की दूकान 'पेंड्रावाला' में काम मिल गया और वहां से आवाज़ उभरने लगी- 'लेना पैसे लेना, आठ आने लेना।' पेंड्रावाला को मालूम था कि रामप्रसाद को पड़ोसी ने काम से क्यों निकाला। ऐसे आदमी को काम पर रखना 'रिस्की' था लेकिन पेंड्रावाला और पांडे महाराज में बहुत फर्क था।
          दोनों दूकानें अगल-बगल थी लेकिन दोनों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा न थी। दोनों के ग्राहक अलग-अलग थे। पेंड्रावाला में आनेवाले ग्राहक गंभीर किस्म के थे, लौंडे-चपाटी वहाँ घुसने की हिम्मत नहीं करते थे। रामप्रसाद की ऊपरी कमाई एकदम कम हो जाने की एक वजह और थी कि पेंड्रावाला के मालिक रूपनारायण अपने पड़ोसी पांडे महाराज की तरह गऊ स्वभाव के नहीं थे। वे चाक-चौबन्द-धाकड़ व्यापारी थे जिनके सामने अच्छे-अच्छे भयभीत मुद्रा में खड़े रहते थे क्योंकि वे स्वभाव से कड़क, अपशब्दों के प्रयोग में पारंगत और पकड़ कर ठुकाई करने के लिए प्रसिद्ध थे।
          रामप्रसाद की तनख्वाह बढ़ती गई और धीरे-धीरे वह सौ रुपए मासिक का मुलाज़िम हो गया। महाकंजूस था वह, साल के साल बीत जाते, कुछ खर्च न करता और वह अपनी तनख्वाह मालिक के पास ही जमा रखता। उसे हर महीने एक शीशी 'शार्कोफेराल' नामक टानिक खरीदना होता था ताकि उसके शरीर में मज़बूती कायम रहे। उस दवा के लिए छः रुपए वह मालिक के छोटे भाई को बहला-फुसला कर ले लेता था और उसका 'डिपाजिट फिक्स' बना रहता।
          अंत में आपको रामप्रसाद के बारे में कुछ और बता दूँ और उसे विदा करूँ। इस समय आपको लेखक पर गुस्सा आ रहा होगा कि कहानी को यहाँ तक लाए और रामप्रसाद को क्यों टपकाया जा रहा है? दरअसल लेखक को पात्र के बारे में जितना मालूम था, उतना सब बता दिया। वैसे भी, इस संसार में जो आया है वह एक पात्र है और उसके जीवन से मृत्यु तक का काल एक घटना ही तो है।

(५)

          हर साल वर्षाऋतु में गोलबाजार की एक सह-सड़क पर रामलीला का आयोजन होता था। मंडली चित्रकूट से आती थी, रोज शाम को बाजपेयी गली में आठ बजे हारमोनियम और तबले की थाप गूंजने लगती। लोग अपने घरों से खाना निपटा कर जमीन पर बिछाने के लिए बोरियां लेकर पहुँच जाते, पालथी मारकर बैठते और सपरिवार रामकथा के साक्षात प्रदर्शन का आनंद और पुण्य अर्जित करते। सड़क खचाखच भर जाती। रामकथा वैसे ही रोचक है, रामलीला के कलाकार अपनी ओर से कुछ और जोड़कर उसे अधिक मनोरंजक बनाते। जोकरई होती थी, अट्टहास सुनाई पड़ता था, युद्ध-नृत्य का प्रदर्शन होता था और कहानी को ऐसी जगह ले जाकर अटकाते जहां सीता और राम को एक साथ मंच पर बैठाए जा सके। सिया-राम की जोड़ी के समक्ष दर्शक हाथ जोड़कर खड़े हो जाते, कुछ उन्हें पैसे चढ़ाते और कुछ समर्थ लोग पाँच रुपए, दस रुपए की घोषणा अपने नाम के साथ करवाते। इसके अलावा बहुत देर तक उस व्यक्ति की प्रतीक्षा की जाती जो सिया-राम की जोड़ी को अपने हाथों से फूलों की माला पहनाए। यह अधिकार केवल उस व्यक्ति को मिलता जो मंडली के समस्त सदस्यों को अगले दिन अपने घर में भोजन करवाए या भोजन में व्यय होने वाली राशि मंडली को नगद दे दे। ऐसे दानी व्यक्ति की प्रतीक्षा रात को बारह बजे तक चलती, कोई न कोई आ ही जाता और अगर कोई न आता तो उस रात की माला रामप्रसाद पहनाता। माला अर्पित करने का उसे अवसर अक्सर मिलता क्योंकि कई बार माला अर्पित करने कोई न आता। वह दिलदारी के साथ उस भोजन का खर्च अपने ऊपर ले लेता और केवल तब ही उसका 'फिक्स डिपाजिट' टूटता जबकि एक दिन का भोजन देने में उसकी एक माह की तनख्वाह खर्च हो जाती थी।
          रामप्रसाद लगभग बारह साल तक बिलासपुर में रहा। उसके बाद उसे अपने गाँव की याद सताने लगी। इतनी लंबी फरारी बिताने के बाद वह अपने गाँव अर्जुनाह लौट गया, फिर कभी वापस नहीं आया। ऐसा सुनने में आया है कि बिसेसर के परिवार वालों को जब रामप्रसाद के गाँव वापस आने की सूचना मिली तो उन्होंने अपना बदला लेने के लिए उसकी हत्या कर दी।
          बिलासपुर के गोलबाज़ार में आज भी रामप्रसाद की उस आवाज़ को लोग दिल से याद करते हैं, 'लेना पैसे लेना, आठ आने लेना।'
       
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