किस्सा प्रभुदत्त खेड़ा का : पढ़ा लिखा आदमी (१) उन दिनों हिंदुस्तान बहुत बड़ा था, पूरब से पच्छिम तक खूब फैला हुआ था. हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दू थे और मुसलमान और पठान भी, सिख थे और ईसाई भी लेकिन सब हिंदुस्तानी थे. इन सबका रहन-सहन, खान-पान अलहदा था, वेशभूषा और बोली अलग-अलग थी लेकिन सबका दिल एक-दूसरे के लिये एक जैसा धड़कता था. इसी हिन्दुस्तान में एक शहर था लाहौर, वही लाहौर जो अपने सीने हिंदुस्तानियत का ज़ज्बा समेटे रहता था और दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसा हसीन शहर माना जाता था. इसी लाहौर में सन १९२८ की गर्मियों में सोमदत्त खेड़ा के घर में पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया, प्रभु दत्त. सोमदत्त कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट थे, उनकी दिली ख्वाहिश थी कि प्रभुदत्त भी खूब पढ़े लेकिन उनके साथ समय ने कुछ ऐसा खेल किया कि उन्हें लाहौर छोड़ कर लुधियाना के पास झंग नामक गाँव में जाकर बसना पड़ा. झंग छोटी बस्ती थी, एक स्कूल था जिसमें प्राथमिक शाला लगती थी. एक हेड मास्टर था जो मास्टर भी था और पोस्टमास्टर भी. अकेला...
स्मृतियों के झरोखे से बिलासपुर शहर के लोग