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Showing posts from May, 2017

किस्सा प्रभुदत्त खेड़ा का : पढ़ा लिखा आदमी

किस्सा प्रभुदत्त खेड़ा का : पढ़ा लिखा आदमी    (१)           उन दिनों हिंदुस्तान बहुत बड़ा था, पूरब से पच्छिम तक खूब फैला हुआ था. हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दू थे और मुसलमान और पठान भी, सिख थे और ईसाई भी लेकिन सब हिंदुस्तानी थे. इन सबका रहन-सहन, खान-पान अलहदा था, वेशभूषा और बोली अलग-अलग थी लेकिन सबका दिल एक-दूसरे के लिये एक जैसा धड़कता था. इसी हिन्दुस्तान में एक शहर था लाहौर, वही लाहौर जो अपने सीने हिंदुस्तानियत का ज़ज्बा समेटे रहता था और दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसा हसीन शहर माना जाता था. इसी लाहौर में सन १९२८ की गर्मियों में सोमदत्त खेड़ा के घर में पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया, प्रभु दत्त.           सोमदत्त कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट थे, उनकी दिली ख्वाहिश थी कि प्रभुदत्त भी खूब पढ़े लेकिन उनके साथ समय ने कुछ ऐसा खेल किया कि उन्हें लाहौर छोड़ कर लुधियाना के पास झंग नामक गाँव में जाकर बसना पड़ा. झंग छोटी बस्ती थी, एक स्कूल था जिसमें प्राथमिक शाला लगती थी. एक हेड मास्टर था जो मास्टर भी था और पोस्टमास्टर भी. अकेला...

किस्सा बजरंग केडिया का : अखबार से लिपटा आम

किस्सा बजरंग केडिया का : अखबार से लिपटा आम (१)           बड़े शहरों में बातें बतंगड़ नहीं बनती लेकिन छोटी बस्तियों की बातों के पंख होते हैं। सबसे बड़ी वजह होती है, आपसी सरोकार, उसके बाद होती हैं कई छोटी-मोटी बतकहियाँ। छोटी बस्ती का हर व्यक्ति अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ अच्छी तरह से बंद रखता है, यहाँ तक कि रोशनदान भी लेकिन वही व्यक्ति दूसरे के दरवाजे, खिड़कियों और रोशनदान की दरारों से झांक कर अंदर के हाल-चाल को जानने और उसे प्रसारित करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है। पुराने जमाने में 'यू ट्यूब' नहीं था इसलिए पुरुषों की बहुत सी जिज्ञासाएँ बड़ी मुश्किल और जुगाड़ से शांत होती थी। ऐसा न समझें कि 'यू ट्यूब' में उपलब्ध अनावृत्त चित्र देखना ही एक मात्र उत्सुकता रही होगी वरन यह जानकारी भी आवश्यक थी कि किसके घर में क्या चल रहा है, क्या हो रहा है ? कुछ नहीं हो रहा है तो क्यों नहीं हो रहा है ?           पुराने समय में परिवारों में बहुत पूछताछ हुआ करती थी। कहाँ जा रहे हो ? क्यों जा रहे हो ? कब आओगे ? वर्तमान समय में ऐसे सवाल दम तोड़ चुके हैं...