दिल की बात किशोरावस्था में हम 'धर्मयुग' पढ़ते थे. सबसे पहले आबिद सुरती का कार्टून कोना 'ढब्बू जी', उसके बाद पूरा 'धर्मयुग'. उसी धर्मयुग में मैंने कभी कवियित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से चोरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं, नाम भी वही हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं. इन कहानियों के बहुत से पात्र दिवंगत हो चुके हैं, जो चले गए, उनसे कोई डर नहीं है लेकिन जो अ...
स्मृतियों के झरोखे से बिलासपुर शहर के लोग